Friday, October 21, 2016

दो शब्द: बीएचयू के उन हिंदी प्रोफेसरों के नाम जिन्होंने सिर्फ अपना हित देखा


नवागत प्रोफेसरर्स,
हिंदी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। 

आपकी पदोन्नति हुई और अब आप बढ़ी हुई तनख्वाह पाएंगे; बधाई! आप इसी के लिए तमाम करम करते हैं, आगा-पीछा निर्णय लेते हैं, सचाई टालते हैं, हकीकत से मुँह चुराते हैं; ताकि आपका अपना हित सध सके, आप अपनी स्वार्थ की पूर्ति कर सके। लेकिन हमारा दोष क्या रहा है। हमने भी तो कभी आपके खिलाफ़ कभी कोई असम्मानसूचक शब्द प्रयोग नहीं किया। हाँ, आपके फैसले का चुपचाप इंतजार करते रहे। आप सांत्वना देते नहीं थकते कि आप सबका साक्षात्कार अगले कुछ दिनों में हो जाना है। व्यक्तिगत तौर पर आपसबों ने मुझे कहा, तुम अच्छे विद्यार्थी हो और संयोगन अच्छ मेरिट के साथ दावेदार भी। ओह! मंच के पुरस्कर्ता, सेमिनारों के तालियों के आस्वादक, विद्याार्थियों के जेहन में भाव-संवेदना के कलात्मक आख्यान प्रस्तुत करने वाले स्नेही प्राध्यापक; आप सब इतने बहुरुपिया बनकर कब तक जिंदा रहेंगे और हम कब तक अपने हक-हकूक से बाहर। क्योंकर आपसब हम और हमारे जैसे जरूरतमंद योग्य लोगों के पक्ष में नहीं बोलते, उनके साथ खड़े नहीं होते। आपके चेहरे तमाम मुस्कुराहटों के बावजूद रक्तरंजित है। आप हम-सबके परोक्ष कत्लेआम के कारण हैं, अंतहीन पीड़ा के सर्जक हैं।

आपको हम कतई माफ नहीं कर सकते, आपके ढोंग और पाखंड को कभी स्वीकार नहीं कर सकते। आपकी सहानुभूति आपको मुबारक। पर याद रहे, आप सबने हमारा भविष्य खा लिया है, यह पचेगी कभी नहीं।

राजीव


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राजीव रंजन प्रसाद

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संचार के साथ भाषा का नाभिनाल रिश्ता है। वर्तमान समय में भाषा संचार के साथ सहोदर भूमिका में दिखाई दे रही है। भाषिक व्यवस्था (लांग) एवं भाषिक व्यवहार (पैरोल) की दृष्टि से देखें, तो इन्होंने इस उत्तर शती में अपेक्षित से कहीं अधिक अप्रत्याशित बदलाव को सिरजा है। साथ ही, तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी आधारित वैज्ञानिकता ने नई संवृत्तियों (फिनोमिना) को जन्म दिया है। यह अन्तर सिर्फ सरफेसतक नहीं सीमित है, अपितु कोर स्ट्रक्चरतक इसका असर देखा जा सकता है। आधुनिक समय में तर्क एवं विवेक आधारित चिन्तन-दृष्टि का बाहुल्य है जिसने अधिरचना और मनोरचना दोनों को प्रभावित किया है। इसकी सबसे अच्छी परिणति है-लोकतंत्र यानी डेमोक्रेसी। लोकतंत्र की आधारभूमि है-समानता, स्वतन्त्रता एवं विश्वबंधुत्व। सचाई है कि भारतीय धरातल पर आरंभ से ही इनका मुखर वाचन होता रहा है, लेकिन यह प्राप्य सबको नहीं था। कहना न होगा कि आधुनिक लोकतंत्र की संकल्पना ने भारतीय जनसमाज का नक़्शा बदलकर रख दिया है। संविधान की लिखित प्रामाणिकता ने सम्पूर्ण आर्यावत को आजादी के पूरेपन से रंग दिया है। समानाधिकार की इस संघर्षपूर्ण स्थिति को साधने में भारतीय स्वाधीनता संग्राम से जुड़े, जुझे, लड़े और खेत हुए राजनीतिक महापुरुषों के अतिरिक्त इस सहस्त्राब्दी में आईसीटी’, ‘डीएसटी’, ‘कन्वर्जेंस’, ‘मार्केट’, ‘कम्युनिकेशनएवं लैंग्वेज हेजमनीकी बदलती स्थितियाँ निर्णायक रही हैं। परिवर्तित पारिस्थितिकीय-तंत्र ने साबित किया है कि आधुनिक समय कुशल दक्षता एवं प्रवीणता का हैै; सूचनाओं के अपरिमित प्रयोग, प्रभाव और प्रविधि का है। अस्तु, ब्राह्मणवाद, क्षत्रीयवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, सत्तावाद, सामंतवाद आदि धारणाएँ अब विलुप्त हो रही हैं। जातिसूचक नामों के आतंक, दबदबा तथा रौब-दाब ख़त्म हो रहे हैं और जो लोग इसे अब भी छाती से चिपकाए बैठे हैं; उनकी स्थिति अंधविश्वासी से इतर कुछ नहीं है। अतः जिनके पास शक्ति-सामथ्र्यअथवा सूचना सत्ताहै, वास्तविक अर्थों में वही असली सामंत, पुरोधा, पराक्रमी, विजेता, महापुरुष, देवी, चंडी, दुर्गा, पार्वती आदि हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा, नाम एवं यश की दृष्टि से वही अब पूज्य, अराध्य और स्तुत्य है। यह सत्ता का सर्वहाराकरण है जिसमें भारतीय जनसमाज का हर स्त्री-पुरुष बिना किसी भेदभाव के समान, स्वतन्त्र और सच्चा मनुष्य कहलाने योग्य है। इस बदलाव के नकारात्मक प्रकोप भी बेशुमार हैं जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

उपर्युक्त समस्त अभिदृष्टियाँ प्रत्यक्ष लोकतंत्र के प्रमाण हैं। यहाँ प्रत्यक्ष लोकतंत्र कहने का आशय डायरेक्ट डेमोक्रेसीसे है। ‘‘प्रत्यक्ष लोकतंत्र की अवधारणा में जनता की सीधी और ज्यादा से ज्यादा भागीदारी का पहलू प्रधान है। इसकी प्रेरणा एथेंस और यूनान की प्राचीन राज्य-प्रणालियों से ली जाती है। अल्पजीवी पेरिस कम्यून भी एक ऐसा ही उदाहरण था। भारतीय सन्दर्भं में पंचायत आधारित ग्राम-स्वराज के प्राचीन रूपों को भी प्रत्यक्ष लोकतंत्र के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है।’’  अतएव, संचार आधारित भाषा ने अपना शब्दार्थ बदल डाला है; सामाजिक विधि-विधान के रहवास और ठिकानों में जरूरी फेरफार संभव किया है। वस्तुतः अभिव्यक्ति आधारित अभिव्यंजना का पुरातन समीकरण बदल चुका है। अब शब्द सबके हैं इसलिए अर्थ पर सबका समान अधिकार कायम है। इस प्रकार की प्रतिरोध के स्वर इस 21वीं सदी में बुलंद हो चले हैं, तो इसमें नवीन संचार साधन एवं माध्यम आधारित भाषा का योगदान प्रमुख है। परिणामस्वरूप हाशिए पर ढकेली गई प्रतिभाएँ अब केन्द्र की चूलें कस रही हैं, लोकतंत्र की बाँह पकड़ उन्हें जाग्रत कर रही हैं। देश, काल एवं परिवेश से जुड़ी-बँधी आधुनिकता जनमत को सींच रही है; उनके पल्लवन हेतु सामासिक संस्कृति की अधुनातन चेतना को सामान्य मन-मस्तिष्क में रोप रही है। आधुनिक ज्ञान-मीमांसा आधारित संकल्पनाएँ ज्ञानोदय का सर्वसमावेशी तथा सार्वभौमिक मंच तैयार करने में जुटी हैं। लोकवृत (पब्लिक स्फियर) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। समाजविज्ञानियों के अनुसार, ‘‘समाजशास्त्र में नागरिक समाज के एक ऐसे दायरे की चर्चा भी है जिसमें संस्कृति और समुदाय की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ अन्योन्यक्रिया करती हैं। साथ ही, सार्वजनिक दायरे की गतिविधियाँ किसी मुद्दे पर आम राय बनाने और उसके जरिए राज्य-तंत्र को प्रभावित करने की भूमिका निभाती हैं। सार्वजनिक दायरा सबके लिए खुला रहता है जिसमें अपने विमर्श के जरिए कोई भी हस्तक्षेप कर सकता है। फ्रैंकफुर्त स्कूल के विख्यात विचारक युरगन हैबरमास ने इस धारणा का प्रतिपादन किया था’’ -जिसका भारत की हिन्दीपट्टी तक दृढ़ विस्तार हुआ है। इस बाबत फ्रांचिस्का आॅरसेनी लिखित पुस्तक हिन्दी का लोकवृत्तद्रष्टव्य है। 

बदलाव के इन मूलभूत कारकों और सूचकांकों को पढ़ा जाना आवयक है; इनकी यथोचित एवं गंभीर पड़ताल जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है कि हमारी समझ और सूचना आधारित बोध पश्चिम की ओर मुख कर चकित एवं किंकर्तव्यविमूढ़ भाव से खड़ी दिखाई देती है जबकि भारतीय जनसमाज में लोकवृत्त जैसी खदबदाहट और परिपाटी काफी पहले ही शुरू हो गई थी। साहित्य का भक्तिकाल आधुनिकता की पूर्वपीठिका इन्हीं अर्थों में है। प्रचलित पांडित्य को चुनौती देने का काम सर्वप्रथम तुलसी-साहित्य ने किया। उसने संस्कृत की दैवीय सत्ताको नकारा और देशज भाषा-बोली में साहित्य-रचना कर लोकप्रियता के नए संस्करण आरंभ किए। इसी तरह कबीर-युग ने लोकमानस को न सिर्फ गहरे प्रभावित किया, चिन्तन-दृष्टि को आस्था के बरअक्स ज्ञान, विवेक और तर्क से चुनौती देने की हरसंभव चेष्टा की। चर्चित लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल की अकथ कहानी प्रेम कीमें दृश्य देशज आधुनिकता इसीलिए अत्यधिक पठनीय, विचारणीय एवं प्रासंगिक है। दरअसल, भक्ति-युग ने आरंभ से ही भारतीयता को नए अर्थ-सन्दर्भ, रूप-आकार, स्थापत्य-संस्कृति, कला-साहित्य आदि दृष्टियों से संवाद-विमर्श हेतु आमंत्रित किया है। उसने संचार की नई वैचारिकी खोजे जिसमें रसास्वदन का एकरेखीय प्रारूप नहीं दिखाई देता है। उसमें जो गौरतलब पहलू है वह है-मानवीय सत्ता एवं भूगोल की वास्तविकता में खोज। इसीलिए कबीर के यहाँ उपदेशक-शैली नहीं है, अपितु उनके कहन में जनचेतना का हुंकार है। समसामयिक गतिरोध के प्रति सीधा और आक्रामक प्रतिरोध है। वहाँ कहा गया सबकुछ प्रत्यक्ष, प्रामाणिक और सत्तावान है; आँखन की देखी है। 

नवजागरण का स्थूल-सूक्ष्म सन्दर्भ लें तो ‘‘अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप (मुख्यतः फ्रांस) में चले वैचारिक आन्दोलन को ज्ञानोदय (एनलाइटमेंट) के नाम से जाना जाता है। इस आन्दोलन ने जिन प्रवृत्तियों को जन्म दिया उन्हें हम आधुनिकता या आधुनिकतावाद के नाम से जानते हैं। समता और न्याय की धारणाओं के प्रचलन का श्रेय भी इसी आन्दोलन को दिया जाता है। मोटे तौर पर इसे अंधविश्वास पर विज्ञान की और आस्था पर विवेक की विजय के नाम से जाना जाता है। ज्ञानोदय के विचारक मानते थे कि तर्कबुद्धि के जरिए सामाजिक, बौद्धिक और वैज्ञानिक समस्याओं का हल किया जा सकता है। वे परम्परा और संस्थागत धर्म के प्रतिगामीप्रभाव की कठोर आलोचना करते थे।...उन्नीसवीं सदी के राजनीतिक-सामाजिक प्रयोगों ने ज्ञानोदय के वैचारिक वर्चस्व को मजबूत किया और धीरे-धीरे ज्ञान का एक नया सिद्धान्त प्रकाश में आया। इतिहास का महत्त्व, प्रगति और विकास की अपरिहार्यता, सेकुलरवाद और राष्ट्रवाद का विचार भी इसी ज्ञानमीमांसा की देन है। आधुनिक राजनीति की समस्त वैचारिक और व्यावहारिक गोलबंदी इन्हीं धारणाओं के आस-पास हुई है। विचार के क्षेत्र में फ्रेंकफुर्त स्कूल के चिंतकों ने ज्ञानोदय के अंतर्निहित द्वंद्व को सामने ला कर आधुनिकता की आलोचना के द्वार खोले। भारत में इससे पहले ही गाँधी ने हिंद स्वराज लिख कर एशिया की तरफ से आधुनिकता की आलोचना की शुरुआत कर दी थी। पिछले तीन दशकों से छोटी पहचानों की बगावत’, ‘समुदाय की वापसीऔर बहुसंस्कृतिवादकी परिघटनाओं ने ज्ञानोदय के वर्चस्व को कड़ी चुनौती दी है। जैसे-स्त्रीयता से सम्बन्धित विमर्श, अश्वेत, दलित, पर्यावरणवादी और अन्य विद्रोही विमर्श।’’  

ध्यातव्य है कि इन सबके केन्द्र में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष ढंग से संचार और भाषा के अंतःसम्बन्ध शामिल हैं जिन्होंने पिछले समय-काल में जरूरी विमर्श खड़े किए है, जनमूल्य आधारित जनान्दोलन को जन्म दिया है; लोक-संवृत्ति के दायरे में एक समांतर किन्तु अधिक प्रभावशाली वैचारिक-संस्कृति को खड़ा किया है। परिणामस्वरूप विवेकी जन जाति से ब्राह्मण होने मात्र के कारण किसी का पाँव पूजने जैसे पाखंड को खारिज़ कर रहे हैं। ज़मीन-जायदाद अथवा इफ़रात दौलत होने मात्र की वजह से किसी को अपना नेता मान लेने को अब अधिसंख्य भारतीय तैयार नहीं हैं। इसी तरह विदेशी सरज़मी पर शिक्षा ग्रहण कर स्वदेश लौटे राजनीतिक बेटे-बेटियों को वह आँख मँूदकर चुनाव जिताने के पक्षधर नहीं हैं। लोकतंत्र आधारित संसदीय राजनीति में अब तक निर्बाध जारी रहे कुप्रथाओं, कुरीतियों, कुप्रचारों, कुविचारों, कुतर्कों आदि को विशेषकर युवा भारत’ (यंग इंडिया) ने नकार दिया है। देश की युवा-आबादी अपने हक़-हकूक पर दूसरे की दखल और पाबंदी को परे धकेल स्वयं इस दिशा में आगे बढ़ रही है। लिहाजतन, कुल, घराना, वंश, खानदान आदि चोचलों और रिवाजों को इस उत्तर शती में भारी चुनौती मिल रही है। समानता, स्वतन्त्रता और न्याय की पाठ पढ़ी यह नई पीढ़ी है जो गरीबी, लाचारी, बेबसी, अभाव आदि में घुट-घुटकर जीने और कुछ न कहने की पुरानवादियों के संस्कार को तोड़ रही है। नई पीढ़ी अधीर और जल्दबाज नहीं है। वह अमीरी में पले-बढ़े लाडलों की तरह अति-महत्त्वाकांक्षी भी नहीं है। वह सच के लिए सचमुच लड़ने-भिड़ने का मादा रखने वाली पीढ़ी है। वह योग्य और काबिल है, इसलिए वह हाशिए पर रहने को तैयार नहीं है। वस्तुतः यह युवा पीढ़ी उत्तर आधुनिक तरीके से अपनी मानसिकता, जागरूकता, हस्तक्षेप, विरोध, एकजुटता आदि को प्रदर्शित करना चाहती है। वह यह बात भली-भाँति जान चुकी है कि राष्ट्र के समक्ष असली समस्या राजनीतिक दलों में छाए वीआईपीवादहै जिसके कारण चहुँओर भ्रष्टाचार पसरा हुआ है। व्यक्ति-विशेष के पहल, प्रभाव और परिचय के कारण राजनीति पाखण्ड एवं प्रपंच का अखाड़ा बन गया है। 

स्पष्टतया संचार और भाषा से जुड़ी नव-आर्थिक अंतःसम्बन्ध इन सबके मूल में है जिसने सत्ता का संस्कृतिकरण कर दिया है जो अब तक सामंती-शक्तिशाली जातियों द्वारा अपह्नत मानी गई थी। सर्वविदित है कि अभी तक स्वयं को ब्रह्मतुल्य मानने वाले आत्ममुग्ध लोगों एवं उनकी जातियों (सबलोग नहीं तब भी बहुत सब) ने देश का सर्वाधिक बेड़ागरक किया है। वे सामान्यीकरण और सर्वहाराकरण का उवाच करती रही हैं, लेकिन खुद पाँव से सर तक पाप, पापाचार, भ्रष्टाचार, अनैतिक कार्य, मूल्यहीन बर्ताव आदि में आकंठ डूबी हैं; क्योंकि लूट के संसाधनों पर उनका ही कब्जा है, भाई-भतीजावाद इनके लिए खुल्लमखुला छूट है। भारत आजादी के इतने वर्षों के बाद भी पिछड़ा हुआ है क्योंकि पिछड़ी मानसिकता और ओछी किस्म की राजनीति करने वाले लोग राजनीतिक पदसोपान में सबसे ऊपर है। देश में अकादमिक गतिविधियाँ इसलिए स्तरहीन हैं क्योंकि जो प्राध्यापक-जन हैं वे अपनी मूल-प्रकृति में जातिवादी, वंशवादी और वर्चस्ववादी मानसिकता से नधाए हुए हैं। वे अपनी जवाबदेही से तौबा करते हैं जबकि अपने मातहत पर इसका  सारा बोझ लाद-थोप देते हैं। यदि इस हस्तांतरण में अगला व्यक्ति जाति-धर्म-गोत्र से समानधर्मा हुआ, तो इसका जिम्मा किसी और की ओर बढ़ा दिया जाता है। इस कारण आज विश्वविद्यालयों में जिनका सर्वाधिक जोर-बल-दाब चलता है, वह दलित, पिछड़ा, स्त्री अथवा सामान्य आर्थिक हैसियत का हरगिज़ नहीं हैं। लेकिन अब समय पलटा है। अब उनकी अयोग्यता को वे काबिल लोग सीधी चुनौती देने लगे हैं, जो केन्द्र से बाहर थे, हाशिए पर थे या कि बाहैसियत अनुपस्थित थे। परिवर्तन के इस ज्वार से ऐसी हड़कम्प मची है कि आरक्षण को भला-बुरा कहने वालों की फौज बढ़ती जा रही है। आरक्षण जिसको लेकर इतना वितंडावाद खड़ा किया जाता है, को प्रश्नांकित करने का षड़यंत्र पूरे देशभर में जारी है। आजकल सरकारी नौकरियों विशेषकर क्लास वनकी नौकरियों में नियुक्तियाँ धांधलीपूर्वक की जाता है। इस क्षेत्र में महारती और घोर जातिवादी लोग आरक्षण पर अपना बल कूटने के लिए अधिकतम योग्य को बाहर का रास्ता दिखाते हैं, वहीं न्यूनतम योग्य को नौकरी दे उसे अपना आजीवन कृपापात्र बने रहने पर मजबूर करते हैं। निःसंदेह यह सांकेतिक भाषा में किया जाने वाला वह खिलवाड़ है जिसके प्रतीकों, संकेतार्थों, अभिव्यंजनाओं को पढ़ने-जानने के लिए भाषा और संचार के नए विधान खोजने होंगे; मनोभाषिकी में घुसे बहु-तमाशी अभिनयों (आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्त्विक) को जाँचना-परखना होगा। यह महती जिम्मेदारी हमारी है,
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Wednesday, October 19, 2016

नेताओं से छीनी जाएगी ‘वीआईपी स्टेटस’: नरेन्द्र मोदी



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  • प्रधानमंत्री ने बनाया राजनीतिक सुधार का जबर्दस्त ‘सुपर प्लान’
  • उन्होंने सभी राजनीतिक नेताओं से अपनी आत्मा की आवाज एक बार अवश्य सुनने को कहा।
  • अब ‘स्मार्ट सिटी की तरह स्मार्ट परसन ही होंगे राजनीतिक नेता।
  • ज़मीनी काम से बनेगा स्कोर कार्ड जिसका मूल्यांकन प्रशासनिक अधिकारी नहीं जनता करेगी।
  • सलाना 80 प्रतिशत जनता का कार्य-समर्थन जुटाना होगा राजनीतिक नेताओं को।
  • नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहले वीआपी कल्चर ख़त्म करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा, अगर ऐसा न कर सका तो जनता उन्हें माफ नहीं करेगी। 
  • सिर्फ नेमप्लेट होगा, गाड़ियों पर; लाल एवं नीली बत्ती तत्काल प्रभाव से हटेंगे। 
  • सार्वजनिक सड़क पर गाड़ियों का काफिला ले नहीं चल पाएंगे अब भारतीय नेता।
  • करोड़पति नेताओं को अपनी 60 प्रतिशत चल-अचल सम्पत्ति सरकारी खजाने के हवाले करने होंगे जिसे सेना की सुरक्षा हेतु इस्तेमाल किया जाएगा। 
  • अब टेलीविजन स्क्रीन पर राजनीतिक बयान देते नहीं दिखाई देंगे निर्वाचित नेता, सारा कमान राजनीतिक प्रवक्ताओं को सौंपी जाएगी।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में ‘वीआपी कल्चर’ के खि़लाफ लोगों को एकजुट होने की बात कही है। वे इस बारे में आगामी ‘मन की बात’ में अपना विचार प्रकट कर सकते हैं। प्रधानमंत्री जिस ज़मीनी बदलाव की ओर कदम बढ़ा रहे हैं वह पूरे देश का सम्पूर्ण सपना है। सरदार पटेल का दृष्टिकाण है। पंडित दीनदयाल की सोच का सच होना है। जनता इस सपने को कब साकार होते देख पाएगी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फिर भी नरेन्द्र मोदी ने पार्टी हित और राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर कुछ अलग करने का ठाना है जो वाकई स्वागतयोग्य है।

प्रधानमंत्री ने दो-टूक लहजे में कहा है कि अब वीआईपी गाड़ियों पर नेमप्लेट के सिवा कोई चिह्न नहीं होंगे। लाल बत्ती और नीली बत्ती के चलन को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। उनका मत है कि नेताओं पर सरकारी खर्च की जगह सेना पर खर्च किया जाना राष्ट्रीयता की रक्षा और राष्ट्रीय सम्मान का सूचक है। वह अपने कैबिनेट मंत्रियों तक को इस सम्बन्ध में कोई छूट देने के मूड में नहीं है। नेताओं के संसदीय दौरे पर गाड़ियों का काफ़िला दिखने पर स्थानीय पुलिस एफआईआर दर्ज कर सकती है अथवा जाँच कमिटी बिठा सकती है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि आजकल नेताओं के कद इतने बढ़ गए हैं कि वह जनता की अहमियत को भूल रहे हैं जिन्होंने उन्हें सत्ता सौंपी है। अधिसंख्य नेता बड़े बंगले में रहने का इस कदर आदी हो गए हैं कि उनहा ज़मीनी सरोकार न के बराबर है। जनता से संवाद न होने के कारण उनके पास जुटाए गए प्रायोजित आँकड़े, इंटरनेट से बटोरे गए रिपोर्ट और ऐसे ही शार्टकट दस्तावेज तो खूब होते हैं; लेकिन अपने निर्वाचित क्षेत्र के बारे में वास्तविक जानकारी कुछ भी नहीं।

प्रधानमंत्री मोदी ने नेताओं को उनके जरूरी जवाबदेही को अहसास करने को कहा और अपने वक्तव्य में यह भी जोड़ा कि हम करोड़पति नेताओं की लम्बी फौज लगातार खड़ी करते जा रहे है जो भारतीय लोकतंत्र के बारे में अच्छी धारणा बनाने से रोकता है। हम अपने संसद का विकसित ‘माॅडल’ जनता के समझ तभी रख सकते हैं जब संसद पहुँचने वाले नेता ‘इलिट क्लास’ का नहीं हो। हम अपने करोड़पति नेताओं का बायकाट नहीं करेंगे, लेकिन उन्हें अपनी सम्पत्ति का 60 प्रतिशत भाग सरकारी खजाने में जमा करने के लिए अवश्य राजी कर लेंगे।

प्रधानमंत्री की उपर्युक्त बातें आदर्श अधिक मालूम देती हैं और इसको लेकर नेताओं में सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देखने को मिल रही है। किन्तु भारत के ताकतवर अब तक के सबसे ‘डायनेमिक प्राइम-मिनिस्टर’ नरेन्द्र मोदी से यह उम्मीद अवश्य की जा सकती है; क्योंकि पूरा देश उनकी कथनी और करनी में समानता होने का कायल है। 

सैम्पल रिपोर्ट: राजीव रंजन प्रसाद
(व्यावहारिक हिंदी के विद्यार्थियों के लिए)

Monday, October 17, 2016

युवा उमरिया की पलछिन: आजादी के बाद

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राजीव रंजन प्रसाद के काॅपी नोट्स 
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स्वाधीन भारत का सप्तम दशकभूखी पीढ़ीऔरविद्रोही पीढ़ीसे शुरू हुआ था। ये नाम अत्यंत सार्थक साबित हुए। इसके बाद सच को सच कहने की ताकत आई। आत्मबल में इज़ाफा हुए। इस चेतना के उत्तरोत्तर प्रचार-प्रसार के कारण व्रिदोही तेवर, आक्रोश, गुस्सा, विरोध आदि ने जनज़्वार का रूप धारण कर लिया। लेकिन यह चेतस पीढ़ी भी कई अंतःविरोधों से घिरी हुई थी। डाॅ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय की दृष्टि में, ‘‘भारतीय युवामानस ने अन्याय के विरुद्ध आवाज़ ऊँची तो की, वह भभका, भड़का, गरजा, उछला भी लेकिन उनके व्यक्तित्व, व्यवहार और नेतृत्व में संतुलन(रैस्ट्रेज) का अभाव रहा।कुछ भी हो, उस पीढ़ी ने अपने समय की विसंगतियों को सिर्फ छुआ नहीं, बल्कि प्रहारात्मक मुद्रा में उन पर टूट पड़े। उन्होंने स्वाधीन भारत में आमूल परिवर्तन के लिए अपना वर्तमान दाँव पर लगा दिया। 

यह नई परिघटना थी। इस चेतस युवा की आगामी पीढ़ीयुवा तुर्कबनकर उभरी। इस युवजन का नेता जयप्रकाश नारायण थे। सम्पूर्ण क्रांति के उद्गाता। कांग्रेस की चूलें हिलीं, तो 1977 में कांग्रेस केन्द्र की सत्ता से बेदख़ल हो गई। जनता ने अपना निर्णय सुना दिया, इंदिरा हटीं नहीं, तो जनता ने निर्मम जनादेश सुनाते हुए उन्हें सत्ता से हटा दिया। यही वह समय था जब जनतंत्र में राजनीति चेतना से लैस कई युवा उभरे और जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुए। बाद में ऐसा देखने में आया कि साठ और सतक के दशक की युवा पीढ़ी में असंतोष, क्षोभ, हताशा, तनाव, कुंठा आदि से उपजे क्रोध और विरोध-भाव तो थे; लेकिन विचार और दिशा सम्बन्धी चिन्तन-प्रतिमा अधिसंख्य में नहीं थीं; लिहाजा उनका अंधा क्रोध अपने को सिर्फस्खलितकरने की विवश और अचेतन क्रिया मात्र बनकर रह गई। यह सही है कि व्यक्तित्व को सामाजिक लड़ाई में झोंक कर या उसका सहभागी बनाकर स्वयं को महत्त्चाकांक्षाओं से मुक्त किया जा सकता है, पर यह आसान कार्य नहीं है। दरअसल, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा की भूख बहुत प्रबल होती है। यह भूख नाम की, पद की, पैसे की या प्रदर्शन की हो सकती है। जब यह बुभृक्षा तृप्त नहीं होती तबआक्रोशउत्पन्न होता है जो अंतरस्थित आकांक्षा या बुभृक्षा के अनुपात में घटता-बढ़ता है। 

अतः यह मानना ही पड़ेगा कि अपनी जिस युगांतकारी और परिवर्तनकामी भूमिका से युवजन ने सन् 77 में भारतीय लोकतंत्र को नेहरू-इंदिरा कब्ज़ेदारी से छुड़ाया; वही पीढ़ी सत्ता के सम्मोहन, प्रभाव और विलासिता में इस तरह आकंठ डूबी कि विचार और विचारधारा के प्रश्न स्वयं कठघरे में खड़े हो गए। मनुष्य की मूलप्रवृत्ति में विद्यमान शील, स्वभाव, आचरण और चरित्र आदि में खोखलापन घर करता चला गया। फलस्वरूप, नब्बे के बाद जन्मी पीढ़ी हद निकम्मी साबित हुई। वर्तमान राजनीतिक अन्तर्धारा में वह अपनी राजनीति-सामाजिक चेतना एवं बोधवृत्ति को लेकर सजग नहीं है, तो उसकी चित्तवृत्ति में समाकलीनता से जुड़ाव सम्बन्धी प्रत्यय नदारद है। अतएव, आज की शब्दावली मेंयुवाहोना फ़रेबी होना है। फ़रेब का मायने स्पष्ट है। अर्थात् जो वास्तविकता है उसे स्वीकार करने से इनकार। यानी जो झूठ एवं ग़लत है उसके होने का दावा ठोंकना अथवा उनका ही अविचारित संगत करना मौजूदा पीढ़ी की भाषा मेंयुवाकहलाना है।

युवा शब्द का राजनीतिक अर्थ-सन्दर्भों में मायने-मतलब क्या बनता है यह देखना और भी दिलचस्प एवं महत्त्वपूर्ण है। दरअसल, भारतीय राजनीति में युवा मोर्चे पर हर किस्म के धत्कर्म की संलिप्तता है, खुली छूट है। तब भी देश में एक भी सही ढंग का प्रभावीयुवा नेतृत्वनहीं है। सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों के पाॅकेटमार ज़मात है। यह युवतम पीढ़ी अपने आकाओं से मिले रुपयों पर ऐश-मौज करने की महत्त्वाकांक्षा पालती है, भौतिक रंग-रंगिनियों में रचे-बसे होने का ख़्वाब देखती है। पहचान के इस संकट के बावजूद भारतीय राजनीति मेंयुवाशब्दावली की घुसपैठ सर्वाधिक है, प्रयोग बहुदलीय है। यह और बात है, शब्दावली का वर्चस्व लिपि के विकसित होने से पहले शुरू हुआ या वर्णाश्रम-व्यवस्था ईज़ाद किए जाने के बाद; यह कह पाना मुश्किल है। किन्तु यह कटु सचाई है कियुवाशब्दावली आज यदि भाषिक विधान में प्रयुक्त अथवा व्यवहृत है, तभी यह संभावना भी दृढ़ है कियुवराजशब्द को चलन में बनाए रखा जाए जो एकअलोकतांत्रिकशब्द है, अमर्यादित भाषा-प्रयोग है। वास्तव में, यह सामाजिक-सांस्कृतिक मानसिकता पर थोपी गई राजतांत्रिक पदछाप का उत्कृष्ट नमूना है जिसे गुलाम-भाषा के चाटुकारों ने राजनीतिक हित-लाभ के लिए रचा-बुना है। 

कहना होगा कि इन युवराज/युवराजियों का जलवा या ठसक भारत में आज भी पुराने राजवाड़ों और रियासत की तरह है। एक उदाहरण के तौर पर आज से एक दशक पूर्व चर्चा में आए उस घटना को लिया जा सकता है। उत्तर प्रदेश केयुवक कांग्रेसके अध्यक्ष नदीम असरफ जायसी ने यह कहकर प्रत्येक कार्यकर्ता से दस हजार रुपए माँगा कि जो 10,000 रुपए देगा वह प्रियंका के साथ डिनर करने के साथ फोटो खिंचावाएगा, जो 5,000 रुपए देगा वह केवल डिनर ही खाएगा। ऐसा ही सौदा अनुराग ठाकुर और अरविन्द केजरीवाल ने पिछले दिनों अपनी लोकप्रियता को भुनाने के मकसद से किया। दरअसल, यह प्रवृत्तियाँ गुलाम मनोवृत्तियों की अभिव्यक्ति है जिसका सम्बन्ध राजसत्तात्मक विचारधारा से है, आधुनिक लोकतंत्र से कदापि नहीं। विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि इस बारे में प्रतिरोधात्मक स्वर बुलन्द करना आसान नहीं रह गया है। आज हर राजतांत्रिक कायदा-कानून लोकतंत्र के पोशाक-परिधान में झक सफेद नज़र आता है, तो वहीं वंश-वंशावली के आधार पर राजनीतिक कब्जेदारी विश्वास एवं भरोसे का आधुनिक प्रतीकशास्त्र गढ़ चुके हैं। जबकि इस देश में युवा आबादी 55 करोड़ है। प्रश्न है, कथित युवराजों की तादाद ऊंगली पर गिनने योग्य क्यों है? और जोमीडियावी युवराजहैं उनकी इस सवा अरब आबादी के प्रति चिन्ताएँ कैसी हैं, चिन्तन क्या है? क्या शेष आबादी के लिए उपलब्ध आँकड़ों के ताजा सर्वेक्षण के आधार पर वोट देने की उम्र में दाख़िल हो जाना मात्र हीयुवासाबित होना है? यदि नहीं, तो भारतीय राजनीति में सामान्य युवजन की भूमिका, सहभागिता एवं नेतृत्व हाशियागत क्यों है? क्यों उन्हें सही एवं सार्थक प्रतिनिधित्व नहीं हासिल है? क्यों अबतक युवजन आबादी एक सर्वमान्य नेता, संगठन और नेतृत्व के रूप में नहीं उभर सका है अथवा जिसकी वैचारिक स्थापनाएँ या विचारधारा स्पष्ट एवं दृष्टिगोचर नहीं है? क्या वजह रही है कि भारतीय राजनीति के प्रति युवा उदासीनता में लगातार बढ़ोतरी हो रही है? क्यों कुछ गिने-चुने किस्म केअयोग्यएवंअपात्रकिस्म के युवा ही राजनीतिक कृपापात्र बनकर हमेशा संसद अथवा राज्य विधानमण्डलों में प्रवेश पा जाने में सफल हो जा रहे हैं? प्रश्न, यक्ष प्रश्न...लेकिन चारों तरफ मौन, सन्नाटा एवं गहन अंधकार का आलम है। 

इस चुप्पी को तोड़ने के लिए एक भारी-भरकम चोट चाहिए। एक जीवंत आन्दोलन। सम्पूर्ण क्रांति की तरह एक परिवर्तनकामी लोकतांत्रिक संग्राम। जेपी की तरह जीवट नेता चाहिए कि श्री अण्णा की तरह करिश्माई व्यक्तित्व। अतः यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि आज कीयुवाशब्दावली में बिना पुराने अर्थ-बोध को जगाए कोई नया कारनामा नहीं किया जा सकता है; विरोध, विद्रोह, प्रतिरोध, आन्दोलन अथवा क्रांति आदि तो इसके बाद के सहज-स्वाभाविक चरण हैं जिसके प्राणवान एवं बलवती होने के बाद ही ढर्रे की राजनीति में आमूल-चूल बदलाव संभव हो पाता है। इसके लिए पुरानी स्मृतियों को टटोला जाना चाहिए जिस पर धुंल के धुंध जमे पड़े हैं। जो हमारी आस्थागत लगाव एवं विश्वास में कमी के कारण बिसरते जा रहे हैं। यथाः  

1.
बलिया जनपद के नगवां गाँव में पैदा हुए मंगल पाण्डेय ने बैरकपुर छावनी में अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ विद्रोह कर संघर्ष का बिगुल फूँकते हुए 29 मार्च, 1857 को अंग्रेज अधिकारी एजूटेण्ट को गोली मार दी थी। उन्होंने 34वीं पैदल सेना के सिपाहियों का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत का बिगुल फूँका था। विद्रोही मंगल पाण्डेय को 8 अप्रैल, 1857 . को सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया।

2.
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।।

उपर्युक्त पंक्तियाँ याद दिला जाती है काकोरी ट्रेन डकैती को, जिसने अंग्रेज शासन को हिलाकर रख दिया था। लखनऊ से करीब 16 किलोमीटर दूर स्थित काकोरी। और रास्ते में ही पड़ता है काकोरी शहीद स्मारक। 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गाँधी ने बाजनगर गाँव के पास इस ऐतिहासिक स्थल पर शहीद स्मारक का शिलान्यास किया। आज इस स्मारक की दुर्दशा हम सबको शर्मसार कर देती है। शहीदों की याद में बने इस शहीद मंदिर के प्रांगण में तो पानी है प्रकाश की समुचित व्यवस्था। प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार इस स्थल पर यहाँ तक कि स्वतन्त्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस पर राष्ट्रध्वज तक नहीं फहराया जाता। 19 दिसम्बर को शहादत दिवस के नाम पर एक औपचारिक समारोह करके कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है और फिर इसे अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है।

3.
‘‘देश की बलिवेदी पर हमारे रक्त की आवश्यकता है। मृत्यु क्या है? जीवन की दूसरी दिशा के अलावा कुछ नहीं। इसलिए मनुष्य मृत्यु से क्यों डरे? दुःख एवं भय क्यों मानें? यह तो नितान्त स्वाभाविक अवस्था है। उतनी ही स्वाभाविक जितनी प्रातःकालीन का सूर्योदय। यदि यह सच है कि इतिहास पलटा खाया करता है तो मैं समझता हूँ कि हमारी मृत्यु व्यर्थ नहीं जाएगी।’’
                (फाँसी पर चढ़ने से पहले राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी द्वारा एक आत्मीय को लिखा गया पत्र)

राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी 17 दिसम्बी को फाँसी दी गई थी। बाद में इनका शव फाँसी घर से पश्चिम की ओर खुले मैदान में छोड़ दिया गया था। जिले के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों ने बाबू ईश्वर शरण के नेतृत्व में लाहिड़ी के दूर के रिश्ते के मामा की उपस्थिति में शव को बुचड़घाट ले जाकर विधि पूर्वक अन्त्येष्टि की थी। आजादी के बाद हर वर्ष 17 दिसम्बर को फाँसीघर में कार्यक्रमों का सिलसिला होता रहता है। पुण्यतिथि के अवसर पर कभी राजनीतिज्ञों द्वारा तो कभी प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इस पावनस्थली को स्मृति के रूप में संजोने की घोषणाएँ की जाती रहीं पर अब तक कोई ठोस कार्य नहीं हुआ है अगर कुछ हुआ भी तो वहखाऊ-कमाऊनीति के भेंट चढ़ गया।

4.
तंग आकर हम भी उनके जुल्म से बेदाद से,
 चल दिए सूए-अदम जिन्दाने फ़ैजाबाद से

ये अन्तिम बोल हैं आजादी के वीर योद्धा अशफाक उल्लाह खाँ के जिन्होंने मुस्कुराते हुए 19 दिसम्बर, 1927 को फैजाबाद जेल में फाँसी का फंदा चूम लिया। वतन की खातिर अपने प्राणों की आहुति देने वाले अशफ़ाक की ज़िन्दादिली बेमिसाल थी। फाँसी के एक दिन पूर्व मिलने आये अपने एक साथी को दिलासा देते हुए उन्होंने समझाया था, ‘‘मरना तो एक दिन सभी है, खुदा ने भेजा था, अब वापस बुला रहा है।’’

5.
जब देश की आजादी की लड़ाई का सबसे महत्त्वपूर्ण मुकदमा लाहौर कांस्प्रेसी केस शुरू हुआ, तो उसका फैसला 7 अक्तूबर, 1930 को सुनाया गया। इस केस में भगत सिंह, राजगुरु सुखदेव को फाँसी हुई तथा डाॅ. गया प्रसाद कटियार, शिव वर्मा, जयदेव कपूर सहित 7 लोगों को आजीवन कारावास की सजा हुई। भगत सिंह से अंतिम मुलाकात का वर्णन डाॅक्टर गया प्रसाद ने की है, ‘‘एक रात अचानक हमारी काल कोठरियों के ताले खुले हमारे साथियों को फाँसी देने से पहले गोरी सरकार हमें कहीं दूर भेज देना चाहती थी। अंतिम भेंट के समय यह सोच कर कि अब यह साथी कभी देखने को नहीं मिलेंगे हमारी आँखों में आँसू गए तो भगत सिंह ने कहा, ‘‘भावुक होने का समय नहीं है। मेरा क्या है? मैं तो कुछ समय बाद फाँसी पर झूल जाऊंगा। आप लोगों पर ही मिशन का उत्तरदायित्व है आपसब को हार-थक कर बैठना नहीं है।’’

6.
    
'वतन के पतन की जो बीमारियाँ हैं,
बड़ी इन सबों में जमीदारियाँ हैं,
किसानों की सूखी हड्डियाँ हैं कहती,
लहू चूसने की ये पिचकारियाँ हैं।

देश की आजादी तथा जमींदारी प्रथा के अत्याचार से लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए इन पंक्तियों को आजादी के मतवाले श्रीराम देव पाण्डेय जेल के अन्दर(तसला की थाप पर) गाकर नौजवानों में जोश भरते थे। वह दौर था सन् 1942 केअंग्रेजों भारत छोड़ों आन्दोलनका। नौजवान इस आन्दोलन की आँधी में अपने को पूरी तरह से समर्पित कर चुके थे। कोई चाह थी, कोई इच्छा। था तो सिर्फ जुनून आजादी का, भारत माता को अंग्रेजी गुलामियत की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने का जो उनके कड़े संघर्षों, त्याग, तपस्या से साकार भी हुआ।

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...