हमारी पीढ़ी जानती है-ताजो-तख़्त पलटना


2014 के लोकसभा चुनाव में बड़े अंतर से पराजित होने वाली सत्तासीन पार्टी कांग्रेस के बारे में यह भविष्यवाणी जल्दबाजी कही जा सकती है; सो मिशन-2012 के तहत यूपी विधानसभा चुनाव में उसे जनता द्वारा हराना जरूरी है। ऐसा मानना है उन राजनीतिक विश्लेषकों, सामाजिक बुद्धिजीवियों, लेखकों एवं साहित्यकारों का जो उड़ती चीड़िया का पर गिन लेने में उस्ताद हैं। लिफाफा देखकर मजमून भाँप लेने वाले इन चुनावी-पण्डितों ने तो यह भी कायास लगाना शुरू कर दिया है कि अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गिने-चुने दिन ही शेष बचे हैं। ऐसे में प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या राहुल गाँधी का प्रधानमंत्री बनना महज एक दिवास्वप्न साबित होगा? क्या उनके अपने ही सहयोगी-सार्गिदों ने उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना को दुसाध्य बना डाला है? अगर नहीं तो जनता के बीच उसे नित अप्रासंगिक बनाये जाने के पीछे का मूल रहस्य क्या है? क्योंकर राहुल गाँधी को उन संवेदनशील मौके के इर्द-गिर्द फटकने या उस पर तत्कालिक प्रतिक्रिया देने से रोक दिया जाता है जो जनता खासकर युवाओं के बीच उनकी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए नितान्त आवश्यक है।(जारी....)
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