‘थोक में निजीकरण नहीं’: यह कारपोरेट दलालों की शब्दावली है, जनता की नहीं

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मान लीजिए, अमेरिकी चार्टर के अन्तर्गत लोकतांत्रिक सुधार की पेशकश सामने आये तो सामान्य जनता क्या प्रतिक्रिया देगी? यदि यूरोपीय संघ इस बात का दावा करता है कि भारत में विकराल होती भ्रष्ट्राचार की समस्या से निपटने के लिए आवश्यक है कि उसे विदेशी शासन-व्यवस्था के अन्तर्गत(थोंक में नहीं आंशिक रूप से) शासित किया जाये, तो क्या भारतीय अवाम इसके लिए सहर्ष राजी होगी?

यदि आप यह सब नहीं सोचते हैं और सोचना भी नहीं चाहते हैं, तो चैन की नींद सोइए; क्योंकि हमारे देश का अभिजात्य घराना और नवप्रबुद्ध युवा पीढ़ी इन सब के लिए पूर्णतया तैयार है और भारत की बहुमत सरकार भी इसी दिशा में त्वरित कार्रवाई और पहलकदमी करती दिखाई दे रही है जिसे जन-प्रचारित रूप में जिस प्रकार परोसा जा रहा है या समझाया जा रहा है; वह बेहद खतरनाक है। भारतीय समाज का एक खास तबका स्वयं को लाभान्वित किए जाने की शर्त पर यह सब नवसाम्राज्यवादी प्रोपेगेण्डा अपना रहा है जिसमें जनता के लिए सिर्फ सपने हैं; यथार्थ में हासिल होने वाला कुछ भी नहीं।

ताजा उदाहरण माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रेलवे के निजीकरण को लेकर है। उन्होंने बड़ी साफगोई से कहा कि रेलवे का निजीकरण नहीं होगा। सरकारी-मातहत अख़बारों ने सम्पादकीय भी जोर-शोर से और अपनी सरकारी प्राथमिकता तय करते हुए लिखा है। आप स्वयं गौर फरमाइए: ‘‘प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात का जोरदार खंडन किया है कि उनकी सरकार रेलवे का निजीकरण करने जा रही है।...भारतीय रेलवे इतनी बड़ी संस्था है कि थोक में उसका निजीकरण संभव नहीं है।’’(हिन्दुस्तान, 27 दिसम्बर) यानी स्पष्ट है कि रेलवे का आंशिक निजीकरण संभव है। यह तब जब कि हम सब जानते हैं कि नवसाम्राज्यवादी ताकतें पहली घूसपैठ ऐसी ही सुराखों से करती हैं। हमारे यहां एक प्रचलित मुहावरा है-अंगुली पकड़कर पहुंचा पकड़ना; इन प्रभुत्त्वादी देशों की मानसिकता बतलाने में यह मुहावरा सर्वथा समर्थ है।

यह अख़बार अपनी सम्पादकीय में आगे लिखता है-‘‘भारतीय रेलवे पिछले दो-ढाई दशकों में धीरे-धीरे ऐसी हालात में पहुंच गई है कि उसे ठीकठाक करना आसान काम नहीं है। तकनीक और प्रबंधन के स्तर पर वह पिछड़ती गई है, क्योंकि उसके आधुनिकीरण की बरसों तक उपेक्षा की गई। इस बीच रेलवे की आर्थिक स्थिति भी ऐसी जगह पहुंच, जहां वह जैसे-तैसे अपने मौजूदा खर्च पूरे कर पा रही है। नई परियोजनाओं, नई टेक्नोलाॅजी और सेवाओं के व्यापक विस्तार के लिए उसके पास पैसा ही नहीं बचता। ऐसे में, निजी क्षेत्र की भागीदारी के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है। लेकिन यह व्यापक निजीकरण नहीं होगा।’’

ओह! ये चालबाज सम्पादक अपनी देशी ज़मीन के खि़लाफ ऐसा षड़यंत्र क्यों कर रहे हैं? वे यथास्थिति का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ एवं निष्पक्ष ढंग से करने की बजाए अच्छे पैकेज की भुगतान पर दूसरों के मनमुताबिक  और मनमाफ़िक करने के लिए जबरिया लालायित हैं। भारत की एक बड़ी आबादी भूख, ग़रीबी, अशिक्षा, बीमारी से लहूलुहान है और वे भर-भर मुंह यह बात प्रचारित कर रहे हैं कि भारत का हर तीसरा आदमी/औरत स्मार्टफोन का दीवाना है वह उसके बिना न जी पाने की बात खुलकर स्वीकार कर रहा है।(हिन्दुस्तान, 27 दिसम्बर, पृ. 13) दरअसल, सम्पादकीय निष्ठा से च्यूत अधिसंख्य सम्पादक कम प्रबंधकीय बोली-बात अधिक परोसते हैं। जहां तक तकनीकी-प्रौद्योगिकी के स्तर पर रेलवे के पिछडने का सवाल है तो वे यह विकल्प कम सुझाते हैं कि जिस तरह आप मोबाइल के टाॅकटाइम को रिचार्ज करकर आप कहीं भी किसी भी जगह से अपना ‘टाॅक वैल्यू’ प्राप्त कर सकते हैं; ठीक वैसे ही रेलवे की आधुनिकीकृत तकनीक आपको यात्रा करने की भी सुविधा प्रदान करेगी या कि अब हर तरह का सरकारी ट्रांजक्शन आपको आॅनलाइन उपलब्ध है। ये काॅरपोरट घराने ऐसे और भी जनकल्याणकारी ऐप क्यों नहीं लांच कर रहे हैं या सरकार को इसके लिए सलाह-सुझाव दे रहे हैं?

पहली बात तो यह कि हम भारतीयों को आधुनिकता और आधुनिकीकरण की परिभाषा ही नहीं मालूम है। हम माध्यम की गतिविधि से अधिक प्रभावित होते हैं; अपनी सोच और दृष्टि से कम प्रेरणा प्राप्त करते हैं। हमारा देशा वर्षों की गुलामी के बाद, अटूट जनांदोलनों के बाद स्वाधीनता का मुंह देख सका है। अतः हमें हर कदम फूंक-फूंक कर रखना और उसके बारे में तत्काल निश्चिंत न हो सकना स्वाभाविक है। यह ठीक है कि हमें समय के साथ बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन इस बात पर भी जोर दिया जाना चाहिए कि हम किन शर्तों पर बदल रहे हैं या बदलावों को आत्मसात करने पर उतारू हैं? महात्मा गांधी जिनके नाम पर हम अक्सर जन-सरोकार और जन-पक्षधरता की बात करते-फिरते हैं; क्या वह वाकई हमारे कर्म-कथन और चरित्र में विद्यमान होता है? यदि नहीं तो फिर हम यह सब करम/करतूत क्योंकर कर रहे हैं? हमें इस बात से कोई गिला नहीं कि अच्छे काम के लिए कई बार खतरे मोल लेने पड़ते हैं? 1990 का आर्थिक उदारीकरण इसी का परिणाम है। लेकिन क्या हमने इन निर्णयों के बाद देश में हुए आमूल-चूल बदलावों पर गौर किया है? क्या हमने अपने शोध-निष्कर्ष और मूल्यांकन-विश्लेषण से प्राप्त तथ्यों-आंकड़ों का यत्नपूर्वक पड़ताल/जांच किया है कि हमारे फैसले का हमारी देश की जनता पर क्या कुछ प्रभाव पड़ा है या कि जनसमाज का जीवन-स्तर कितना बढ़ा है या कि कम से कम सबके लिए कुछ खास न सही माकुल ढंग से जीने लायक हुआ है?

अभी जिस तरह की रवायत है और हम जिस दिशा में आगे बढ़ने को तत्पर दिख् रहे हैं; वह ग़लत है या सही; यह बताने का जिम्मा देश के पत्रकारों पर है, बौद्धिक वर्ग के अधिष्ठताओं पर है...यह सब दारोमदार उन पर है जिन्होंने यह संकल्प लिया है कि हम संविधान की मूल प्रस्तावना के साथ कभी और किसी स्थिति में खिलवाड़ नहीं करेंगे। तिस पर भी यदि यह खेल जारी रहता है, तो छोड़ दीजिए सबकुछ ईश्वर के रहमोकरम पर...नियति के भाग्यभरोसे....लेकिन याद रखिए कि आपके ही पोते-पोतियां, नानि-नातिन....जब अपनी ही ज़मीन पर मुंह के बल गिरी हुई किसी को बददुआ देंगी, तो उस कतार में पहली अगुवाई में शामिल हम और हमारे समकालीन ही होंगे।
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Banaras Hindu University
दस विदानिया
फिर मिलेंगे
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