...और यह भी विश्वविद्यालय के बारे में

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भारतीय ज्ञान-मीमांसा के अनुसार, मनुष्य का ज्ञान उसके स्वयं के अनुभव पर आधारित है। जहाँ ज्ञान की रिक्तता होती है, वह युग अंधकार युग बन जाता है। भारत में इस घड़ी अंधकार युग के आगमन का शोर और कोलहाल सुनाई दे रहा है। चारों तरफ यह कहा जा रहा है कि वे दिन अब नहीं रहे जब शिक्षा की बात भविष्य के लिए समाजीकरण के रूप में विवेचित किया जा सकता था। चूँकि तब बहुत कम अवसर प्रत्याशित थे और जीवन जी सकने योग्य बनाने के लिए एक बच्चे को अपेक्षित दक्षता प्रदान की जा सकती थी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा लाए गए आधुनिकीकरण ने विरोधाभासी रूप से एक ओर तो हमारी भविष्य कथन की ताकत को बढ़ा दिया है; वहीं दूसरी ओर भविष्य की अनिश्चितताओं को पैदा कर दिया है। भारत में उच्च शिक्षा के संस्थान ऐसे स्नातकों के उत्पादक हैं जो उच्च योग्यताओं के लिए तथा अंतत्त्वोगत्वा पश्चिम की विकसित अर्थव्यवस्था में समावेशन के लिए चले जाते हैं। इस प्रकार एक स्नातक को प्रशिक्षित करने में विकासशील समाज जो भी निवेश करता है-मौलिक विज्ञानों, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा विज्ञान इत्यादि में वह बेकार चला जाता है; क्योंकि वह व्यक्ति ऐसी दूसरी अर्थव्यवस्था को सेवाएँ प्रदान करने लगता है जो अपने लोगों को प्रशिक्षित करने में सक्षम हैं; पर जो ऐसे विदेशियों को काम पर रखकर स्थिति का लाभ उठाती है जिनके प्रशिक्षण में उन्हें कोई प्रारम्भिक निवेश नहीं करना पड़ा। विकासशील विश्व में ज्ञान के केन्द्रों को विकास के वैकल्पिक मार्ग पर विचार एवं शोध हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए, जो जीवन को बेहतर बनाएँ; पर्यावरण को कम प्रदूषित करें; संसाधनों की बेहतर साझेदारी संभव करे तथा लोगों को अपने समाज तथा संस्कृति के प्रति प्रतिबद्ध एवं दूसरी संस्कृतियों का गुणग्राही बनाएँ।

अतएव, आज अध्ययन-अध्यापन में परोपकारिता और सदाशयता के स्थान पर पारदर्शिता और जवाबदेही कायम किए जाने की जरूरत है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इसी संकल्प को दुहराते हैं:

भारत अपने युवाओं को कौशल-विकास, प्रशिक्षण और अवसर देकर एक ज्ञान आधारित समाज बनाने का इरादा रखता है। 12वीं योजना के अंत तक हमारा ज्ञान आधारित समाज बनाने का लक्ष्य है। मैं युवाओं को शिक्षा प्रदान करने वाले तथा उनके मस्तिष्कों को प्रभावित करने वाले तथा समाज पर नैतिक प्रभाव रखने वाले लोगों का आह्वान करता हूं कि वे इस प्रक्रिया को शुरू करें। हमारे विश्वविद्यालयों तथा अकादमिक संस्थानों को शिक्षा प्रदान करने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए, जिससे हमें अपने समय की नैतिक चुनौतियों का सामना करने में सहायता मिलेगी। इससे समाज में मानव गरिमा और समानता के मूल्यों के प्रचार-प्रसार में मदद मिलेगी। भारत के वर्तमान जनसांख्यिकी स्वरूप से इस विश्वास को सुदृढ़ बल मिलता है। एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2020 तक भारत की औसत आयु 29 वर्ष होगी। यह अमरीका की 40 वर्ष, जापान की 46 वर्ष और यूरोप की 47 वर्ष की औसत आयु से काफी कम होगी। 2025 तक, दो-तिहाई भारतीयों की कामकाजी आयु होगी। यदि हम युवाओं की इस क्षमता का उपयोग कर सके और उनकी लाभकारी ऊर्जा को दिशा दे सके तो हम अपने देश के आर्थिक भविष्य की कायापलट कर सकते हैं।

भारतीय राष्ट्रपति के शब्दों में भावी पीढ़ी के भविष्य से सम्बन्धित चिन्ता साफ स्पष्ट हो रही है। इस चिन्ता का मुख्य कारण है-भारतीय ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया में पड़ने वाला भूमण्डलीकरण का तीव्र प्रभाव। आज दुनिया भर की विचारधाराओं का प्रभाव भारतीय विश्वविद्यालयों पर पड़ रहा है। माक्र्सवादी हैं; नवमाक्र्सवादी हैं; प्रगतिवादी हैं; नवप्रगतिवादी हैं; जनवादी हैं; नवजनवादी हैं; लेकिन ज्ञानवादी या नवज्ञानवादी नदारद हैं। आज विश्वविद्यालय केवल उपाधि बाँटने की जगह भर बनकर रह गया है। आज अध्ययन एवं शिक्षा का मूल्य न समझकर या विद्यार्थी की निपुणता और प्रवीणता में वृद्धि न कर उसे केवल उपाधिकारी बनाने पर तुले हुए हैं। अर्नाल्ड एंडरसन और एडवर्ड शिल्स प्रवीणता के विकास और रचनात्मकता पर जोर देते हैं और चिन्तन के लिए नए रूपों के साथ आधुनिक उद्योग, समाज और शासन के निर्माण की सक्रियता देखते हैं। यूरहेड ने ‘एलिमेन्टस आॅफ एथिक्स’ में कहा है कि ज्ञान ही उच्चतम आनन्द हैं। धन और शान्ति इसकी अपेक्षा निम्न कोटि के हैं जिनसे केवल इच्छाओं की पूर्ति होती है। और उस ज्ञान प्राप्ति की चेष्टा करना, सुख प्राप्ति के लिए किए गए कर्मों में उच्चकोटि का है।
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