Monday, July 18, 2011

भेंट


हे सावनी शक्ति, आप हो तो मैं हूँ। आपके आधार की भूमि पर ही मैं चेतस हँू। सजग और सचेत हँू। आपके भीतर काल की एकरसता से उपजी तनाव और बेचैनी जिसके प्रति संवेदनशील होना मेरा दायित्व सह धर्म है; को मैं समझता हँू ठीक-ठीक। लेकिन बात समझने से ही नहीं बनती है। बूझ लेने से ही समाधान नहीं हो जाता है। उसके लिए प्रयास की दिशा में निरंतर समय को बोना पड़ता है। पौधे में फलि लगने के बाद भी उसकी निगरानी आवश्यक है। अभिष्ट लक्ष्य हासिल कर लेने की जीद या कहें अभिलाषा मेरी खुद की गढ़ी हुई है; लेकिन मेरे इस स्वप्न में आप समानधर्मा सहभागिनी हैं जिसे मैं अपना ‘बेहतरीन’ भेंट करने का आकांक्षी हँू।
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हमने जब भी पाया, पूरा पाया...!

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