Monday, December 29, 2014

हत्या-पूर्व एक मशविरा

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कितना अच्छा हो अपने ब्लाॅग में किसी वर्ष कोई तारीख न दर्ज हो...!!

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जब बेहद चालाक हो समय
मित्र बन पीठ पर थाप दे
घुस आए धड़धड़ाते हुए
तुम्हारे मकान के भीतर
अभाव में जीते तुम्हारे बच्चों को दुलारने लगे
तुम्हारी मेहरारू के भाग्य को कोसने लगे
निःसंकोच छूने लगे तुम्हारे सत्त्व को
करने लगे व्यंग्य, उड़ाने लगे उपहास
उसकी अट्टहास देख
यदि तुम्हारा चेहरा फ़क पड़ने लगे
एकबारगी भकुआ जाओ तुम
तो इस घड़ी सावधान होओ...
यह डरने का नहीं मुकाबला का समय है!
पीछे हटने का नहीं प्रतिरोध का समय है!
कमबख़्त यह रोने का नहीं गीत गाने का समय है!
अपने पिता के टोन में निहत्था किन्तु निर्भीक-
‘आव गाईं जा झूमर हो हमार सखिया....’

यह समय अपनी भाषा में तेज-तेज स्वर में बोलने का है
ताकत भर अपनी चेतना को आज़माने का है
ताकि तुम्हारी हत्या भी हो...,
तो सारा ज़माना तुम्हारी आह! सुने
और बरबस कहे, ‘हाय हत्भाग्य हमारा जड़-मूक, स्पंदहीन, संवेदनहीन बेजान शरीर;
दुनिया से कुछ न चाहने वाले को दुनियावालों ने ही लील लिया।’
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