Sunday, December 19, 2010

महामना परिसर से बिसरे सुरेन्द्र मोहन


किसी व्यक्ति को बनाने में विश्वविद्यालयी शिक्षा और परिवेश का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है। समाजद्रष्टा सुरेन्द्र मोहन जी सबल उदाहरण हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें छात्र-जीवन में गढ़ा और एक प्रखर समाजवादी चिंतक के रूप में पहचान दी, यह कह लेना उचित है। लेकिन..., उनके निधन की सूक्ष्म-ख़बर(माइक्रो न्यूज़) अख़बार में तैरती हुई उड़न-छू हो ली किंतु सर्व विद्या के परिसर को भान तक न हुआ। आयोजनों-समारोहों की बीसियों करतब करते विश्वविद्यालय को इस कर्मयोगी के जाने से भले कोई फर्क न पड़ा हो लेकिन महामना की वे प्रस्तर मूर्तियाँ जो परिसर में यत्र-तत्र-सर्वत्र जमीन से उठी हुई आसमान में टंगी हैं, सुरेन्द्र मोहन जी के जाने से ग़मजदा हैं, विश्वास मानिए। फिलहाल इसी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी की हैसियत से मनस्वी सुरेन्द्र मोहन जी को सादर नमन!

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हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...