Thursday, February 7, 2013

नदी


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प्यास लगी
तो बचे-खुचे धैर्य के साथ
पसरी रेत पर
जरूरतमंद रेत ने
नदी के प्यास को
अपनी प्यास की भूख समझ
खा लिया
नदी ने उफ! तक नहीं की
अंतिम क्षण तक
नदी कहती रही थी
‘मैं सिर्फ नदी नहीं हँू
हँू रेत की माँ’

घर के आँगन में
एक बेटी जन्मी है
सुना है
उसका भी नाम है-‘नदी’ 

जब तक नदी है
संभावनाएँ अनन्त हैं
और रेत के पास मौके अनगिनत।

निजी रियासत बनते विश्वविद्यालय


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अध्यापकीय पेशे से जुड़े ज्ञानावलम्बियों का धुर्त होना अक्षम्य है। लेकिन, वे आज निरपराध घोषित हैं। गुणवत्ता के मानक पर फिसड्डी साबित हो रहे विश्वविद्यालयों के बारे में जताई जा रही चिन्ता फिजू़ल नहीं है। राष्ट्रपति भवन में हाल ही में आयोजित केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के सम्मेलन में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने इस बाबत बेहद अफसोस जताया है। उनकी मुख्य चिन्ता यह है कि हालिया सर्वेक्षण से उजागर तथ्य में यह कहा जा रहा है कि विश्व के टाॅप 200 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का एक भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं है। प्रश्न है कि जब उच्च शिक्षा में अध्यापकों की नियुक्ति में ही बड़ी धांधली हो रही है, तो फिर अन्य सम्बन्धित चीजों के अप्रभावित रहने की गुंजाइश ही क्या बचती है? उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापक के रूप में नियुक्त हो रहे अधिसंख्य अभ्यर्थी साँठ-गाँठ और जुगाड़-पैरवी में उस्ताद हैं। उनकी ‘मास्टरी’ सम्बन्धित विषय या अनुशासन में नगण्य है। लेकिन, उनके चयन के पीछे जो गणित या समीकरण है; वह नेटवर्क बेहद प्रभावशाली और ऊपरी पहुँच का है।    

पिछले दिनों खुद के साथ घटित एक वाक्या यह पंक्तिलेखक प्रस्तुत करना चाहता है। 30 अक्तूबर, 2012 को हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय में इंटरव्यू होना तय था। पत्रकारिता एवं सर्जनात्मक लेखन पाठ्यक्रम में अस्सिटेंट प्रोफसर पद के लिए आरक्षित कोटे से चयन होना निश्चित था। हिन्दी पत्रकारिता के व्यावहारिक पक्ष को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से चलाए जा रहे प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता) पाठ्यक्रम से परास्नातक यह पंक्तिलेख जनसंचार एवं पत्रकारिता विषय में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा 2010 में ही उतीर्ण कर चुका है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में कनिष्ठ शोध अध्येता के रूप में अनुसन्धानरत इस पंक्तिलेखक को उस समय तगड़ा झटका लगा जब उससे इंटरव्यूकर्ता यह पूछ बैठे कि यहाँ आने से पहले आपको यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए था कि इस पाठ्यक्रम के निर्देश की भाषा सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी है।

यह सवाल तब किए गए जब यह पंक्तिलेखक पी.पी.टी. प्रजेन्टेशन के लिए 12 स्लाइड्स अंग्रेजी-हिन्दी मिश्रित भाषा में इस विषयवस्तु को आधार बनाकर प्रस्तुत था कि 21वीं शताब्दी में नानाविध चुनौतियों और संकटों से घिरी पत्रकारिता को सर्जनात्मक लेखन से जोड़े जाने की आवश्यकता क्योंकर है? वे इस बात को मानने से ही इंकार कर रहे थे कि हिन्दी भाषा जनसंचार और पत्रकारिता जैसे पश्चिमी माॅडल को ‘कैरी’ करने में सक्षम है। आई. सी. टी. के ‘इनोवेशन’(नवाचार) और ‘कन्वर्जेंस’(अभिसरण) आधारित इस युग में हिन्दी की उपयोगिता कहानी, कविता, उपन्यास इत्यादि साहित्यिक विधाओं या रचना-कर्म से भिन्न भी कुछ हो सकती है; इसको लेकर वे पूर्णतः आश्वस्त नहीं थे। स्पष्टतः फिल्म, विज्ञापन, सांस्कृतिक-व्यापार व अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध, सूचना-समाज इत्यादि में हिन्दी के माध्यम से हो रहे अभूतपूर्व और हस्तक्षेपकारी बदलाव उनकी आँखों से ओझल थे। वह भी तब जबकि हिन्दी मीडिया सेक्टर उत्तरोत्तर ‘बूम’ पर है। यानी वैसे संभावनाशील समय में जब हिन्दी जीवन के हर क्षेत्र, विषय और सन्दर्भ में निर्णायक भूमिका निभा रहा है; हिन्दी को लेकर यह कुंठा कैस सही ठहरायी जा सकती है?

इससे पूर्व में बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय ने भी इस पंक्तिलेखक को इंटरव्यू में शामिल होने नहीं दिया था। जबकि न्यूनतम योग्यता वाले अभ्यर्थी तक को बुलावा-पत्र भेजे गए थे। इस बाबत पूछने पर उनका साफ तर्क था कि यूजीसी आपको पात्रता दे चुका है, इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आप हमारे विश्वविद्यालय के चयन-कमिटी के मानक को भी ‘फुलफिल’ कर लें। उन्होने एक नया झूठ गढ़ा, वह यह कि प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता) जैसा कोई भी पाठ्यक्रम यूजीसी से सम्बद्ध नहीं है।

खुद की मेहनत पर गुमान करने वाले इस पंक्तिलेखक को उस समय भारी सदमा पहुँचा था। वजह कि एक ओर किसी विद्यार्थी की गुणवत्ता को सराहते हुए ‘जेआरएफ’ का तमगा दिया जाता है, तो दूसरी ओर उसके साथ यूजीसी के तय मानकों से अलग ‘पैटर्न’ पर खड़ा करते हुए विश्वविद्यालय के नए रियासदार भयंकर कुचक्र भी रचते हैं?

खैर, ज्ञान सदैव भावुकता से परे होता है। संकल्प-विकल्प और विवेक-विक्षोभ से पूरित मेरे अन्तर्मन के लिए मंजिल इससे काफी आगे है। 

Monday, February 4, 2013

अभ्युत्तथान: फिल्म स्क्रिप्ट का आॅउटनोट्स


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नयनतारा उन भारतीय महिलाओं में से है जो अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य को लेकर फिक्रमंद रहती है। अस्थायी नौकरी के बीच नयनतारा तलाकशुदा ज़िन्दगी जी रही है। रोहन उसका बेटा है और रोहिणी बेटी। नयनतारा काॅलोनी के मानिंद लोगों से बहुत कम कमाती है, लेकिन रोजमर्रा के खर्च में कटौती बेहिसाब करती है।

उसका सपना है कि रोहन और रोहिणी सोसाइटी के पब्लिक स्कूल में पढ़े। लेकिन वहाँ दाखिला नहीं मिलती है। स्कूल से निराश हो कर लौट रही नयनतारा की मुलाकात वार्डेन कालिन्दी से संयोगवश तब होती है जब उसका पति उसे स्कूल छोड़ने या तलाक देने के लिए कह रहा होता है।

खुद तलाकशुदा नयनतारा परेशानहाल कालिन्दी से अपना जीवनगाथा शेयर करती है। वह बताती है कि वह पहले से कितना बेहतर और मानसिक रूप से खुद को संतुष्ट एवं सुरक्षित महसूस कर रही है। कालिन्दी जिसकी अर्सी नाम की 6 साल की बेटी है; वह नयनतारा के हौसले और साहस को देखकर उसी समय अपने पति को स्पष्ट शब्दों में तलाक के लिए हाँ कह देती है।

नयनतारा जो निम्न मध्यवर्गीय परिवार से है जब उच्च मध्यवर्गीय परिवार की कालिन्दी के सम्पर्क में आती है तो उसे अहसास हो जाता है कि धन होने से घर में सामान बढ़ जाता है; संस्कार या मानसिकता बदलती है। यह जरूरी नहीं है। हर पुरुष तो नहीं, लेकिन, भारत के अधिसंख्य पुरुष श्रेष्ठताबोध की ग्रन्थि से ग्रस्त रहता ही रहता है।

नयनतारा के बच्चों का स्कूल में प्रवेश कालिन्दी के सहयोग से हो जाता है। नयनतारा भावातिरेक और खुशी में एक गीत गाती है। कालिन्दी गीत सुनती है, तो जिज्ञासाभाव से उसे और कुरेदती है। नयनतारा बताती है कि उसे ढेरों लोकगीत याद हैं जो उसने बचपन में सुन रखा है।

कालिन्दी नयनतारा के साथ मिलकर एक प्लान बनाती है। दोनों मिलकर सारे गीतों का कलेक्शन करती हैं। नयनतारा अपने हमउम्र औरतों से भी कालिन्दी को मिलाती है। इस तरह एक किताब का फार्मेट तैयार होता है। पुस्तक का नाम लाख माथापच्ची के बावजूद वे नहीं तय कर पाती हैं। हरीश रावत जो एक बड़ा प्रकाशक है; कालिन्दी का दोस्त है। वह इस पुस्तक के प्रकाशन का सारा खर्च उठाने को तैयार हो जाता है।

नयनतारा कालिन्दी को आगाह करती है। हरीश की आँख ठीक है लेकिन उसकी पुतली उसे प्रायः ग़लत ढंग से घूरती है। कालिन्दी हरीश के बड़प्पन और महानता का किस्से सुनाती है कि दोनों काॅलेज के फ्रेण्ड हैं। एक-दूसरे के बीच ग़लत कुछ हो ही नहीं सकता है। 


कालिन्दी को जल्द ही अहसास हो जाता है। नयनतारा सही कह रही थी। वह नयनतारा से माफी मांगती है। अब प्रकाशन के लिए दोनों चन्दा जुटाती है। दूसरे प्रकाशकों से मिलती है, लेकिन हरीश के स्टेटस से प्रभावित लोग पुस्तक छापने के लिए तैयार नहीं होते हैं। प्रकाशन संस्थान में व्याप्त भ्रष्टाचार और बाज़ार का मकड़जाल उजागर होता है।

हरीश कालिन्दी को फिर आॅफर करता है। मुहमांगी रकम देने की पेशकश करता है। बात नहीं बनती, तो चतुराईपूर्वक नयनतारा को बदनाम करता है। नयनतारा की बेटी रोहिणी को स्कूल में एक लड़के से कथित प्रेम के आरोप में निष्कासित कर दिया जाता है। नयनतारा का लड़का रोहन ग़लत संगत में पड़ पैसे का दुरुपयोग कर रहा होता है। सिगरेट पीने की लत उसे लग चुकी है।

कालिन्दी और नयनतारा इस कठिन समय में भी हिम्मत नहीं छोड़ती हैं। अपने पुस्तक के प्रकाशन के लिए पैसे एकजुट कर रही होती हैं कि एक दिन कालिन्दी की लड़की अर्सी सिढ़ियों से लुढ़ककर गिर जाती है। गंभीर चोट की वजह से अस्पताल के आइसीयू में रखा गया है।

वहीं नयनतारा कालिन्दी को हौसला आफजाई के लिए एक गीत गाती है। पूरा अस्पताल इसमें शामिल होता है। डाॅ0 अभय जो उस अस्पताल के मशहूर न्यूरो-फिजिशियन हैं, नयनतारा के गीत के बोल सुन भावुक हो जाते हैं। वे कालिन्दी और नयनतारा की हरसंभव मदद करते हैं। पुस्तक का नाम एक मीटिंग में तीनों मिलकर ‘अभ्युत्तथान’ रखते हैं।

डाॅ0 अभय का दोस्त अकुल एक बहुत बड़े प्रकाशन कंपनी में है। वह कालिन्दी और नयनतारा को उसके पास भेजता है। दोनों साफगोई के साथ इस पुस्तक को लेकर हुई सारी परेशानी अकुल से शेयर करती है। अकुल अपने बाॅस से मिलवाने के लिए नयनतारा और कालिन्दी को ले जाता है। वहाँ डाॅ0 हरीश पहले से पहुँचा है और उसकी प्रकाशन कंपनी के मालिक से तिखी झड़प हो रही है। वह बाहर गुस्से में निकलता है। सामने नयनतारा और कालिन्दी को देख एकबारगी चौंक जाता है।

अतुल अपने बाॅस से नयनतारा और कालिन्दी को मिलाता है। हरीश के बारे में दोनों ने अतुल को अभी-अभी ही बताया होता है, सो वह बड़ी होशियारी से इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए राजी कर लेता है।

पुस्तक छप जाती है। लेकिन उसके बिकने का संकट सामने आता है। कालिन्दी और नयनतारा को समझ में आता है कि पुस्तकों की बिकावली के लिए भी गणित और समीकरण दुरुस्त होने चाहिए।

इस समस्या का हल भी निकल जाता है। रोहन, रोहिणी और अर्सी इसका बीड़ा उठाते हैं। तीनों गीत गाते हुए नुक्कड़-प्रदर्शन करते हैं। कालिन्दी और नयनतारा उस पुस्तक की प्रतियाँ बेच रही होती हैं।

देखते-देखते पुस्तक ‘अभ्युŸथान’ की सभी प्रतियाँ बिक जाती हैं। कालिन्दी और नयनतारा को एक व्यावहारिक ज्ञान होता है। भारत में पुस्तक के पाठकों की कमी नहीं है। बल्कि पुस्तक माफियाओं ने लेखकों/साहित्यकारों की आत्मा को खरीद लिया है। लेखक, साहित्यकार या बुद्धिजीवी सार्वजनिक जीवन में नहीं बोलते हैं। उन्हें प्रायोजित कार्यक्रमों, विश्वविद्यालय गोष्ठियों तथा निजी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थानों-संगठनों ने हथिया लिया है या वे इन पूँजीबाड़ों के गिरफ्त में अपनी वास्तविक चेतना नष्ट कर चुके हैं।

कालिन्दी और नयनतारा ने अभ्युत्तथान नाम से पुस्तकशाला खोल दिया है। वे पुस्तकों को ‘भाव एवं विचारों का जनसंग्राम’ मानते हुए पूरे देश के पाठकों को जागरूक करने का बीड़ा उठाती हैं।

पुस्तक बाज़ार से निकलकर लोक से जुड़ती है, तो लोकमंगल की भावना का विस्तार होता है। सभ्यता, संस्कृति, समाज, राजनीति...सभी का अभ्युत्तथान होता है।

कविता पर कहानी

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बनारस शहर कवियों का गढ़ है। आभावान कवियों को देखकर कई जन कवि हो जाते हैं। संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात वाली कहावत। या कहें संगत का रंगत।

दरअसल, मेंहदी जिसकी हथेली पर रची जाती है उसी पर अपना रंग नहीं छोड़ती, बल्कि मेंहदी लगाने वाले हाथ को भी रंगीन कर देती है, जरा-मर्रा। और यह किसी तरह का चोरकटई भी नहीं है।

एक दिन इस गढ़ में कविता-प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। सभी से प्रविष्टियाँ माँगी गई। मैं ठहरा हिन्दी पत्रकार। कविता देख-पढ़ लेता हँू। सूझती कतई नहीं। और कविता वैसे भी हृदय का मामला है। मस्तिष्क का खेल नहीं।

खैर, सोचा कि कविता के लिए क्या कोई नियम-कानून है। मालूम नहीं। सो, लिखा और भेज दी। कविताएँ एक की जगह तीन थीं।

1.
उनकी तनख़्वाह
चालीस हजार है
लेकिन, जब भी वे चाय पीते हैं
पैसा मुझे देनी पड़ती है
वे सिर्फ कहते हैं, गुरु! महंगाई डायन खाए जात है।

2.
अस्सी घाट
तीनों लोक से प्यारी काशी में है
जो वहाँ सिगरेट पीते हैं
तीनों लोक का मजा लेते हैं
जो वहाँ गाली देते हैं
तीनों लोक से प्यारी गाली देते हैं
जो वहाँ बोलते हैं
तीनों लोक से दमदार बोलते हैं

क्या आपने देखी है, काशी की अस्सी
जो तीनों लोक से प्यारी काशी में है।

3.

मेरे सात साल के बेटे देव ने एक दिन पूछा
डाॅक्टर के बीमार होने पर
उसकी इलाज कौन करता है
मैंने उसके सवाल से पिण्ड छुड़ाने के लिए कहा-भगवान
और भगवान के बीमार होने पर, उसने फिर पूछा
मैंने कहा-‘मैं’
लेकिन, आप तो कभी जाते नहीं; बोला देव

आज उसे ले कर मंदिर आया
उसने पूछा, भगवान की बीमारी आप कब तक ठीक कर दोगे
मैं अचकचा गया
बगल की महिला ने कहा
बेटे! भगवान सबकी बीमारी ठीक करते हैं
आपसे किसने कहा कि भगवान बीमार है
और उसे ठीक करने की जरूरत है
देव ने मेरी ओर देखा
कहा कुछ भी नहीं, हँस दिया सिर्फ
दरअसल, देव ने मेरी झूठ पकड़ ली थी
और यह पहली बार नहीं हुआ था।

आज इन तीनों कविेताओं के पुरस्कृत होने की सूचना मिली है। लोग कह रहे हैं-कविता के गढ़(?) में तुम्हारे कवि हो जाने का अंदेशा हमें पहले से थी।

हे! भगवान, लोगों ने मेरा लिखा पढ़-पढ़कर मुझे कवि मान लिया। नोबल पुरस्कार के आयोजकों आप कहाँ हो।

जंगल के बारे में


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सच पूछिए
जिस जंगल से
मेरा कोई दरकार नहीं है

उस जंगल के बारे में
मैंने पढ़ा है
यह जाना है
कि वहाँ कोई भव्य शादी नहीं करता
कि वहाँ कोई दिव्य दावत नहीं देता
कि वहाँ कोई एम्स या आईआईटी संस्थान नहीं खुलता
कि वहाँ कोई बिड़ला अपनी मन्दिर नहीं बनाता
कि वहाँ कोई फिल्म समारोह आयोजित नहीं होता
कि वहाँ कोई सूचना-राजमार्ग नहीं पहुँचता
कि वहाँ वैसा कुछ भी नहीं होता
...जो आज के कथित उत्तर आधुनिक समाज में होता है

जबकि वहाँ लोग रहते हैं
जबकि वहाँ जीवन का संकट है
जबकि वहाँ परिस्थितियाँ विकट है

तब भी जंगल में बसे लोग जंगल को प्यार करते है जबर्दस्त

सच पूछिए
जिस जंगल से
मेरा कोई दरकार नहीं है

उस जंगल के बारे में
मैंने पढ़ा है
यह जाना है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे मौलिक अधिकार से नहीं है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे देश के संविधान और सरकार से नहीं है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे विकसित होते शहर से नहीं है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे कला, साहित्य, संस्कृति व शिक्षा से नहीं है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे अर्थ-व्यापार, शेयर, बीमा व बैंकिंग से नहीं है

जबकि वहाँ लोग रहते हैं
जबकि वहाँ जीवन का संकट है
जबकि वहाँ परिस्थितियाँ विकट है

तब भी जंगल में बसे लोग जंगल को प्यार करते है जबर्दस्त

सच पूछिए
जिस जंगल से
मेरा कोई दरकार नहीं है

उस जंगल के बारे में
मैंने पढ़ा है
यह जाना है
कि वहाँ संगीनों का बोलबाला है
कि वहाँ बाहरी गुर्गे तैनात हैं
कि वहाँ ज़मीनों की लूटमार है
कि वहाँ वह सब है
जिसमें वहाँ के लोगों की मिलीभगत नहीं है

जबकि वहाँ लोग रहते हैं
जबकि वहाँ जीवन का संकट है
जबकि वहाँ परिस्थितियाँ विकट है

तब भी जंगल में बसे लोग जंगल को प्यार करते है जबर्दस्त

सच पूछिए
जिस जंगल से
मेरा कोई दरकार नहीं है

उस जंगल के बारे में
मैंने पढ़ा है
यह जाना है
कि बाहरी लोगों का सम्बन्ध और सरोकार वहाँ की मूल आत्मा से नहीं है
कि बाहरी लोगों का सम्बन्ध वहाँ की भाषा और संवेदना से नहीं है
कि बाहरी लोगों का सम्बन्ध वहाँ की स्थानीय भूगोल और मानचित्र से नहीं है

जबकि वहाँ लोग रहते हैं
जबकि वहाँ जीवन का संकट है
जबकि वहाँ परिस्थितियाँ विकट है

तब भी जंगल में बसे लोग जंगल को प्यार करते है जबर्दस्त

क्या आप भी पढ़ते हैं अख़बारों में जंगल के बारे में
या गढ़ते हैं कविता अपने चेहरे के आइने पर....फेसबुक पर मेरी तरह।

Monday, January 28, 2013

Weeping Forest


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जंगल में शेर राजा होता है। इस शास्त्रानुसार जंगल का राजा शेर को ही होने चाहिए थे। लेकिन, इस जंगल का सर्वेसर्वा रानी थी। रानी का विवाह जिस शेर से हुआ था; उनके बाप-दादे राजा थे। यानी राजपाट शेर का खानदानी पेशा था। शेरू जिसे कई माह से राजा बनने का प्रशिक्षण दिया जा रहा था। आज अकेले पूरी बिरादरी भर का शिकार ले आया। इस अवसर पर भोज आमंत्रित हुए। शेरू की प्रशंसा में तालियाँ पिटी गई। जयजयकार हुए। गुणी लोग गुणगान करने आगे आए।

शेरनी की बाँछे खिल गई। शेरू के महानतम राजा बनने की बात सुन-सुनकर ही वह निहाल हो चुकी थी। आँख से आँसू ढरक लिए। पूरा जंगल उसका नेतृत्व स्वीकारता है; यह सोच कर ही वह अपने मातृत्व को धन्य समझ रही थी। उस रोज सर्वसम्मति से निर्णय हुआ-‘अगला राजा शेरू होगा। शेरू अपने वंशजों का नाम रौशन करेगा। माता रानी शेरनी की अपेक्षा और आशा भी यही है।’’ ’

जंगल में शेरनी के कारिन्दों ने ख़बर फैला दी। पूरे जंगल में जगह-जगह पोस्टर लग गए। कहीं-कहीं शोर कर, चिल्ला कर यह बात सबको जनाई गई।

हिरू जो हिरन का लड़का था। अप्रत्याशित ढंग से खुश था। क्योंकि शिकारी द्वारा वध किए गए शिकार को अपना शिकार कहने का आइडिया शेरू को उसी ने दिया था। शेरू हिरू को मानता बहुत था। इसलिए उसे यह आइडिया जँची। इसके बदले में शेरू उसके साल भर तक के भोजन का जिम्मा स्वयं ले चुका था।

जंगल में चुनाव होना था। तैयारी जोर-शोर पर थी। चुनावी टंट-घंट चल रहे थे। शेरू का प्रतिद्वंद्वी कोई नहीं था; ऐसा नहीं था। दो-तीन जन शेरू को कड़ा टक्कर दे रहे थे। आपस में इसके लिए रणनीति तय की गई। चुनाव में शेरू की जीत हो ली।

यह क्या? शेरू ने नियम बना दिए कि जनता की भाषा में राजकाज नहीं होगा। उनकी बात नहीं सुनी जाएगी। जो भी समस्या हो। वे हमारी भाषा में बात करें। सबका निवारण होगा। भाषा की समस्या के लिए नए ट्रेनिंग स्कूल खोलने की बात चली। उससे पहले टीचरों को प्रशिक्षित होने के लिए दूर-देश के जंगल भेजा गया।

शेरू वहीं से पूर्व-प्रशिक्षित था। वे वहाँ सामाजिक मौज किए। वहाँ के रहन-सहन का लुत्फ उठाया। भाषा भी सीख ली थी। भाषा बस आदेश देने लायक, इनकार और राजी होने भर तथा थोड़ी ऊंची आवाज़ में रौब झाड़ने की थी। शेरू ने कहा, बस इतना ही काफी है।

हिरू इस निर्णय के खिलाफ था। वह बगावती तेवर अपनाये हुए था। उसका कहना था कि जनता की बात जनता की भाषा में हो। शेरू ने तर्क दिया कि इस जंगल में सभी जानवरों की भाषा एक नहीं है। संवाद करने में कठिनाई होती है। हीनताबोध होता है सो अलग। बाहरी भाषा सुसंस्कृत है। आज़ाद ख्यालों की है। उसमें संवाद करने से हमारे व्यक्तित्व का विकास होगा।

हिरू अड़ गया। उसने शेरू से कहा कि मैं तुम्हारा पोल सार्वजनिक कर दूंगा।

शेरू ने हिरू को समझाया काफी। पर उसकी एक न चली। शेरू ने उसकी गरदन मरोड़ दी। दो दिन तक शेरू शोकग्रस्त रहा था। उसे अफसोस था कि वह अपने नासमझ मित्र को अंत तक समझदारी न सिखा पाया।

उधर इस घटना के बारे में तरह-तरह की चर्चाएँ हैं। उसके परिजन कहते हैं कि हिरू नासमझ था। अपना हित न सोचकर उसने हम सबका अहित ही किया है। उसे शेरू से मित्रता का फायदा उठाना चाहिए था। कम से कम वह संवाद-मित्र की भूमिका में तो था। हमारी बात राजा से कहता-सुनता। दरअसल, राजसी भाषा उन्हें आती नहीं थी। और उनकी भाषा में कोई सुनता नहीं था। अब तो जंगल की नई पीढ़ी राजसी भाषा को ही अपनाने को व्यग्र थी। उस भाषा में लोग बेकार नहीं थे। सबको बढ़िया काम नसीब थे।

इस तरह जंगल का राजकाज चल रहा है। जंगल में जंगलराज होने पर किसी को भी तकलीफ क्या होगी भला?

लेकिन जंगल रो रहा है। जंगल के लोग सोच रहे हैं कि जंगल को रोने का रोग लग गया है।

बच्चे कहते हैं-‘Weeping Forest, why are
you weeping?'

जंगल निरुत्तर है।

Friday, December 14, 2012

फ़र्क

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यदि मैं आपसे मिलता हँू
आधे-अधूरे मन से
पूछता हँू हालचाल
चलते भाव से
लेता हँू आपमें या आपके कहे में
दिलचस्पी अनमने तरीके से
या कि
कुछ भिन्न स्थितियाँ हो
तो आप ही कहिए ज़नाब!
मेरी ऐसी बेज़ा हरकतों के बीच
आपको यह बताया जाना कि
राजीव रंजन प्रसाद के बैंक अकांउट में
चार या चौदह सौ रुपइया नहीं चार लाख है
क्या फ़र्क पड़ता है?

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...