Friday, March 28, 2014

पुरानी फाइल में युवा-2010

 



भारतीय युवा जनतांत्रिक समाज का नवीन प्रवर्तक तो सांविधानिक इकाई का महत्वपूर्ण घटक है। युवा अर्थात एक ऐसा वर्ग, जो मेहनती, ऊर्जावान, दिलेर, जांबाज, स्वाभिमानी, राष्ट्रभक्त और देशप्रेमी हो जिसकी चेतना जीवित हो। रक्त में स्फुर्ति और ताजगी हो। उपस्थिति अलहदा, तो विचार जुदा हो। जो अंतर्मन की आंख से भविष्य में ताक-झांक करने में निपुण हो। यानी युवा एक ऐसा शब्द है, जो सर्वगुणसंपन्न भले ना हो किंतु नूतन-नवीन गढ़ सकने में प्रवीण अवश्य हो। यथार्थ जो भी हो। युवा होने का अर्थ कमोबेश यही समझा जाता है। फिलहाल राष्ट्रीय मानव-संपदा के रूप में ये युवा देश की अंदरूनी ताकत और श्रेष्ठता का पर्याय हैं जिन पर सवा अरब आबादी वाला देश हिन्दुस्तान मजे में गुमान कर सकता है।

कई देश जो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उनके यहां युवा उम्र के लोगों की तादाद तेजी से घट रही है जबकि बुढ़ाते जा रहे लोगों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी जारी है। भारत में युवाओं की संख्या 55 फीसदी से अधिक होना वाकई गर्व करने की हिम्मत और अवसर देता है। आधुनिक साम्राज्यवादी देशों में अगुवा राष्ट्रों का भारतीय युवाओं के प्रतिभा, गुण एवं दक्षता पर रीझना और उनके सम्मुख बिछना सुखद अनुभूति का अहसास कराता है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरान तक का भारतीय युवाओं के बड़प्पन में कसीदे काढ़ना अब झांसा कम उनकी विवशता अधिक मालूम पड़ती है। खुद को महाशक्ति साबित कर तीसरी दुनिया पर राज करने वाले ये बौने देश जान गए हैं कि अब उनकी अर्थव्यवस्था का ऊंट ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता। और न ही विकासशील राष्ट्रों के उन ताकतवर जिराफों से टक्कर ले सकता हैं जिन्हें वे पिछड़ा, असभ्य और कमजोर-फिसड्डी कहने की भूल करते आए हैं।

इस घड़ी हमारे देश के युवा कई मोर्चे पर जबर्दस्त लड़ाई लड़ रहे हैं। वे आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक और धार्मिक हर मोड़ पर संघर्षशील हैं। कहीं मंदी से उबरने की छटपटाहट है तो कहीं खाप पंचायत की मध्ययुगीन सोच से टकराने की कशमकश। परिवार के स्तर पर ‘अपनी आजादी, अपने हाथ’ लेने को इच्छुक युवा-पीढ़ी आधुनिकता-बोध से लैश है। आज के युवा अपना आग-पाछ सब जानते-समझते हैं। वे इतने आत्मविश्वासी और सक्षम हैं कि उसूलों का ‘कैप्सूल’ खा कर नियम, कानून, मर्यादा, नैतिकता और शुचिता के प्रश्न को हल करना उन्हें नहीं सुहाता। आज के युवा मोबाइल पर चैटिंग करते हुए मां का चरण छूते दिख रहे हैं तो दूसरी ओर मंदिर के आगे चलते-चलते मस्तक नवाना भी नहीं भूल रहे।

सबसे अलहदा और अजूबा स्थिति है धर्म के मामले में। आज की युवा पीढ़ी अयोध्या पर आये फैसले पर हंसते हुए प्रतिक्रिया देती है-‘यार! हमारे देश में भगवान से ज्यादा ऊंचा तो भगवा है।’ यह सतही हंसी-ठट्ठा नहीं है। यह हमारे देश के उन युवाओ