भगत सिंह: पुराना फाइल

इन दिनों युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी कठिनाई भगत सिंह के वैचारिक भूगोल से अपरिचित होना है। आज की दिग्भ्रमित युवा पीढ़ी में नितांत निजी मामलो से परेशान हो कर आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, भगत सिंह इस कोटि में शामिल नहीं थे। उन्हें अपने जीवन से कितना प्रेम था, इसका वह स्वयं उल्लेख करते हैं-‘मैं पूरे जोर से कहता हँू कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों से ओत-प्रोत हंू पर आवश्यकता के समय सबकुछ कुरबान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है।’ भगत सिंह की यह स्वीकारोक्ति इस बात की तसदीक है कि वह महज विचार-बावर्ची नहीं थे। सिद्धांत और विचारधारा के स्तर पर वह एक विचारनायक थे। एक ऐसा योद्धा जो जनता की दृष्टि में ज्यादा व्यावहारिक और राष्ट्र शुभेच्छु था। जांबाजीयत और दिलेरपना में जिसका कोई सानी न था।

 भगत सिंह ‘फांसी के फंदे’ को प्राणहंता न मानकर ‘विचार का मंच’ मानते थे। चेतनशील-प्रयोगधर्मी भगत सिंह युवाओं की अकर्मण्यता और अदूरदर्शिता के बाबत कहते दिखते हैं-‘कितने दुःख की बात है कि हमारे-तुम्हारे ऐसे नवयुवक, जो जीवन के सौंदर्य के प्रति इतने सचेत हैं। फिर भी वर्तमान अनुचित सामाजिक दमन के प्रति विद्रोह में उसी जीवन का बलिदान करने जा रहे हैं। हम केवल दूसरों की प्रशंसा करते हैं। विदेशियों के गुण गाते हैं, किंतु अब समय आ गया है कि चेत जाएं और अपने कर्तव्य को भी समझे। देश के भविष्य का निपटारा हमारे ही हाथों में है। माँ अपने सभी दुःखो को दूर करने के लिए हमारी ओर देख रही है। राष्ट्र की रक्षा का समस्त भार हमारे हीं कंधो पर है। आवश्यकता इस बात की है कि कार्य की महानता, पवित्रता और गंभीरता को अनुभव किया जाए।’

मात्र 17 वर्ष की आयु में ‘पंजाब की भाषा तथा लिपि की समस्या’ विषयक गंभीर लेख भगत सिंह की बौद्धिक परिपक्वता की पुष्टि करता है। ‘युवक’ और ‘विश्व प्रेम’ जैसे चर्चित लेख उनके सोच को बहुआयामी बनाते हैं, जिस पर आज भी बहुतो को गर्व है। इलाहाबाद से निकल रहे ‘चांद’ पत्रिका के नवंबर, 1928 के ‘फांसी अंक’ में भगत सिंह ने कई शहीद रणबांकुरों का जीवन-परिचय लिखा। बाद में जनपत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के सान्निध्य में वे ‘प्रताप’ पत्रिका में लिखने को उद्धत हुए। मजे की बात है कि भगत सिंह अव्वल दरजे के पढ़ाकू थे। 26 मई 1930 को अपने मित्र जयदेव गुप्त को लिखे पत्र में वह उल्लेख करते हैं, ‘इन दिनों मेरे पास एक ही किताब है और वह भी बहुत शुष्क। देखना, अगर हाल में प्रकाशित कुछ दिलचस्प उपन्यास भेज सको।’

भगत सिंह एक ओर बाल गंगाधर तिलक के ‘गीता रहस्य’ को पढ़ रहे थे, तो दूसरी ओर उनकी निगाह रूसो के ‘सोशल काॅन्ट्रेक्ट’ के अलावे अंग्रेजी कवि जाॅन मिल्टन के ‘पैराडाइज लाॅस्ट’ और ‘पैराडाइज रिगेंड’ तक को खंगाल रही थी। जेल की कालकोठरी में माक्र्स, एंग्लस और लेनिन जैसे क्रांतिकारियों के विचारो से उनकी मुठभेड़ और गुफ़्तगू आम बात थी। अध्ययन करना भगत सिंह की आदत थी। उनके हाथो में प्रायः पुस्तके मिलती थी। सिर्फ पढ़ना शौक ही नहीं, जेल में लिखे पचासो लेख, सैकड़ो पत्र, भूमिका, परचे, पोस्टर, आत्मकथा उनके व्यक्तित्व की असल जमापूंजी थे।

23 साल की उम्र में भगत सिंह शोषणविहीन समाज के लिए लड़ रहे थे, यह आज के युवा समाज को देख कर अनुमान लगाना कठिन है। भगत सिंह आज की तारीख़ से 100 साल पीछे टाॅमस पेन की रचना ‘राइट्स आॅफ मैन’ के अंग्रेजी हरफ़ का अक्षर-दर-अक्षर टटोलने में जुटे थे, यह सुनना भी कौतुक और आकर्षण का विषय है। संचार-क्रांति के एसएमएस युगीन इस दौर में युवा समाज का एक बड़ा तबका भगत सिंह से सीधे परिचित एवं प्रभावित भले न हो, किंतु चेतनशील युवा जमात के लिए भगत सिंह अदम्य साहस और प्रेरणा के स्रोत हैं। इस समय युवा समाज को भगत सिंह की जरूरत सर्वाधिक है। इस बाबत बीबीसी हिन्दी का एक कार्यक्रम उल्लेखनीय है, जिसमें आये वेब-टिप्पणियों में अधिकांश ने भगत सिंह को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझे जाने की वकालत की है, जिसकी आज जन-जन को जरूरत है। ज्ञानवान समाज बनने को आग्रही भावी पीढ़ी भगत सिंह को ले कर किसी वहम या गलतफहमी में न रहे, इसके लिए सभी को सम्मिलित प्रयास किए जाने की जरूरत है। क्योंकि संवैधानिक रीति से जनादेश पाये भारत में अभी काफी कुछ शेष बचा है, जो बेहतर भविष्य के लिए भरोसा देता है। जनशक्ति और जनसहभागिता के सहारे समस्त विघ्न-बाधाओ से पार पाने का हौसला देता है। फिलहाल, सारा दारोमदार युवा समाज के उस निर्णय पर आश्रित है कि वह अपना मार्गदर्शक नेता किसको चुनता है? आशाजीवी विचार से ओत-प्रोत कवि गोपालदास नीरज के शब्दो में कहें, तो- 

‘कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है/
कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है/
कुछ दीपों के बुझ जाने से आंगन नहीं मरा करता है/
कुछ मुखड़ों की नाराजी से दर्पण नहीं मरा करता है।’
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