ज्ञान, विश्वविद्यालय और युवा


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पश्चिम में, अठारहवीं शताब्दी से ज्ञानोदय की परम्परा शुरू होती है। इसमें बेकन, कांट, देकार्त, ह्युम, हीगेल जैसे विचारक शामिल हैं। फ्रांसिस बेकन को ज्ञानोदय का पितामह ही कहा जाता है। बेकन ने कहा कि ज्ञान के केन्द्र में मनुष्य है। बेकन के अनुसार ज्ञान और शक्ति पर्यायवाची हैं। सन् 1783 ई. में इमैनुअल कांट ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘ज्ञानोदय क्या है?’ में ज्ञानोदय को साहस का पर्याय कहा। मनुष्य में साहस आत्मनिर्भर होने से आता है। आत्मनिर्भरता ज्ञान से आती है। ज्ञान, तर्क और विवेक ने मनुष्य को अंधविश्वास, धार्मिक कूपमंडूता व रूढ़ि के जकड़न से मुक्त करना शुरू किया। ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया में प्रेस की भूमिका अभूतपूर्व रही है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का मानना था कि प्रेस ने पुस्तकों को अपूर्व प्रचार-प्रसार और असंख्य पाठक दिए। वस्तुतः प्रेस ने साहित्य को प्रजातांत्रिक रूप दिया। यूरोप में आधुनिक युग, आधुनिक होने का एहसास, आधुनिकता की शुरुआत पन्द्रवहीं सदी के रिनैसां(पुनर्जागरण) से मानी जाती है। यह अंग्रेजी, फ्रंासीसी, जर्मन आदि आधुनिक यूरोपीय जातियों के निर्माण का काल है। जातीय निर्माण का मतलब है सामंती व्यवस्था के भीतर व्यापारिक पूँजीवाद का विकास। यहीं से लैटिन को पीछे ठेलकर अंग्रेजी, इतालवी, फ्रांसीसी, जर्मन आधुनिक यूरोपीय भाषाओं में साहित्य की रचना शुरू हुई, यूरोपीय मानवतावाद का जन्म हुआ। भारत में ज्ञानोदय काफी पहले ही हो चुकी थी। भारत में उच्च शिक्षा नई बात नहीं है। प्राचीन काल में गुरुकुलों तथा आश्रमों में गुरु के पास रहकर छात्र विशेष विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करते थे। उस समय उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में वेदो-वेदांगों की शिक्षा का बाहुल्य था। शाखा, चरण तथा क्षेत्र नामक तीन प्रकार का बाहुल्य था। नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय वास्तव में विश्व प्रसिद्ध थे जिनमें विश्व के अन्य देशों के छात्र पढ़ने आया करते थे। नालन्दा विश्वविद्यालय विश्वप्रसिद्ध था जहाँ निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी।

-ज्ञान-प्राप्ति के पौर्वात्य साधन

मूल प्रवृत्ति
इन्द्रियों द्वारा
विवेक-बुद्धि
आचार्यत्व के माध्यम से

-अकादमिक शिक्षा

पाठ्यक्रम-विश्वास या श्रद्धा का स्तर
अध्ययन-अध्यापन-चिन्तन का स्तर
अनुसंधान-वृत्ति-नए सत्य की खोज या पुराने की नवीन स्थापना

-आचार्य शब्द की भारतीय ज्ञान-मीमांसा में अर्थ

ज्ञान
सद्
प्रेमी
नम्र
विनयी
सत्य

उच्चकोटि की आध्यात्मिक चेतना प्राप्त पुरुष
महामना मदन मोहन मालवीय जी का मानना था विश्वविद्यालय में ज्ञान ही धर्म है:

घर में हमारा ब्राह्मण धर्म है
परिवार में सनातन धर्म है
समाज में हिन्दू धर्म है
विश्वविद्यालय में ज्ञान धर्म है
देश में स्वराज धर्म है
विश्व में मानव धर्म है
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