लोक-चितेरा फिल्मकार मणि कौल और बॉलीवुड


क्या फिल्म सिर्फ कथा आधारित अभिनय एवं प्रदर्शन का साधन भर है? क्या फिल्म शहरी-संस्कृति और उसके भौड़े भेड़चाल का नुमांइदा भर है? क्या फिल्मी-संसार अर्थात बॉलीवुड महज एक समर्थं प्लेटफार्म भर है जहाँ से अकूत धन ‘मैजिक रोल’ की तरह रातोंरात बनाया जा सकता है?

गोया! फिल्म यथार्थ में क्या है; इसे लोक-चितेरा निर्देशक मणि कौल ने बखूबी समझा। इस घड़ी उनके निधन पर फौरी श्रद्धांजलि देने वालों का टोटा नहीं है, किंतु आज जरूरत है उनके काम की टोह की; असली मूल्यांकन की, देशकाल और समय सापेक्ष वस्तुपरक विश्लेषण की।

ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि परदे पर लोक-परिन्दे उतारने का ‘रिस्क’ लिया था मणि कौल ने। ऐसे परिन्दे जिनके पैर ही पर थे जो आसमान में नहीं ज़मीन पर ज्यादा दृढ़ता से टिकते थे। फिल्म ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘नौकर की कमीज़’, ‘दुविधा’, ‘घासीराम कोतवाल’, ‘सतह से उठता आदमी’, ‘इडियट’, ‘सिद्धेश्वरी’ जैसी फिल्में जो रंग उभारती-उकेरती है उसमें सोलह-आना भारतीयता का पुट है। ये फिल्में भारतीय सिनेमा में बढ़ती विदेशी सूट, साइट और लोकेशन की अपसंस्कृति को आईना दिखाती हैं; साथ ही सच का लकीर पकड़ दिर्घायु होने की कामना करती हैं।

वास्तव में मंजे और सिद्ध निर्देशक के रूप में मणि कौल भारतीय सिनेमा में एक नवीन लहर के प्रणेता थे। बाज़ार-वर्चस्व के चलन को ख़ारिज करने वाले मणि कौल अपनी फिल्मों के लिए जितना भारत में नहीं जाने-सराहे गए, उससे कहीं अधिक उनके कद्रदान विदेशी धरती पर थे। ऐसे शख़्सियत की जिन्दगी भर की कमाई को अंजुरी भर श्रद्धांजलि में समेटने से होना-हवाना कुछ नहीं है सिवाय औपचारिक रस्म-अदायगी के। अतः उनके द्वारा फिल्मांकित फिल्मों के कथावस्तु, संवाद-योजना, दृश्य-बिम्बों और अभिनीत चरित्रों के अभिव्यक्ति-विधानों पर थोड़ा रूककर सोचने-विचारने तथ बहस-मुबाहिसे की जरूरत है।
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