आओ बच्चों तुम्हें दिखाए....झांकी हिंदुस्तान की


जानता हंू कि शब्दों से जिंदगी का भरण-पोषण नहीं हो सकता। पर बच्चों, शब्द की रोशनी अंधकार में डूबने नहीं देती। ज्ञान से मन-मस्तिष्क पर नियंत्रण होता है। शब्द उसी ज्ञान की कुंजी है। पहले के ऋषि-महर्षि ज्ञान पाने के लिए कठोर तपस्या करते थे। कष्ट और तकलीफ सहते थे। लेकिन अब का जमाना वो नहीं रहा। अब तो शिक्षार्जन एक पेशा है। पहले शिक्षकों का दर्जा भगवान तुल्य था। समाज के लिए आदरणीय था यह पद। अब सभी को पैसे ने एक ही खूंटे से टांग दिया है। जो जितना अमीर यानी धनवान है, उसे उतनी ही बढ़िया और मुफीद शिक्षा मिलेगी। सरकारी स्कूल में तुम क्यों नहीं पढ़ रहे? कभी सोचा है तुमने? सोचना चाहिए। क्योंकि सरकारी स्कूल महज तमाशा बनकर रह गया है। वहां सबकुछ मिल जाता है सिवाय ज्ञान के। वहां ककहरा और ‘एबीसी’ सीखने में पांच साल लगते हैं। पर सही उच्चारण का सहूर नहीं सीख पाता बच्चा। जो शिक्षक या शिक्षिका हैं, उन्हें भी ऐसे स्कूलों में पढ़ाने में जी नहीं लगता है। वो कक्षा लेने से आनाकानी करते हैं। ज्यादातर समय गप और इधर-उधर की बातें करने में बीत जाता है।
कहने का तात्पर्य है कि हमारे शिक्षा प्रणाली में काफी लोचा है। लोग बीच का राह तलाशते हैं। अपनी भलाई या कहें फायदा-नुकसान देखते हैं। जैसे तुम प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हो। कई लोगों के संग। पर तुम समूह में हो कर भी कई लोगों से अलग हो। तुम जिस समुह या समुदाय में हो, वह एक खास किस्म का वर्ग है। पर्याप्त पैसा या कहें निजी तौर पर ‘विशेष’ प्रकार की शिक्षा दिला सकने की हैसियत वाला वर्ग। वहीं एक ऐसा समुह भी है, जिसमें शामिल बच्चे आकार में बहुत अधिक हैं। लेकिन वो आज भी सरकारी विद्यालय में पढ़ने को विवश हैं। उनके माता-पिता के पास निजी स्कूलों का मेहनताना देने की क्षमता नहीं है। कई लोग तो देखा-देखी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला करा देते हैं। पर जल्द ही यह हौसला पस्त हो जाती है। निजी विद्यालयों की फरमाइश और ट्यूशन फी अंततः उनके लिए ‘नो इंट्री’ का साइन-बोर्ड ले कर आता है।
कहने को तो, भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। यहां समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे समान इंसानी मूल्य और सिद्धांत हैं। पर असल में यह एक लिखित दस्तावेज मात्र है। संविधान सभी को समान दरजे का कानूनी हक देता है। उसकी सुरक्षा की गारंटी देता है। अवमानना की स्थिति में संबंधित कार्रवाई हेतु प्रावधान देता है। पर यह सब कागजी है। इसका सामना करने के लिए पत्थर का जिगर चाहिए, जो न्याय की गुहार के लिए अडिग चट्टान सा खड़ा रहे, लेकिन टूट कर चकनाचुर न हो जाए। भारतीय संविधान यह कहता है कि 5 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा पाना उनका मौलिक अधिकार है। लेकिन वो कैसी और किस स्तर की शिक्षा पायें, इसका न तो कोई मानक है और न ही गुणवत्ता का सही सुचकांक। खानाप ुर्ति के लिए भारत में शिक्षा पर होने वाले खर्च कम नहीं है। विश्व बैंक से ले कर यूनिसेफ तक पैसे लुटा रहे हैं। मतलब, किसी भी तरह भारत का शिक्षा का ग्राफ बढ़ना चाहिए। लेकिन शिक्षा कितना मूल्यपरक और स्तरीकृत हो इसका कोई नाप-जोख और पैमाना नहीं है। शिक्षा का ध्येय ज्ञान का सृजन है। रचनात्मक गतिविधियों का विकास है। यह मनुष्य के हाव-भाव और आचरण में परिलक्षित होने चाहिए। यह दिखना चाहिए कि शिक्षा प्राप्त एक सभ्य व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है और एक अज्ञानी शिक्षा के अभाव में किस तरह का आचरण कर रहा है।
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