मेहरारू के नाम औपचारिक ‘थैंक्यू’

Happy Valentine Day Dear,
.....................

बहुत दिन नहीं हुआ, नौकरी मिले। लेकिन जो मिला वह तुम्हारे कारण है। मेरी सारी योग्यता, सफलता और व्यक्तित्व-व्यवहार की धुरी हो तुम। तुम ही हो जिसने मुझे इस कदर सहनशील बनाया कि बार-बार ठोकर खाकर संभलता हूँ, उठता हूँ, और चलता हूँ।

अपनी पुरुषवादी मानसिकता को बल देता हुआ मैं वह बन गया जो मेरी इच्छा थी। पर यह अर्जित सफलता तुम्हारे अरमानों को बलि देकर हासिल है। तुमने मुझे पढ़ाने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी। तुमने बच्चों के नाज-नखरे सहे। घर की पारिवारिक जिम्मेदारी ढोयी, लेकिन मुझे कुछ न कहा। आज तनख्वाह मुझे मिलती है जबकि मेरे लिए सारी पूँजी तुमने लगाया है।

आज के दिन यह भी ‘प्राॅमिश’ की इस साल अपना पीएच.डी. पूरा कर लूँगा ताकि हमारे सर को बुरा न लगे जिनकी सहायता से इतने खराब माहौल के बीच यह छोटी सी नौकरी अंततः मिली है। इससे अधिक मुझसे उनकी कोई अपेक्षा भी नहीं है।

सीमा जिस लड़ाई को मैं लड़ा, वह थी-एक तरह की अचेतन कुंठा। एक ऐसी कमजोरी जिसका साथ किसी ने नहीं दिया। किसी ने नहीं सुना। यह हास्यास्पद है किन्तु सचाई कि ‘जनसंचार एवं पत्रकारिता’ का एक विद्यार्थी जिसे अकादमिक कौशल के महत्त्वपूर्ण औजार के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने गढ़ा था संस्थान ने अपने ही हाथों मुझे मार डाला। यह सबकुछ मेरे अंदर घटित हुआ, इसलिए खून के छींटे बाहर नहीं दिखे। मेरा निर्णय कि मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रयोजनमूलक हिंदी का सहायक प्राध्यापक पद पर नियुक्ति हेतु निकला आवेदन नहीं भरूँग, सिर्फ भावुक फैसला नहीं था; बल्कि मेरे आत्मबल एवं मनोबल का एक ऐसा कठोर निर्णय था जिसका दूरगामी प्रभाव मेरे जीवन पर पड़ेगा। तुम इस सचाई से बेखबर हो, बिल्कुल अनजान।

पुरानी बातें कई बार कुंठा के रूप में सालती हैं, पर उसका मोह छोड़ देने पर सबकुछ छूट जाता है। लोगों ने हमें छोड़ दिया, हम भी लोगों को थोड़ी राहत दें। इस समय सारा देश उदीयमान प्रधानमंत्री के तेज से प्रभावित है। मई, 2014 के बाद से ही देश में विकास की लहर दौड़ पड़ी है। लोग सुख-चैन के साथ मोदी जी की स्तुति कर रहे हैं। लोग हमारी बुद्धि से अधिक विवेकवान हैं, प्रतिभाशाली हैं। उनके पास माल-सम्पत्ति, धन-जायदाद हैं। वे मोदी जी की अगुवाई में पूरे देश का कल्याण करने में जुटे हैं। गरीबों को अच्छा भोजन, कपड़ा,स्वास्थ्य सुविधा, रोजगार, पेंशन आदि दिला रहे हैं। पहले योजना आयोग थी जो बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाती थी; अब नीति आयोग है जिसे विकास के फसल उग रहे हैं। पूरा देश अचानक गतिमान और शक्तिमान हो उठा है।

अच्छा ही है, जो तुम मुझे न्यूज चैनल नहीं देखने देती। नहीं तो ओम पुरी की तरह मेरा भी ब्रेन हैम्रेज हो जाता। बीएचयू में एक लड़के का रीसर्च करते-करते ऐसा ही हो गया था। वह हमसे सीनियर थे। बहुत अधिक प्रतिभाशाली। कुछ दिन उनके नाम का गुणगान हुआ। फिर सब भूल गए। आजकल लोग भूलने के लिए पैदा हो रहे हैं। सबकुछ। सभ्यता, संस्कृति, परम्परा, विरासत, आदत, स्वभाव, अहिंसा, ईमानदारी, सदाचार, सत्यनिष्ठा....सबकुछ।

चलो, हम आराम से अपनी मौत मरें; औरों को चैन से जीने दें।


आई लव यू

आपका
राजीव
Post a Comment

Popular posts from this blog

‘तोड़ती पत्थर’: संवेदन, संघात एवं सम्प्रेषण

उपभोक्ता-मन और विज्ञापन बाज़ार की उत्तेजक दुनिया

भारतीय युवा और समाज: