खुफिया ख़बरों की महाखोज और विकीलीक्स


चर्चित केबलगेट काण्ड के सूत्रधार जूलियन असांजे चौतरफा विवादों से घिरे हैं। विकीलीक्स खुलासे के बाद से भूमिगत हो गए असांजे पर स्वीडन में यौन-शोषण का कथित आरोप है। दिसंबर के दूसरे सप्ताह असांजे ब्रिटेन के एक थाने में खुद चलकर आए जहाँ उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। असांजे के वकील मार्क स्टीफ़न्स ने लंदन उच्च न्यायालय के उस फैसले का स्वागत किया है जिसमें कोर्ट असंाजे को 2 लाख पाउंड के मुचलके पर रिहा करने को तैयार है। इस दौरान असांजे को न केवल अपना पासपोर्ट कोर्ट को सौंपना होगा बल्कि एक इलेक्ट्रीक टैग भी पहनना आवश्यक होगा। पिछले दिनों असांजे ने अपनी माँ क्रिस्टीन को जेल में एक लिखित बयान सौंपा जिसमें अमरीका की लोकतंत्र विरोधी रवैए और अन्यायपूर्ण साजिशों के प्रति आगाह किया गया है।
कथित यौन-आरोपों के लिए जेल में नज़रबंद 39 वर्षीय असांजे विकीलीक्स द्वारा खुलासा किए जाने के बाद से ही अमरीकी निशाने पर हैं। स्वीडन ने अमरीकी दबाव को देखते हुए इंटरपोल से संपर्क किया है जिसके तहत असांजे के प्रर्त्यपण की मांग की जा रही है। उधर असांजे की वेबसाइट विकीलीक्स को अमरीकी ऑनलाइन सेवा देने वाली कंपनी अमेजन ने अपने सर्वर से हटा दिया है। इससे पूर्व भी साइबर वर्ल्ड से विकीलीक्स को हटाने के तमाम प्रयास किए जा चुके हैं। अमरीकी सरकार के दबाव में कैलिफोर्निया के इंटरनेट होस्टिंग फर्म एवरीडीएनएम ने विकीलीक्स को अपने सर्वर से हटा दिया, लेकिन कुछ ही समय बाद यह साइट स्विट्जरलैण्ड स्थित होस्टिंग फर्म के सहयोग से फिर ऑनलाइन हो गई। इन तमाम परेशानियों के बीच जूलियन असांजे को दुनिया का सबसे चर्चित व्यक्ति यानी ‘पर्सन ऑफ दि ईयर’ चुना गया है। टाइम मैगजीन के अनुसार असांजे ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को पछाड़ते हुए यह ख़िताब हासिल किया है। क्या ओबामा सही मायने में पिछड़ गए हैं? यह देखा जाना अभी शेष है।
असांजे की पहचान एक आस्ट्रेलियाई मूल के पत्रकार, प्रकाशक और इंटरनेट विशेषज्ञ की है। 2006 में असांजे ने विकीलीक्स वेबसाइट को लांच किया जिसका उद्देश्य कंप्यूटर हैकर्स द्वारा प्राप्त सुचनाओं को सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए उजागर करना था। कारपोरेट-तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और अन्य अनियमितताओं को सार्वजनिक करना विकीलीक्स की पहली प्राथमिकता है। अपनी वेबसाइट की प्रतिबद्धता के बारे में बताते हुए असांजे खुद कहते हैं-‘हर नागरिक को सच जानने और अपनी राय व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। चाहे वह कुटनीतियों का ही मामला क्यों न हो। यह अमेरिका के ऊपर है कि वह अपना रवैया बदले।’
हाल के दिनों में जिस तरह असांजे ने 2.5 लाख से अधिक के खुफिया एवं गोपनीय दस्तावेजों को इंटरनेट पर उजागर किया है उससे अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पडा है। सफाई देने के लिए उन राष्ट्रों से सीधे संवाद और संपर्क की भी नौबत आन पड़ी जिन देशों के नाम खुलासे में शामिल थे।
अमरीकी माफीनामे से पूरी दुनिया संतुष्ट हो या न हो किंतु भारतीय शासन को अमरीका की यह तरकीब बेहद जँची है। फिलहाल भारतीय सरकार असांजे के इस खुलासे को कोई खास महत्त्व नहीं दे रही है। भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोथी जे0 रोमर ने दिल्ली को भरोसा दिलाया है कि अमरीका दुनिया में भारत के वैश्विक नेतृत्व की दिशा में उभरती छवि का स्वागत करता है। इस बाबत अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन खुलासे के बाद आए मोड़ को यह कहकर शांत करने में जुटी हैं कि अमेरिका का सम्बन्ध अपने मित्र राष्ट्रों से पूर्ववत बना रहेगा। साथ ही हिलेरी क्लिंटन का यह भी कहना है कि विकीलीक्स का हालिया खुलासा अन्तरराष्ट्रीय समुदाय पर हमले के रूप में है। आगे वह यह कहने से भी नहीं चूक रही हैं कि असांजे द्वारा सार्वजनिक किया गया दस्तावेज अमरीका द्वारा साझी समस्याओं को हल करने की दिशा में दूसरे देशों के साथ चल रहे प्रयासों को कमजोर करने की कवायद है। विदेश मामलों के भारतीय कूटनीतिज्ञ हिलेरी क्लिंटन के इस कथन से काफी हद तक सहमत है।
बहरहाल, विकीलीक्स की चर्चा जोरों पर है। पूरी दुनिया में विकीलीक्स के खुलासे को आधार बनाकर राजनीति हो रही है। पाकिस्तानी मीडिया में मनगढंत ख़बरें छापी जा रही हैं तो खुद अमेरिका के प्रतिष्ठित अख़बारों में शुमार ‘न्यूयार्क टाइम्स’ खुफिया सूचनाओं के भेदन पर आधारित ख़बरें लगातार प्रकाशित कर रहा है। अन्य देशों में ब्रिटेन का अख़बार ‘द गार्डियन’ और जर्मनी का ‘डेर स्पीगेल’ अमेरिकी राजनयिकों की पोल खोलने में जुटे हैं। लीक हुई ख़बरें लोगों के पास जिस तरह आ रही हैं, वो बेहद दिलचस्प हैं-‘हामिद करजई एक पागल और बेहद कमजोर इंसान’, ‘मरियल और दब्बू है रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव’, ‘जोखिम से डरती हैं एंजेला मार्केल’, ‘शारीरिक और मानसिक संताप का शिकार है उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग इल’ ‘संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद का भारत स्वघोषित दावेदार’।
ये ख़बरे कितनी महत्त्वपूर्ण और गोपनीय किस्म की हैं। इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए, लेकिन प्रथम द्रष्टया इन ख़बरों से मनबढ़ अमेरिका का दोमुँहापन और उसके राजनयिक सम्बन्धों का दोहरापन पहली बार रहस्योद्घाटित हुआ है, यह सोचना मूर्खता है। विकीलीक्स ने अपने खुलासे में जो बाते कहीं हैं, उससे सारी दुनिया पूर्वपरिचित है। फर्क सिर्फ इतना है कि जिन चीजों को हम अभी तक पीठ पीछे स्वीकारते आए थे आज वह सारी दुनिया के सामने है। इस संदर्भ में विकीलीक्स का यह दावा कि उसके पास करीब 10 लाख से अधिक सूचनाएँ सुरक्षित हैं, दुनिया को भरमाने की साजिश भी हो सकती है। यानी एक ऐसी रणनीति जिससे पूरी दुनिया की हमदर्दी भी हासिल हो ले और अमरीकी शासन पर उसका ‘ब्लैकमेलिंग’ का सिक्का भी जम सके। अन्यथा जो असांजे जनहित का हवाला देकर खुफिया ख़बरों के सार्वजनिक किए जाने के पैरोकार हैं, वे अतिमहत्त्वपूर्ण गोपनीय दस्तावेजों को अपने पास छुपाकर दुनिया को क्या बताना चाहते हैं? देखा यह भी जाना चाहिए कि असांजे अमरीका के खिलाफ जितना मुखर दिखते हैं उनके साक्ष्य या खुलासे उतने ताकतवर नहीं हैं कि अमरीकी शासन और अन्तरराष्ट्रीय राजनयिक सम्बन्धों की चूले हिल जाए। ऐसे में विकीलीक्स का दावा छलावा भी हो सकता है। अतएव, चीन की यह आशंका बिल्कुल निर्मूल नहीं कही जा सकती है जिसमें उसने विकीलीक्स के खुलासे में अमरीकी सरकार की मिलीभगत और संलिप्तता को अहम किरदार माना है।
विकीलीक्स के साथ काम कर चुके ‘क्रिप्टोम’ कंपनी के संस्थापक जॉन यंग जो पिछले दस सालों से इस तरह के रहस्योद्धघाटन में सक्रिय रहे हैं, ने विकीलीक्स के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा है कि ‘विकीलीक्स का मुख्य ध्येय और मकसद धन कमाना है और यह भाड़े के सिपाहियों से बेहतर नहीं है।’ जॉन यंग की बात इसलिए भी गौरतलब है कि वह खुद भी इससे पहले हजारों ऐसे दस्तावेज नेट पर जारी कर अमरीकी सरकार से पंगा ले चुके हैं। उनके द्वारा सार्वजनिक दस्तावेजों में इराक में मारे गए अमेरिकी सैनिकों के फोटोग्राफ, ब्रिटिश गुप्तचर संस्था एमआई6 के एजेंटों की सूची और इराक युद्ध में हताहत हुए चार हजार लोगों का ब्यौरा प्रमुख है। यानी कि आज जिस तरह के संघर्ष और खतरे से विकीलीक्स दो-चार है, जॉन यंग की कंपनी ‘क्रिप्टोम’ सन् 2007 में इन तमाम अमरीकी साजिशों एवं प्रताड़ना की भुक्तभोगी रह चुकी है।
खैर, इसे आस्ट्रेलियाई मूल के जूलियन असांजे की खासियत ही कही जाएगी कि उन्होंने बहुत कम दिनों में ही काफी शोहरत और प्रसिद्धि जुटा ली। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2008 में असांजे को ‘इकोनॉमिस्ट फ्रिडम ऑफ एक्सप्रेशन अवार्ड’ दिया गया। वहीं वर्ष 2010 में उन्हें ‘सैम एडम्स अवार्ड’ मिला।
यही नहीं अमेरिका की ख्यातनाम पत्रिका ‘उटने रिडर’ ने उन्हें दुनिया को बदल देने वाले पचीस दूरद्रष्टा व्यक्तित्व में शुमार किया तो दूसरी ओर ‘न्यू स्टेट्समैन’ ने उन्हें 50 प्रभावशाली लोगों में 23वें स्थान पर रखा। जूलियन असांजे के पिछले कारनामों और अर्जित उपलब्धियों को गौर से देखने पर आश्चर्य होता है कि जिस असांजे को अमरीकी मीडिया इतना महत्त्व दे रही थी वह अचानक ही अमरीका के लिए खतरा या शत्रु कैसे बन गया? असांजे को इतनी छूट कैसे मिली की वह डिजिटल साम्राज्यवाद का अमरीकी किला ढाहने में कामयाब हो जाए? यह एक विचारणीय प्रश्न है। क्योंकि पूरा माहौल विकीलीक्स की छवि में चमक जरूर पैदा करता है लेकिन अमरीकी शासन इससे आतंकित या भयाक्रांत है, ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। हाँ, इतना अवश्य है कि इस घटनाक्रम के बाद पूरे विश्व को ‘सूचना युद्ध’ के संभावित खतरे का भान हो गया है। साथ ही सूचना-समाज के संदर्भ में प्रयुक्त चर्चित शब्दावली ‘साइबर स्पेस’ की निजता और वैधता के सुरक्षा सम्बन्धी मसले पर प्रश्नचिन्ह् खड़े हो गए हैं।
फिलहाल इस पूरे प्रकरण में मीडिया उस व्यक्ति को नजरअंदाज करने की भारी भूल कर रहा है जिसका नाम ब्रेडले मैनिंग है। बगदाद में एक सैन्य शिविर में तैनात 7 महीनों से कैद मैनिंग जिसका जल्द ही कोर्ट मार्शल किए जाने की तैयारी चल रही है, अमरीकी सेना का खुफिया विश्लेषक रह चुका है। मैनिंग ने सारी सूचनाओं को यह जानते हुए कि ये गोपनीय हैं असांजे को सौंपा क्योंकि उसका मानना है कि विकीलीक्स सूचना के अधिकार से जुड़े कार्यकताओं की आजादी का प्रतीक है। मैनिंग ने विकीलीक्स को सूचनाओं का जो जखीरा सौंपा वह महज 1.6 गीगाबाइट के एक टेक्सट फाइल में कैद थी। विश्व भर के अमरीकी दूतावासों से वाशिंगटन को भेजी जाने वाली ये वही सूचनाएँ थीं जिनमें 12 देशों मसलन, पाकिस्तान, अर्जेण्टिना, यमन, सऊदी अरब सहित जी-4 के सदस्य राष्ट्रों के नाम शामिल हैं। मैनिंग ने इन गोपनीय सूचनाओं को गुप्त तरीके से हैक कर विकीलीक्स वेबसाइट को सौंप दिया ताकि विश्व के सामने युद्धोन्मादी अमरीका का असली
नवसाम्राज्यवादी चेहरा सामने आ सके। मैनिंग ने शासन विरोधी यह कृत्य मानवीय दायित्वबोध के तहत किया था। आज की तारीख़ में असांजे की रिहाई को लेकर पूरी दुनिया से आवाजें उठनी शुरू हो गई हैं। यह वैश्विक पहल ठीक है लेकिन हमें ब्रेडले मैनिंग की सुध भी लेनी चाहिए जो अमरीकी कैद में है। आज दुनिया की निगाह भले ब्रेडले मैनिंग पर केन्द्रित न हो किंतु अमरीकी असलियत को उजागर करने में उसका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
अतः यह ठीक है कि आज विकीलीक्स विश्वचर्चित नामों में शुमार है। लोग उसके संस्थापक-संपादक जूलियन असांजे को सत्य का प्रहरी और लोकतंत्र का उपासक मान रहे हैं। नामचीन हस्तियाँ ब्रिटेन के वेस्टमिंस्टर अदालत में असांजे की रिहाई के समर्थन में लामबंद होती दिख रही है। किंतु उस शख़्स को भूल जाना भी उचित नहीं कहा जा सकता है जो आज अमरीकी कैद में गुमनाम जिंदगी जीने को अभिशप्त है। जनहित में सूचनाओं को सार्वजनिक किए जाने की वजह से ब्रेडले मैनिंग को सजा का हकदार मानना वास्तव में व्यक्ति स्वातंत्र्य और मानवाधिकार का हनन है, इस ओर भी दृष्टि जाए तो ही श्रेयस्कर है।
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