समाज विचार के साथ ही आगे बढ़ता है

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आजकल राजनीति में एक नई संस्कृति विकसित हुई है-‘पाॅलिटिकल नेकेडनेस’ अर्थात राजनीतिक नंगई। इस मामले में कमोबेश सभी दल समानधर्मा हैं। सन् 1885 ई0 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसके गौरवपूर्ण अतीत की समृद्ध परम्परा हमारे समाज में मौजूद है; वह भी इस संस्कृति की मुख्य किरदार है। 2004 ई. में भाजपा भारत के जिस नवउदारवादी चेहरे का छद्मपूर्ण एवं भ्रामक ‘फील गुड’ कराती हुई सत्ता से बेदख़ल हुई थी; अब वहाँ कांग्रेसी पूँजीपतियों, राजनीतिक परिजनों, औद्योगिक घरानों और सत्तासीन मातहतों का एकाधिकार है। समाचार पत्रों में चर्चित राबर्ट बढेरा एक सुपरिचित(?) नाम है। ए0 राजा, कनिमोझी, सुरेश कलमाड़ी और नीरा राडिया खास चेहरे हैं। यानी ‘हमाम में सब नंगे हैं’ और ‘हर शाख पर उल्लू बैठा है’ जैसी कहावत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में चरितार्थ हो चुकी है। ‘हर कुएँ में भांग पड़ी है’ वाली कहावत इस घड़ी जब हम सोलहवीं लोकसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े हैं; बड़ी ही दिलचस्प मालूम पड़ रही है। सभी राजनीतिक दलों में इस बात को ले कर ‘रिले रेस’ है कि किस कुनबे का गार्जियन कितना आक्रामक, वाक्पटु, प्रचारपंथी, घाघदिमागी इत्यादि है। सौम्यता, विनम्रता और सहजता की भारतीय तहज़ीब गई है तेल लेने, यह आप दिग्गज नेताओं के भाषण सुनकर खुद ही विलापने लगेंगे। आज अपनी लंपटई और लंठई को जो शख़्सियत जितनी ही उस्तादी से भुना ले जा रहा है, वही सफल राजनीतिज्ञ है; योग्य उम्मीदवार अथवा जनप्रतिनिधि है।

दरअसल, यह समय भारतीय राजनीति का एक कठिनतम दौर है। आज संविधान, संसद और सत्ता में जो राजनीति जीवित है वह मुट्ठी भर अरबपतियों का कृतदास है। आज जिस राजनीति को हम भारतीय धरातल पर पसरते-फैलते देख रहे हैं; वह वास्तव में ‘आइटम पाॅलिटिक्स’ का पाॅपुलर फ्लेवर है। इस राजनीति में नामचीन राजनीतिज्ञों के बेटे-बेटियाँ ऐश करते हैं। सलाना जारी भौड़े राजनीतिक महोत्सवों में करोड़ों की पेशगी पर आई अभिनेत्रियाँ अपना जलवा बिखेरती हैं और युवा से लगायत बुजुर्ग राजनीतिज्ञ तक इनके आगे सलामी ठोंकते हैं। और जनता टुकुर-टुकुर देखती है क्योंकि आज की पढ़ी-लिखी अधिसंख्य जनता अपना आत्मसम्मान और स्वाभिमान इन प्रपंची-पाखण्डी राजनेताओं के सामने गिरवी रख चुकी हैं। लिहाजा, आम और असहाय जनता से छल करती इन पार्टियों की चाँदी है। इन दलों के पास पैसे से खरीदे गए राजनीतिक कार्यकर्ता इतनी पर्याप्त मात्रा में हैं कि वे दिन को रात बताकर जनता को चुपचाप सोते रहने का फ़रमान जारी कर सकते हैं और चाह जाएँ तो उबले हुए अण्डे से चूजे निकालकर जनता की हाथ में रख उसे उड़ाते रहने की हुक्म दे सकते हैं। आज इन्हीं पार्टियों के लाखों-करोड़ों फैन्स हैं। अकूत धन-सम्पदा देकर उन्हें मालामाल करने वाले दानार्थी हैं जो अपने मुनाफे और लाभ के लिए हर तरह के समझौता और सौदेबाजी करने से नहीं हिचकते हैं।

कांग्रेस जो अक्सर आम-आदमी का ज़ुमला उछालती है; इस बार उसकी हवा ख़राब है।  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो ‘हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की’ का नारा देते हुए अपनी पार्टी को आम-आदमी की डीएनए में समाई हुई पार्टी बताती है; आज ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’ नारे के भय से बेसुरी और बेआवाज़ी हो गई है। कांग्रेस अपनी पार्टी को त्रिकालमुखी साबित करने के लिए जो भावनात्मक संदेश गढ़ती है, उसे पढ़ लेना भी कम दिलचस्प नहीं है-‘‘हम लोगों की ऐसी पार्टी है जिसका गरिमापूर्ण भूतकाल है। हमारी पार्टी भविष्य की पार्टी है, इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह हरेक भारतीय के बीच उम्मीद जगाए रखे। यह हमारी पुकार है और हमारा दायित्व भी है।’’

लेकिन आज स्थितियाँ उलट है। कांग्रेस निहत्थों से भिड़ती है; लाठियाँ चमकाती है; यह वही कांग्रेस है जिसकी दिल्ली में चिंदी-चिंदी उड़ चुकी है और केन्द्रीय राजनीति में इतनी भद्द पिट गई है कि सबकुछ कथित तौर पर मोदी की लहर में बह चुका है। आज राहुल गाँधी आक्रमक और तैश भरी बनावटी-दिखावटी भाषा में जनता को ऊँचे मंचों से सम्बोधित कर रहे हैं, लेकिन जनता इतना ऊँचा सुनने को अब राजी नहीं है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी रोष और उत्तेजना के इन प्रायोजित क्षणों में अपनी दादी स्व. इन्दिरा गाँधी के उस दीक्षांत भाषण को याद रखना भूल जाते हैं जिसे उन्होंने शांति निकेतन विश्वविद्यालय में रविन्द्रनाथ टैगोर को उद्धृत करते हुए 9 मार्च 1974 को दिया था-‘‘ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों का रोष भड़काना एक आसान राजनैतिक तरीका हो सकता है, लेकिन हमारी राजनैतिक गतिविधियों का आधार रोष होना है, तो हमारा मूल उद्देश्य पीछे रह जाता है और उत्तेजना अपने आप में एक लक्ष्य बन जाती है। तब आनुषंगिक विषयों को अनावश्यक महत्व मिलने लगता है तथा विचार और कार्य की समस्त गम्भीरता विनष्ट हो जाती है। ऐसी उत्तेजना शक्ति की नहीं बल्कि दुर्बलता की परिचायक होती है।’’

बहरहाल, आज कांग्रेस ही नहीं कमोबेश सभी पार्टियाँ उसी दुर्बलता से पीड़ित है। लेकिन, भारतीय जनता को अब यह भान हो चुका है कि समाज या दुनिया को बदलने के लिए सबसे पहले राजसत्ता पर कब्जा करना जरूरी नहीं है। यानी राजसत्ता ही सबकुछ नहीं है। सामाजिक रिश्ते बदलते हैं या बदले जाते हैं, तो राजसत्ता का चरित्र भी बदले बिना नहीं रह सकता है। इस सम्बन्ध में भावी पीढ़ी जाॅन हाॅलोवे को अनुसरण कर रही है जिसकी एक किताब है-‘चेंज दि वल्र्ड विदाउट टेकिंग पाॅवर।’ आज एक बड़ी बदलाव यह देखने को मिल रही है कि अब किसी एक मुद्दे पर देश के विभिन्न हिस्सों में एक साथ कार्रवाईयाँ होने लगी हैं। इसके पीछे ‘न्यू मीडिया’ का बड़ा हाथ है। संचार क्रांति और सूचना राजमार्ग के गठजोड़ से आज दुनिया जिस तरह ‘इंटीग्रेट’ हो रही है, उससे यह जरूर संभव हो गया है कि एक जगह होने वाला आन्दोलन बहुत तेजी से दूसरी जगहों पर फैल जाता है और वह फिर दुनिया की और-और जगहों में भी हवा, फ़िजा या माहौल बनाने में मददगार होता है।’’

अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और अरविन्द केजरीवाल इसी बदलाव के प्रतिमान हैं जिन्होंने पूरे भारत को वर्ग, लिंग, वय, जाति, भाषा और धर्म से ऊपर उठाते हुए एकसूत्री उद्देश्य में बाँध दिया है। विशेषकर केजरीवाल जिसे नरेन्द्र मोदी अपनी अशोभनीय भाषा में ‘एके-49’ कह रहे हैं; को जनता ने हाथों-हाथ लिया है। परेशान-हाल जनता तमाम कमी-बेसियों के बावजूद केजरीवाल से अपनी उम्मीदें बाँधे हुए है। इस सन्दर्भ में मुझ जैसे आशावादियों का अनगिनत किन्तु-परन्तु के बावजूद अरविन्द से आस अभी टूटी नहीं है। भ्रष्टाचार के मुखालफ़त में आन्दोलन अथवा कालेधन की वापसी का मुद्दा दोनों एक विचार है और मैं इनका हमेशा समर्थन करता हूं। इस घड़ी मुझे केवल रेमजे मेकडोनल्ड का यह कथन याद आता है-‘समाज विचार के साथ ही आगे बढ़ता है।’
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