Tuesday, July 16, 2013

धूपगाड़ी


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आओ बाबू
बैठो साथ

निकालो अपना
अंजुरी-हाथ

बिन सीढ़ी
उतरी धूप

आजू-बाजू
पसरी धूप

गहन अन्धेरा
बिल्कुल चुप

सब जागे
जब चमकी धूप

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हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...