Monday, July 15, 2013

मन...राग


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बहुत हुई भाषा में बातें
अब...नहीं कोई बात कहूंगा
गले मिलूंगा, गले पडूंगा

छोडूंगा चर्चा, बातूनी बहसें
अब....नहीं कोई प्रचार करूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

बहुत चलाया शब्द-धनुष को
अब...नहीं कोई वाक्य गढूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

यह समय है स्वांग-धरण का
अब...नहीं कोई पाँत बैठूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

जो होना-जाना तय था, सीखा
अब नहीं कोई राग रटूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

‘करो या मरो’ दो ही पथ हैं
बस इस पथ का नेह धरूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

इस सबक के कई हैं साथी
उनसे सीधा संवाद जोडंूगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा।

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हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...