माक्र्सवाद की कार्बन काॅपी और भारतीय जनसमाज

रजीबा की क्लास
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अक्सर यह देखने में आता है कि आप गरीबी के बारे में बात कर रहे हैं, आमजन के रोजमर्रा के अभाव, संकट अथवा चुनौतियों पर विचार कर रहे हैं या फिर भारतीय जनसमाज की स्वतन्त्रता, समानता, न्याय आदि के बारे में बहस-मुबाहिसे कर रहे हैं, तो लोग कहेंगे कि आप ‘काॅमरेड’ हैं, ‘लाल-सलामी’ हैं, माक्र्सवादी हैं या और कुछ न हुआ तो माओवादी या नक्सली हैं। हे भगवान! माक्र्सवाद कोई बुनियादी एवं मौलिक सैद्धान्तिकी या वैचारिकी न होकर बल्कि  चिनिया-बादाम जैसे हो गया कि निखोरा-तोड़ा और मूँगफली की तरह गटक लिया।

छिपा अब किससे है कि राजनीति भारतीय समाज को लील रही है। और हम(खाए-पिए-अघाए लोग) लोकतंत्र का कंठीमाला फेर रहे हैं....जन-गण-मन गा रहे हैं....वन्दे-मातरम्...सुजलाम-सुफलाम चिल्ला रहे हैं(मेक इन इंडिया वाले इस घड़ी अवसादग्रस्त हैं, सो उनकी बात छोड़ दीजिए...)। भारतीय समाज भजनार्चन में तल्लीन है। आजकल यह भजनार्चन सभी को बेहद सुहा रहा है। लिहाजा, सर्वत्र शान्ति है। सुकून-चैन बिंदास-बेलौस है। ऐसे में माक्र्सवाद, समाजवाद की बात महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि भारतीय माक्र्सवाद राजनीतिक रूप से आजकल उड़नखटोला पर उड़ रहा है। यह किसी को नहीं दिख रहा है कि ज़मीनी आदमी के हक़-हकूक के बारे में लड़ने-भिड़ने वाले इस विचारधारा की डिब्बी में तेल नहीं है। अतः वह भगजोगनी की तरह भुकभुका रहा है। भगजोगिनी मतलब जुगनू। नतीजतन, आजकल लोग माक्र्सवादियों के ‘नेमप्लेट’ लगाए घूम रहे हैं। किराए पर ‘काॅमरेडी’ झंडा ढो रहे हैं। एक-दूसरे को जबरिया ‘लाल-सलाम’ बोल रहे हैं। यह दिखावे का भेडि़याधसान है। रहा-सहा सबकुछ सत्यनाश हो चुका है यानी गुड़-गोबर। आज माक्र्सवाद के ललटेन का रंग लाल है...पर यह लालिमा रोशनाई देने वाली नहीं है। दरअसल, भारतीय माक्र्सवाद मूल वैचारिकी का कार्बन-काॅपी है जिसका इस्तेमाल अवश्य होता है; लेकिन इस पर लिखा-पढ़ा पठनीय नहीं रह गया है। ऐसा क्यों है? यह खोज का विषय है। 

वर्तमान पीढ़ी की दिमागी दुर्दशा कम नहीं है। युवजन अपने दिमाग पर बल-जोर देने की जगह की-बोर्ड दबाते हैं: गुगल सर्च...विकीपीडिया....आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी...वगैरह-वगैरह। आज की पीढ़ी भगत सिंह की ‘कोटेशन’ काॅपी में लिखती है; चे ग्वेरा की ‘टी-शर्ट’ पहनती है; मूँछ-दाढ़ी में हफनाती है; लेकिन है सचाई में सबकुछ फ्राॅड....जाली और जुगाड़ू। अतएव, इस विचारधारा से जुड़े भाँति-भाँति के लोगों में आपसी संवाद-विमर्श, राय-विचार, सहमति-असहमति किनारे पर है...हाशियागत। और जो परछाई चलती-फिरती दिखाई दे रही है उनमें से अधिसंख्य बोकस है। यानी भारतीय माक्र्सवाद रहस्मयी है, सम्मोहनकारी या फिर पूरी तरह जादूगरी के चाल-तिकड़म से लदी-फदी हुई।

जबकि एक विद्वान के कथनानुसार, ‘‘वर्तमान सामाजिक व्यवस्था अन्याय और शोषण पर आधारित है, भेदभावपूर्ण है और अपने मूल-चरित्र में सामंतशाही है। कुछ लोगों का सुखी होना और बहुत से लोगों का दुखी रहना इस व्यवस्था की अपरिहार्य परिणति है। इस व्यवस्था में निचले तबके के शोषण को रोका नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में बहुत से लोगों का गरीब और दुखी होना तय है। इस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर उसे समाप्त करके सामाजिक स्तर पर शोषित वर्गों को सुखी बनाया जा सकता है। डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने समाजवादी व्यवस्था का समर्थन इसी इच्छा और आकांक्षा से किया था।’’

संकट यह है कि आज की तारीख में माक्र्सवाद-समाजवाद सब के सब बहुरुपिया हैं। उनकी जन-संवेदना अथवा सहानुभूतिपूर्ण आचरण दिखावटी है, बिल्कुल हाथी दाँत। थैलीशाह लोग समानता, स्वतन्त्रता, न्याय, भाईचारा आदि की बात करते हैं लेकिन वह स्वयं ही इसके अनुपालनकत्र्ता नहीं हैं। वह दूसरों की अमीरी पर सवाल खड़े करता है; लेकिन स्वयं हकमारी द्वारा गरीबों, असहायों, भूखों आदि के मुँह का निवाला छिन ले रहा है। भारतीय समाजवाद के मौजूदा पुरोधा आमजन के जांगर और मेहनत-मजूरी हड़प लेने में उस्ताद है। ऐसे लोग अपनी जिन्दगी की मियाद पूरी होने से पहले अपना वर्चस्व, एकाधिकार आदि अपने संतान-संतति को स्थांतरित कर देते हैं किन्तु औरों को अवसर नहीं देते हैं।  और माक्र्सवाद, उसकी तो इतनी भी कूव्वत नहीं बची है..... 

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