1 अप्रैल, अन्तरराष्ट्रीय मुर्ख दिवस और इस बार

प्रिय देव-दीप,

''शब्दों से कहना
उनकी आहुति का समय आ गया है
कि उन्हे नया शब्द संसार रचना है
अपनी हवि देखकर         माँ की तरह 
इस शब्दमेध यज्ञ में इन शब्दों की हवि देते समय कहना .
शब्द ऊर्जा !
तुम हमारी निःशब्द वाणी में,  हमारे निःशब्द कर्म में
नये शब्दों के रूप में अंकुरित होओ 
बनो एक नया संवाद, एक नया सेतु''
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नोट: सन्् 1989 में लिखी गई यह कविता-अंश प्रसन्न कुमार चैधरी की है।  
इसे पढ़ लेने के बाद मेरे पास कहने को कुछ भी बचता नहीं शेष।
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