Wednesday, September 18, 2013

शामली: द स्पाइडर गर्ल


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यह कहानी प्रेम की है...प्रेम-प्रसंग की नही।

उस दिन वह नीले रंग की बटनदानी वाली कुर्ती पहने हुए थी। परिधान उस पर जम रहे थे। वह आकर्षक लग रही थी। लड़कियाँ जब आकर्षक लगती हैं, तो मन के भँवरे अपनी आवाज की ट्यून बढ़ा देते हैं। मुझे अपने भीतर के भँवरों की गुनजाहट साफ सुनाई पड़ रही थी। ये भँवरे डोरे डालने वाले नहीं थें, लेकिन थे तो भँवरे ही।

शामली ने आते ही मुझे दस हजार रुपए थमाए थे।

‘‘इतनी जल्दी थी....,’’

‘‘हाँ...,’’ छोटा सा, लेकिन प्यारा-सा जवाब।

मैं और शामली चाय की दूकान से चाय लेकर घुटकने लगे। वह बड़ी मुश्किल से अपना नया सूट दिखाते हुए कुछ बोली थी।

मैं शामली को सुन रहा था। इस सुनाहट में ताजगी थी।

‘‘पापा निक हो गए हैं, माँ भी खुश है। लोग आजकल हरी सब्जियाँ बिना कहे ले आते हैं...कभी शक्कर और मसाले भी।’’

मैं शामली को देख रहा था। उस शामली को जिसने एक तिनके के सहारे खुद को बदल देने का ज़ज्बा दिखाया था।
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शामली जिसकी उम्र 26 साल है; यही कोई तीन माह पहले मुझे मिली थी।

वह बड़ी थी, लेकिन इतनी भी बड़ी नहीं कि मैं उसे अपनी छोटी बहन न कह सकूँ। शामली का स्वभाव बिंदासता के महीन तागे से बुना हुआ था। आँख जो हमारी जिंदगी के सर्वाधिक करीब होते है; वे ज़िन्दगी के सच को ऐसे देखते हैं जैसे किसी फुलझड़ी को जलाकर बच्चे देखा करते हैं...पूरे हुलस, उत्साह और उमंग के साथ। शामली अपनी ज़िन्दगी को ऐसे ही देखती थी।

मुझे पिछली बातें याद आ रही थी।

जिस दिन शामली को मैंने मंदिर की सीढ़ियों के पास पहली बार देखा, उसके आँख में आँसू थे। मैंने आगे बढ़कर उससे बात की थी।

शामली के पिता सूत-कारोबारी थें। पिछले कई महीनों से उन्हें बीमारी ने तोड़ दिया था। माँ दो-चार घरों में बर्तन-बासन कर गुजारा करने लायक कमा-धमा ले रही थीं, लेकिन शामली के पढ़ने के सपने को बलि देकर।

यह सच था। चंद रुपल्ली से ज़िदगी नहीं बदला करती हैं। सो मैंने शामली के घर में बात की। हमसब मिलकर घरेलू तंगी से निपटने का कोई न कोई उपाय सोच रहे थे।

‘‘शामली....हमलोग टिफिन पैक कर लोगों को देंगे...!’’

सब चुप। शामली भी चुप।

‘‘हाँ, शामली! सुुबह-सुबह स्कूल के बच्चों को टिफिन देने का काम करेंगे...बिना लेकिन...परन्तु के।’’

सभी हँस पड़े। लेकिन, इस सुझाव में हामी सबकी थी।
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उस दिन के बाद से शामली रूकी कहाँ?

वह बच्चों की टिफिन में रोटियाँ जेवर की तरह तहियाकर रखती थी। खाने में स्वाद हो, इसका जायज़ा लेने के लिए वह भोजन पहले खुद ही चख लेती थी। शामली पूरे मुहल्ले की ‘प्यारी दीदी’ बन गई थी।

मुझे शामली का चेहरा फुलदानी-सा दमक रहा था। वह मुझे बार-बार अपने घर चाय के लिए आमंत्रित कर रही थी। मैंने उसे प्रामिश किया कि मैं, सीमा और बच्चों के साथ आऊँगा जल्द ही।

शामली संतोष के भाव से मुझे देख रही थी...और मैं शामली जैसी साहसी लड़की का कहानी अपने दिमाग में बुन रहा था।
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Monday, September 16, 2013

बर्फपात


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आसमान के बरास्ते

यात्रा कर
लम्बी दूरी तय कर
पहुँचता है बर्फ
मेरे पास
मैं दोहरा हो जाता हूँ
खुशी से मुटा जाता हूँ

जब भी आता है बर्फ
बर्फपात के दिनों में
मेरी हथेली पर
उसके आँख में चमक
और मेरे चेहरे पर मुसकान होती है
मैं पुकारता हूँ
-आ गए बर्फ
बर्फ प्रसन्नभाव से कहता है
-हाँ राजीव!

एक बात
मैंने नहीं पूछा कभी
बर्फ तुम्हारे घर में
कौन-कौन हैं?
चाहकर भी नहीं
सोचकर भी नहीं

मैं नहीं पूछ पाया कभी
बर्फ तुम्हारे देश में
चिड़ियाँ ही उड़ती है आसमान में
या एरोप्लन, हेलिकाॅप्टर, लड़ाकू विमानें
तुम्हारे देश में नदियों में सिर्फ पानी ही बहता है
या खूनी समुन्दर भी हैं
जिसमें चलते हैं
जंगी बेड़ों के युद्धवाहक पोत

मैंने नहीं जानना चाहा कभी
क्या तुम्हारे देश में भी नेता चुनावी दौरा करते हैं
और भाषण देते हैं, सुशासन का, रामराज्य का
वैसे पूछना अवश्य चाहिए मुझे
कि वहाँ सरकार, लोकतंत्र, बाज़ार-व्यापार आदि में
धंधेबाजी, गुटबाजी, कब्ज़े और लूट की धाक किस हद तक अमानुषिक है?

इस बार
मैं सूची तैयार कर रहा हँू

मैं शान्तिपूर्वक पूछूँगा यह सब
यह जानते हुए कि
हमारे यहाँ शान्ति के रंग कम दिखते हैं
अपराध और आतंक ही असली रंगरेज है
मैं पूछूँगा
यह सब कुछ
साथ-साथ यह भी
कि कौन है उनका लोकप्रिय कवि
कि कौन है उनका प्रिय साहित्यकार
कि कौन-सी भाषा बोलते हैं वे लोग
कौन-सी है लिपि उनके यहाँ लिखे-छपे का
उनके यहाँ कौन सुखिया है और कौन दुखिया?
गाँव, शहर, महानगर में बिजली टिकती है कितनी देर?
शादी-विवाह में मंडप या बैन्ड-बाजे के लिए
कितना महँगा तय करते हो किराया
और कौन कितना अधिक देता है बयाना?
पर्व-त्योहार के मौके पर कैसे करते हो हँसी-हुल्लड़
या तुम्हारे यहाँ भी अपना अलग-अलग राग है

इस बार
मैं सूची तैयार कर रहा हँू

मैं यह भी पूछूँगा
तुमलोग कैसे करते हो पहचान अपने और पराए की
मित्र और दुश्मन की
सीमा अन्दर और सीमा बाहर की
कौन किससे लड़ता है युद्ध
कौन जीतता और कौन होता है परास्त
कैसे लूटते हो खजाने
टाँगते हो आधिपत्य के तम्बू-कैनात
सभ्यता, संस्कृति, परम्परा, विरासत इत्यादि को
ध्वस्त करने में कितना लगता है आखिर वक़्त
वर्चस्व अपना हो जाने पर किसी क्षेत्र में
कैसे करते हो अपने प्रभुत्व की घोषणा
कभी मुसीबत गले फँसने पर
अपनी बचाव में
तोप, बम, रासायनिक हथियार का कैसे और कितनी मात्रा में करते हो इस्तेमाल?

इस बार
मैं सूची तैयार कर रहा हँू

यह जानते हुए कि
ये सवाल
बर्फ के किसी एक टुकड़े से हो ही नहीं सकते हैं
क्योंकि बर्फपात में होती है
सामूहिकता की चेतना
अलगाव-विलगाव से विपरीत
एक स्वभाव, रूप, गति, अवस्था इत्यादि का गुणधर्म
धर्म, भाषा, वर्ग, समुदाय, वर्ग, लिंग इत्यादि का अद्भुत ऐक्य
जबर्दस्त साम्य
गलनांक एक
सूचकांक एक
भूगोल एक
संविधान एक
ज़्ाबान एक
सोच और संकल्प एक
और एक ही जीवन

बर्फपात के दिनों में
आप कभी बर्फ को देखिए, तो सही
अनुपस्थिति में
मैं उसकी स्मृति से भी बेइंतहा प्यार करता हूँ।

Sunday, September 15, 2013

सेमिनार-प्रस्तुति संग राजीव रंजन प्रसाद

विषय : ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृत्ति और लोकवृत्त'
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10 सितम्बर, 2013; समय: 3 बजे दोपहर बाद; हिन्दी विभाग


युवा राजनीति पर बात करना मेरे लिए भाषा में सत्याग्रह करना नहीं है।

राजनीति सिनेमा नहीं है कि इसका उद्देश्य या ध्येय मनोरंजन मान लें। राजनीति आदमी की भाषा में आदमी होने की वैध तहज़ीब है। विधान का एक ऐसा वितान जिसमें हर आदमी को अपने हिसाब से सोचने, बोलने और करने की स्वतन्त्र और समान छूट प्रदान की जाती है। इस छूट की तमाम अर्थच्छवियाँ हो सकती हैं; लेकिन इससे किसी को तकलीफ हो, नुकसान हो या वे सामाजिक चरित्र के लिए ख़तरनाक साबित हों...इसकी सख़्त मनाही है। ऐसी विडम्बनापूर्ण स्थिति में रोकथाम के लिए बीसियों तरीके हैं जिससे समाज अपनी राजनीतिक चेतना को उत्तरोत्तर बड़ा और समृद्ध करता है। बशर्तिया विधान-नायक जनता के बीच का आदमी हो। बीच का आदमी कहने का तात्पर्य सामाजिक संस्कार-व्यवहार से पगे उस आदमी से है जो अंतिम आदमी की खै़रख़्वाही के लिए फिक्रमंद होना जानता है। राजनीतिक फिकरे कसने या प्रतिस्पर्धी कहकहे लगाने की कुचेष्टा वह नहीं कर सकता है, तो नहीं कर सकता है। खैर!

हाल के दिनों में भारतीय राजनीति ने राजलिपि विकसित करने में अभूतपूर्व सफलता पा ली है जिसमें
राजनीतिक वसीयत लिखे जा रहे हैं। मौजूदा लोकतंत्र में इसी वसियत को वंशानुगत आधार मानकर युवा राजनीतिज्ञ भारतीय जनतंत्र में विराज रहे हैं; यह निर्णय कर रहे हैं कि जनता आधी रोटी खाएगी या पूरी। जिस जनता के साथ इनका बचपन से युवा होने तक सोना-बिछौना कुछ नहीं लगा; उस जनता की भूख को इतिहास बनाने का नारा ये युवा राजनीतिज्ञ लगा रहे हैं। ये ऐसे ही भाषा में तफरी मारते हुए मीलों आ गए हैं...अभी और मीलों जाने की हेठी इनमें बेशुमार हैं। राजनीतिज्ञ जब बेशर्म होते हैं, तो धर्म, जाति, भाषा, वर्ग, क्षेत्र इत्यादि के जन-बैंकर में घुस जाते हैं। सवाल है, जनता की जरूरत क्या सिर्फ पेट की भूख से निपट जाएगी? क्या मंदिर की घंटियाँ टुनटुनाने से उनके घरों में ‘सुजलाम्-सुफलाम’ हो जाएगा? अगर नहीं, तो जनता धृतराष्ट्र और दुर्योधन को ढो क्यों रही है? वह लोकतंत्र की बिनाह पर महाभारत क्यों नहीं लड़ रही है? ये सवाल जितने आसानी से पूछे जा सकते हैं...जवाबदारों को उतनी आसानी से उत्तर नहीं प्राप्त हो सकते हैं।

एक तमाशा यह भी कि हम जिस वर्ग को युवा-मानस कहते हैं; वह सिनेमा हाॅलों, रेस्तराँआंे, जिमखानों, बियरबारों, डिस्कोथिकों आदि में ‘चकाचक राग बसन्ती’ गा रहा है, लेकिन लोकतंत्र की ज़मीन पर वह
यहाँ-वहाँ कहीं नहीं है। आश्चर्य यह है कि जिन युवा राजनीतिज्ञों का भारत के किसी विश्वविद्यालय में पढ़ना-लिखना नहीं हुआ है; वहाँ से युवा राजनीति का ‘क-ख-ग’ भी नहीं सीखा है; आज वे उन्हीं विश्वविद्यालयों में जाकर छात्र-राजनीति का बिगुल फँूक रहे हैं; छात्र-संघ की वकालत कर रहे हैं।

आइए, इस पूरी वस्तुस्थिति का मूल्यांकन-विश्लेषण करने के लिए अपने निर्धारित विषयवस्तु ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृत्ति और लोकवृत्त' में प्रवेश करें---,

Saturday, September 14, 2013

व्यक्तित्व की भाषा


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अंग्रेजी में एक शब्द है-‘व्यक्तित्व’। लोकप्रिय और बहुचर्चित भी। इंटरनेट जो अक्षरों, शब्दों, वाक्यों, लिपियों, भाषाओं इत्यादि का खजाना है; में एक इंटर पर इफरात सामग्री(टेक्सट, इमेज, पीएडएफ, पीपीटी, आॅडियो, विडियो इत्यादि) मिल जाएंगे व्यक्तित्व के बारे में। वहाँ यह सूचना आसानी से मिल सकती है कि साधारण बोलचाल में प्रयुक्त शब्द ‘व्यक्तित्व’ को अंग्रेजी में ‘Personality’ कहा जाता है जो लैटिन शब्द ‘Persona’ से बना है। अपनी बोली में हम कुछ बोले नहीं कि सामने वाला व्यक्ति फौरन यह जान लेगा कि हम कैसे हंै? हमारे व्यवहार की प्रकृति क्या है? हमारा स्वभाव कैसा होगा? हम मिलनसार हैं या उजड्ड। अक्लमंद हैं या हमारे दिमाग में सिर्फ भूसा भरा हुआ है। कई बार तो हम किसी का हाव-भाव और हरकत देखकर यह सटीक अनुमान लगा सकते हैं कि फलांना व्यक्ति इस वक्त क्या सोच रहा है; उसके दिमाग में क्या चल रहा है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

व्यक्तित्व का नाता हर आदमी के चाहे वह छोटा हो या बड़ा; देह और दिमाग दोनों से अंतःसम्बन्धित होता है। मन की हलचलों से, भाव-तरंगों से, सूझों से या फिर देखने-सुनने के उन सभी तौर-तरीकों से जो हमारे व्यवहार और आचरण का हिस्सा हैं; हमारे व्यक्तित्व की अमूल्य निधि हैं। बिल्कुल भाषा की माफिक। उस भाषा की तरह जो हमारे ज़बान के लार से पुष्ट-संपुष्ट होकर जवान होती है; समृद्ध होती है। मैं भाषा के मुद्दे पर आऊँगा, लेकिन उससे पहले व्यक्तित्व की बात। यदि कोई हँसोड़ है, तो यह उस व्यक्ति-विशेष का अपना व्यक्तित्व है। इसी तरह किसी आदमी की प्रसन्नता को भाँपकर जब हम कहते हैं, वह बहुत हँसमुख है, तो यह भी उस व्यक्ति के व्यक्तित्व पर की गई टिप्पणी ही होती है। दुनिया में बहुतेरे ऐसे लोग मिल जाएंगे जो खुशी हो या ग़म सब स्थिति में संतुष्ट और स्थिर बने रहने की चेष्टा करते हंै और अपने सचेतन प्रयत्न में सफल भी होते हैं; ऐसे लोगों को हम ज़िन्दादिल शख़्स कह उनके आगे सर नवाते हैं। उदाहरण कई-कई हो सकते हैं। जैसे-कोई उदारमना व्यक्तित्व का हो सकता है, तो कोई महामना। पण्डित मदन मोहन मालवीय जी स्वयं उदाहरण हैं जिनका व्यक्तित्व विराट चेतना, विशाल हृदय और विमल मन से आपूरित था। धैर्यवान, सयंमशील, उग्र, निंदक, आलसी, ईष्र्यालु आदि-आदि मनोवृत्ति-अभिवृत्ति के लोग भी होते हैं जिनके सम्पर्क-संगति में आते ही हमारा दिमागी एंटीना/एरियल उनके बारे में ख़बरें देने लग जात हैं। उद्दीपन, संवेदन, प्रत्यक्षीकरण और आत्माधारणा जैसी मनोवैज्ञानिक शब्दावली इसीलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि वे हमारे मनोजगत और मनोचेतना को देखते ही पढ़ लेने में अव्वल हैं।

ध्यातव्य है कि चारित्रिक गुण हमारे व्यक्तित्व का अहम भाग है। इसके माध्यम से व्यक्तित्व को काफी हद तक जाना-समझा जा सकता है। जब किसी के काम को मौलिक कहा जाता है, तो यह मौलिकता कहीं बाहर से आरोपित अथवा प्रक्षेपित नहीं होती हैं, बल्कि यह उस व्यक्ति-विशेष के व्यक्तित्व का अंग-उपांग होती हैं जो उसका प्रयोक्ता होती हैं। यह मनुष्य के व्यक्तित्व का आन्तरिक गुणधर्म है जो भिन्न-भिन्न कई रूपों में देखने को मिलती हैं। यथा-अंतःमुखी व्यक्तित्व, बाह््यमुखी या विकासोन्मुखी व्यक्तित्व। दरअसल, खाना, पीना, सोना, रोना, हँसना, बोलना इत्यादि को जिस तरह मनोविज्ञानियों ने मुलप्रवृत्ति कहा है; उसी तरह व्यक्तित्व हमारे जीवन का सूचक/संकेतक है। व्यक्तित्व स्वाभाविक जीवन-प्रणाली की अभिव्यक्ति है। यह चेतना का वास्तविक और मूर्त स्वरूप है। व्यक्तित्व को जानने के लिए अगर हम जिज्ञासा की खुरपी लगाएँ, तो आश्चर्यजनक चीजें प्राप्त होंगी। हम यह जानकर चकित होंगे कि-‘‘मानव का निर्माण पाँच पदार्थों से हुआ है। प्रथम तो उसे भौतिक शरीर मिला है जो अन्नमय कोष है। दूसरे उसे प्राणवायु प्राप्त हुई है, वही प्राणमय कोष है। तीसरे उसे मन प्राप्त हुआ है। उसी को मनोमय कोष कहा जाता है। चैथे उसे बुद्धि मिली है जो विज्ञानमय कोष के अन्तर्गत आती हैं और पाँचवें उसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ प्राप्त हुई हैं जिनके द्वारा वह आन्नदोपभोग करता है। अतः ये ही अन्नदमय कोष हैं। इस तरह हमारा मानव-शरीर जिसे व्यावहारिक भाषा में व्यक्तित्व कहा जा रहा है उक्त पाँचों कोषों से मिलकर पंचकोष के रूप में समन्वित है।

व्यक्तित्व या भौतिक-शरीर से सम्बन्धित यह व्याख्या भारतीय दृष्टिकोण से सम्बन्धित है। उपनिषदों में वर्णित इन प्रामाणिक तथ्यों को पश्चिमी विद्वान, विज्ञानी, शिक्षाशास्त्री सभी स्वीकार करते हैं; लेकिन इन्हें हम मानना तो दूर ‘आउटडेटेड नाॅलेज’ कह इस पूरे ज्ञान-मीमांसा से ही पल्ला झाड़ ले रहे हैं। दूसरी तरफ ज्ञान-तकनीकी की पश्चिमी विचारधाराएँ जिन्हें हम अंग्रेजी पोथियों में पढ़ने को बाध्य हैं; के प्रति हमारा दृष्टिकोण प्रायः बिल्कुण भिन्न किस्म का होता है। उदाहरणार्थ-पानी की यौगिकीय-संरचना के बारे में वैज्ञानिक जब यह कहते हैं कि-जल के कण मूलतः 2 भाग हाइड्रोजन और 1 भाग आॅक्सीजन से मिलकर बने हैं; तो हमें प्रथम द्रष्टया घोर आश्चर्य होता है। हम सेाचते हैं-पानी के कणों को कैसे अलग-अलग विभाजित किया जा सकता है? चूँकि यह वैज्ञानिक सिद्धान्त के रूप में यह रूढ़-कथन है; इस कारण एक सीमा के बाद हम अधिक जिरह नहीं करते हैं। न्युटन की गति नियम हो या आइंस्टीन की सापेक्षिकता का सिद्धान्त; हम इन्हें वैज्ञानिक सत्य कह कर स्वीकार कर लेते हैं प्रायः। ऐसा क्यों है कि हम इन प्रस्थापनाओं के भीतरी खण्डों को अलग-अलग न देखते हुए भी उसे सच मान लेने को बाध्य होते हैं? उस पर जरूरी तर्क-वितर्क नहीं करते हैं? कई बार द्वंद्व या आन्तरित असंगति उत्पन्न होने की स्थिति में भी चिन्तन करने को उद्धत नहीं होते हैं? या फिर चिन्तन की प्रतिमाएँ इतनी सघन नहीं होती हैं कि वे इन सिद्धान्तों से सीधे टकराने की चुनौती मोल ले सकें।

जबकि हमारे यहाँ शास्त्रार्थ की संस्कृति हजारों वर्ष पहले तक मौजूद थीं। आज तो उनका जिक्र भी फ़साने में नहीं। आज की नवपीढ़ी को इस सत्य से साक्षात्कार कराना बिल्ली के गले में घंटी बाँधने जैसा है कि हमारी परम्परा आज तक जीवित इसलिए नहीं है कि हम एक महान परम्परा के नागरिक हैं; बल्कि इसलिए कि हमारी सांस्कृतिक क्रियाशीलता में परिवर्तनीयता के गुण विद्यमान हैं। भारतीय ज्ञान-परम्परा नवीनताओं को हमेशा समय के कोख में ढोती है और उसे उपयुक्त अवधि के पश्चात जन्मती भी है, बशर्ते नवीन-धारा अपनी प्रकृति और चेतना में दीर्घजीवी हो। आज यह कसौटी हमारी आधुनिक भारतीय चित्तवृत्ति से गायब हैं जो सचमुच तकलीफदेह है और चिन्ताजनक भी।

इसके विपरीत पश्चिमी ज्ञानतंत्र या अकादमिक जगत से जुड़े लोग अच्छी से अच्छी चीज को हमेशा ‘काउंटर’ करते हैं। वे यह मानने के लिए न तो बाध्य होते हैं और न ही किए जाते हैं कि फलांना सत्य सार्वभौमिक सत्य है या कि उनमें परिष्कार/परिवर्धन की चेष्टा समय की फ़िजूलखर्ची है। भारतीय शिक्षालयों में ऐसी अध्यापकीय हिदायतें अटी पड़़ी हैं। वस्तुतः पश्चिमी शोधक भीतरी प्रयोग को लेकर पगलाए होते हैं। कई नई खोजें तो इसी पागलपन की देन हैं। ऐसे सुधीजनों के प्रति निःसंदेह हमारी कृतज्ञता व्यक्त होनी ही चाहिए जिन्होंने अपनी इस तर्क-वितर्क की चेतना से समय के पूरे ‘पैराडाइम’ को ही बदल देने का लाभकारी उपक्रम किया है। पश्चिमी अनुसन्धानकत्र्ताओं की इन चेष्टाओं  पर निसार होने का यह अर्थ नहीं है कि हम अपने दरो-दीवार के भूगोल, रंग, आकार, प्रकृति, भाषा और ज़ुबान भूल जाएँ। संवादी रूप में अपनी भाषा को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले व्यक्तित्व को ही खो दें सदा-सर्वदा के लिए।

बहरहाल, आज हम पश्चिमी जगत के उस दौर को अपना सार्थक अतीत मानने को अभिशप्त हैं, जो औद्योगिकीकरण के बाद उपनिवेश की खोज में विकसित हुई साम्राज्यवादी सत्ता का ज्ञानोदय-काल है। गोरे अंग्रेजे मैकाले की काली शिक्षा नीति आज भी प्रभावी और बेखटक प्रयोग में है, तो सिर्फ इसलिए कि स्वाधीन भारत की चेतना अपनी भाषा से कटकर उस भाषा से संयुक्त हो गई है जो अधिनायकवादी प्रवृत्ति और वर्चस्व की नीति से परिचालित है। स्मरण रहे, सीखने की भाषा अपनी या परायी नहीं होती है, लेकिन अपनी मर्म, वेदना, संवेदना, मौन और चिन्तन की भाषा परायी कैसे हो सकती है? जिस तरह हम अपनी जान को किसी बीमा-कम्पनी के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं, वैसे ही अपनी भाषा को अपनी ही ज़बान से बेदखल कर देना कहाँ की और कैसी समझदारी है? यह एक यक्ष प्रश्न है जिस पर भावुक विलाप करने की जगह वस्तुपरक संवाद-विमर्श की आवश्यकता है। वर्तमान भाषा-बोध की कमी और हिन्दी भाषा को लेकर फैलाई गई भ्रामक संकीर्णता के बाबत साहित्यकार प्रभाकर श्रोतिय दो-टूक कहते हैं-‘‘यह आर्थिक प्रभुत्त्ववाद अपने बहुत बड़े और महीन संजाल से मनुष्य के मन, बुद्धि, संवेग, इच्छा, यहाँ तक कि उसकी राष्ट्रीय राजनीति और व्यवस्थाओं को भी नियंत्रित कर रहा है; साहित्य, संस्कृति और भाषा का, मनुष्य के मन में नए ढंग से अर्थांतर और मूल्यांतर कर रहा है; प्रतिरोध और विद्रोह की आवाज़ों को तत्काल बिकने वाले साहित्य की ऊँची कीमत पर माँग से कुचल रहा है। घटिया साहित्य की विपुलता से वह विचारशील और गहरे साहित्य को विस्थापित कर रहा है। सब कुछ इतनी नफ़ासत और क्रमिक प्रक्रिया से होता है कि पाठक-मन को जरा धक्का न लगे।’’

Friday, September 13, 2013

प्रचारित ज्ञानकाण्ड नहीं है हिन्दी


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हमें अपने कल के कार्यक्रम('वर्तमान समय और हिन्दी भाषा' विषयक गोष्ठी) के लिए हिन्दी-विलापी ज़बानकारों की जरूरत नहीं है। ऐसे नकारे लोग कोई दूसरे नहीं हैं; वे हम ही में से हैं यानी हिन्दीभाषाभाषी शोधक-अन्वेषक; अध्यापक-प्राध्यापक, अकादमिक या राजभाषिक बुद्धि-सेनानी वगैरह-वगैरह जिनकी चेतना और संस्कार दोनों में से हिन्दी-भाषा के प्रत्यय, प्रतिमा, अनुभव, स्मृति, कल्पना, चिन्तन, संवेदन इत्यादि सब के सब गायब हो चुके हंै। इन दिनों हिन्दी-प्रदेशों में अंग्रेजी को ही ज्ञान के गहन प्रकाश के रूप में देखने का चलन बढ़ा है। इसे भूख-निवारण, कुण्ठा-निवारण, बेराजगार-मुक्ति, भाषाई-प्रतिरूप, चेतना-विकास और संस्कृति-बोध की वास्तविक, एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ कसौटी मानकर प्रचारित-प्रसारित करने वाले हमहीं-आपहीं जैसे ज्ञान-आयोगिया लोग हैं। क्या इस सचाई को हम झुठला सकते हैं कि आजादी के इत्ते बर्षों बाद भी भारत में बनी अंग्रेजी की एक भी धारावाहिक, वृत्तचित्र, सिनेमा आदि ने भारतीय जनमानस को आलोडि़त-आन्दोलित करने में सफलता हासिल नहीं की है। कितने लोग मानेंगे कि अंग्रेजी में प्रकाशित किसी पुस्तक ने भारतीय मन की सामूहिक अभिव्यक्ति की दिशा में अकल्पित अथवा अप्रत्याशित दखल देने का जिम्मा उठाया है। दरअसल, हम भूल जाते हैं कि अंग्रेजी भाषा में तैयार उत्पाद, साहित्य, तकनीक, प्रौद्योगिकी इत्यादि को भारतीय बाजार में बेचा-खपाया जा सकता है; लेकिन, लोगों में प्रतिरोधी संचेतना पैदा करने की कूव्वत अपनी भाषा को छोड़कर दूसरी भाषा में हो ही नहीं सकती है। फिर ऐसा क्यों है कि यशोगान उसी भाषा का, जयगान उसी भाषा का, दर्शन-साहित्य सम्बन्धी पिच्छलग्गूपन उसी भाषा का, ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी आकर्षण उसी भाषा का हमारे मन-मस्तिष्क पर काबिज़ है। अंग्रेजी को प्रायोजित ढंग से नम्बर वन या सर्वश्रेष्ठ घोषित करने के पीछे मुख्य वजहें क्या हैं जबकि दुनिया भर में ज्ञान की इकलौती भाषा वही नहीं है? आखिर ऐसी स्थिति क्योंकर है; यह हम-सबके लिए निःसन्देह विचारणीय है? क्योंकि यह हमारी मातृभाषा हिन्दी के लिए ही नहीं, अपितु देश की उन सभी भाषाओं के लिए यक्ष प्रश्न है जो अपनी भाषा को लेकर सवाल खड़े करना चाहते हैं, सोचना, विचारना और खुले रूप से संवाद करना चाहते हैं।

वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हिन्दी के अकादमिक जगत के लोग इस मुद्दे पर प्रायः सार्थक कम बोलते हैं; घिसी-पिटी बातों को दुहराते ज्यादा हैं। दरअसल, हमारी भाषा के जानकारों के पास स्पष्ट समझ और निष्पक्ष नेतृत्व का संकट गहरा है। भाषिक अभिव्यक्ति के लिए शब्द-भण्डार विपुल मात्रा में उपलब्ध हंै; लेकिन, सहृदय ज्ञान-संचारकों, वात्र्ताकारों, मार्गदर्शकों की भारी कमी है। मौजूदा स्थिति यह है कि जो विद्धान हैं वे चुप हैं। वे प्रायः अपनी विद्वता के आलोक में ही विचरते रहते हैं-‘अजगर करे न चाकरी...’ के दर्शन के साथ। लेकिन जो नई पीढ़ी के हमारे जैसे भाषाई शावक हैं वे संभाव्य-चेतना से बिल्कुल खाली नहीं हैं। हम विद्यार्थीजन इस कमी को पाटने की दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं। हम यत्नपूर्वक और पूरे मनोयोग से अपनी भाषा में स्वस्थ और सार्थक जवाब देने के लिए कटिबद्ध और संकल्परत हैं। स्मरण रहे, हम फिल्मी अंदाजे-बयाँ की तरह तड़क-भड़क से भरपूर मनोरंजनयुक्त कार्यक्रम करने के हामी नहीं हैं; हम भाषाई विचार-विमर्श के स्तर पर सतही और बासी चिन्तन सामग्री भी नहीं परोसना चाहते हैं। वास्तव में, हम किसी भाषा-विशेष के सन्दर्भ में कोई राजनीतिक नारा या जुमला उछालने की बजाए अपनी भाषा के बारे में अपनी भाषा में बात करने को पूरी शिद्त और शाइस्तगी के साथ इच्छुक हैं। हमारा मुख्य ध्येय निज संकल्प, चिन्तन, दूरदृष्टि, देसी ज्ञान, देसी आधुनिकता, लोक कला, योजना, तकनीक, प्रौद्योगिकी, इंटरनेट इत्यादि के बहुआयामी तथा समग्र प्रयोग-प्रसार के माध्यम से हिन्दी भाषा को समुन्नत, विकासशील और सार्वदेशिक ज्ञान-मीमांसा का सर्वतोमुखी क्षेत्र घोषित करना है। हम पूरी ताकत से उस आन्तरिक-बाह्î संक्रमण को अपनी संज्ञानात्मक बोध, चेतना, व्यक्तित्व और व्यवहार से अलग कर देना चाहते हैं जो ज्ञान की भाषा होने की बजाए वर्चस्व और प्रभुत्त्व की महिमामण्डित भाषा बनती जा रही है।

यह आवश्यक है क्योंकि आज पूरी दुनिया बाज़ार पूँजीकरण के दबाव और चपेट में है। हमें ‘पेट्रोडाॅलर’ और ‘मार्केट कैप’ से दबते रुपए की तरह अपनी भाषा को शिकस्त खाने नहीं देना है। हम रवीन्द्रनाथ टैगोर के उस विचार से पूर्णतया सहमत हैं जिसका आह्वान उन्होंने उस दौर में किया था जब देशकाल-परिवेश औपनिवेशिक मानसिकता से जकड़ा था-‘‘मैंने बहुत दुनिया देखी है। ऐसी भाषाएँ हैं जो हमारी भाषाओं से कहीं कमजोर हैं परन्तु उनके बोलनेवाले अंग्रेजी विश्वविद्यालय नहीं चलाते। हमारे ही देश में ये लोग परमुखापेक्षी हैं...देशी भाषाओं को कच्चे युवकों की जरूरत है। लग पड़ोगे, तो सब हो जाएगा। हिन्दी के माध्यम से तुम्हें ऊँचे से ऊँचे विचारों को प्रकट करने का प्रयत्न करना होगा। क्यों नहीं होगा? मैं कहता हूँ जरूर होगा।’’


कल 14 सितम्बर है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का हिन्दी विभाग आपके आगमन का आकांक्षी है। हम उन सभी अनुभवी प्राध्यापकों, अध्यापकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, शुभचिन्तकों इत्यादि से यह आस और उम्मीद लगाए बैठे है कि आपसबों के आगमन से ही हमारी भाषा में उजियारा होगा...निश्चय जानिए।
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विषय: वर्तमान समय और हिन्दी भाषा
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समय: 12 बजे दोपहर
स्थान: हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। 

Saturday, September 7, 2013

वर्तमान भारतीय युवा राजनीति : चित्तवृत्ति और लोकवृत्त


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मान्यवर,

आपसी संवाद, बहस और विकल्प की अधुनातन संचेतना को लक्षित करते हुए भारतीय युवा राजनीति की चैहद्दी को ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृित्त और लोकवृत्त’ विषयक राजीव रंजन प्रसाद की सेमिनार-प्रस्तुति के बहाने खुले विषय के रूप में प्रश्नांकित किया जा रहा है। सम्प्रति राजीव रंजन प्रसाद, हिन्दी विभाग में प्रो0 अवधेश नारायण मिश्र के मार्गदर्शन में ‘संचार और मनोभाषिकी(युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के विशेष सन्दर्भ में)’ विषयक शोधकार्य में संलग्न हैं।

इस सेमिनार-प्रस्तुति के अन्तर्गत वर्तमान युवा राजनीति के दो पक्ष विचारार्थ प्रस्तुत हैं-1) चित्तवृत्ति और 2) लोकवृत्त। चित्तवृत्ति के रूप में युवा राजनीतिज्ञों के व्यक्तित्व, भाषा एवं व्यवहार से सम्बन्धित विभिन्न बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है; वहीं लोकवृत्त के अन्तर्गत युवा राजनीतिज्ञों के राजनीतिक समाजीकरण, संभाव्य राजनीतिक संचेतना, नेतृत्व, निर्णय-क्षमता इत्यादि से सम्बन्धित विविध पक्षों पर सम्यक् विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत है।

आप सभी इस अवसर पर सादर आमंत्रित हैं!

स्थान: हिन्दी विभाग       मंगलवार: 10 सितम्बर, 2013                 
समय: अपराह्न 3 बजे

Monday, September 2, 2013

हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है....!


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(शोध-पत्र प्रस्तुति)

पश्चिम वाले हमारी ओर मुँह करके सूर्य-नमस्कार करते हैं;
और हम पश्चिम की ‘चियर्स लिडरों’ को देखकर आहे भरते हैं।
वे हमारी आस्था की ड्योढ़ी पर सर नवाते हैं,
हमारी पवित्र गंगा में घंटों खड़े हो कर जल ढारते हैं;
वहीं हम अपने देसी रेस्तरां में विदेशी डिश चखते हुए अपनी गर्लफ्रेण्ड को
शानदार ‘प्रपोज’ मारते हैं, या सड़कछाप मंजनूओं की तरह
उनकी स्कूटी पर बैठकर  हैंडिल सम्भाल रहे होते हैं।
वे देह की साँस से ऊब चुके होते हैं। हम पूरबवासी देह की साँस लेते हुए अपना जीवन-पबितर कर रहे होते हैं; हमारे घर की स्त्रियां भी ऐसा ही कुछ कर रही होंगी फिलहाल....!  धन-दौलत को दुनियादारी निभाने का जरिया मात्र मानते हैं; और हम अपने काले धन को सफेद करने के लिए अपने भगवान के दरबार में
सोने का कंगन, चेन, लाॅकेट, बिस्कीट, अशर्फी, गिन्नी.....बना रहे होते हैं।

महोदय/महोदया,

मानव-जीवन सिर्फ पश्चिम-पूरब या उत्तर-दक्षिण नहीं है।
हमारा यह जीवन हम-वे, मैं-तुम-वह भी नहीं है।
मैं स्पष्ट शब्दों में यहाँ अपनी बात रखना चाहता हूँ कि
हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है.....!

तो सवाल उठता है....क्या है हमारा यह जीवन?

दरअसल हम और हमारा व्यक्तित्व सांख्यिकी की भाषा में चर-सरीखा है।
हमारा समस्त जीवन-व्यापर इन चरों के व्यवहार पर ही आधृत है।
ये चर स्वतन्त्र चर भी हैं, और आश्रित चर भी।

(इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में राजीव रंजन प्रसाद से बार-बार सिर्फ अबस्ट्रेक्ट पढ़ने के लिए कहा जा रहा है, फिर भी वे अपनी बात जारी रखे हुए हैं...)

मनुष्य का आन्तरिक व्यक्तित्व स्वतन्त्र चर है जबकि उसका बाह््य व्यक्तित्व आश्रित चर है।
बाह््य व्यक्तित्व हमेशा आन्तरिक व्यक्तित्व से ‘इंटरलिंक’ होता है। यह ‘कनेक्शन’ ही दोनों के आपसी अंतःक्रिया का मूलधन है। व्यवहार अथवा भाषा/वाक् में प्रकाशित हमारे सारे करतब/कर्तव्य/अधिकार इत्यादि तो प्राप्त ब्याज मात्र हैं जिन पर हमारा समस्त वाक्-व्यापार एवं जीवन-व्यवहार टिका होता है। यहाँ मैं अपनी बात थोड़े विस्तारपूर्वक कहना चाहता हँू। उम्मीद है, आपसब धैर्य के साथ सुनेंगे....,
 
(कार्यक्रम संचालक का अनुरोध, मुख्य वक्ता को हवाई मार्ग से दिल्ली पहुँचना है। वक़्त कम बचे हैं। इसलिए उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता है। राजीव रंजन प्रसाद अपना कृशकाय शरीर लिए अपनी जगह आकर धँस जाते हैं। श्रोताओं का एक बड़ा वर्ग जो उन्हें आज सुनना चाहता था....वंचित रह जाता है।)

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...