Monday, June 19, 2017

वाह! रजीबा वाह!

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रजीबा ने सोचा-
यदि ‘डाॅक्टोरेट’ की उपाधि न लिया
तो....!
...तो क्या बिगड़ जाएगा?

यही कि तनख़्वाह कम मिलेगी
और क्या?
हा...हा...हा!

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साला रजीबा, नौटंकी
चूतिए को और कुछ नहीं सूझता
तो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी चलाता है
चिल्लर....!

हा...हा....हो.....हो...!!!


भारतीय मानुष : बाज़ार से इतर का व्यक्तित्व

  ----------------- राजीव रंजन प्रसाद ------------------ यह समय का फेर है कि इन दिनों फ़रेब, जालसाजी, षड़यंत्र, धोखा, ईष्र्या, कटुता...