सांस्कृतिक क्रांति के अग्रदूत : लोहिया संस्कृति-समाज और भाषा के अन्तःसम्बन्धों की पड़ताल

राजीव रंजन प्रसाद

समाजवादी विचारधारा के मूल-स्तंभ डाॅ0 राममनोहर लोहिया का जीवन श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों एवं अनुपम योग्यता से पूरित था। भारतीय राजनीति में उनकी छवि एक ऐसी राजनेता की थी जो ठोस सामाजिक परिवर्तनों के प्रति समर्पित थे। वे महात्मा गाँधी की भाँति सर्वजनसुलभ थे। सप्तक्रांति सिद्धांत के जनक डाॅ0 राममनोहर लोहिया को आज भी लोग ‘जनतंत्र’, ‘न्याय’ और ‘समानता’ का सबसे बड़ा हिमायती मानते हैं। सन् 1942 में जब महात्मा गाँधी समेत अन्य नेताओं को बन्दी बना लिया गया तब प्रतिरोध की मशाल को राममनोहर लोहिया और उनके समानधर्मा साथियों ने प्रज्ज्वलित रखा। गाँधी के इस मानस पुत्र के विषय में गणेश मन्त्री का कथन है, ‘‘लोहिया गाँधी नहीं थे। वे किसी की अनुकृति हो भी नहीं सकते थे। गाँधी संत योद्धा थे। एक ऐसा संत जिसे युग की परिस्थितियों ने योद्धा बना दिया था। अथवा, फिर ऐसा योद्धा जो संघर्षों में तपते-तपते संत बन गया। किंतु लोहिया बिना कुटी के हो कर भी संत नहीं थे। वे माक्र्स भी नहीं थे। माक्र्स ऋषि या द्रष्टा थे। 19वीं सदी के यूरोपीय वर्तमान की दहलीज पर खड़े, अतीत के व्याख्याकार और भविष्य के प्रवक्ता थे माक्र्स। लोहिया को भी माक्र्स की तरह इतिहास की अंतर्धारा, सभ्यताओं की उथल-पुथल को समझने में गहरी दिलचस्पी थी। लेकिन मनुष्य-इतिहास को किसी खास लौह-नियम या विचार-साँचे में जकड़कर देखने-रखने की उनकी कोई इच्छा नहीं रही। इसी कारण लोहिया अनेक नये विचारों के प्रतिपादक और व्याख्याता तो रहे, परंतु किसी एक बंद विचार-प्रणाली के निर्माता नहीं बने।’’1
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल से ज्ञान, स्वतंत्रता और प्रतिरोध का पाठ प्रारंभ करने वाले लोहिया असाधारण प्रतिभाशाली युवक थे, लेकिन उनका व्यक्तित्व आन्तरिक अनुशासन को तो स्वीकार करता था, बाह्î दबाव को नहीं। उनके व्यक्तित्व के तीन मुख्य घटक थे-मानवीयता, विवेक-विक्षोभ और संकल्प। ये घुल-मिलकर मनुष्य की आन्तरिक शक्ति बन जाते हैं जो दूसरे मनुष्यों के सन्दर्भ में मानवीय करुणा को लोकमंगल तक विस्तार देते हैं। स्वयं के संदर्भ में इच्छा, चयन, संकल्प और क्रिया की अधिकतम संगति से डाॅ0 लोहिया ने अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व के ताने-बाने बुने।
डाॅ0 लोहिया मातृभाषा हिन्दी की उन्नति के ही पक्षधर नहीं थे बल्कि विभिन्न प्रांतों में व्यवहृत महत्त्वपूर्ण राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के पक्षधर थे। उनकी दृष्टि में पूर्व-पश्चिम-उत्तर बनाम दक्षिण जैसी कोई संकीर्ण अवधारणा नहीं थी। डाॅ0 लोहिया की संकल्पना को मूत्र्त रूप देते हुए उनके सहयोगी मित्रों ने हिन्दी की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका ‘कल्पना’ हैदराबाद से प्रकाशित की। चर्चित विचारक-लेखक यू. आर. अनन्तमूर्ति एक संस्मरण में कहते हैं, ‘‘रामनोहर लोहिया ने मुझे कहा कि तुम कन्नड के लेखक हो और तुम्हंे कन्नड को सार्वजनिक जीवन में उपयोग के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए। उनकी यह मान्यता थी कि शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक से स्नातक तक की पढ़ाई मातृभाषा में होनी चाहिए। वे सभी भारतीय भाषाओं के प्रबल अनुरागी थे। उनकी दृष्टि में अंग्रेजी का भी महत्त्व था लेकिन जनतांत्रिक भारत के सार्वजनिक जीवन में वह भारतीय भाषाओं की जगह पर अंग्रेजी का कब्ज़ा ख़त्म करना चाहते थे।’’2 डाॅ लोहिया ने जब बर्लिन के हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय में दाखिला लिया तो उनके शोध-प्रबन्ध का शीर्षक था-‘नमक सत्याग्रह: धरती का नमक’। उनके निदेशक प्रख्यात अर्थशास्त्री बर्नर जोम्बार्ट टूटी-फूटी अंग्रेजी ही जानते थे। इस तथ्य ने जहाँ राममनोहर लोहिया को तत्काल जर्मन भाषा सीखने को प्रेरित किया; वहीं हमेशा के लिए एक सबक भी उन्होंने सीख लिया-ज्ञान के लिए किसी खास भाषा पर अधिकार जरूरी नहीं और, अपनी मातृभाषा ही ज्ञान और अभिव्यक्ति का सबसे अच्छा माध्यम हो सकती है।
ऐसे उदात्त चिन्तक डाॅ0 राममनोहर लोहिया का व्यक्तित्व असीमित था। उनका व्यक्तित्व सांगठनिक के साथ-साथ वैचारिक एवं नैतिक प्रेरणा-पुरुष का व्यक्तित्व था जिसमें यथार्थ चेतना(Actual Consciousness) और संभाव्य चेतना(Potential Consciousness) के प्रत्ययमूलक तंतु विद्यमान थे। विखण्डन के दौर में लोहिया सभी को एकसूत्र में जोड़ने की बात कर रहे थे। वे संयुक्त परिवार-व्यवस्था की संरचना के दरकने और उसकी टूटन को ले कर भी चिंतित थे। मधु लिमये के शब्दों में, ‘‘लोहिया में एक ‘भीतरी आँख’ थी जो सपने देखती थी। उन्होंने समस्त मिथ्यावाद, पाखण्ड, धूल-धक्कड़ और गरीबी के भीतर बहने वाली ‘प्रगति की अन्तर्धारा’ को खोज लिया था और उसी से ‘चेतना के जगत’ का विस्तार मानते थे। वे उस अन्तर्धारा को हाथ में लेना, संभालना चाहते थे। लोहिया इस चीज से परिचित थे कि देश में यथास्थितिवादी ताकतें मजबूत हैं जिन पर शीघ्रता से काबू नहीं पाया जा सकता था। युगों के जड़त्व से आच्छादित विघटन, राज्य समेत सभी संस्थाओं पर अपना प्रभाव डाल चुका था। विघटन की यही स्थिति, विधानसभाओं, अदालतों, राजनीतिक दलों, प्रेस तथा अकादमिक समुदायों में भी थी। स्वयं का संवर्धन जीवन का नियंत्रण सिद्धांत बन चुका था। बावजूद इसके उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी, हार नहीं मानी। लोहिया अलग-थलग रह कर, कुर्सी पर बैठकर राजनीति करने वाले नेता नहीं थे। वह एक स्वप्नद्रष्टा तथा उसे साकार करने वाले, दोनों ही थे। उनका लक्ष्य था हमारे समाज में मौलिक परिवर्तन व उसके पुनर्संयोजन जो भारत को एक विश्व-समुदाय में बराबर का सदस्य बना देगा।’’3 यही वजह रही है कि लोहिया अपने जीवन में दो बार संसद का चुनाव हारे और दो बार जीते। हार के प्रसंगों को उन्होंने समाजवाद को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया। जीतने के बाद मात्र तीन वर्ष की अवधि में उन्होंने इतने प्रश्न उठाये और बहसें चलाईं कि समूची सामग्री को प्रकाशित करने के लिए 16 खंड छापने पड़े। हमारी संसदीय प्रणाली के अब तक के इतिहास में किसी एक सांसद की इतनी सक्रियता का दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा। डाॅ0 लोहिया ने नाजीवाद और साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव और सीमाओं का भी गहन अघ्ययन-विश्लेषण किया क्योंकि इन विचारधाराओं में संकल्प-भावना प्रभूत मात्रा में अन्तर्विष्ट है।
डाॅ0 राममनोहर लोहिया एक अध्येता की भाँति आजीवन भारतीय इतिहास, भारतीय सभ्यता और संस्कृति, भारत के महापुरुष एवं व्यक्तित्व का खोजबीन करते रहे। उनकी दृष्टि का फलक व्यापक और अनुसंधान का स्रोत संपूर्ण विश्व का समाज-दर्शन था। ‘व्हील आॅफ हिस्टरी’, ‘फ्रैग्मेंट्स आॅफ ए वल्र्ड माइड’, ‘विल टू पाॅवर’, ‘माक्र्स, गाँधी एण्ड सोशलिज्म’, ‘भारतीय इतिहास लेखन’, ‘भारत में समाजवाद’ जैसे अपने विनिबन्धों और पुस्तकों में डाॅ0 लोहिया जब प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से राजनीतिज्ञों में नैतिक-शक्ति का उत्कर्ष खोजते हैं तो लगता है जैसे कोई अभिभावक भावी-पीढ़ी के बुनियादी प्रश्नों को ‘इतिहास-चक्र’ में दर्ज कर रहा है। देश, काल एवं परिवेश से लोहिया का जुड़ाव गहरा था। डाॅ0 लोहिया के लिए शायद ही देश का कोई ऐसा कोना बचा हो जहाँ उन्होंने अपने पाँव न धरे हों। देश की भूमि, नदियाँ, भाषा, पोशाक, भोजन, समाज, अर्थव्यवस्था, इतिहास, पुराकथाएँ, दर्शन, किंवदन्तियाँ, कलाएँ; इन सबसे लोहिया ने संपर्क-साहचर्य साधने की भरपूर कोशिश की। भारत के सम्पूर्ण व्यक्तित्व से जैसा साक्षात्कार लोहिया ने किया, वैसा निश्चय ही स्वातंत्र्योत्तर युग के किसी अन्य राजनेता ने नहीं। लोहिया सदैव इस दिशा में प्रयासरत रहे कि भारत में आधुनिक जन-राजनीति के साथ-साथ एक सांस्कृतिक क्रांति का ‘माॅडल’ कैसे बनाया जाए जिसमें पारंपरिक संस्कृति के मानवतावादी और बौद्धिक तत्त्व संग-साथ समाहित हों? देश की जड़ता से उनका आशय धार्मिकता के आवरण में पैठी साम्प्रदायिकता और जाति-व्यवस्था से थी जो एक खास तरीके से धर्म-प्रभुत्व का द्योतक थी।
डाॅ0 लोहिया की दृष्टि में 20वीं सदी की वास्तविक विसंगति उसकी कल्पनातीत क्रूरताओं और इन क्रूरताओं के विरुद्ध विभिन्न मोर्चों पर हो रहे संघर्षों-क्रांतियों में निहित थी। पूर्व और पश्चिम के ऐतिहासिक संघर्षों से प्रेरणा ग्रहण कर उन्होंने ‘सप्तक्रांति’ के सूत्र विकसित किए: 1) नर-नारी समता के लिए; 2) चमड़ी के रंग के आधार पर राजनीतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक विषमता के विरुद्ध; 3) पुरानी परंपरा के आधार पर पिछड़े और अगड़े समूहों या जातियों में गैर-बराबरी के विरुद्ध और पिछड़ों को विशेष अवसर देने के लिए; 4) विदेशी दासता के विरुद्ध और जनतंत्र के आधार पर विश्व-सरकार की स्थापना के लिए; 5) निजी संपत्ति के अस्तित्व तथा उसमें आसक्ति के विरुद्ध और आर्थिक समता एवं नियोजित उत्पादन के लिए; 6) निजी जीवन में अन्यायपूर्ण हस्तक्षेप के विरुद्ध और लोकतांत्रिक उपायों के लिए; और 7) शस्त्रों के विरुद्ध सत्याग्रह के लिए। उपर्युक्त की सविस्तार व्याख्या करते हुए लोहिया ने इन्हें इस सदी के स्वास्थ्य का लक्षण कहा था।
प्रो0 आनंद कुमार इसका जिक्र करते हुए कहते हैं-‘‘लोहिया की दृष्टि में समाजवाद की परिभाषा के लिए समता और सम्पन्नता दोनों की एकजुटता महत्त्वपूर्ण है। उनका समता का सपना सत्ता के विकेन्द्रीकरण और समुदाय के क्रांतिकरण के जरिए साकार होना था। अपने सपने को उन्होंने विश्व इतिहास और भारत इतिहास का गहन अध्ययन करके इतिहास-चक्र के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था जिसमें हर समाज की अंदरुनी और वैश्विक प्रक्रियाओं के दुहरे दबाव में अपने अस्तित्व की निरंतरता का सच जीने की वास्तविकता का विश्लेषण किया गया है। लोहिया मानवीय सभ्यता में निरंतर बढ़ती निकटता के सच को जानते थे, लकिन बगैर समता और सम्पन्नता आधारित मानव सभ्यता को संभव बनाये, वह भारत और विश्व के भविष्य को आशाजनक नहीं देखते थे।’’4
धर्म को दीर्घकालीन राजनीति और राजनीति को तात्कालीन धर्म मानने वाले लोहिया भारत की सांस्कृतिक विरासत से पूर्व परिचित थे। उन्हें पता था कि भारतीय सभ्यता का मुख्य आधार दर्शन रहा है, हिन्दू दर्शन तो मूलाधार ही है। अतः धर्म को समाज-संस्कृति एवं राजनीति से अलगाया नहीं जा सकता है। धर्म इसलिए बीच में आ जाता है कि वह उसी सामाजिक व्यवस्था का अंग है जिसमें लोग रहते हैं। वे शून्य में सक्रिय नहीं होते। वे जीवन में ही कार्यशील होते हैं। अतएव, किसी भी समाज की चिंतन पद्धति से उसे अलग नहीं किया जा सकता है। भारत में धार्मिक मनमुटाव का साम्प्रदायिक रूप लेने के पीछे एक मुख्य वजह यह भी रही कि आधुनिक संस्कृति और नव मूल्य-व्यवस्था के प्रचार-प्रसार हेतु सांस्कृतिक क्रांति आरंभ करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जा सके थे। इसके लिए शिक्षित भारतीयों का सांस्कृतिक एवं बौद्धिक पिछड़ापन भी जिम्मेदार था जिसकी वजह से साम्प्रदायिक घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि परिलक्षित की गयी। विभाजन की त्रासदपूर्ण घटना और साम्प्रदायिक दहन से डाॅ0 लोहिया मर्माहत थे। असल में, विश्व-बन्धुत्व के सपने का एक और रूप भी लोहिया के मन में था; और वह था-मनुष्य जाति के शारीरिक सामीप्य का। उनकी दृष्टि में वह दिन दूर नहीं जब नर-नारी सम्बन्धों में जाति, धर्म, नस्ल और रंग के भेद खत्म हो जाएंगे और सारे ही मनुष्य मिश्रित रक्तवाले होंगे। डाॅ0 राममनोहर लोहिया के मुताबिक इंसान को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक अलग-अलग खाँचो में बाँटकर देखने की बजाय उसके लिए समग्र चिंतन-दृष्टि की दरकार है। उन्होने समाजवादी मूल्यों और आदर्शों को केंद्र में रखकर एक समतामूलक समाज को निर्मित करने का सपना देखा। लोहिया ने ‘जाति तोड़ो’ का नारा दिया और धर्म को व्यक्ति के निजी आचरण तक सीमित रखा। धर्म और जाति से राज्य प्रभावित न हो, यह स्पष्ट धारणा उनके भीतर पैठी थी।
डाॅ0 राममनोहर लोहिया की रणनीति और कार्यशैली में दो चीजों का हमेशा समन्वय दिखता है-कार्य करते हुए फलाफल के प्रति तटस्थ रहना, और दूसरे कोई काम करते हुए पूरी शक्ति उस काम में केन्द्रित कर देना। गणेश मन्त्री कहते हैं, ‘‘वे मात्र सिद्धांत-प्रतिपादक बुद्धिजीवी ही नहीं, निरंतर क्रियाशील आंदोलनकारी भी थे। स्वातंत्र्य-पूर्व दौर में लोहिया ने ‘इकाॅनाॅमिक्स आॅफ्टर माक्र्स’ में विषमता के बुनियादी कारणों की छानबीन की थी। उन्होंने माक्र्स के विचारों के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ी उन्नीसवीं सदी के यूरोप की विशेषताओं को पहचानने की कोशिश की है, तो दूसरी ओर भारत जैसे निर्धन और अविकसित एशियाई देश की अपनी परिस्थितियों के संदर्भ में माक्र्सवाद की जाँच-पड़ताल की है। लोहिया इस समाजशास्त्रीय तथ्य को मानकर चल रहे थे कि बड़े से बड़ा विचारक अपने देश-काल की परिस्थितियों से बंधा होता है। उसकी सोच और निष्कर्षों का एक बड़ा हिस्सा इन परिस्थितियों के बाहर असंगत हो जाता है। कमोबेश यही बात सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के विश्लेषण के लिए प्रयुक्त की जाने वाली परिकल्पनाओं पर भी लागू होती है। पूंजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद भी इसके अपवाद नहीं हैं। सार्वभौमिकता के तमाम दावों के बावजूद ये सभी देश-काल की परिस्थितियों की उपज हैं। जिस समय विषमता के सभी रूपों पर प्रहार और देश के शोषितों-दलितों में समता की चेतना जगाने तथा उसे तीव्रतर करने का दायित्व लोहिया के जिम्मे आया, वह अत्यंत विकट और विषम परिस्थिति थी।’’5
डाॅ0 लोहिया ने अपने समाजवादी मार्ग को ‘वोट, फावड़ा और जेल’ के नारे में सूत्रबद्ध किया। विकेन्द्रीकरण की दिशा में लोहिया ने चैखम्भा राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की। जनतांत्रिक, न्यायपूर्ण तथा समतामूलक समाज की प्रतिस्थापना हेतु प्रतिबद्ध डाॅ0 लोहिया एक ऐसे जनवादी राजनीतिज्ञ थे जो चित्’, ‘वाक्’, ‘कर्म’ और ‘आचरण’ की एकरूपता को सामाजिक जीवनमूल्य का सांस्कृतिक गौरव कहते थे। उनकी दृष्टि में जनतंत्र आधारित समानता का अर्थ व्यापक और कैनवास बड़ा था। असल में समतामूलक समाज की परिकल्पना मानव-चेतना में सदैव अनुस्यूत रही है। सच्चिदानन्द सिन्हा की दृष्टि में, ‘‘मनुष्य सदा एक बड़े वैचारिक परिप्रेक्ष्य में पास-पड़ोस के लोगों को समेटने वाली किसी संरचना के भीतर ही अपनी आजीविका या जीवन की संभावनाओं की तलाश करता है। परिवेश की किसी समग्र कल्पना के बिना जीवन का हर कदम अंधकार में छलांग है। चाहे मिथक हो, इतिहास हो, चाहे ब्रह्माण्ड की कोई परिकल्पना, इनके भीतर ही आदमी अपने जीवन की विशेष स्थिति को निरूपित करता है एवं इसी ज्ञान के आलोक से आश्वस्त हो जीवन को नियोजित करता है। आदिम समाजों की भी एक विश्व-दृष्टि होती है भले ही उनके पितरों, जादूगरों और पेड़-पौधों में ‘माना’ आदि की अवधारणाएँ हमारे विज्ञानवादी युग में कुछ अजूबा लगें। लेकिन मिथकों में भी जीवन को समग्रता में आकार देने का प्रयास अवश्य रहा है।’’6
राममनोहर लोहिया अक्सर कहा करते थे कि मैं चाहता हूं कि इंसान की जिंदगी में राम की मर्यादा, कृष्ण की उन्मुक्तता, शिव का संकल्प, मुहम्मद की समता, महावीर-बुद्ध की ऋजुता और यीशु की ममता सब एक साथ ही समाहित हो जाए। भारत-पाकिस्तान युद्ध में बलि देने वाले अब्दुल हमीद के घर जाते समय एक बार उन्होंने कहा था-‘‘बलिदान में हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। भारत सर्वधर्मियों की मातृभूमि है, इसका साक्षात्कार होता है।’’7 भारतमाता से लोहिया की एक ही माँग थी-हे भारतमाता! हमें शिव का मस्तिष्क और उन्मुक्त हृदय के साथ-साथ जीवन की मर्यादा से रचो।
डॉ0 लोहिया का स्वप्न विश्व-सरकार स्थापित करने का था। मानवता की दृष्टि से वे पूर्व-पश्चिम, काले गोरे, अमीर-गरीब, छोटे-बडे राष्ट्र तथा नर-नारी के बीच की दूरी मिटाना चाहते थे। आण्विक हथियारों के साथ तलवार व पिस्तौल जैसे भी हथियार प्रतिबंधित हांे, यही उनकी कामना थी। लोहिया जी स्पष्ट कहा करते थे कि जनतंत्र और समाजवाद एक सिक्के के दो पहलू है। वे अन्याय के खिलाफ एक साथ क्रान्ति का आõान करते थे। चाहे वह लैंगिक विभेद हो, रंगभेद हो, आर्थिक असमानता हो, निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप हो या जातिप्रथा। स्त्रियों की आजादी के पक्षधर लोहिया का मानना था कि जब तक समाज में महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं मिलता तब तक किसी भी हिस्से में समानता की बात सोचना बेमानी होगा। वे खुले मंच से घोषणा करते थे कि आजाद हिन्दुस्तान में हर आदमी राजा है; चाहे वह मर्द हो या फिर औरत। औरतें भी अपने हक से राजा होंगी, राजा की पत्नी होने के नाते रानी नहीं। भारतीय पौराणिक चरित्रों का सहारा लेते हुए एक चर्चित भाषण में उन्होंने कहा कि भारतीय नारी का आदर्श सावित्री नहीं हो सकती जिसका एकमात्र गुण उसकी पति-निष्ठा है, बल्कि द्रौपदी होना चाहिए जो क्रियाशील है, विद्वान है, बहस करने वाली है और कृष्ण के साथ बराबरी का सखा सम्बन्ध रखती है। उन्होंने यह भी कहा था कि यौन-शुचिता सिर्फ औरतों पर क्यों लादी जाती है? यह सभी के लिए बराबर होनी चाहिए। शायद! इसी कारण सांस्कृतिक क्रांति के अग्रदूत लोहिया समाजवाद का अर्थ ‘संपूर्ण बराबरी, संभव बराबरी’ मानते हैं। हम देख सकते हैं कि डाॅ0 लोहिया ने महिलाओं के अधिकार को तो सशक्त बनाया ही साथ ही उन्होंने पिछड़े वर्ग के मुसलमानों, आदिवासियों, हरिजनों जो भारत की जनसंख्या के नब्बे प्रतिशत थे, को संगठित कर उन्होंने जातिवाद पर जबरदस्त हमला करने का भी प्रयास किया।
ध्यातव्य है कि डाॅ0 राममनोहर लोहिया के समाज-दर्शन में भाषा एक महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्व है। लोहिया इस बात से पूरी तरह भिज्ञ थे कि ‘‘भाषा का प्रकार्य विचार विनिमय को संभव बनाना है अर्थात भाषा एक आधार है जो समाज के अस्तित्व के साथ अस्तित्व में आती है और उसके नष्ट होने के साथ ही नष्ट हो सकती है। यह समाज के निर्माण और विकास के साथ ही निर्मित और विकसित होती है; समाज से अलग कोई भाषा नहीं होती। इसलिए भाषा और उसके विकास के नियमों को तभी समझा जा सकता है जबकि इनका अध्ययन इनके अविवोज्य रूप से जुड़े, समाज के इतिहास के साथ किया जाए; उस जनता के इतिहास के साथ किया जाए जिसकी वह भाषा है और जो इसकी निर्मात्री और धारक है। भाषा के माध्यम से समाज सृजनात्मक सक्रियता के लक्ष्य निश्चित कर पाता है। इसके बिना वह विघटित हो जाता है। यानी भाषा समाज के विकास और संघर्ष की वाहिका है। यही नहीं, भाषा अपनी कार्यकारी भूमिका में मनुष्यमात्र के सम्पर्क-साधन के रूप में व्यवहृत होती है। इसके कारण वह प्रत्येक परिवर्तन के प्रति संवेदनशील होती है और प्रत्येक स्तर पर ग्रहणशीलता का परिचय देती है। भाषाएँ अतीत के लम्बे अन्तराल में विकसित होती हैं। इस लम्बे अन्तराल में गोत्र भाषाओं से जातीय भाषाएँ, जातीय भाषाओं में राष्ट्रीयताओं की भाषाएँ और फिर राष्ट्रभाषा का अनुवर्ती विकास का क्रम चलता है। इस क्रम में प्रत्येक स्तर पर भाषा का स्वभाव समाज के हर सदस्य के साथ एक जैसा होता है। अतः राष्ट्र के प्रत्येक सदस्य के बीच प्रथमतः सम्पर्क सूत्र का काम करती हैं, वह सामान्य भाषा होती है न कि वर्ग की भाषा। कुलीनभाषा या जनभाषा का व्यवहार समाज में विविध वर्गों में बोली जाने वाली भाषा के आधार पर साहित्यालोचन में भले ही चलता हो, लेकिन यह भाषा वैज्ञानिक यथार्थ नहीं है। इस सम्बन्ध में माक्र्स को भी अक्सर गलत ढंग से उद्धृत किया गया है और आज भी यह बात प्रचलन में है कि वे राष्ट्रभाषा जैसी चीज को नकारते थे और भाषा की वर्गीयता को प्रशय देते थे। ईमानदारी का तकाजा यह है कि माक्र्स को उद्धृत करते हुए उनके उद्धरण का उत्तर-पक्ष भी प्रस्तुत किया जाना चाहिए जहाँ उन्होंने साफ-साफ कहा है कि वर्ग भाषाओं का सान्द्रीकरण(कंस्ट्रेशन) एक अकेली राष्ट्रीय भाषा के रूप में आर्थिक-राजनीतिक सान्द्रीकरण के परिणामस्वरूप होता है। इसके अतिरिक्त माक्र्स एकमात्र राष्ट्रीय भाषा की आवश्यकता को भी स्वीकारते हैं जो एक उच्चतर स्वरूप की तरह हो और निम्नतर स्वरूप के रूप में जिसकी सहायिका वर्ग-उपभाषाएँ हों।’’8
अतएव, भाषा के मुद्दे पर डाॅ0 लोहिया यदि गहरी चिंता प्रकट करते हैं तो इसकी मुख्य वजह राष्ट्रीयता का प्रश्न है। वे ‘अंग्रेजी हटाओ आंदोलन’ का नेतृत्वमात्र ही नहीं करते अपितु इसके गहरे निहितार्थ, पुख्ता तर्क और सामाजिक-सांस्कृतिक औचित्य भी सिद्ध करते हैं। सन् 1909 में गाँधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में लिखा, ‘‘हर पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानी को अपनी भाषा का, हिन्दू को संस्कृत का, मुसलमान को अरबी का, पारसी को फारसी का और सबको हिन्दी का ज्ञान होना चाहिए। उत्तरी और पश्चिमी हिन्दुस्तान के लोगों को तमिल सीखनी चाहिए। सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी चाहिए।’’9 स्वतन्त्रता-आन्दोलन के पूरे दौर में हिन्दी को ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में सम्बोधित किया गया। इस दौरान कुछ विवाद हिन्दी के स्वरूप को लेकर उठा, पर राष्ट्रभाषा की संकल्पना के साथ हिन्दी विकसित होती रही। उसकी व्याकरणिक संरचना संश्लिष्ट हुई तथा भाषिक चेतना में राष्ट्रीय-संस्कृति का स्वर अनुगुंजित हुआ। गाँधी की किताब ‘हिन्द स्वराज’ वस्तुतः सभ्यता-समीक्षा की किताब है। इसमें उन्होंने भाषाओं को भी विभिन्न सभ्यताओं के साथ विकसित माना है। हिन्दी को उन्होंने ‘राष्ट्रभाषा’ मानते हुए व्यवहार से अंग्रेजी के निकालने का उपाय बताया है।
गाँधी के इसी उपाय को डाॅ0 राममनोहर लोहिया ‘अंग्रेजी हटाओ आंदोलन’ के माध्यम से साकार करने हेतु आजीवन संघर्षरत रहे। उनका स्पष्ट विचार था कि आज अंग्रेजी भाषा के फैलते एकाधिकार को तोड़ने की जरूरत है क्योंकि पूँजी, आतंक, और तकनीक की तरह यह भाषा भी नेतृत्व और वर्चस्व का अधिकार बन गई है। वैश्वीकरण के इस समय में प्रभावी राष्ट्र अपनी भाषा को जबरन थोप रहे हैं। इस खतरे को चीन, जापान और यूरोप के कुछ देशों ने समय से भाँप लिया था। इसलिए वे अपनी भाषा को किसी भी सूरत में छोड़ने को तैयार नहीं थे। ‘डाॅलर’ को पीटने के लिए ‘यूरो’ को अपनाने वाले देश आज भी अंग्रेजी से परहेज कर रहे हैं। इन देशों ने अंग्रेजी को प्रगति का पर्याय न मानकर एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया कि मातृभाषा में वह क्षमता है जो ज्ञान, गौरव और स्वाभिमान प्रदान करती है। लोहिया का स्पष्ट विचार था कि ‘‘वास्तव में भाषा जोड़ने का काम ही करती है। तोड़ने का काम वह तब करने लगती है जब वह स्वार्थी लोगों के हाथ का खिलौना बन जाती है।’’10
‘‘मुख्य प्रश्न यह है कि स्वातंत्र्योत्तर भारत की आर्थिक-संरचना और तज्जन्य अधिरचना की ऐसी क्या विशेषता थी कि विद्वानों ने राष्ट्रभाषा के बदले ‘सम्पर्क भाषा’ के रूप में हिन्दी को प्रस्तावित किया और राजभाषा के सिंहासन पर बैठाने की सांविधानिक घोषणा की जिस पर वास्तव में अंग्रेजी विराजमान थी, और है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी के साथ यह व्यवहार राजसत्ता की ओर से किया जा रहा था जो पूरी तरह अंग्रेजी के पक्षधर थी। अंग्रेजी सत्ता-संस्कृति के अनुकूल थी, किन्तु उसे खुलकर मान्यता देना भारतीय राजसत्ता के लिए सम्भव न था। नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था में निर्मित हुई आधुनिक संस्कृति की अधिरचना का अध्ययन करने पर पता चलता है कि भारतीय सत्ता की नीति-निर्माण में ऐसे कौन-से कारक तत्त्व सक्रिय थे जो हिन्दी को सम्पर्क भाषा की परिधि में उलझाए रखना चाहते थे। फलतः लोहिया के ‘अंग्रेजी हटाओ’ आन्दोलन के बावजूद हिन्दी के प्रति सत्तापक्ष का दृष्टिकोण नहीं बदला। उनकी मृत्यु के बाद तो ‘हिन्द स्वराज’ के उस संकल्प को लेकर लड़ने वाला कोई नहीं है। वास्तव में, लोहिया का यह संकल्प केवल ‘हिन्द स्वराज’ का नहीं, भारतीय जनता का था जिसमें हिन्दी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं की समृद्धि का संकल्प था। नेहरू राज से भारतीय जनता का स्वप्न केवल भाषा के बिन्दु पर ही नहीं, राज्य की भूमिका के हर मुद्दे पर टूटा। इसके बावजूद उस काल में राजसत्ता ही प्रभावी रही यद्यपि बाज़ार की शक्तियाँ भी इसे अपने हित में प्रभावित करती रहीं और राजसत्ता से उनका गठजोड़ बना रहा।’’11
आज हमारे शिक्षा-जगत की जो दयनीय स्थिति है उसमें पश्चिम के अंधानुकरण का योगदान अधिक है। पत्रकार शंकर शरण की मानें तो ‘‘हमारे देश के प्रभावशाली प्रोफेसर और बुद्धिजीवियों को जो भी नया विषय या मुहावरा पश्चिमी पत्र-पत्रिकाओं या शिक्षा-जगत में दीख पड़ता है, उसे वे भारत पर ‘लागू करने’ में लग जाते हैं। जब तक सोवियत संघ था, यहाँ सोवियत प्रस्थापनाओं की बड़ी प्रतिष्ठा थी जिसे ‘प्रगतिवाद’ कहा जाता था। सोवियत विघटन के बाद से यूरोप के रेडिकल यानी मूल सिद्धांतवादी प्रोफेसरों, बुद्धिजीवियों की बातें दुहराना ही हमारे बौद्धिकों का कार्य रह गया है। इस प्रकार यहाँ लिबरलिज्म, प्रोग्रेसिविज्म, वीमेन्स लिब से लेकर फेमिनिज्म, गे-राइट्स, पोस्ट-माॅडर्निज्म, ग्लोबलाइजेशन और मल्टी-कल्चरलिज्म तक के चर्बी-चर्वण में एक प्रकार का औपनिवेशिक दासत्व है। दासत्व इससे भी झलकता है कि उसी पश्चिमी विमर्श में जो विचार, स्वतन्त्र चिंतन प्रेरित करे, उसे हमारे बुद्धिजीवी नहीं उठाते।’’12 इस बारे में डाॅ0 लोहिया सीधे कटाक्ष करते हैं, ‘‘हिन्दी की दुर्दशा आज ऐसे ही बुद्धिजीवियों के कारण हुई है जिन्हें इतना भी नहीं पता है कि हिन्दी 900 साल से अधिक पुरानी है। हम जब तक अपनी ही भाषा को नहीं जानेंगे तो लड़ेंगे कैसे? उसी का फायदा अंग्रेजी परस्त लोग और दूसरे बुद्धिजीवी उठा रहे हैं।’’13
यह अलग बात है कि राजनीतिक स्वार्थपरता, सवर्ण मानसिकता और राष्ट्रभाषा-राजभाषा के तिकड़म में सबसे ज्यादा दुर्गति हिन्दी की हुई। साठ के दशक में उत्तर भारत में ‘अंग्रेजी हटाओ’ और दक्षिण भारत में ‘हिन्दी हटाओ’ के राजनीतिक अभियान में भाषा किस कदर प्रभावित हुई इसे हिन्दी कवि धूमिल ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया था-‘‘हाय! जो असली कसाई है/उसकी निगाह में/तुम्हारा यह तमिल-दुःख/मेरी इस भोजपुरी-पीड़ा का/भाई है/भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है। जो सड़क पर और है/संसद में और है/इसलिए बाहर आ!/संसद के अँधेरे से निकलकर/सड़क पर आ!/भाषा ठीक करने से पहले आदमी को ठीक कर/आ! अपने चैदहों मुखों से/बोलता हुआ आ!’’14
इसी छटपटाहट की परिणति थी कि डाॅ0 लोहिया पूरे हुंकार के साथ कह सके-‘‘जिंदा कौमे पाँच साल इंतजार नहीं करती।’ डाॅ0 लोहिया की इस उक्ति का मुख्य उद्देश्य आमजन को सचेत करना था, साथ ही लोकतंत्र में विपक्ष की जीवंत भूमिका का भी स्मरण कराना था। भारतीय राजनीतिज्ञों का चारित्रिक पतन तथा दायित्व-क्षरण जिस रफ़्तार से हुआ उसका भान डाॅ0 लोहिया को काफी पहले हो गया था। वह एक पुस्तिका में सारी दुनिया में व्यक्ति-स्वातंत्र्य सम्बन्धी स्थिति का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि तथाकथित लोकतांत्रिक देशों में भी व्यक्ति की स्वतन्त्रता किस तरह सीमित है, और कैसे खतरों से घिरी है? समाज-संस्कृति और भाषा के सम्बन्ध में डाॅ0 लोहिया के नायकत्व की भूमिका को रेखांकित करते हुए गिरिराज किशोर कहते हैं-‘‘गाँधी के बाद लोहिया इस देश के अंतिम पागल हैं जो बकौल सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानी ‘लड़ाई’ के हीरो की तरह, हर अन्याय और बेईमानी के विरोधी थे। भले ही वह इस कहानी के हीरो की तरह मार खा जाएँ। भारत में सबसे अधिक मार गाँधी ने खाई है, फिर लोहिया ने। क्योंकि लोहिया जाति तोड़ने के हिमायती थे। वे अंग्रेजी को हटाकर अपने देश की पहचान अपनी भाषा में बनाना चाहते थे। लेकिन न गाँधी के सपने पूरे हुए, न लोहिया के न अम्बेडकर के। बड़े लोग सपने देखते हैं, उन्हें कार्यान्वित करना चाहते हैं, पर उल्टा है, अपने साथ लिए चले जाते हैं।’’15
यद्यपि लोहिया के समाज-दर्शन पर कई ग्रंथ लिखे जा चुके है, लेकिन यह भी वास्तविकता है कि ‘‘आज की युवा पीढ़ी अभी भी लोहिया से दूर है। वे विद्रोही युवा पीढ़ी तैयार करना चाहते थे। लेकिन आज जो पीढ़ी तैयार हुई है, उसके भीतर सामाजिक अन्याय को लेकर कहीं विद्रोह नजर नहीं आता क्योकि उसे लोहिया का पाठ पढने नहीं दिया गया। आज जिस आधुनिकता के अंधे दौर में हम शामिल है वह समस्या ही ज्यादा पैदा कर रहा है, सुकून नहीं दे रहा। लोहिया ने जिस समाजदर्शन की बात की थी वह मानवता को सुकून देने वाला था। उन्होंने भौतिक समाजवाद की बात कही, राजनीतिक समाजवाद की बात कही, आर्थिक समाजवाद की बात कही, संवादपरक राजनीति की बात कही, लेकिन हमने सब कुछ भुला दिया। अपने आपको पूंजीवाद, साम्यवाद और व्यक्तिवाद के बीच फंसा लिया हैं। इन तीनों से जब हम मुक्त होंगे तभी डॉ. लोहिया के संकल्प पूरे होंगे।’’16 प्रो0 आनंद कुमार आज की नौजवान पीढ़ी को लक्ष्य कर कहते हैं, ‘‘आज नई पीढ़ी बहुत सारे सपनों के साथ आगे बढ़ना चाहती है। पहले की पीढ़ी को वह पराजित पीढ़ी मानती है। आज वैश्वीकरण का ज़माना है, इसमें आगे बढ़ना है और येन-केन-प्रकारेण विश्व के जो श्रेष्ठतम सुख-साधन है, उनको हासिल करना है। अब नई पीढ़ी के इस सपने के साथ सचाई के रास्ते को जोड़ने का उपाय सोचना चाहिए और यह बहुत कठिन नहीं।’’17
कहना न होगा कि 21वीं सदी का समाज पश्चिमीकृत पूँजीवाद का पोषक है। बाजा़रवाद ने जिस उपभोग की संस्कृति का निर्माण किया है उसमें हर नागरिक उपभोक्ता/उत्पाद में बदल चुका है। वर्तमान में चारों तरफ बाज़ारवाद का बोलबाला है। बाजार लोगों के लिए न होकर, लोग बाज़ार के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। हम देख रहे हैं कि आज भारतीय समाज समय-सापेक्ष बेतरतीब बदलावों के दौर से गुजर रहा है। बाज़ारवादी स्पर्श-सुख सेवन करता भारतीय समाज सीधे-सीधे गरीब और अमीर दो वर्गों में अलगाया जा चुका है जिसमें एक वंचित है तो दूसरा सर्वसुविधासंपन्न। मुश्किल यह है कि बाज़ार की संस्कृति उपभोक्तावादी संस्कृति है जिसमें अधिक से अधिक उपभोग को ही विकास का सूचकांक माना जाता है। कुदरती संसाधनों के अत्यधिक दोहन, श्रम के मूल्य और न्यायसंगत बंटवारे आदि के प्रश्न दरकिनार कर दिए जाते हैं। ऐसी पूँजीवादी व्यवस्था को एक तरह की विषम जातिवादी व्यवस्था के समकक्ष देखने वाले लोहिया इस बाबत सही आकलन-मूल्यांकन करते हैं कि हर व्यवस्था जिसमें कुछ लोग बहुसंख्यक लोगों का शोषण करने की स्थिति में होते हैं जाति-व्यवस्था का ही रूप है।
डाॅ0 लोहिया मानते थे कि जाति एक ऐसा बीमा है जिसके लिए प्रीमियम देना नहीं पड़ता। इस तरह हम पाते हैं कि लोहिया आधुनिक भारत के उन कतिपय विचारकों और नेताओं में से थे जिन्होंने भारत में जाति-प्रथा की गहराई और विकृतियों को समझा और उस पर लगातार प्रहार करने पर जोर दिया। उनका साफ मानना था कि मात्र आर्थिक और भौतिक बेहतरी का लक्ष्य रख कर नई दुनिया की रचना नहीं हो सकती है। इसके लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक स्तर पर भी बदलाव लाना पड़ेगा। पुराने मूल्यों के स्थान पर नए मूल्य स्थापित करने होंगे। समाज का ढाँचा बदलना पड़ेगा। वे सिर्फ पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों को बदलना काफी नहीं मानते थे, बल्कि एक नई सभ्यता का निर्माण करना चाहते थे।
आज के संदर्भों में प्रो0 एजाज अहमद समसामयिक परिदृश्य और वस्तुस्थिति का बिल्कुल सही विश्लेषण करते दिखते हैं-‘‘वैश्वीकरण के दौर में राज्य की प्राथमिकताएँ उलट गई हैं। लोग कह रहे हैं, राष्ट्र कमजोर हो रहे हैं। लेकिन मैं कहता हँू कि श्रम के मामले में राज्य मजबूत हुआ है और विदेशी पूँजी के मामले में कमजोर। इसे इस तरह देख सकते हैं; पिछले दस-बारह सालों से वैश्वीकरण का दौर चल रहा है। अब गौर करें कि इस दौर में कितने श्रम विरोधी कानून बनाये गए हैं? आज कोर्ट फैसला देता है कि कर्मचारी हड़ताल नहीं कर सकते। एक दूसरे कानून के तहत करीब एक हजार श्रमिकवाले कारखाने को बगैर सरकार की मंजूरी के बंद किया जा सकता है। तीसरी बात, इस दौर में आत्महत्याओं का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि श्रम को नियंत्रित करने के मामले में यह राज्य स्वयं को विभिन्न कानूनों और नीतियों के जरिए मजबूत कर रहा है।’’18
कथित समाजवादियों तथा लोहियावादियों में भी रचना-संगठन-संवर्द्धन की क्षमता विकसित करने के बरक्स प्रहार-संहार-विघटन की क्षमता और कौशल अधिक दिखाई देता है। आज लोहिया के झंडाबदार ही उनके सिद्धांत और वैचारिकी से कोसो-मील दूर हैं। ये जितने भ्रष्ट या नैतिक रूप से पतित हुए दिख रहे हैं, उसकी एक वजह जाति-धर्म जैसी संकीर्णवादी मानसिकता की आत्मस्वीकृति है। असल में लोहिया या जयप्रकाश व्यावहारिक स्तर पर विफल होने को भी तैयार रहते थे, क्योंकि वे रूटीन किस्म के नेता नहीं थे। जो रूटीन किस्म का नेता होता है, उसे किसी भी कीमत पर भी, सफलता चाहिए। सफलता के लिए दौड़ हमेशा पतित करती है। फिर समाजवादी इसके अपवाद कैसे रह सकते थे। पत्रकार साजिद रशीद इसका दो-टूक शब्दों में मुख़ालफत करते हैं-‘‘लालू प्रसाद और मुलायम सिंह सामाजिक न्याय, तरक्की और खुशहाली के लोहियावादी स्वप्न को साकार देने के इरादे के साथ जनता के सामने आए थे। दोनों को जनता ने पूर्ण विश्वास के साथ चुना। यों दोनों जात-पांत के सख्त खिलाफ थे। पर उन्होंने अपने कार्यों से यही सिद्ध किया कि वे केवल उच्च वर्णों के विरुद्ध थे जात-पांत के नहीं। उन्होंने सत्ता प्राप्त करते ही अपनी जाति-बिरादरी को शासन-प्रशासन में हर जगह घुसा दिया। विचित्र है कि लालू और मुलायम साम्प्रदायिकता के जितने विरोधी हैं, जाति-बिरादरी के उतने ही बड़े खैरख़्वाह हैं।’’19
अतः हमें इन समस्त बिन्दुओं पर गंभीरता से विचार करते हुए ‘जनतंत्र’, ‘न्याय’ और ‘समानता’ के मूल प्रश्नों का हल तलाशना चाहिए जिसमें लोहिया के समाजवादी दृष्टिकोण और चिंतन-दृष्टि न केवल महत्त्वपूर्ण हैं बल्कि उनका अन्यतम स्थान है। निष्कर्षतः समाजवादी चिन्तक-विचारक सुनील को यहाँ उद्धृत करना समीचीन प्रतीत होता है, ‘‘मानव जाति के इतिहास में दुनिया को बदलने और बेहतर बनाने की कई कोशिशें हुई हैं। पहले ये कोशिशें ज्यादातर धार्मिक और दार्शनिक तौर पर हुई हैं। गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, ईसा, पैगम्बर मोहम्मद, गुरुनानक आदि ने इसी तरह की कोशिश की। आधुनिक काल में कार्ल माक्र्स, लेनिन, माओ और गाँधी ने भौतिक आर्थिक व्यवस्था बदल कर नई दुनिया बनाने की कोशिश की। दोनों तरह की कोशिशें एकांगी थीं और इसीलिए ज्यादा सफल और टिकाऊ नहीं हो पाई। ऐसे वैचारिक धुंध की स्थिति में यदि रास्ता तलाश करनी है तो हमें लोहिया की लालटेन को साथ लिए चलना ही होगा।’’20 

संदर्भ ग्रंथ:
1. मन्त्री, गणेश: ‘माक्र्स, गाँधी और समसामयिक सन्दर्भ’, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ0 सं0 129।
2. किशोर, गिरिराज: त्रैमासिक पत्रिका ‘अकार’, अगस्त-नवम्बर 2010, पृ0 सं0 91।
3. किशोर, गिरिराज: त्रैमासिक पत्रिका ‘अकार’, अगस्त-नवम्बर 2010, पृ0 सं0 18।
4. किशोर, गिरिराज: त्रैमासिक पत्रिका ‘अकार’, अगस्त-नवम्बर 2010, पृ0 सं0 15।
5. मन्त्री, गणेश: ‘माक्र्स, गाँधी और समसामयिक सन्दर्भ’, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ0 सं0 138।
6. सिन्हा, सच्चिदानन्द: ‘संस्कृति और समाजवाद’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण प्रथम 2004, पृ0 सं0 91।
7. (डाॅ0) युगेश्वर: ‘समाजवाद’, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, संस्करण प्रथम, 1994, पृ0 सं0 260।
8. कुमार, बिपिन, छमाही पत्रिका ‘अनिश’, जनवरी-जून 2010, पृ0 सं0 62-63।
9. कुमार, बिपिन, छमाही पत्रिका ‘अनिश’, जनवरी-जून 2010, पृ0 सं0 62-63।
10. कपूर, मस्तराम: ‘डाॅ0 रामनोहर लोहिया, वर्तमान संदर्भ में’, अनामिका प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2009, पृ0 सं0 146।
11. कुमार, बिपिन, छमाही पत्रिका ‘अनिश’, जनवरी-जून 2010, पृ0 सं0 62-63।
12. शरण, शंकर: ‘विखण्डन की संस्कृति’, संपादकीय पृष्ठ(6), समाचारपत्र ‘जनसत्ता’, 31 दिसम्बर 2010।
13. किशोर, गिरिराज: त्रैमासिक पत्रिका ‘अकार’, अगस्त-नवम्बर 2010, पृ0 सं0 11।
14. धूमिल: ‘संसद से सड़क तक’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1972।
15. किशोर, गिरिराज: त्रैमासिक पत्रिका ‘अकार’, अगस्त-नवम्बर 2010, पृ0 सं0 11।
16. http://www.pravakta.com/story/16938
17. कुमार, (प्रो0) आनंद, ‘व्यक्तिवाद केन्द्रित समाज है....’ हस्तक्षेप(साप्ताहिक परिशिष्ट), राष्ट्रीय सहारा, 18 दिसम्बर 2010।
18. जोशी, (सं0)रामशरण: वैश्वीकरण के दौर में, समयांतर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ0 सं0 47।
19. रशीद, साजिद: ‘पराभव के पीछे’, रविवारीय पृष्ठ(7), समाचारपत्र ‘जनसत्ता’, 12 दिसम्बर 2010।
20. सुनील: ‘लोहिया की लालटेन’, संपादकीय पृष्ठ(6), समाचारपत्र ‘जनसत्ता’, 20 अक्तूबर 2010।
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