बीएचयू : यह हंगामा है क्यों बरपा?


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बीएचयू में फीसवृद्धि का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। विश्वविद्यालय के
विद्यार्थियों में रोष व्याप्त है। बीएचयू प्रशासन इस सम्बन्ध में
निर्लिप्त है। यह कहना ग़लत होगा। वह जानबूझकर इस मुद्दे को बेपरवाही के
साथ ‘हैंडिल’ करता दिखाई दे रहा है। प्रशासन और अकादमिक अधिकारियों की
अक्षमता या कहें मिलीभगत ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग में रंग दिया है।
परिसर में विरोध-प्रदर्शन, पुतला-दहन, ज्ञापन इत्यादि का सिलसिला हफ़्ते
भर से जारी है। बीएचयू सिंहद्वार के समीप प्राॅक्टर-फोर्स लाठी-डंडे के
साथ तैनात है सो अलग। परिसर में तनाव का बाना इस कदर बुना हुआ है कि
सामान्य विद्यार्थियों में भय और खौफ पैदा होना स्वाभाविक है।

संकट की इस घड़ी में विश्वविद्यालय का प्रशासनिक अमला हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
मानों उसने अपनी बुद्धि की बत्ती ही बुझा दी हो। दरअसल, शुल्कवृद्धि की वजह से
आर्थिक रूप से विपन्न विद्यार्थियों के ऊपर बड़ा बोझ डाल दिया गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन यहाँ पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के भूगोल से
परिचित नहीं है; ऐसा नहीं है। यह सबकुछ सोची-समझी रणनीति के साथ हुआ
है। इसका एक संदेश तो यह जा रहा है कि बीएचयू प्रशासन गरीबों को बेहतर
शिक्षा दिए जाने का पक्षधर नहीं है। दूसरा यह क़यास भी लगाया जा रहा है कि
यह फैसला चुनाव से ठीक पहले छात्र-राजनीति या छात्रसंघ बहाली की मांग को
धार देने के लिए किया गया है। फिलहाल, फीसवृद्धि के फैसले को लेकर
छात्र-छात्राओं में एकजुटता बढ़ी है। वे फीसवृद्धि के ख़िलाफ अपनी आवाज़
बुलन्द करने में जुटे हैं।

यह विडम्बना ही है कि फीसवृद्धि का लिहाफ़ लेकर विश्वविद्यालय-प्रशासन सड़कों का मरम्मतीकरण और खाली जगहों का उद्यानीकरण करना चाहता है। महामना मदनमोहन मालवीय ने इस गुरुकुल की परिकल्पना जिस महान उद्देश्य को आधार बनाकर की थी आज वे हाशिए पर हैं। यह विश्वविद्यालय ज्ञान, साहित्य, समाज, कला, वाणिज्य, नवाचार, शोध, सर्जनात्मकता इत्यादि में उच्चस्तरीय नेतृत्व की भूमिका निभाने में अक्षम है। परिसर के ‘आउटलुक’ को बनाने या उसे सजाने-सँवारने में जो धन अपव्यय हो रहा है; उसे यदि विद्यार्थियों के मानसिक विकास, स्वतन्त्र चिन्तन, ज्ञानात्मक प्रबन्धन, कला-कौशल, जीवनबोध व मूल्य-संवर्द्धन इत्यादि के लिए किया जा रहा होता, तो आज फीसवृद्धि को लेकर यह हंगामाखेज दृश्य शायद! ही देखने को मिलता।


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