Saturday, May 3, 2014

पुरानी फाइल: 2009 में बनारस


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भारत की सांस्कृतिक राजधानी बनारस अन्य भारतीय शहरों से कई मायने में अलहदा है। यहाँ पारंपरिकता से जुड़ाँव है, तो आधुनिकता का रंगरोगन भी। धर्म और आस्था का पुरातनपंथी दिनचर्या है, तो कला, साहित्य और वैचारिकता की बहस-मुबाहिसे भी आम है। दिलचस्प शहर है बनारस, जहाँ सलाना 5 लाख के करीब सैलानी आते हैं। उनकी यह आवाजाही इस शहर की जीवंतता का सबूत है, जो यहाँ आकर यही का हो जाना चाहते है। रमता जोगी बहता पानी की तरह एकदम निश्छल और निस्वार्थ है बनारस, जिसे पौराणिक ग्रंथों में काशी और वाराणसी दो अन्य नामों से जानते हंै. इस ऐतिहासिक नगर को अपनी लोकप्रियता का तनिक गुमान नहीं. आधुनिकता को समय के साथ सहजता से स्वीकारने में उस्ताद इस बुजुर्ग शहर को बदलाव की तीव्र रफ्तार से कोई गुरेज़ या परेशानी भी नहीं है. यहाँ लोकसेवा के निमित बने अनेकों धर्मशाला और सामुदायिक पड़ाव हैं, तो पाँच-सितारा होटल और महँगे रेस्तराँ भी. एक तरफ पारंपरिक बुनकरों द्वारा बनाये कपड़ों का बाजार है, तो दूसरी तरफ माॅल-कल्चर की तर्ज पर निर्मित गगनचुंबी मल्टीप्लेक्स. गंगा किनारे बने घाटों की संख्या तकरीबन सौ से ज्यादा हैं. जिसके इर्द-गिर्द हमेशा श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है. फूल-माला लिए धमाचैकड़ी करते छोटे उम्र के बच्चे भी घाटों के समीप आकर्षण का मुख्य केन्द्र होते हैं, जो बालसुलभ तरीके से पूजन-सामग्री लेने के लिए निवेदन करते मिल जाएंगे. दुनियावी तामझाम से बेफिक्र यह रहस्यपूर्ण जीवन परदेशी के अंदर चरम कुतूहल का संचार करता है. 
 
गंगा-जमुनी तहजीब, जो मानव के सहअस्तित्व का प्रमुख लक्षण है, बनारसवासियों में गहरे पैठी है. लिहाजा, छद्म मजहबी उन्मादों, सांप्रदायिक कुचक्रों तथा पारस्परिक सौहार्द बिगाड़ने वाले राजनीतिक हथकंडों को प्रश्रय का मौका ही नहीं मिलता. हर रंग में रचा-बसा बनारस बनारस को किस्म-किस्म के नामों, उपनामों और मिथकीय उपाधियों से नवाजा जाता है. कोई इसे गलियों का शहर कह आनन्दित होता है, तो किसी को घाटों का दृश्य इतना लुभाता है कि वह इसे घाटों का शहर समझने लगता है. बनारसी साड़ियाँ, जो कभी भारतीय नारियों की पसंदीदा परिधान थी. आज प्रायोजित माॅडल और फैशन के युग में हाशिए पर हंै, किंतु साँस टूटी नहीं. आज भी बनारसी साड़ियों की मांग वैवाहिक अवसरों पर सर्वाधिक है. उसी तरह फास्टफूड और कोल्डड्रिंक के इस जमाने में भी अगर लोग मिट्टी के कुल्हड़ पसंद करते हैं, तो इसके पीछे बनारसीपन जुड़ाव पहली वजह है. इसी तरह शौकीन लोग पान का बीड़ा चबाते हुए देश-विदेश के हाल-हालात पर चर्चा करते हैं, कला, साहित्य और लोक-चेतना के बाबत बहस करते हैं. ताज्जुब है कि इस शहर में जेट-वायुयान के युग में भी ‘एक्का’ अर्थात घोड़ागाड़ी प्रचलन में है. ठंडई, लस्सी, कचैड़ी, जलेबी और इमरती के दूकानों पर उमड़ती रेलमपेल भीड़ रोजाना का टंट-घंट है. यही नहीं धर्म, शास्त्र, वास्तु, कला-साहित्य, संगीत, नाटक, रामलीला, लोकगीत व गायन सभी क्षेत्रों में अग्रणी है बनारस. जहाँ आ कर पर्यटक खुद ही अपना सुध-बुध खो देते हैं. दर्शनार्थी मंत्रमुग्ध हो इसके चप्पे-चप्पे का खाक छानते हैं. आगंतुक घाटों के किनारे बने प्राचीन इमारतों, किलानुमा मेहराबों तथा नक्काशीदार भवनों के बीच से पावन नदी गंगा को अपलक निहारते हैं. किसी एक मुंडेर या झरोखे से सुबह-ए-बनारस का नजारा देखते हैं. सांध्य आरती, जो बनारस का पहचान-प्रतीक है को देखने हेतु जबरिया नावों की सवारी करते हैं. निःसंदेह कण-कण में थिरकन का अहसास कराते इस शहर में उमंग, उत्सव और उल्लास का जलवा जिस बुलंदी पर है. उसे देखकर ईष्र्या स्वाभाविक है. यँू तो इस उम्रदराज शहर में समय के साथ पैदा हुई समस्याएँ भी ढेरों हैं. लेकिन वह इन सभी से अपने हिसाब से निपटता है.

अपनी शर्तों पर जीता बनारस

ऐसे समय में जब भारतीय संस्कृति पर चैतरफा हमला जारी है. रहन-सहन से लेकर जीने का सलीका-तरीका तक बदलाव की चपेट में है. जिंदगी में आपाधापी, हो-हल्ला और चिल्ल-पों बढ़ी है. शब्द, संवेदना और सामाजिकता का दायरा घटा है. इन तमाम बुरे ख्यालातों और डरावने आशंकाओं के बीच भी प्राचीन स्मृतियाँ न तो विलुप्त हुई है और न ही बिखरी है. बनारसी परंपरा की कौन कहे, यह तो सदैव संबंधों को गर्माहट और गरिमा प्रदान करने का काम करता रहा है. लेकिन बनारस में रचने-बसने खातिर कुछ जरूरी शर्ते हैं. इसे बनारसी अदब में कुछ इस प्रकार कहा जाता है-‘राड़, साँढ़, सीढ़ी, सन्यासी; इन से बचै तो सेवै काशी’ एक और बात कही जाती है कि बनारस को पूर्णता में जानना मुश्किल है. यह हमेशा स्वयं को सौ-फीसदी प्रस्तुत करने से बचता है. यों तो कला, साहित्य, सिनेमा के अलावा नवसंचार माध्यम अपने-अपने हिसाब तथा दृष्टिकोण से इस ऐतिहासिक शहर का मुआयना करते आये हैं. परंतु अद्भुत और रहस्यमयी बनारस आज भी उनके लिए अजनबी और उतना ही अपरिचित बना हुआ है. कवि केदारनाथ सिंह ने बनारस की इस बनावट-बुनावट को ‘बनारस’ शीर्षक कविता में सधे अंदाज में चित्रित किया है-
 
‘अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं है’
युगप्रवत्र्तक-युगद्रष्टा बनारस

अगर हम इस शहर की प्राचीनता को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में खंगाले तो बनारस से वर्तमान वाराणसी में रूपांतरण शनैः-शनैः हुआ है. वैदिक काल में जहाँ यह जीवन-मृत्यु एवं मोक्ष-मुक्ति का पावन केन्द्र था. वहीं जैन-बौद्ध संप्रदायों के लिए ज्ञानाश्रयी स्थल था. आज सारनाथ की ख्याति इन्हीं कारणों से है,  क्योंकि महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम अपने शिष्यों को उपदेश इसी जगह दिया था, जिसे बौद्ध ग्रंथों में ‘धर्मचक्रपरिवर्तन’ के नाम से जाना जाता है. हिन्दु धर्मावलम्बियों की दिव्यस्थली कहे जाने वाले बाबा विश्वनाथ मंदिर, दुर्गा मंदिर, संकटमोचन मंदिर तथा कालभैरव मंदिर प्राचीनकाल से ही धार्मिक-संकेन्द्रण के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं. कबीर और रैदास, जो भक्ति-आंदोलन के आधार-स्तंभ माने जाते हैं. उनका जन्मस्थली और तपोभूमि यही शहर है. राजशाही और व्यवस्थित राजतंत्र के हिसाब से काशी-नरेश का ओहदा सर्वोपरि था. मशहूर रामनगर का किला आज भी वास्तु और स्थापत्य के विचार से महत्वपूर्ण भारतीय विरासत हैं. जहाँ भ्रमणल पर्यटकों की दिनभर आवाजाही लगी रहती है. लोक-कला और लोक-चेतना की दृष्टि से उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, पंडित रविशंकर, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी, किशन महराज जैसे जादुई शख्सियतों की सरजमीं बनारस आज भी  शास्त्रीय संगीत और गायन विधा में अव्वल है. अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त इन प्रसिद्ध लोगों की सहज जीवनशैली और मृदुभाषिता आमजन को बेहद प्रभावित करती है. इसके अलावे यह जिक्र जरूरी है कि वैचारिक संजीवनी का प्रस्फुट्टन और साहित्य एवं हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव-विकास काशी से ही हुआ है. जिसे कबीर, तुलसी, रैदास, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचन्द, महामना मदन मोहन मालवीय, रामचन्द्र शुक्ल ने समकालीन हिसाब से गढ़ा. अब यह दारोमदार नई पीढ़ी के नायकों मसलन चंद्रबली सिंह, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह और ज्ञानेन्द्रपति पर है, जो अंधाधुंध बदलाव के चपेट और चंगुल में कैद वर्तमान मानव-समुदाय को वैचारिक खुराक प्रदान करने हेतु तत्पर हैं.

बनारस का सिनेमाई सच

सिनेमा से आमआदमी का साबका हर रोज पड़ता है. क्योंकि यह समय, समाज और संस्कृति का प्रतिबिम्ब है. बनारस इसके दायरे से भला कैसे दूर रहता. अतएव, फिल्मों की दुनिया में अमिताभ ने बनारस को ज्यादा लोकप्रियता दिलायी. मसलन, ‘ओ...खइके पान बनारस वाला...कि खुल जाए बंद अक्ल का ताला.’ इसके अलावे सिनेमा के रूपहले परदे पर बनारस को लेकर बहुत सारी फिल्में बनी हैं या फिर अपरोक्ष ढंग से उनमें इस शहर का जिक्र.

क्या खूब कही किसी ने...,

मिलता है. बनारस के ठेठपन और भदेसपन को बड़े ही सूक्ष्मता और सहजता के साथ सिनेमा में फिल्माया जाता रहा है. नामों की फेहरिस्त में पकंज पराषर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘बनारस-अ माइस्टिक लव स्टोरी’ के अतिरिक्त ‘लगा चुनरी में दाग’, ‘धर्म’, ‘चोखेर बाली’ शुमार है. विवाद और विरोध की वजह से दीपा मेहता ‘वाटर’ फिल्म भले यहाँ न बना पायी हों, पर वह बनारस केन्द्रित एक महत्वपूर्ण फिल्म है. अमूमन बनारस पर फिल्म बनाना आसान काम नहीं है. क्योंकि यहाँ बिम्बों की भरमार है. एंग्ल और लोकेशन के अनगिनत स्पाॅट हैं. अब निर्देशक और सिनेमेटोग्राफर पर निर्भर है कि वह अपने विजुअल्स में क्या दिखाना चाहता है और क्या छोड़ना?

पुरानी फाइल : हाशिए का हरफ़ लिखती ‘बहादुर कलम’

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 अख़बारनवीस रामबहादुर राय को जितना मैं जानता हूँ, ‘अनायास’(संपादकीय स्तंभ, प्रथम प्रवक्ता, 1-15 अगस्त, 2007 से आजतक) ही सही; यह कहने के लिए पर्याप्त है कि वे आखि़री आदमी के ‘प्रथम प्रवक्ता’ हैं। ऐसे प्रवक्ता जिनका अपना कोई स्वार्थ नहीं, राजनीतिक एजेण्डे का चोचरम नहीं। वे बेलाग-लपेट अपनी बात सीधे शब्दों में ‘यथाकाल’ कह डालते हैं; इसी कारण उनके लिखे को ‘बहादुर की निर्भीकता’ कहने में संकोच नहीं होता है। हाँ, उनकी तल्ख़बयानी से साँपनाथ और नागनाथ किस्म के करीबियों(ख़बर-खरीद के कारोबारी) के सीने पर मूंग अवश्य दल जाते हांेगे। ‘काली पत्रकारिता की कहानी’ लिखने वाले इस यशस्वी पत्रकार के मुख़ालफत में मोर्चा बुलन्द करने वाले भी अनेको होंगे। क्योंकि इस जहां की रीत है; सच लिखने वाले दोस्त कम, दुश्मन ज्यादा बनाते हैं। लेकिन पत्रकार रामबहादुर राय विचारों के मामले में स्वशासी हैं। उत्साही और जुनूनी भी खूब। वे आदर्शवाद के गोलम्बर नहीं रचते, बल्कि पगडंडी की परिधि पर पहला पग स्वयं धरते हैं। वे जानते हैं कि नेतृत्व हमेशा व्यवहार में फलित होता है। इसीलिए वे संघर्ष से गठजोड़ अथवा समझौता करने के बजाए उससे सीधे मुठभेड़ करते दिखते हैं। उनकी आत्मा आम-आदमी से सम्बद्ध(अटैच) है। जनमानस से उनका लगाव गाढ़ा, तो स्वयंनिर्णित जवाबदेही जबर्दस्त है। दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी के संस्मरण में उन्हें याद करते हुए वे जो शब्द-लड़ी पिरोते हैं, वस्तुतः वे उनके मन का मनका हैं-‘‘मैं मानता हँू कि 1983 की जुलाई में उनसे जो नाता जुड़ा वह नदी-नाव संयोग नहीं था। पत्रकारिता में मैं उसी तरह आया था जैसे फिसल पड़े तो हरगंगा। उस डुबकी के बाद की यात्रा तीर्थंकर संपादक प्रभाष जोशी की छाया में उनके न रहने पर भी चल रही है।’’
 
आपको बता दँू कि मैंने ‘प्रथम प्रवक्ता’ को इसलिए पढ़ना शुरू नहीं किया कि उसके संपादक रामबहादुर राय हैं जो एक प्रतिष्ठित पत्रकार हैं। उनकी ख्याति स्वयंसिद्ध है। दरअसल, उन दिनों ही मेरा दाखिला पत्रकारिता के मास्टर-डिग्री के अन्तर्गत काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुआ था। पाठ्यक्रम प्रयोजनमूलक हिन्दी। छोटे कोष्ठक में पत्रकारिता शब्द भी उसके साथ गुदा हुआ था जिस पर गुमान कम आह्लाद अधिक था। अलबत्ता, पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने की रुचि पैदा हुई। उन्हीं दिनों ‘प्रथम प्रवक्ता’ के अगस्त अंक को पलटा था। निगाह उस ‘बहस’ पर पड़ी जिसका शीर्षक था-‘क्या राष्ट्रवाद एक अपर्याप्त अवधारणा!’ यह जवाहरलाल कौल द्वारा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में दिया गया भाषण था जिसे मैंने सुना नहीं था, किन्तु उसकी चर्चा सुन रखी थी। उस भाषण को आद्योपांत पढ़ा, अच्छी लगी। उसके बाद पत्रिका को मैं नियमित खरीदने लगा। कुछ भूलचूक के साथ। आज जिस अण्णा जनान्दोलन के बारे में देख-सुन कर हमारी बाँछे खिल रही है; ‘प्रथम प्रवक्ता’ के संपादकीय स्तंभ ‘अनायास’ में ‘भ्रष्टाचार है मुद्दा’ शीर्षक से संपादक रामबहादुर राय ने उस वक्त ही चेताया था जब देश में दूर-दूर तक अण्णा हजारे और बाबा रामदेव के पगचिह्न या सितारे देसी-फलक पर नहीं मौजूद थे-‘‘चैंकने की नहीं, चैकन्ना होने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे आर. सी. लाहोटी उस हकीकत पर निशान लगा रहे हैं जिसे हर आदमी जान गया है। उसे देख रहा है। आम आदमी उसके भयावह रूप से पीड़ित है, पर मजबूर भी है। वह हकीकत यह है कि शासन और सार्वजनिक जीवन के हर ठिकाने पर बेईमानों ने कब्जा जमा लिया है।’’
 
वे अपने इस संपादकीय में यहीं नहीं थमते हैं। आम आदमी से कटती जा रही उन वैचारिक बहसों एवं विमर्शों के ऊपर भी सवाल खड़े करते हैं जिन्हें ‘नागर-समाज’ आतुर-भाव से अपनी चिन्ता में  शामिल तो अवश्य कर ले रहा है; किन्तु उसके पास कारगर उपाय के निमित दृष्टिसंपन्न योजना एवं रणनीति का सर्वथा अभाव है। दो-टूक शब्दों में किया गया विषय-विश्लेषण द्रष्टव्य है-‘‘राजधानी दिल्ली में दो अनेक्सियाँ हैं जहाँ देश की तकदीर रोज लिखी जाती है। देश का ललाट ऐसा है जो इन इबारतों को रोज मिटा देता है और उस पर अपनी छाप बैठा देता है। पार्लियामेंट की अनेक्सी में वह समूह जमा होता है जो शासक-वर्ग में शरीक हो गया है। इंडिया इण्टरनेशनल की अनेक्सी दूसरी ज़मात के उस समूह के लिए है जो परिधि पर पहुँच जाता है। वहाँ बंद कमरे में होने वाली चर्चा के केन्द्र में आम आदमी का दुःख-दर्द होता है, उससे दूरी भी बनी रहती है।’’
 
बतौर संपादक रामबहादुर राय सिर्फ अपनी बात कहकर ही चुप बैठने वाले व्यक्ति नहीं है, वरन् वे पत्रकारीय कसौटी के साथ उस आग-पाछ से भी पाठक को अवगत कराते हैं जो उनकी निगाह में सच को सही सन्दर्भों में जानने हेतु यथेष्ट है। इसीलिए वे जब ‘धर्म बदला पर हालात नहीं बदले’ शीर्षक से एक तात्कालिक घटना पर अपनी राय प्रस्तुत करते हैं, तो उस घड़ी उनकी यात्रा वर्तमान से अतीत की ओर सहज ही प्रस्थान कर जाती है-‘‘19वीं और 20वीं सदी में पादरियों ने दलित समुदायों को ईसाई बनाने में ताकत झोंक दी। उन्हें यह आश्वासन दिया गया कि ईसाई होते ही उन्हें बराबरी का दर्जा मिलेगा। इज्जत मिलेगी। समाज में सम्मानपूर्वक जीने के अवसर उपलब्ध होंगे। इसके लिए शिक्षा और रोजगार के विशेषाधिकार भी प्राप्त होंगे। उन्हें कष्ट के समय भाईचारे का सहारा होगा। दमन की पीड़ा से दूर हो जाएंगे और आजाद हवा में सांस ले सकेंगे। इन आश्वासनों ने दलितों को ईसाई बनने के लिए अपनी ओर खींचा। लेकिन वहाँ जाने पर उन्हें जो कुछ मिला वह बद से बदतर ही था। रत्ती भर बदलाव की बयार उन्हें नहीं मिली। साफ था कि जिन खुशियों के लिए वे वहाँ गए थे, उन्हें नसीब नहीं हुई। वे एक ऐसी मृगमरीचका में फँसे हुए हैं कि हर कदम और हर क्षण अपने अधिकारों की रक्षा में गुजारना पड़ रहा है। साफ है कि वे आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।’’ 
 
याद करिए, जिन दिनों लाल कृष्ण आडवाणी की आत्मकथा ‘माई कंट्री, माई लाइफ’ चर्चा और विवाद के लपेटे में डूब-उतरा रही थी; रामबहादुर राय ने इस पुस्तक को अपनी पत्रिका की प्रथम कथा बनाना जरूरी समझा। ‘आत्मकथा नहीं आत्मकथन’ शीर्षक से रामबहादुर राय स्वयं इस पुस्तक के निहितार्थ उद्देश्य को खंगालते हैं। आम पाठक इस पुस्तक की वास्तविकता से जिन शब्दों में रू-ब-रू होता है; वह बेमिसाल है-‘‘यह किताब क्यों लिखी गई? क्या यह आत्मकथा है, जैसा कि कहा जा रहा है? आत्मकथा में आत्मावलोकन भी होता है। इस किताब में लाल कृष्ण आडवाणी के लंबे राजनीतिक जीवन के किसी मोड़ पर आत्मावलोकन का कोई भी संकेत नहीं है। सच तो यह है कि इस किताब में जो तत्त्व नहीं है, वह आत्मावलोकन ही है। इसमें वे ही बात है जिन्हें लाल कृष्ण आडवाणी बोलते-बताते रहे हैं। यह एक सिद्धान्त के तौर पर पूरी किताब पर लागू होता है।’’
 
‘प्रथम प्रवक्ता’ समाचार-विचार पाक्षिक के रूप में एक विश्वसनीय पत्रिका है। जल्द ही मुझे यह अहसास हो गया कि यह पत्रिका अन्य पत्रिकाओं के झुण्ड से कैसे अलग है? ‘मुद्दे की बात, मुद्दत के बाद’ कर ले जाने में क्योंकर अग्रणी है? साथ ही, इसकी चिन्ता गहरी, सत्यान्वेषी और परिवर्तनकामी क्यों है? पत्रकार रामबहादुर राय वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पर महज़ आह! उफ! करने के उलट ‘बस! बहुत हो चुका’ शीर्षक के साथ जो आवरण-कथा लिखते हैं; उसकी नानाविध अर्थच्छटाएँ इन शब्दों में स्पष्टतः देखी जा सकती हैं-‘‘अनेक चिन्तकों ने लिख-पढ़ कर बताया है कि मौजूदा शासन-व्यवस्था ईस्ट-इंडिया कंपनी राज की लकीर पर चल रही है। भारत की राजनीति भी इसी आधारभूत सिद्धान्त से संचालित हो रही है जिसकी नींव अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य को मजबूत करने के लिए रखी थी। भू-मण्डलीयकरण ने उसे नया ज़ामा पहना दिया है। विश्व प्रेम दिखावा और मुनाफे पर नज़र यही है, वह आधारभूत सिद्धान्त जिसे सेसिल रोड्स ने निकाला था। उसी सिद्धान्त को भारत में शाश्वत बनाए रखने के लिए मार्ले-मिन्टो सुधार से एक निर्वाचन-पद्धति निकली। वह हमारी मौजूदा चुनाव-प्रणाली की जननी है जिसका आधार साम्प्रदायिक विभाजन है। उससे आदमी भारतीय नहीं रहता वह एक वोटर हो जाता है और मज़हब, जाति और उपजातियों में बँट जाता है। लोगों को छोटे-छोटे घरौन्दे में बाँटने के लिए ही वह निर्वाचन पद्धति निकाली गई थी। उस समय जो विषवृक्ष पैदा हुआ वह अब ज़हर का जंगल हो गया है। उसी की कीमत पर आतंकवाद लहलहा रहा है। इस राजनीतिक व्यवस्था में भारत का स्वबोध नहीं है। उसकी अपनी परम्परा का विलोप हो गया। सत्ता पाने की होड़ में राजनीतिक नेतृत्व अपनी वह सुध-बुध खो चुका है जिससे व्यवस्था-परिवर्तन का संकल्प उभरता है। मूलभूत अवधारणाओं पर सवाल खड़े कर वोट की राजनीति की जा रही है। इसलिए अपनी परम्परा और राष्ट्रीयता को पहचानने का सही प्रयास नहीं किया गया है। अलबत्ता, इसके नारे जरूर लगाए जाते हैं। लेकिन उसकी समझ बनाने से हमेशा बचने की कोशिश होती है। समझ तो वही बनी हुई है जो अंग्रेजों ने पढ़े-लिखे समुदाय में बैठा दिया था कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, राष्ट्रीयताओं का समूह है। इसपर अबतक एकमत न होना भी हमारे संकट का एक कारण है।’’ 
 
रामबहादुर राय जनता के प्रश्न का संसद में माख़ौल उड़ाए जाने पर उन जन-प्रतिनिधियों की माकूल ख़बर लेते दिखते हैं जिन्हें संसदीय प्रश्नकाल का इतिहास-बोध तक नहीं मालूम है। वे कहते हैं-‘‘प्रश्नकाल जनता का होता है। यही वह समय होता है जब सदस्य जनता की ओर से मंत्री से जानकारी मांगते हैं। सवाल उसका जरिया होता है। सदन की बैठक जैसे ही शुरू होती है पहला एक घंटा प्रश्नकाल होता है। इसमें मौखिक और लिखित प्रश्न सदस्य पूछते हैं। उसकी 21 दिन पहले वे सूचना देते हैं। यह प्रक्रिया इसलिए निर्धारित की गई है कि मंत्रालय सवालों के सही जवाब तैयार कर सके।...प्रश्नकाल की परम्परा पुरानी है। इसकी शुरूआत 217 साल पहले हुई थी जिसे आज़ादी के बाद लोकसभा ने बनाए रखा। इस समय सदन की छटा देखने लायक होती है। ऊपर की दर्शक-दीर्घाएँ भरी होती हैं और सदन में सदस्य सजे-धजे पूरी संख्या में उपस्थित रहते हैं। लोकसभा की बैठक में यही एक घंटा ऐसा होता है जिसमें सत्ता और विपक्ष की खाई पट जाती है। उस समय सदन दो पाले में खिंच जाते हैं। एक में सरकार के मंत्री होते हैं, तो दूसरे में जनता के प्रतिनिधि। जनता की प्रभुसत्ता का इसी समय सीधे दर्शन किया जा सकता है, बशर्ते जन-प्रतिनिधि योग्य, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हो।’’
 
एक जवाबदेह पत्रकार ख़बर के साथ तथ्य, सूचना और आँकड़े के अतिरिक्त अपनी दृष्टि भी सम्प्रेषित करता है। अतएव, स्थानीय भूगोल और सांस्कृतिक सनातनता से जो पत्रकार जितना अधिक संपृक्त होगा; उसके भाव-बिम्ब और विचार में सत्य उतने ही उदात्त ढंग से मुखरित हांेगे। रामबहादुर राय की कलम इस दृष्टि से अतुलनीय है। ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ सूक्ति को व्यवहार में चरितार्थ अथवा फलीभूत करने की माफ़िक। यह उनके लेखन में स्फूर्त ढंग से समाविष्ट है-‘‘बनारस का न्यारापन जितना उसके नाम में है उससे अधिक उसकी विभूति में है। जिसका जैसा नज़रिया हो वह वैसा माने। यह आजादी यही शहर देता रहा है। याद में यह काशी है। सरकारी कागजों में वाराणसी है।...लोकतांत्रिक राजनीति में जो खतरे उभर आये हैं उन्हें बनारस ने अपने अनुभव से पहचाना कि वे उसी तरह के हैं जैसे कभी महामारी हुआ करती थी। उसका नाम चेचक, हैजा, प्लेग कुछ भी हो सकता है। नई महामारी आतंकवाद है। जिस तरह पहले बनारस वाले गली के हर नुक्कड़, तिराहे और चैराहे पर टोटका कर महामारी रोकते थे और उसके लिए अनुष्ठान करते थे वही तरीका इस बार चुनावी समर में बनारस ने अपनाया।’’
 
स्थानीय भूगोल और सांस्कृतिक सनातनता से परिचय, लगाव और निश्छल आत्मीयता रामबहादुर राय की स्वयं की खोज है। पत्रकारिता में उनके यायावरीपन का द्योतक। इसीलिए उनके लिए जितनी महत्त्वपूर्ण काशी है उतना ही प्रिय है मिजोरम। वे आम-बोलचाल की भाषा में मिजोरम के देसी-भूगोल, वेशभूषा, रहन-सहन, परम्परा और संस्कृति में इस कदर गहरे पैठते हैं कि मन एकबारगी इस पत्रकार के प्रति श्रद्धा से नत हो जाता है। पूर्वोत्तर भारतीयों के साथ आज़ादी के इत्ते वर्षों बाद भी किए जाने वाले भेदभाव के बर्ताव पर वे गहरी चिन्ता जाहिर करते हैं। दक्षिण भारत की यात्रा के दरम्यान मिजोरम के मुखिया लल थनहावला को जिस अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ा; उसकी पड़ताल करते हुए रामबहादुर राय स्पष्ट शब्दों में कहते हैं-‘‘इससे यह साफ हो जाता है कि मिजो पुरानी जनजाति है। इसका मूल निवास मिजोरम है। जो भारत के एक छोर पर पहाड़ियों के बीच स्थित है। ये पहाड़ियाँ उत्तर से दक्षिण की तरफ लम्बी बढ़ती चली जाती है। इसके ढलान तीखे हैं। हर पहाड़ी एक-दूसरे से अलग है। उनके बीच घाटियाँ हैं। ऐसे मनोरम इलाके के लोग बड़े आकर्षक तरीके से रहते हैं। उनका पहनावा उनकी रंगीन तबीयत की परिचायक है। उनकी संस्कृति भरी-पूरी है। मिजो का लोक-साहित्य विपुल है। ऐसे राज्य को अपने परिचय के लिए मुहताज होना पड़े, तो समझना होगा कि राजनीतिक व्यवस्था के कार्यकलापों में कहीं न कहीं बुनियादी खोट है। यह भी समझना होगा कि शब्दों के कोहरे में अपनी पहचान की लड़ाई लड़ने वाले लल थनहावला अकेले नहीं हैं, उन्हीं की तरह वे सब हैं जो उत्तर-पूर्व के सुदूर इलाके में रहते हैं।’’
 
वस्तुतः रामबहादुर राय अनुयायी नहीं हैं, सत्यानुरागी हैं। वे ऐसे जन-साधक हैं जो आम आदमी का बाहर से समर्थन नहीं करते, बल्कि उनके भीतर पैठकर उनकी बोली-वाणी में जन-पत्रकारिता का ख़म ठोंकते हैं। रामबहादुर राय हर पाठक में पत्रकारिता के मूलभूत अभिलक्षण मौजूद पाते हैं। लिहाजा, वे अपनी पत्रिका के एक पृष्ठ को उस अलक्षित ‘पाठक-पत्रकार’ के नाम सुपुर्द करते हैं जिस के भीतर सच के लिए लड़ने-भिड़ने का ज़ज़्बा हो, संकल्पशक्ति और दृढ़विश्वास हो। ‘प्रभाष दीपो भव’ का ध्येय हो। यह ध्येय खुद रामबहादुर राय के भीतर प्रभाष जोशी के प्रकाशपुंज से आलोकित है। वे प्रभाष जी को याद करते हुए कहते हैं-‘‘अपनी तरुणाई में उन्होंने देश को नए सिरे से बनाने का सपना देखा था। उस राह से पत्रकारिता में आए थे। वह सपना उनका कभी न मरा, न ठंडा पड़ा। आखिरी दिन तक वे उसके लिए पूरा सक्रिय रहे। नाना प्रकार के प्रभावों से परे थे। वे सत्यान्वेषी थे। लेकिन परम्परागत पद्धति से खोज नहीं करते थे। वे केन्द्र से विस्फोट करते थे, परिधि से नहीं।’’
 
किसी सम-सामयिक विषय पर रामबहादुर राय की चिन्ता तात्कालिक उत्तेजना की उपज नहीं है। वे दूरगामी प्रभाव को सूक्ष्मतम तरीके से पकड़ने में सिद्धहस्त हैं। सूचनाएँ स्पष्ट, तथ्य वस्तुपरक, तो अर्थ बेजोड़ हैं। 1 जून, 2010 के अंक में ‘ताकि करतूतें छिपी रहें’ शीर्षक से लिखे गए आवरण-कथा में रामबहादुर राय जिस सचाई को प्रकट करते दिखते हैं, उसका मकसद सिर्फ सच को सच की तरह कहना भर नहीं है-‘‘कहते हैं कि वक्त ही सबसे बड़ा मरहम होता है। जिन्हें चोट लगी है, वे वक्त नहीं चाहते। जल्दी इलाज चाहते हैं। साफ-साफ समझ लेने की जरूरत है कि ख़बरें बेचने के धंधे ने लोकतंत्र के मर्म पर चोट की है। जिससे हर सुधी नागरिक मानसिक रूप से घायल हुआ है। नई कमेटी न मरहम-पट्टी कर पाएगी और न इलाज। वह लोगों की जिज्ञासा को शांत भी नहीं कर सकेगी। उससे किसी का बचाव भी नहीं होगा। क्योंकि बात बहुत दूर तक जा चुकी है। कोई ऐसा फोरम नहीं बचा है जिस पर ख़बरें बेचने और ख़रीदने के धंधे पर थू-थू नहीं हुई हो। साफ है कि चैतरफा निंदा से बचने का कोई उपाय उन लोगों को नहीं दिखता जो धंधे में अपना ईमान काला कर चुके हैं। यह धंधा हुआ ही इसलिए कि राजनीति एक बाज़ार हो गया है। राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को अपनी मार्केटिंग के लिए मीडिया की जरूरत पड़ती है। इसलिए वे भी उतने ही गुनाहगार हैं जितने मीडिया घराने वाले माने जा रहे हैं।’’
 
रामबहादुर राय बिलावजह यहाँ राजनीति को कठघरे में खड़ा नहीं कर रहे हैं। आज राजनीति जिस कदर भ्रष्ट और पतनशील हो चुकी है; उसे देखते हुए स्वतःस्फूर्त बेहतर की गुंजाइश के बारे में सोचना भी फिजूल है। इस बाबत रामबहादुर राय की चिंता बेहद वाज़िब है-‘‘राजनीतिक दलों के बारे में एक धारणा बन गई है कि वे तात्कालिकता से ऊपर नहीं उठ पाते। चुनावी राजनीति ने उनकी सोच को कुंद कर दिया है। लोकतन्त्र के लिए यह जितना घातक है उससे ज्यादा यह परिपाटी घातक साबित होगी कि किसी सवाल पर खुलकर बहस ही न हो। ऐसे माहौल में उन लोगों की कौन सुनेगा जो सोच-विचार के हिमायती हैं।’’
 
पत्रकार रामबहादुर राय की एक ख़ासियत यह भी है कि वे किसी पर आरोप नहीं मढ़ते हैं। लांछन नहीं लगाते हैं। उनके कहे के साथ कार्य-कारण सम्बन्ध अविच्छिन्न ढंग से जुड़ा होता है। राजनीतिक गलियारे में मशहूर अमर सिंह के बारे में रामबहादुर राय अपने संपादकीय में ‘यथाकाल’ बड़ी साफगोई से कहते हैं-‘‘अमर सिंह जैसी राजनीति करते रहे हैं उसके लिए एक पार्टी होनी चाहिए। इन दिनों वे बार-बार चैदह साल के सम्बन्धों का जिक्र कर रहे हैं। कोई मलाल है जो बाहर निकल रहा है। उनकी छवि सत्ता के सौदागर की रही है। इसे लोगबाग सीधी संज्ञा देते हैं। यही लोकतन्त्र है। कल तक अमर सिंह के लिए मुलायम सिंह ‘नेता जी’ रहे हैं। ये दोनों बिना साफ-साफ बोले अपने ढंग-ढर्रे से संदेश देते रहे हैं कि जैसा ज़माना है सपा वैसे ही हो गई है।’’
 
रामबहादुर राय किसी व्यक्ति के किए का मूल्यांकन जिस संकल्प और निष्ठाभाव से करते हैं उसमें स्वार्थ या आत्मख्याति की गुंजाइश रत्ती भर भी नहीं है। आचार्य राममूर्ति जैसे राष्ट्रीय महापुरुष के निधन पर जब जनसत्ता अख़बार तक ने सुध न ली, तो रामबहादुर राय की संपादकीय कलम ने खुद शब्द-सुमन अर्पित करते हुए लिखा कि-‘‘धीरेन्द्र मजूमदार प्रखर क्रान्तिकारी थे। बाद में अहिंसक प्रयोगों की ओर मुड़े। उनसे प्रेरित होकर आचार्य राममूर्ति ने अपने जीवन की दिशा बदल दी। वे कहते थे कि हजूर से मजूर बन गया। यह सब उस प्रयोग की प्रक्रिया में था जिसमें लक्ष्य था-जनक्रान्ति और माध्यम अहिंसा। इसके लिए अपने विचार और कर्म की साधना की। भूदान आन्दोलन में कूदे। मुंगेर की श्रम भारती संस्था को बनाया जिसे खादी ग्राम से लोग जानते हैं। वे सर्वसेवा संघ के विभिन्न पदों पर रहे। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया तब सबको चैंकाते हुए आचार्य राममूर्ति उसमें पड़े। उन्हें उम्मीद थी कि जेपी की अधूरी सम्पूर्ण क्रान्ति की एक कड़ी यह हो सकती है।’’
 
वर्तमान राजनीति जिस जार्ज फर्नांडीज को बिसार चुकी है; रामबहादुर राय की स्मृति में उनकी याद आज भी तरोताजा है। अपने संपादकीय में वे जार्ज को याद करते हुए कहते हैं-‘‘यह उस दौर की बात है जब जार्ज फर्नांडीज अपने में होते थे। अपना फैसला खुद करते थे। तब यह भी माना जाता था कि राजनीतिक नेताओं में जार्ज कई तरह से अपवाद हैं। उन पर उम्र का कोई कुप्रभाव नहीं दिखता था।...लोकसभा के पिछले चुनाव ने जार्ज फर्नांडीज को गहरे तोड़ दिया। उन्हें इतनी व्यथा झेलनी पड़ी कि मन और तन से टूट गए। वहाँ से शुरू हुई ढलान ने उन्हें आखिरकार खाई में ला पटका। मूलतः जार्ज नियति से हमेशा लड़ते रहे। उन्होंने गरीबों, आस्थावानों, मजदूरों और व्यवस्था परिवर्तन के सरोकारों से अपनी नियति को बचपन में ही नत्थी कर दिया था। इसे विडम्बना समझने की भूल मत करें कि वे नेतृत्व की भूमिका से अब उनके जैसे हो गए हैं जिनके लिए जीवन भर जूझते रहे हैं। जिनकी आवाज़ बन गए थे। यह ज़माना गरीबों की आवाज़ का है। ऐसे समय में जार्ज का बेजुबान होना ज्यादा अखरता है।’’   
 
जार्ज की क्षीण हो चुकी स्मृति के बाबत जो कसक रामबहादुर राय के अंतस में दिखती है, उसका महत्त्व सार्वकालिक है। आज ज़माना सचमुच गरीबों की आवाज़ का है। ऐसे में अगुवाई के लिए जार्ज जैसे अनुभवी तथा जमीन से जुड़े व्यक्तित्व का टोह आवश्यक है। क्योंकि आज की राजनीति में ‘हाइब्रिड’ राजनीतिज्ञों का वर्चस्व और बोलबाला सर्वत्र है। ये राजनीतिज्ञ महज़ चुनावी गरज़ से लोगों के बीच जाते हैं, अन्यथा उनकी खुद की बनायी दुनिया में रंगीनियत असीम है। रामबहादुर राय बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी शिकस्त के बारे में विचार करते हुए ठीक ही कहते हैं-‘‘सभा की भीड़ से उसका मिज़ाज़ नहीं जाना जा सकता। अक्सर भीड़ देखकर नेता बौरा जाते हैं। अपने बारे में गलतफ़हमी पालने लगते हैं। ऐसा उनके साथ भी होता है जो राजनीति के मंजे खिलाड़ी हैं। फिर राहुल गाँधी को दोष क्यों दें। बेचारे अभी ककहरा सीख रहे हैं। बिहार में बड़े दौरे किए। लोग ‘राजकुमार’ को देखने भी आए। उन्हें भ्रम हो गया कि वह भीड़ कांग्रेस की विधानसभा में संख्या बढ़ा देगी। वे कहने लगे थे कि कांग्रेस कम से कम 50 सीट जीतेगी। उनका अनुमान अगर सही निकलता, तो कांग्रेस को राहुल गाँधी के जादू से 41 सीटों का फायदा होता। हुआ ठीक उल्टा। पिछली बार कांग्रेस को वह अंक मिला जिसे ज्योतिषी बहुत पवित्र मानते हैं। वह अंक था-9। क्या राहुल गाँधी को उन्हीं ज्योतिषियों ने बताया था कि इस बार कांग्रेस 50 की संख्या छू लेगी। ज्योतिष और भीड़ से भ्रम हो सकता है, लेकिन राजनीति तो निष्ठुर नियमों से चलती है।’’
 
कहना न होगा कि हाल के दिनों में लोकपाल विधेयक को लेकर ग़हमागहमी जबर्दस्त रही। सरकारी महकमे से लेकर सिविल सोसायटी तक में धींगामुश्ती और तनातनी के माहौल तारी रहे। इस महत्त्वपूर्ण घड़ी में रामबहादुर की कलम ने जो लिखा उसमें सोलह आना सचाई नज़र आती है-‘‘जिस विधेयक को सरकार प्रचारित कर रही है उसकी कलई खुल गई है। उसमें इतनी कमियाँ हैं और इतने सुराख हैं कि भ्रष्ट राजनीतिक नेता चाहे वह सांसद हो या मंत्री या प्रधानमंत्री उससे साफ-साफ निकल जाएगा। जिनके खिलाफ़ जाँच होनी है वे किसी न किसी संरक्षण में हैं। सांसद के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल को सीधे नहीं की जा सकती। लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति की इज़ाजत चाहिए। उसी तरह मंत्री की जाँच के लिए प्रधानमंत्री की इज़ाजत चाहिए। जिस लोकपाल विधेयक को मनमोहन सिंह सरकार ला रही है, उसमें जब सांसद और मंत्री की जाँच भी कठिन होगी, तो प्रधानमत्री के ख़िलाफ जाँच करीब-करीब असम्भव ही होगी।’’
 
कहना न होगा कि मौजूदा केन्द्र सरकार में समझदार कम तीतर-बटेर ज्यादा हैं जो अपने पार्टीगत-मूल्य तथा आन्दोलनों की परम्परा से कट चुके हैं। जेपी की सम्पूर्ण क्रान्ति के बाद इसी वर्ष अगस्त में हुए अण्णा आन्दोलन जिसे अपनी प्रकृति और प्रभाव में अभूतपूर्व माना जा रहा है; से निपटने की खातिर कांग्रेस सरकार ने जो भी दाँव चले, सब के सब उल्टे पड़ गए। इस घटना की सविस्तार पड़ताल करते हुए रामबहादुर राय ‘अन्ना की आँधी के मायने’ शीर्षक से महत्त्वपूर्ण कवर स्टोरी’ लिखते हैं-‘‘आन्दोलन छोटा हो या बड़ा उसे जनजीवन से जोड़ कर ही देखा और समझा जाता है। वह कोई अलग-थलग घटना नहीं होती। जो घटित होता है उसमें कार्य-कारण का सम्मिश्रण होता है, और उसकी अखण्डता होती है। इसके बगैर कोई आन्दोलन सजीव, प्राणवान और प्रवाहमान हो ही नहीं सकता। जनजीवन अखण्ड बना रहना चाहता है। स्वस्थ समाज में उनकी अखण्डता अक्षुण्ण रहती है। उसकी व्यवस्था चरमराने पर या तो उदासी आती है या विद्रोह का भाव। विद्रोह का विचार ही आन्दोलन में फलित होता है। अन्ना आन्दोलन को देखने का एक नज़रिया यह भी हो सकता है।’’
 
रामबहादुर राय एक वरिष्ठ पत्रकार की हैसियत से किसी मुद्दे का विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत करके ही अपने कर्तव्यों का इति श्री नहीं समझ लेते हैं। वे सामाजिक मुद्दे को विचारधारात्मक आधार भी प्रदान करते हैं। वे उन प्रश्नों के जवाब खुद ही ढूढंना चाहते हैं जिससे आज हर एक भारतीय त्रस्त, भयभीत और विकल है। वे बीते आन्दोलन की दिशा और अभी तक तय की गई दूरी का मूल्यांकन करते हुए जो सवाल खड़े करते हैं, वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है-‘‘इस आन्दोलन का मूल प्रश्न नया है और वह यह है कि क्या इससे स्वस्थ राजनीति निकलेगी? इससे ही जुड़ा हुआ है कि स्वस्थ राजनीति क्या है? सीधी-सी बात है कि जो सिर्फ सत्ता की राजनीति न हो और जन-राजनीति उसमें हो वही स्वस्थ राजनीति है। यह सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अन्ना हजारे का आन्दोलन एक अराजनीतिक समूह के हाथ में है। यह आन्दोलन सघन और व्यापक है। इससे स्वस्थ राजनीति पैदा हो सकती है। अगर इसके लिए सही तरीके से प्रयास किए जाएँ।...सत्ता की राजनीति शोषण पर टिकी होती है। शोषण का ही सम्बन्ध भ्रष्टाचार से होता है। जिस मात्रा में भ्रष्टाचार कम होगा उसी मात्रा में सेवा की भावना प्रबल होगी। जिस दिन राजनीति सत्ता की पटरी से सेवा पर आएगी उसी दिन स्वस्थ राजनीति शुरू होगी। तब समाज खुद में होने से तृप्त होगा। उसे शासन और सत्ता पर हर क्षण के लिए निर्भर नहीं रहना होगा। क्या इस आन्दोलन के अगले चरण में यह संभव है?’’
 
निःसंदेह, आज इस ‘संभव’ शब्द की अर्थपूर्ण सम्भावना तलाशने की जिम्मेदारी हम सबों पर है। हमें वे नियामक स्वयं तय करने होंगे जो रायबहादुर की चिन्तनदृष्टि और चेतस चिन्ता के केन्द्र में है। सार्थक पहलकदमी के नए मानक, बिम्ब और प्रतीक गढ़ने की दिशा में प्रयास भी हमें खुद ही करना होगा। फ़िलहाल उस ‘बहादुर कलम’ को सलाम जो हाशिए का हरफ़ लिखने में उस्ताद है। लोककवि नागार्जुन की भाषा में-रामबहादुर राय आमआदमी के प्रति प्रतिबद्ध हैं; सम्बद्ध हैं; आबद्ध हैं।  

Thursday, May 1, 2014

इन मनबढ़ कुःसंगियों पर काशी चुप क्यों?


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काशी की सात्त्विक पक्षधरता सुविख्यात है। छुटभैए ठग से बचने की सलाहियत है; लेकिन कुमार्गी और कुःसंगियों की खेप/फौज यहाँ मौजूद नहीं है। परम्परा और तहज़ीब की धनी इस सांस्कृतिक नगरी में सभी को बराबर जगह मिलते हैं। मैंने सुना ही नहीं, जिया भी है। पूरे सात वर्ष। अकादमिक पढ़ाई का लिहाफ़ ले कर इस घड़ी मैं काशी में ही हूँ। मैंने नजदीक से देखा है-बुद्धिबाज अड़ीबाजों को, मौखिक संभाषण और तमतमाये मुख-मुद्रा के साथ बमकते-बरसते भाषाई प्रोफेसरानों को। इनमें से कुछ तो बेजोड़ नरेटीबाज हैं। खैर! यह अद्भुत नगरी इस मायने में भी दिलचस्प है कि यहाँ मुक्ति का बाट जोहने से लेकर आपकी बटुआ की सुरक्षा करने वाले लोग भी मिल जायेंगे। लेकिन यह शहर अपने व्यक्तित्व-व्यहार में अभद्र और उत्पाती हरगिज़ नहीं है। भाषा में भदेस होना सिर्फ यहीं की नहीं पूरे उत्तर प्रदेश
की ठेठ पहचान है। बनारसी होने का ठाठ गलगौज में पसरा-फैला दिखता है; लेकिन काशीवासियों की नियत खोटी और मन अपवित्र नहीं है। घाटों की रौनक के बरक़्स शहर का मिज़ाज तेजी से बदल रहा है; लेकिन यह रफ़्तार बनारसीपन के लौह चदरे को पिघला सकने की कुव्वत नहीं रखती है। इस बारे में मेरा अब तक का हासिल निष्कर्ष यही है।

चुनावी सरगर्मी के मध्य नंगेपन का नज़राना पेश करना इस नगरी के शान के सर्वथा खि़लाफ है। फिर ऐसा क्या हुआ इस बार? काशी की मर्यादा की धुरी चुक रही है। लगातार शर्मसार हो रहे हैं काशीजन। ख़बरों में उत्पातियों, मनबढ़ों, असामाजिको, अराजनीतिकों इत्यादियों की आमद थोकभाव है। क्या प्रचारवादी राजनीति की अकूत ताकत ने बनारसी चेतना का सत्यानाश कर दिया है? क्या यहाँ अब सद्भावना और सद्व्यवहार जैसी सहकार-भाव शेष नहीं बची है। क्या अबकी बार चुनावी समर में यह भी नष्ट कर दिया है हम ने? अगर हाँ, तो डरो ‘मुक्तिबोध’; क्योंकि अब अच्छे दिन नहीं आने वाले हैं। शास्त्र का ज्ञान रखने वाले महापंडितों को ज्ञात होगा कि यह ‘वीर रस’ नहीं है। आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को आलम्बन बनाकर जिस फूहड़ता, अश्लीलता और अमर्यादित आचरण को हम पूरी दुनिया के सामने प्रकट कर रहे हैं; इस बारे में काशी की चुप्पी बेहद ख़तरनाक है। कथित रूप से भाजपाईयों को जिस तरह ये व्यवहार शर्मसार कर रहे हैं उस पर और किसी को बाद में नरेन्द्र मोदी को सबसे पहले नकेल कसनी चाहिए। शास्त्रीय ज्ञान की सैद्धान्तीकी में भी इस बात की निंदा की गई है। भाषाविद् रामदहिन मिश्र ने विरोधी दल की छेड़खानी, कटुतापूर्ण व्यवहार, अधिक्षेप, अपमान, अपकार, कठोर भाषण, शस्त्र उठाना, गंजन, तर्जन, विरोधियों को ललकारना आदि को निकृष्टतम आचरण माना है। आधुनिक मनोविज्ञानियों ने इसे दमित/कुंठित अवचेतन का निकास कहा है। संविधान में भी आम चुनाव के अन्तर्गत किये जाने वाले इस तरह के व्यवहारों की पर्याप्त आलोचना है।

अतः मेरा इस सन्दर्भ में यही गुज़ारिश है कि आप अपने कृत्य को देखें और स्वयं उसकी आत्मालोचना करे। अपनी सेहत की न सही बल्कि समाज की तबीयत का तो कुछ ख्याल रखिए। इस समय काशी पूरे दुनिया की निगाहबानी में हैं। तमाम देशों के चुनाव-विश्लेषक, मीडियाकर्मी, समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इत्यादि काशी की विशेषता और इसके वैशिष्टय को अपनी-अपनी दृष्टि से खंगाल रहे हैं। ऐसे में हमें यह भली-भाँति विचारना चाहिए कि हम अपने इन नकारात्मक प्रवृत्तियों के माध्यम से पूरी दुनिया को आखिर क्या जतालाना चाहते हैं? क्या इससे किसी पार्टी के राजनीतिक लक्ष्यार्थ की उद्देश्य-पूर्ति हो जाती है? क्या इससे हमारी गरिमा और गर्वबोध में इज़ाफा होता है। क्या हम अपने देश में विद्यमान लोकतंत्र का यही स्वर अपनों के संग-साथ बाहरियों को सुनाना चाहते हैं? अगर नहीं, तो फिर ऐसी घटनाक्रमों में लगातार बढ़ोतरी क्यों हो रही है? क्या यह मोदी के सत्ता में आने का पूर्व-संकेत है जो थामे नहीं थम रही है। या कि यह किसी पार्टी-विशेष के द्वारा सुनियोजित ढंग से ख़ालिस चर्चा में बने रहने की कवायद मात्र है? दोनों ही सरासर ग़लत है। अतएव, इसकी कड़ी भत्र्सना और आलोचना ही एकमात्र उपाय है।

गोकि काशी में सबका समादर होता है। निरादर और निरपराध को दंड देना यहाँ की संस्कृति नहीं है। यह काशी ही है जहाँ राज्य और राष्ट्र के ही नहीं पूरे विश्व के नाथ विश्वनाथ का रहवास है। यह शहर मोम का नहीं है, ‘अप्पो दीपो भवः’ का है। यह शहर लुकाठी लेकर बाज़ार में खड़े कबीर का है। यह शहर मंदिरों के घंट-घड़ियाल और घाट का जितना है उतना ही भारत माता मन्दिर का। यहाँ लोग हर सम्प्रदाय के हैं; लेकिन सम्प्रदायिक कोई नहीं है। नई पीढ़ी विशेषतया युवा पीढ़ी को यह मान-सम्मान बरकरार रखनी चाहिए। भाषा के धनी इस शहर को कवि दुष्यंत की यह पंक्ति व्यवहार में दुहरानी चाहिए-‘मेरे सीने में न सही, उसके सीने में सही; हो गई है पीर पर्वत सी बस पिघलनी चाहिए।’। वर्तमान चुनावी माहौल में यदि प्रतिपक्षी की ताकत और तादाद लगातार बढ़ रही है, तो उस से डटकर मुकाबला करना चाहिए। क्योंकि ऐसी घिनौनी कवायद से हम काशी की परम्परा, संस्कृति और विरासत को धूल-धूसरित ही करेंगे। विप्रजन/भद्रजन आप चुप क्यों हो?

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...