Wednesday, August 21, 2013

प्रिय देव-दीप,



हमारी युवा पीढ़ी ‘स्वयं में’ एक वर्ग बन चुकी है, लेकिन अभी स्वयं के लिए स्वतन्त्र नेतृत्व की भूमिका में नहीं है। बच्चों! देश में युवाओं की कमी नहीं है। लेकिन, आधुनिक भारतीय राजनीति के बैठकखाने में सामान्य युवाओं का प्रवेश लगभग वर्जित-सा हो गया है। ऐसा क्यों है? इस विषय पर हमारा बहसतलब होना बेहद जरूरी है। आज संसद में जितने युवा राजनीतिज्ञ पदस्थ हैं उनमें से अधिसंख्य पैतृक राजनीति की उपज हैं; परिवारवादी सलतनत के बैण्ड-बाज़ा-बारात हैं। इन युवा राजनीतिज्ञों के पास क्या कुछ नहीं है, सिवाय व्यक्तित्व, मूल्य और भारतीय आत्मा के। विडम्बना यह है कि वे ही ताकत में हैं। वे ही सत्ता और नेतृत्व में हैं। इन युवा राजनीतिज्ञों का ज़मीनी जनाधार ठनठन-गोपाल है। ‘मास अपील’ के नाम पर भाषा में लीपापोती अधिक है। इसके बावजूद वंशवादी पैराशूट से ज़मीन के सबसे ऊपरी टीले(संसद) पर काबिज़ यही हैं, हाथ यही हिला रहे हैं; कमल यही खिला रहे हैं; साइकिल यही चला रहे हैं; हाथी यही दौड़ा रहे हैं; यहाँ तक कि ‘आप’ में भी हम शामिल नहीं हैं। हम सिर्फ संज्ञा और सर्वनाम से नवाज़े जा रहे शब्द हैं। इन शब्दों के प्रयोग में भी सत्ता की राजनीति है; अर्थतंत्र का अर्थबोध-निरोधक खेल है। युगचेतना के कवि धूमिल की सीधी किन्तु सधी भाषा में कहें, तो-‘‘उन्होंने कभी किसी चीज को/सही जगह नहीं रहने दिया है/न संज्ञा/न विशेषण/न सर्वनाम/एक समूचा और सही वाक्य/टूटकर बिखर गया है/उनका व्याकरण इस देश की/शिराओं में छिपे हुए कारकों का हत्यारा है.../वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं/उसके रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है’’ 

देव-दीप, निज स्वार्थ की कड़ाही में देश की जनता को पकौड़े की तरह छानते ये राजनीतिज्ञ(यदि तुम्हें हँसी आ रही हो, तो हँस लो) कहीं किसी मौके पर ‘क’ भी बोलते हैं तो वह मैनेजमेंट थ्योरी के किसी न किसी सिद्धान्त पर टिका होता है। वे चुनावी-सीज़न में कहीं किसी घर-बस्ती, जवार-इलाका, कुँआ-तालाब, स्कूल-संस्था आदि को छू-छा भी रहे होते हैं, तो वह आधुनिक प्रचार के किसी न किसी जुगाड़-तकनीक से मेल खाता है। चूँकि नैतिकता का दमन है, शोषण का बाहुल्य है; अतः इन्हें अधिकार है कि ये मंच से बोलें, टेलीविज़न में दिखें और अख़बार में छपें। अपने पुरनिए सत्तासीनों की तरह जनता को ये मूर्ख मानंे, उन्हें भोला और भालू कहें। वे पूँजी के लम्बरदारों की माफ़िक हम को भेड़, गड़ेरिया, हेडलेस चिकेन, मैंगोज पिपुल इत्यादि कहें और हम चुपचाप हँेसे...मौन विहंसे। ख़्यातनाम कवि रघुवीर सहाय की कविता की तर्ज़ पर-‘हँसो-हँसो, जल्दी हँसों।’


देव-दीप, यहाँ सचाई का एक पहलू यह भी है कि वर्तमान राजनीति से लड़कियाँ बुरी तरह बेदख़ल हंै। दिल्ली से लेकर जम्मू-काश्मीर तक लैंगिक भेदभाव की मानसिकता में लिपटे राजनीतिज्ञ अपने बेटों को ही अपना सत्ताधिकारी घोषित करते हैं। उनके गुणगान-बखान में रैली-रेला आयोजित होते हैं। और लड़कियाँ...? उनके लिए राजनीति में आने की सोच तक पर पहरा जमा होता है। हाँ, जिन सियासी राजनीतिज्ञों के लड़के नहीं होते....वे अपने बेटियों को ‘प्रमोट/प्रोजेक्ट‘ अवश्य करते हैं। यह स्वभाव और चरित्र का उदारीपन नहीं है, बल्कि यह समझ के स्तर की काइयाँगिरी है जिसमें उनका लक्ष्याार्थ अपनी राजनीतिक वंशावली के ‘डीएनए’ को हर हाल में ‘सेफ-साउंड’ रखना होता है। यह एक कुटनीतिक चाल है जिसमें विकल्पहीनता की स्थिति में ही लड़कियों को राजनीतिक दावेदार के रूप में ‘बाई-प्रोडक्ट’ की भाँति इस्तेमाल किया जाता है। इस मुद्दे पर पूरी संवेदनशीलता के साथ अलग से विचार किए जाने की जरूरत है।

देव-दीप, यह स्थिति तब है जब भारतीय युवक-युवतियाँ जीवन के विविध क्षेत्रों में विभिन्न विकल्पों का सामना करते हैं; उन्हें कार्यान्वित करते हैं। यथा-पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, व्यावसायिक, वैश्विक इत्यादि। युवजन के लिए ये सभी जीवन के सक्रिय स्वभाव और व्यवहार हैं जिसका तात्पर्य है-ज्ञान, कुशलता और प्रतिबद्ध कार्रवाई एवं इन तीनों की परस्पर गहन अंतःक्रिया। आज भारतीय समाज इस अंतःक्रिया का अनुसमर्थक है; और हितचिन्तक भी। इस समर्थन या पैरोकारी की वजहे हैं-समाज में युवकों की विशिष्ट स्थिति, इसके मूल्यों एवं आदर्शों का सक्रिय आत्मसातीकरण, जीवनानुभव, यथार्थबोध, संचार की अभिप्रेरणा, पारस्परिक सम्बन्धों के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी प्रयासें इत्यादि। युवजन चेतना की ये विशिष्टताएँ राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया को समझने और युवजन आन्दोलनों और संगठनों के विकास की गत्यात्मकता की खोज करने के लिए बहुत जरूरी है।

चलो...., विस्तार से चर्चा होगी इस पर फिर कभी!

Monday, July 29, 2013

लद्दाख भी आसमान से धरती जैसा ही दिखाई देता है.....: रामजी तिवारी


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(पढ़िए रामजी तिवारी का लिखा लाज़वाब यात्रा-संस्मरण
‘लद्दाख में कोई रैन्चो नहीं रहता’ शीर्षक से;
परिकथा, जुलाई-अगस्त, 2013 अंक में प्रकाशित)

पहाड़ हवा में नहीं होते। वे ज़मीन पर होते हैं। इसीलिए मजबूती से टिके रहते हैं।
उनका ज़मीन से नाभिनाल रिश्ता है। रैन्चोगिरी की ख़ुमारी में डूबे हम पर्यटकों
से प्रायः वे भिन्न महत्व के होते हैं। दरअसल, इस रिश्ते के कई-कई छोर या सिरे होते हैं।
हमारे पाँव इन पहाड़ों को छूते हैं। हमारा देह इन पहाड़ों पर टिकते हैं, तो कई मर्तबा
पर्याप्त आॅक्सीजन न होने का रोना भी रोते हंै। ‘‘साँस उखड़ने की यह कमी लेह में उतरने के
आधे घंटे बाद इतनी शिद्दत से महसूस होने लगती है कि पहली बार आपको अपने स्वस्थ जीवन में यह एहसास भी हो जाता है कि साँस लेना भी एक जरूरी काम है।’’ जरूरी तो पस्त होते तबीयत के साथ पहाड़ों के मन-मिज़ाज को बूझना भी होता है। अक्सर ‘‘हम मैदानी लोगों के दिमाग में पहाड़ों को लेकर कितना भ्रम रहता है। हम सोचते हैं कि पहाड़, रास्ते के हिसाब से बंद जगहें होती हैं लेकिन यहाँ तो इस जगह(लद्दाख) का अर्थ ‘बहुत सारे रास्ते’ के रूप में खुलता है।’’ इसी के साथ खुलता है लोकरंग। ‘‘कुमायूँनी हो या गढ़वाली, हिमाचली हो या डोगरी या फिर लद्दाखी, सभी पहाड़ी लोक धुनों में एक खास किस्म की मस्ती, उल्लास, उमंग और रवानी पाई ही जाती है।’’ अगर आप घूमने निकले हों, तो ‘‘घूमने के लिहाज़ से यह आवश्यक होता है कि आप उस क्षेत्र के गाँवों और दूर-दराज के इलाकों से परिचित हों। विविधताएँ और खासपने की तलाश आपकी वहीं पूरी होती है। वहीं उस समाज का लोक भी बचा होता है, और संस्कृति भी। अन्यथा आप दिल्ली में हों या लन्दन में, न्यूयार्क में हों या मेलबोर्न में, सारे जगहों के पाँच-सितारा होटल एक ही जैसी विशेषताओं से सुसज्जित मिलेंगे।....मेरी राय में लेह जैसे जगहों पर शहरों की कुलाँचे भरती बदहवाश दुनिया को भी जरूर आना चाहिए कि वह इस तथ्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर सके कि पृथ्वी की छाती पर मूँग दलते हुए वह अपनी भौतिकता की खातिर जो खेल खेल रही है, आने वाले समय में उसका क्या हश्र हो सकता है। लेह में तो यह काम प्रकृति ने किया है, लेकिन शेष दुनिया में....?’’

Friday, July 26, 2013

यह ज़िन्दा गली नहीं है


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माही का ई-मेल पढ़ा। खुशी के बादल गुदगुदा गए।

जिस लड़की के साथ मेरे ज़बान जवान हुए थे। बुदबुदाए।

‘‘बिल्कुल नहीं बदली....’’

अंतिम शब्द माही का नाम था, उसे मन ने कह लिया था। लेकिन, मुँह ने मुँह फेर लिया।
(आप कितने भी शाहंशाह दिल हों....प्रेमिका से बिछुड़न की आह सदा शेष रहती है)

उस घड़ी मैं घंटों अक्षर टुंगता रहा था। पर शब्द नहीं बन पा रहे थे। रिप्लाई न कर पाने की स्थिति में मैंने सिस्टम आॅफ कर दिया था। पर मेरे दिमाग का सिस्टम आॅन था। माही चमकदार खनक के साथ मानसिक दृश्यों में आवाजाही कर रही थी। स्मृतियों का प्लेयर चल रहा था।

‘‘यह सच है न! लड़कियाँ ब्याहने के लिए पैदा होती हैं, और लड़के कैरियर बनाने के लिए ज़वान होते हैं। मुझे देखकर आपसबों को क्या लगता है?’’

बी.सी.ए. की टाॅप रैंकर माही ने रैगिंग कर रहे सीनियरों से आँख मिलाते हुए दो-टूक कहा था। तालियाँ बजी थी जोरदार। उसके बैच में शामिल मुझ जैसा फंटुश तक समझ गया था। माही असाधारण लड़की है। लेकिन, मैं पूरी तरह ग़लत साबित हुआ था। माही एम.सी.ए. नहीं कर सकी थी। पिता ने उसकी शादी पक्की कर दी थी। उस लड़के से जो एम. सी. ए. का क...ख...ग भी नहीं जानता था। माही ने एकबार भी इंकार नहीं किया था।(अपने माता-पिता या अपने अभिभावक का सबसे अधिक कद्र आज भी लड़कियाँ ही करती(?)हैं।)

माही का पति बिजनेसमैन है। स्साला एकदम बोरिंग। हमेशा नफे-नुकसान की सोचने वाला। शादी के बाद भी माही से जिन दिनों बात होती थी। वह बताती थी-‘‘राकेश की सोच अज़ीब है, वह मानता है कि सयानी लड़कियों को लड़कों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए; लड़कियाँ ख़राब हो जाती है।’’

‘‘ये सामान बेचने वाले हमेशा ख़राब-दुरुस्त और नफे-नुकसान की ही सोचते हैं...,’’

मैंने कहा। माही तुरंत फुलस्टाॅप लगा दी। विवाहित लड़कियाँ चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी हों अपने सुहाग(?)के बारे में ज्यादा खिंचाई बर्दाश्त नहीं कर सकती हैं। वैसे हम दोनों हँसे खूब थे।

अब तो उसकी हँसी सुने अरसा हो गया है। आज उसने ई-मेल किया है। वह भी यह बताने के लिए कि बच्ची हुई है...और स्वभाव में बिल्कुल मुझ पर गई है।

माही के बिल्कुल न बदल सकने वाली बात ऊपर के पैरे में मैंने इसीलिए कहा था।

‘‘ओए मंजनू के औलाद...सो गए,’’

‘बोल न कम्बख़्त, क्या मैं किसी को चैन से याद भी नहीं कर सकता...., दो मिनट!’’

‘‘खुद तो माही महरानी बन गई...अब माताश्री भी; मजे लो...।’’

पार्टनर जीवेश और मेरी खूब बनती थी। उसने मुझे माही पर एतबार करते हुए, उसके लिए अपना सबकुछ लुटाते हुए देखा था...अब उन्हीं आँखों से मुझे लूटते हुए भी देख रहा था।.....
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(कहानीकारों की ज़िन्दा कौमे हैं....अफ़सोस गलियां ज़िन्दा नहीं हैं.....खै़र! फिर कभी...)

Thursday, July 25, 2013

यही सच है!


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आज दीपू
तुम्हारा जन्मदिन
और मैं बेरोजगार
चाहता हूँ
तुम्हारी हँसी उधार.....!

Tuesday, July 23, 2013

बीएचयू : यह हंगामा है क्यों बरपा?


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बीएचयू में फीसवृद्धि का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। विश्वविद्यालय के
विद्यार्थियों में रोष व्याप्त है। बीएचयू प्रशासन इस सम्बन्ध में
निर्लिप्त है। यह कहना ग़लत होगा। वह जानबूझकर इस मुद्दे को बेपरवाही के
साथ ‘हैंडिल’ करता दिखाई दे रहा है। प्रशासन और अकादमिक अधिकारियों की
अक्षमता या कहें मिलीभगत ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग में रंग दिया है।
परिसर में विरोध-प्रदर्शन, पुतला-दहन, ज्ञापन इत्यादि का सिलसिला हफ़्ते
भर से जारी है। बीएचयू सिंहद्वार के समीप प्राॅक्टर-फोर्स लाठी-डंडे के
साथ तैनात है सो अलग। परिसर में तनाव का बाना इस कदर बुना हुआ है कि
सामान्य विद्यार्थियों में भय और खौफ पैदा होना स्वाभाविक है।

संकट की इस घड़ी में विश्वविद्यालय का प्रशासनिक अमला हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
मानों उसने अपनी बुद्धि की बत्ती ही बुझा दी हो। दरअसल, शुल्कवृद्धि की वजह से
आर्थिक रूप से विपन्न विद्यार्थियों के ऊपर बड़ा बोझ डाल दिया गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन यहाँ पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के भूगोल से
परिचित नहीं है; ऐसा नहीं है। यह सबकुछ सोची-समझी रणनीति के साथ हुआ
है। इसका एक संदेश तो यह जा रहा है कि बीएचयू प्रशासन गरीबों को बेहतर
शिक्षा दिए जाने का पक्षधर नहीं है। दूसरा यह क़यास भी लगाया जा रहा है कि
यह फैसला चुनाव से ठीक पहले छात्र-राजनीति या छात्रसंघ बहाली की मांग को
धार देने के लिए किया गया है। फिलहाल, फीसवृद्धि के फैसले को लेकर
छात्र-छात्राओं में एकजुटता बढ़ी है। वे फीसवृद्धि के ख़िलाफ अपनी आवाज़
बुलन्द करने में जुटे हैं।

यह विडम्बना ही है कि फीसवृद्धि का लिहाफ़ लेकर विश्वविद्यालय-प्रशासन सड़कों का मरम्मतीकरण और खाली जगहों का उद्यानीकरण करना चाहता है। महामना मदनमोहन मालवीय ने इस गुरुकुल की परिकल्पना जिस महान उद्देश्य को आधार बनाकर की थी आज वे हाशिए पर हैं। यह विश्वविद्यालय ज्ञान, साहित्य, समाज, कला, वाणिज्य, नवाचार, शोध, सर्जनात्मकता इत्यादि में उच्चस्तरीय नेतृत्व की भूमिका निभाने में अक्षम है। परिसर के ‘आउटलुक’ को बनाने या उसे सजाने-सँवारने में जो धन अपव्यय हो रहा है; उसे यदि विद्यार्थियों के मानसिक विकास, स्वतन्त्र चिन्तन, ज्ञानात्मक प्रबन्धन, कला-कौशल, जीवनबोध व मूल्य-संवर्द्धन इत्यादि के लिए किया जा रहा होता, तो आज फीसवृद्धि को लेकर यह हंगामाखेज दृश्य शायद! ही देखने को मिलता।


Sunday, July 21, 2013

हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है....!


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(शोध-पत्र: निष्कर्ष)

जल्द ही....!

चुनावों में मरघटिए का टंट-घंट मत छानिए


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शशि शेखर अख़बार के सम्पादक हैं। समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ में उनकी
वैचारिक-टीआरपी जबर्दस्त है। वे जो लिखते हैं, सधे अन्दाज़ में। उनका साधा
हर शब्द ठीक निशाने पर पड़ता है या होगा, ऐसी मैं उम्मीद करता रहा हूँ
(फिलहाल नाउम्मीदगी की बारिश से बचा जाना नितान्त आवश्यक है) लेकिन, कई
मर्तबा वे जो ब्यौरे देते हैं, तर्क-पेशगी की बिनाह पर अपनी बात रखते
हैं; उसमें विश्लेषण-विवेक का अभाव होता है। यानी वे अपने विचार से जिस
तरह पसरते हैं, उनकी तफ़्तीश से कई बार असहमत हुआ जा सकता है। खैर!
पत्रकारिता भाषा में तफ़रीह नहीं है, यह शशि शेखर भी जानते हैं और मैं भी।
बीते ढाई दशक में उनकी कलम ने काफी धार पाया है, चिन्तन में पगे और चेतस
हुए हैं सो अलग। यह मैंने कइयों से सुना है...और उनसे भी।

अब मुख्य बात। शशि शेखर के लोकप्रिय रविवारीय स्तम्भ ‘आजकल’ में आज का
शीर्षक है-‘‘चुनावों को महाभारत मत बनाइए’’। इसमें उनका कौतूहल देखने
लायक है-‘‘पुरजवान होती इक्कीसवीं सदी के हिन्दुस्तानी सियासतदां अपने ही
इतिहास से सबक क्यों नहीं लेते? वे कबतक नफरत के भोथरे तर्कों को नया
जामा पहनाते रहेंगे? वे कबतक हमारे शान्ति पसन्द समाज को बाँटने की कोशिश
करते रहेंगे? वे हम पर तरस क्यों नहीं खाते? हम हिन्दुस्तानी हैं, सिर्फ
वोट बैंक नहीं।’’

ऐसे कुतूहल शशि शेखर जी जैसों के लिए सेहतमंद नहीं है। आप किस पर तरस
खाने की बात कर रहे हैं? भारतीय जनता के ऊपर जो चुनावों में हर एजेण्डे,
साँठ-गाँठ, जोड़-तोड़, जाति-धर्म, संस्था-समुदाय, भाषा-तहजीब इत्यादि से
ऊपर उठकर(तमाम षड़यंत्रों अथवा कुचक्रों के अस्तित्वमान होते हुए भी) अपना
निर्णय सुनाती आई है; जिसने भाजपा के ‘इंडिया शाइंनिग’ से लेकर बसपा के
‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ तक को अप्रत्याशित पटखनी दी है? उस कांग्रेस
को ठेंगा दिखाया है जिसके मीडिया-युवराज राहुल गाँधी पर पार्टी की ओर से
लाख एतबार-पेशगी के बावजूद जनता की दिलचस्पी लेशमात्र नहीं है।(वैसे
कांग्रेस में उनसे बेहतर कई युवा राजनीतिज्ञ हैं) तभी तो, आप इस बात का
जिक्र करना नहीं भूलते हैं-‘‘राहुल गाँधी ने पिछले अप्रैल में जब सीआईआई
को सम्बोधित किया, तो एक वर्ग(पंक्तिलेखक युवा लिखना भूल गए) ने सोशल
मीडिया पर उन्हें ‘पप्पू’ की उपाधि से नवाज दिया।’’

अतः उपर्युक्त उदाहरणों से ज़ाहिर है कि भारतीय आबादी ‘मुर्दों का टीला’
नहीं है, लिहाजा चुनावी मौके पर हमें भी मरघटिए का टंट-घंट नहीं छानना
चाहिए। यह ख़्याल रखा जाना आवश्यक है कि हमारे किए-धरे, कहे-सुने पर आज भी
जनता सबसे अधिक विश्वास करती है, अपनी आत्मा में सच के ज़िन्दा होने का
ढ़िढोरा पिटती है। इसलिए हमारे लिखे का वैचारिक-अर्थ निकसे न कि
वैचारिक-अर्थी; ऐसी निगाहबानी जरूरी है।

और जहाँ तक नरेन्द्र मोदी का सवाल है, तो उनका व्यक्तित्व निश्चित ही
नेतृत्व-सम्पन्न है। उनके उवाच में प्रभाव का रंग है। राजनीति की उनकी
समझ(चालाकियाँ) इतनी साफ/निखरी हुई है कि वे जर्रे-जर्रे का इस्तेमाल
अपने पक्ष, हित अथवा वोट-बैंक भुनाने के लिए कर सकते हैं।(यह मान लेना भी
अतिरेक से भरा और भ्रामक है) बकौल शशि शेखर-‘‘बड़े जतन से
उन्होंने(नरेन्द्र मोदी) खुद को इस लायक बनाया है कि उनकी प्रसिद्धि
गुजरात और देश की सीमाओं से लांघकर समूची धरती पर फैलने लगे। लोग उन्हें
पसन्द करें या नापसन्द, पर राजनीति के जंगल में उन्होंने अपनी जगह बनाने
में कामयाबी हासिल कर ली है।’’

यहाँ भी शशि शेखर जी को याद रखना चाहिए कि भारतीय राजनीति जंगल नहीं है।
अगर जंगल-राज होता, तो आप पिछले वर्ष यूपी में बेहद रचनात्मक ढंग से
चुनावी-तैयारी, अभियान, जनमुहिम, संघर्ष या व्यावहारिक परिवर्तन(चुनाव
ख़त्म अब काम शुरू) इत्यादि का ‘अपना मोर्चा’ नहीं ठानते; इस ज़मीन में खुद
को नहीं गोड़ते; आप वह सब नहीं करते जिससे भारतीय लोकतंत्र की गरिमा
‘पुनर्नवा’ होती है।

शशि शेखर जी की सलाहियत दुरुस्त है। हमें अपने चुनावों को महाभारत बनने
से रोकना होगा। इससे ईश्वरवाद और भाग्यवाद के कुकुरमुते पनपते हैं। इससे
हमारा नागरिकपना ख़त्म होता है। हम यूटोपिया-चिन्तन में दाखिल अवश्य होते
हैं, लेकिन उसे साकार करने का औजार भूल गए होते हैं। मेरी समझ से, अतीत
की बात पर श्रद्धा ठीक है। परन्तु उसका बेवजह इस्तेमाल ख़तरनाक है। हमें
चुनावों में अपने विवेक-कौशल, बुद्धि-व्यवहार, दृष्टि-चेतना इत्यादि के
सहारे चुनावी लड़ाई लड़नी चाहिए जिसका हिमायती खुद आप भी हैं। हमें उन बौने
युवा राजनीतिज्ञों(वंशवाद के उत्तराधिकारी) को राजनीतिक-पास देने से बचना
चाहिए जिनसे जनता को रू-ब-रू कराने का जिम्मा कई बार समाचारपत्रों के ऊपर
भी लाद दिया जा सकता है।

अतएव, हमें चुनावी सरगर्मियों का आकलन-विश्लेषण करते समय भारतीय नागरिकों
की ओर से सहृदयता बरतने की हरसम्भव कोशिश करनी चाहिए; ताकि हमारे ये
प्रयत्न तमाम भूलों के बावजूद भारतीय चिन्तन, विचार, दृष्टि, परम्परा,
तहज़ीब, उसूल इत्यादि को दृढ़ सम्बल प्रदान कर सके; भाग्य की लेखी कहे जाने
वाले पाखण्ड का नाश कर सके...और हम बढ़ सके लोकतंत्र के जनपथ पर अपनी
भारतीय जीवन-राग एवं जीवन-मूल्यों को गाते-गुनगुनाते हुए; ‘वीर तुम बढ़े
चलो, धीर तुम बढ़े चलों की टेक पर। आमीन!

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हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...