मोदी नहीं, दाँव पर चढ़ी महादेव की प्रतिष्ठा

काठ की कड़ाही आग पर दोबारा नहीं चढ़ती है। यह मुहावरा भारतीय लोकमानस में बहुश्रुत है। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने आखिरी दाँव जिस तरह चला है-वह काठ की कड़ाही की बजाय स्वयं महादेव की लोक-प्रतिष्ठा, अगाध विश्वास और जनास्था है। काशी में आज की तारीख़ में ‘हर हर महादेव’ के स्थान पर ‘हर हर मोदी’ होना इस बात की तसदीक है कि बाबा विश्वनाथ की इस नगरी का राजनीतिक वाया आध्यात्मिक ध्रुवीकरण जबर्दस्त ढंग से किया जा चुका है। भाजपा नित एनडीए के प्रधानमंत्री के घोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी का बनारस परिक्षेत्र से संसदीय लोकसभा चुनाव लड़ना कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है। काशीवासियों को इस बात की खुशी है कि पन्द्रहवीं लोकसभा चुनाव में बनारस क्षेत्र की भूमिका केन्द्रीय महत्त्व की है। अपनी निर्णायक और प्रभावकारी भूमिका को लेकर काशीवासी भी पूर्णतया आश्वस्त हैं। उन्हें यह मालूम है कि जनता से गद्दारी करती सत्ताओं का यह आखिरी वक़्त है। यह समय विकास पर घोषणापत्र पढ़ने का नहीं है। बल्कि यह समय है, अपनी भाषा और ज़बान का ‘डीएनए टेस्ट’ कराने का। विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए यह साबित करने का वक्त है कि उन्होंने अब तक जो भी बातें सार्वजनिक मंच से कही-सुनी है; सभी अक्षरशः सत्य हैं। ‘घर घर मोदी’ के सुर और स्वर से जिस तरह काशी की राजनीति इस वक़्त भीगी-पगी है; उसे देखकर तो यह साफ लगता है कि इस बार माहौल काफी हद तक मोदी के पक्ष में है। कर्तव्यपरायण और जवाबदेह राजनीतिज्ञ की छवि के रूप में प्रचारित नरेन्द्र मोदी खुद भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि उनके द्वारा जनता को सम्बोधित सारी बातें सच हैं। नरेन्द्र मोदी की यह स्वीकारोक्ति इसलिए भी विश्वसनीय प्रतीत होती है; क्योंकि उन्होंने ऐसा सीधे शिव को साक्षी मानकर कहा है....
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