आखि़री बात इस वर्ष की ‘इस बार’

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वह 20 रुपए की पत्रिका है इंडिया टुडे...एकदम ताजा अंक; पत्रिका को मैंने ‘संकल्प के सितारे’ आवरण-कथा के लिए खरीदा था। हद पिछली बार से यह हुई कि उसने इस बार पूरा ‘पेड न्यूज़’ ही मुख्यपृष्ठ पर रंगीन-चटकीले पृष्ठों में प्रकाशित कर दिया। मानों ह कवर-स्टोरी हो...! 
यानी 
बात हो रही है उस विज्ञापन की जिसमें बग्घी पर नेताजी का उत्तर प्रदेश और उनका लाडला अखिलेश संग-साथ विराजमान हैं।

...क्या माननीय अखिलेश यादव की मंशा, घोषणा और उद्देश्य ही यह हो चली है कि :

उत्तर प्रदेश का नक्शा क्या कुछ बदला है यह अब यहां की जनता/मतदाता नहीं बोलेगी बल्कि यह सब वह प्रचार-सामग्री द्वारा कहे जाने चाहिए जो हम अकूत/इफ़रात खर्च कर तैयार कर रहे हैं; छोटे-बड़े सभी प्रचार माध्यमों से बंटवा- भिजवा रहे हैं और अपनी सफलता का और अपने बुलंद नज़रिए को अधिकाधिक नज़राना पेश कर रहे हैं....
(यह न भूलें श्रीमान् अखिलेश यादव कि हमारे पास आपके राजनीति में ककहारा सीखने वाले दिनों की ‘ब्लैक एण्ड व्हाइट’ कतरनें भी सुरक्षित हैं जब आपने मंचों से बोलना शुरू किया था...जनमुद्दों और सत्ताधारी जनप्रतिनिधियों को अपनी भाषा में घेरना शुरू किया था)

प्रचार में लपेट दो प्रदेश को, जनता रंगीनमिज़ाजी है वह अपना सारा दुःख-दर्द, उम्मीद और मांग भूल जाएगी....

प्रदेश की जनता को समाजवाद के झंडे के नीचे यह जतलाते हुए रखों कि समाजपार्टी ही जीवनदायिनी बरगद है उनका बरक्क़त इसी से होगा....

प्रांत में जो दिख रहा है या जो हो रहा है; उससे दूर हटकर जैसा कभी नहीं हो सकता लेकिन हम होने की दावा कर सकते हैं; ऐसी परिकल्पना संचार-माध्यमों में प्रचारित करो....

चीख-चीख कर संचार के हर माध्यमों के सर-सवार होकर यह बताओ कि प्रदेश की सरकार ने पिछले कुछेक वर्षों में ही पूरे राज्य का कायापलट कर दिया है....

अब जनता प्रचार को देखकर अपवना मत बेचती है या फिर राजनीतिक पार्टियों की दासता स्वीकार करती  हैं...

यह सरकार प्रचार का आक्रामक और बेशुमार पोचारा अथवा रंगरोगन करने वाली इकलौती प्रांतीय सरकार नहीं है....आज बिकाऊ किस्म की ध्ंधेबाज और बाजारू पत्रिकाओं का जत्था इसे ही अपना ईमान-धर्म, संकल्प, जनास्था और अपनी पत्रकारिता का वास्तविक ध्येय तथा अपने लक्ष्यसिद्धि का साधन मान चुका है..

पश्चिमी ज्ञान में पगे-पगुराए  हमसब(यानी वे सब जो प्रचार के द्वारा विकास का नारा लगाते हैं, कागजी रंगरोगन के द्वारा अपने राज्य की भूख, गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य तथा अन्य जनमुद्दों से निपटते अथावा उसकी काट निकालते हैं...) एक ही हिसाब-किताब वाले साफसुथरी छवि के, अमनपसंद और अपने लोगों की भलाई और उनका विकास चाहने वाले ‘जनता के लोग’ हैं...‘समाज के आदमी’ हैं....
अतः
जनता हमेशा हमारे कहे का मनोविज्ञान समझती है... हमारे दिखाए फोटू-तस्वीर को सही-सच मानती है और इसी आधार पर हमें वोट देती है....

 सब समाजवादी आओ, एकराग और एकसुर में हमारा साथ दो, हमारा प्रचार करो और द्वारा दिखलाये गए कामों का गुणगान करो.....समाजवादी पार्टी के हर मानिंद नेताओं के श्रीमुख से यह भी अवश्य कहवाते रहो-कि 
‘बदल रहा है आज, संवर रहा है कल'
                            
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               उपयुक्त की असहमति में हमें अपनी ओर से पूरजोर प्रतिरोध दर्ज़ कराना चाहिए। यह जानते हुए कि यह किसी एक दल या पार्टी-विशेष का गाथा या हाल-ए-हक़ीकत नहीं है। लगभग सभी दल एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। नाम के ‘अपना दल’ में भी अपना कोई नहीं है; ‘आप’ में भी हमसब नहीं हैं; कांग्रेस हमारी डीएनए से गायब है और भाजपा का एनडीए पूरे जोर-शोर से साम्प्रदायिक बोल और कट्टर बयान देने में जुटी है....
'आई नेक्सट' से साभार
 सवाल है... ऐसे में हम क्या करें?...तो मुझे तो बंधुवर वर्तोल्त ब्रेख्त का वह कथन आपसे साझा करने की इच्छा हो रही है जिसे आज ही किसी पत्रिका में पढ़ा हूं:

‘‘महाशय, संसद ने जनता का विश्वास खो दिया है
        तो ऐसा करें
        कि संसद को रहने दें और जनता को भंग कर दें।''

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