रजीबा की पाती

प्रिय देव-दीप,

कैसे हो आपदोनों? बिटना का जन्मदिन है 25 जुलाई को। याद है। मैं भूला नहीं हँू तारीख़। राजा बाबा आपका जन्मदिन भी याद था, 27 अप्रैल। आप ही नहीं थे मेरे पास। खैर! इस बार आपदोनों का जन्मदिन साथ-साथ मनाऊँगा। संयुक्त रूप से।

देव-दीप, आपदोनों के पिता होने का सुख मैं काट रहा हूँ। जबकि आपदोनों बेरोजगार पिता के बेटे होने का दंश झेल रहे हैं। इन हालातों का जवाबदेह मैं खुद हूँ। मेरा निकम्मापन जिसपर मुझे लाड़ आता है अक्सर....आपदोनों के लिए करता-धरता कुछ नहीं है। हाँ, बतकही-बकबकी में अव्वल अवश्य है। यह सब वैसे समय में जब प्रतिभावानों का झुण्ड मेरे आगे-पीछे दौड़ लगाता दिख रहा है; मैं अपने फिसड्डीपन का पीठ थपथपाने में अलमस्त हूँ।

देव-दीप, शोध जैसे महत्त्वपूर्ण काम के लिए मेरी पात्रता न के बराबर थी। मेरे गाइड ने हौसला आफजाई की, तो मेरा उत्साह कपार पर और सोच फुनगी पर चढ़ गया। मुझे खुद से ताज्जुब था कि जो लड़का ठीक से अपनी बबरी तक नहीं सँवार सकता है, सलीकेदार कपड़े(मुफ्ती, लिवाइस, काॅटन्स, फ्लाइंग मशीन....ब्रान्डेड) तक नहीं पहन सकता है....वह अपने गुणवान/प्रतिभावान मित्रों के संगत में रहकर इतनी जल्दी क्या कुछ सीख लेगा? खैर! आपदोनों अपनी उम्र के साथ बड़े होते चले गए और मैं जूनियर शोधार्थी से सीनियर शोधार्थी बनता चला गया। आज इस शोध में आए मुझे चार साल हो गए हैं...तब भी लगता है कि अगले साल के अंत से पहले शायद ही कुछ ठीक-ठाक(काॅपी-पेस्ट कतई नहीं)जमा कर पाऊँ?

देव-दीप, जहाँ मैं पढ़ता हूँ मेरे इर्द-गिर्द संवेदना, ज्ञान, भाषा, शिल्प, कला इत्यादि की गंगोत्री बहती है। इस गंगोत्री में दर्शन-चिन्तन की बड़ी-बड़ी मछलियाँ तैरती हैं। मेरे कई मित्रों की उठकी-बैठकी और हर-हर गंगे उस गंगोत्री के साथ जबर्दस्त है। वे उसमें चैबीसों घंटे पँवरते हैं, लेकिन डूबते कतई नहीं। इस गंगोत्री में कई सिद्ध साधक हैं जो खुद को दुनिया भर के मुद्दों का जानकार और अन्तरराष्ट्रीय प्रवक्ता कहते हैं। उनके आगे पीएम, सीएम, डीएम सब के सब पानी भरते हैं। वे सीधे सबसे बात कर लें...जुबान की मजाल नहीं। लेकिन वे मंच से तूफानी बोलते हैं। वजनदार ताली पिटवाते हैं। मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ी है। अतः मैं उनकी बातों को प्रायः पन्ने पर नोट-नाटकर उनकी नाक की नापजोख करता हूँ, अलोता में....अकेले में। और खुद से हिसाब-किताब करता हूँ कि क्या वे वाकई बहुत ज्ञानी हैं। प्रकाण्ड हैं। जिनके आगे सब सुननहारों की आँखें चुंधिया जाती है।

देव-दीप, ज्ञान बाँटने से बढ़ता है; यह बचपन की सीख है। विश्वविद्यालयों में तो ज्ञान मौके पर बोलने से ही बढ़ा मालूम देता है। कौन संवेदनशील है, मानवीय है, अद्भुत है, बेमिशाल है, सर्वहारा का साथी है, हाशिए की आवाज़ है...यह सब किसी को देखकर या उनके हाव-भाव, व्यक्तित्व-व्यवहार का सीधे मोल-तोल-परख कर नहीं जाना जा सकता है। इसके लिए मुझ जैसे की मोटी बुद्धि धोखा दे जाती है। सूक्ष्म दिमाग और तीक्ष्ण दृष्टि का जुगाड़-सुगाड़ हो तभी यह पहचान हो पावेगा। अब मैं यह पउवा कहाँ से लाऊँ। साथी कहते हैं, हीनताबोध खराब चीज है। संगत-पंगत में रहने से जो नहीं है, उस पर भी हक ज़माने का अधिकार मिल जाता है। उनका तर्क है कि यदि आपको पगुराना सीखना है, तो जानवरों के साथ गलबहियाँ तो करना ही पड़ेगा न! ठीक उसी तरह ज्ञानवान, महान या सम्मानित बनने के लिए ज्ञानियों के साथ धुनि तो रमाना ही पड़ेगा।

यदि यह सब नहीं कर सकते, तो आपके लिए टका-सा रेडिमेड जवाब रखा है-‘जाइए अपना हाथ जगन्नाथ कीजिए।’

....और मैं वर्षों से यही करता आ रहा हूँ।

तुम्हारा पिता
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