चोटी गूँथने वाली लड़कियाँ


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अक्सर कहते सुना है
शहराती आवाज़ में
अंग्रेजी पिटपिटाने वाली भाषा में
‘...कि चोटी गूँथने वाली लड़कियाँ
क्या जानती हैं आखिरकार?
न डायटिंग, न डेटिंग, न पार्टी,
न शाॅपिंग, न फैशन, न मूवी, न डीजे,
न लव-शव, न कैरियर
...और न ही इंज्वायबुल लाइफ
...हाऊ डैम्ड यार, ये चोटी गूँथने वाली लड़कियाँ
गले में मोती का माला गाँथे रखने वाली लड़कियाँ
जानती ही क्या है अपने बारे में?
कुछ भी तो नहीं...!’

वहीं मैंने यह सुना है
ठेठ देसी अंदाज में
आँचलिक बोली-वाणी में
इन लड़कियों को बोलते हुए कि
‘हम अपना जांगर खटाते हैं
तो जलता है घर में चूल्हा
पकता है खाना
धुलाते हैं बरतन
बहराते हैं घर-आँगन
दीवालों की पीठ पर होती है मालिश
ज़मीन की देह पर लगते हैं उबटन
पेड़ों की तनाओं में लपेटा जाता है सूत
खेत-खलिहान में खाना पहुँँचता है
नाद में सानी गोताते हैं
जानवरों को मिलता है उनका जरूरी आहार
किसी लड़के की सजती है बारात
लौटते ही द्वार पर होती है परछन
गूँजती हैं किलकारी, तो बँटते हैं पाहुर
चारों तरफ हम और हम ही होते हैं
अतः नहीं चाहिए हमें शहरियों द्वारा
सभ्य होने का प्रमाण-पत्र
क्योंकि हमारे बाहर निकलते ही
मर जाएगी एक नदी
उजड़ जाएंगे खेत-खलिहान
ख़त्म हो जाएगी हरियाली
असमय काल-कलवित हो जाएंगे पेड़
खो देगी भाषा अपना सौन्दर्य
घर टीका-बुना करना भूल जाएंगे
और देखते-देखते
कायम हो जाएगी गाँवों में
अन्धेरे की बादशाहत
और समा जाएंगे सारे गाँव
शहरों के ‘ब्लैक होल’ में।'
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