Sunday, July 21, 2013

चुनावों में मरघटिए का टंट-घंट मत छानिए


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शशि शेखर अख़बार के सम्पादक हैं। समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ में उनकी
वैचारिक-टीआरपी जबर्दस्त है। वे जो लिखते हैं, सधे अन्दाज़ में। उनका साधा
हर शब्द ठीक निशाने पर पड़ता है या होगा, ऐसी मैं उम्मीद करता रहा हूँ
(फिलहाल नाउम्मीदगी की बारिश से बचा जाना नितान्त आवश्यक है) लेकिन, कई
मर्तबा वे जो ब्यौरे देते हैं, तर्क-पेशगी की बिनाह पर अपनी बात रखते
हैं; उसमें विश्लेषण-विवेक का अभाव होता है। यानी वे अपने विचार से जिस
तरह पसरते हैं, उनकी तफ़्तीश से कई बार असहमत हुआ जा सकता है। खैर!
पत्रकारिता भाषा में तफ़रीह नहीं है, यह शशि शेखर भी जानते हैं और मैं भी।
बीते ढाई दशक में उनकी कलम ने काफी धार पाया है, चिन्तन में पगे और चेतस
हुए हैं सो अलग। यह मैंने कइयों से सुना है...और उनसे भी।

अब मुख्य बात। शशि शेखर के लोकप्रिय रविवारीय स्तम्भ ‘आजकल’ में आज का
शीर्षक है-‘‘चुनावों को महाभारत मत बनाइए’’। इसमें उनका कौतूहल देखने
लायक है-‘‘पुरजवान होती इक्कीसवीं सदी के हिन्दुस्तानी सियासतदां अपने ही
इतिहास से सबक क्यों नहीं लेते? वे कबतक नफरत के भोथरे तर्कों को नया
जामा पहनाते रहेंगे? वे कबतक हमारे शान्ति पसन्द समाज को बाँटने की कोशिश
करते रहेंगे? वे हम पर तरस क्यों नहीं खाते? हम हिन्दुस्तानी हैं, सिर्फ
वोट बैंक नहीं।’’

ऐसे कुतूहल शशि शेखर जी जैसों के लिए सेहतमंद नहीं है। आप किस पर तरस
खाने की बात कर रहे हैं? भारतीय जनता के ऊपर जो चुनावों में हर एजेण्डे,
साँठ-गाँठ, जोड़-तोड़, जाति-धर्म, संस्था-समुदाय, भाषा-तहजीब इत्यादि से
ऊपर उठकर(तमाम षड़यंत्रों अथवा कुचक्रों के अस्तित्वमान होते हुए भी) अपना
निर्णय सुनाती आई है; जिसने भाजपा के ‘इंडिया शाइंनिग’ से लेकर बसपा के
‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ तक को अप्रत्याशित पटखनी दी है? उस कांग्रेस
को ठेंगा दिखाया है जिसके मीडिया-युवराज राहुल गाँधी पर पार्टी की ओर से
लाख एतबार-पेशगी के बावजूद जनता की दिलचस्पी लेशमात्र नहीं है।(वैसे
कांग्रेस में उनसे बेहतर कई युवा राजनीतिज्ञ हैं) तभी तो, आप इस बात का
जिक्र करना नहीं भूलते हैं-‘‘राहुल गाँधी ने पिछले अप्रैल में जब सीआईआई
को सम्बोधित किया, तो एक वर्ग(पंक्तिलेखक युवा लिखना भूल गए) ने सोशल
मीडिया पर उन्हें ‘पप्पू’ की उपाधि से नवाज दिया।’’

अतः उपर्युक्त उदाहरणों से ज़ाहिर है कि भारतीय आबादी ‘मुर्दों का टीला’
नहीं है, लिहाजा चुनावी मौके पर हमें भी मरघटिए का टंट-घंट नहीं छानना
चाहिए। यह ख़्याल रखा जाना आवश्यक है कि हमारे किए-धरे, कहे-सुने पर आज भी
जनता सबसे अधिक विश्वास करती है, अपनी आत्मा में सच के ज़िन्दा होने का
ढ़िढोरा पिटती है। इसलिए हमारे लिखे का वैचारिक-अर्थ निकसे न कि
वैचारिक-अर्थी; ऐसी निगाहबानी जरूरी है।

और जहाँ तक नरेन्द्र मोदी का सवाल है, तो उनका व्यक्तित्व निश्चित ही
नेतृत्व-सम्पन्न है। उनके उवाच में प्रभाव का रंग है। राजनीति की उनकी
समझ(चालाकियाँ) इतनी साफ/निखरी हुई है कि वे जर्रे-जर्रे का इस्तेमाल
अपने पक्ष, हित अथवा वोट-बैंक भुनाने के लिए कर सकते हैं।(यह मान लेना भी
अतिरेक से भरा और भ्रामक है) बकौल शशि शेखर-‘‘बड़े जतन से
उन्होंने(नरेन्द्र मोदी) खुद को इस लायक बनाया है कि उनकी प्रसिद्धि
गुजरात और देश की सीमाओं से लांघकर समूची धरती पर फैलने लगे। लोग उन्हें
पसन्द करें या नापसन्द, पर राजनीति के जंगल में उन्होंने अपनी जगह बनाने
में कामयाबी हासिल कर ली है।’’

यहाँ भी शशि शेखर जी को याद रखना चाहिए कि भारतीय राजनीति जंगल नहीं है।
अगर जंगल-राज होता, तो आप पिछले वर्ष यूपी में बेहद रचनात्मक ढंग से
चुनावी-तैयारी, अभियान, जनमुहिम, संघर्ष या व्यावहारिक परिवर्तन(चुनाव
ख़त्म अब काम शुरू) इत्यादि का ‘अपना मोर्चा’ नहीं ठानते; इस ज़मीन में खुद
को नहीं गोड़ते; आप वह सब नहीं करते जिससे भारतीय लोकतंत्र की गरिमा
‘पुनर्नवा’ होती है।

शशि शेखर जी की सलाहियत दुरुस्त है। हमें अपने चुनावों को महाभारत बनने
से रोकना होगा। इससे ईश्वरवाद और भाग्यवाद के कुकुरमुते पनपते हैं। इससे
हमारा नागरिकपना ख़त्म होता है। हम यूटोपिया-चिन्तन में दाखिल अवश्य होते
हैं, लेकिन उसे साकार करने का औजार भूल गए होते हैं। मेरी समझ से, अतीत
की बात पर श्रद्धा ठीक है। परन्तु उसका बेवजह इस्तेमाल ख़तरनाक है। हमें
चुनावों में अपने विवेक-कौशल, बुद्धि-व्यवहार, दृष्टि-चेतना इत्यादि के
सहारे चुनावी लड़ाई लड़नी चाहिए जिसका हिमायती खुद आप भी हैं। हमें उन बौने
युवा राजनीतिज्ञों(वंशवाद के उत्तराधिकारी) को राजनीतिक-पास देने से बचना
चाहिए जिनसे जनता को रू-ब-रू कराने का जिम्मा कई बार समाचारपत्रों के ऊपर
भी लाद दिया जा सकता है।

अतएव, हमें चुनावी सरगर्मियों का आकलन-विश्लेषण करते समय भारतीय नागरिकों
की ओर से सहृदयता बरतने की हरसम्भव कोशिश करनी चाहिए; ताकि हमारे ये
प्रयत्न तमाम भूलों के बावजूद भारतीय चिन्तन, विचार, दृष्टि, परम्परा,
तहज़ीब, उसूल इत्यादि को दृढ़ सम्बल प्रदान कर सके; भाग्य की लेखी कहे जाने
वाले पाखण्ड का नाश कर सके...और हम बढ़ सके लोकतंत्र के जनपथ पर अपनी
भारतीय जीवन-राग एवं जीवन-मूल्यों को गाते-गुनगुनाते हुए; ‘वीर तुम बढ़े
चलो, धीर तुम बढ़े चलों की टेक पर। आमीन!

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Wednesday, July 17, 2013

O! Bastard, I'm Dancing Again


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उसके अधरों से फूटे बोल
और वह.....,
चुप आत्मा, मनहूस
आत्महीन, कलपजीवी
गाने लगी अचानक

जैसे बाँस में खिले फूल
और वह....,
बहिष्कृत, शोषित
दुखिहारी, रुदाली
बजाने लगी पैजनियाँ

उसका आज न बर्थ डे है
न फ्रेण्डशिप डे
न वुमेन्स डे
न ह््युमन राइट्स डे
वह गा रही है गीत
नृन्य कर रही है पैजनियाँ
नहला रही है अपने भीतर की पार्वती को
गूँथ रही है गजरा बालों में
लगा रही है मेंहदी हाथों में
बना रही है रंगोली दरवाजे पर

टेलीविजन, अख़बार....जनमाध्यम
जो कभी नहीं रहे शुभचिन्तक
आज ढार रहे हैं उनके लिए ख़बर
उलीच रहे हैं तर्क
परोस रहे हैं भाषा
चमका रहे हैं चेहरा(खाया, पिया, अघाया)

कुल जमा निष्कर्ष
‘महाराष्ट्र में फिर खुलेंगे डांस बार’।

Tuesday, July 16, 2013

दुनिया का हर घटित हमारे मनःजीवन के दायरे में है...!



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(शोधपत्र निष्कर्ष)

यह स्वयंसिद्ध तथ्य है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति
आसमान देख सकता है, तो आसमान भी प्रत्येक
व्यक्ति को देख सकता है....! घट-घट व्याप्त राम की
तर्ज़ पर.....! या कण-कण, क्षण-क्षण विराजे शिव की आध्यात्मिक भावना को समो कर....!

यहाँ आसमान से आशय उस
समष्टि-चेतना से है जिसके पास चेतन मन असंख्य है,
चिन्तनशील, क्रियाशील आत्मा अनगिनत हंै,
व्यावहारमूलक व्यक्तित्वों के बारे में क्या कहना उनके आपसी समूहन ने सोशल नेटवर्किंग
के रूप में जो करिश्मा कर दिखाया है उससे हम-आप सभी परिचित हैं।
जैसे सर्च इंजन के माध्यम से इन्टरनेट
पर देय सामग्री कोई भी कहीं भी देख सकता है। एक क्लिक में
जिस तरह आॅनलाइन विडियो से लिंकअप हुआ जा सकता है, अपने परिचिति-परिजनों
से साक्षात्कार किया जा सकता है। वैसे ही दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति
‘फ्रैक्शन इन सैकण्ड’(नैनो सेकेण्ड) की सुपरजेट गति में अपने को वहाँ प्रकट कर सकता है
जहाँ उसका चेतस(प्रेरित/परीक्षित) मन जाना या पहुँचना चाहता है।

आसान-सी बात है। आपकी आवाज सैकड़ों-हजारों मिल दूर कैसे चली जाती है
इतनी जल्दी? कैसे आप ‘विडियो विजुअल्स’ देख लेते है...चटपट इतनी आसानी से?
जब इतना कुछ अपनी नज़रों से सत्य प्रकाशित होते देख रहे हैं...
और हमको चक्कर नहीं आ रहे....मतलब हम सहज विश्वास करने लगे हैं, चाहे यह
विज्ञान के लिहाफ में ही क्यों न हो तो फिर हमें इस नवीन संकल्पना से जुड़े
नए खोज, नवीन अनुसन्धान का अवश्य स्वागत करना चाहिए।
आज भले इसकी संगति करना थोड़ा अटपटा लग रहा है। लेकिन
कल देखिएगा, हमारा कोई परिजन/परिचित बीमार होगा और हम
वहाँ सशरीर उपस्थित न होकर भी उन्हें सांत्वना दे रहे होंगे,
डाॅक्टर से सिमटम-डिस्कस कर रहे होंगे।
इर्द-गिर्द की गतिविधियों/हलचलों, शहर के वातावरण से अवगत हो रहे होंगे।

यही नहीं हमारा सांसद संसदीय-सत्रों के दौरान संसद में बैठकर कैसी भागीदारी कर रहा है, अपना मित्र देर रात जगकर किस विषय पर प्रोजेक्ट तैयार कर रहा है,
हमारी गर्लफ्रेण्ड मोबाइल पर बात करने के बाद अपनी रूममेट को
हमारे बारे में क्या कुछ बता रही है....यह सब आसानी से देखा-सुना-महसूसा
जा सकता हैं। यह अत्याधुनिक तकनीक गूगल-मैप पर अपना गाँव-ज्वार,
घर-द्वार पाकर खुश-प्रसन्न होने से आगे की कड़ी है
जिसमें दुनिया का प्रत्येक कण प्रकाशित है, तरंगित है....उस तक
हम कभी भी किसी समय पहुँच सकते हैं।

दरअसल, यह वायवीय निगरानी है। स्वाभाविक। प्रकृति सापेक्ष।
निर्वात में प्रकाश की की गति है। माध्यम में ध्वनि की पहुँच है।
तो मन तो इन सबसे शक्तिशाली है....फिर वह पलक झपकते दिल्ली से दौलताबाद
क्यों नहीं पहुँच सकता है। हम आश्चर्य कर सकते हैं, लेकिन यह सत्य है।
कोई भी यंत्र/मशीन अपना काम सुचारू ढंग से करे, तो अपेक्षित परिणाम मिलते ही
मिलते हैं। आज मन को साधने, उसकी सूक्ष्म स्फूरण को पकड़ने की तकनीक विकसित कर ली गई है। परखनली शिशु, सरोगेट मदर, क्लेनिंग के बारे में एक समय
सोच पाना भी संभव नहीं था....आज ये अफसाने नहीं हकीकत हैं।

आज जब मन के संप्रत्ययों को विभिन्न ज्ञान-मीमांसा से जुड़े विशेषज्ञों
यथा-मनोविज्ञानियों, संचारविज्ञानियों, समाजविज्ञानियों, मनोभाषाविज्ञानियों, जैवविज्ञानियों, नुविज्ञानियों इत्यादि ने अबूझ मानना छोड़ दिया है, तो हमें भी इसके पराक्रम से परिचय करना
चाहिए। यदि विश्वमानव की अवधारणा है तो निश्चित जानिए कि
हम-सबका मन विश्वमन है। हम पूरे विश्व को अपने मन के
आन्तरिक-बाह््य प्रभाव से हर क्षण देख सकते हैं,
अनसुनी आवाज़ों को सुन सकते हैं, उनतक आसानी से
पहुँच बना सकते हैं।

यदि अमेरिका हमारी निगरानी कर सकता है तो हम भी
अपने मनःशक्ति के प्रभाव से यह जान सकते हैं कि
अमेरिका का राष्ट्रपति भारत के बारे में क्या फैसला लेने के बारे में सोच रहा है, विचार-विमर्श कर रहा है। गुप्त सूचना, गोपनियता और वर्चस्वपूर्ण जासूसी का एकाधिकार
जिस संयुक्त राज्य अमेरिका के पास आज है उस प्रभाव-घेरे को तोड़ने के लिए
मनःजीवन की ऊर्जस्वी-तेजस्वी ताकत ही मुख्य रूप से काम आ सकती है।

आइए, इस बाह्मण्ड में अपनी लौकिक उपस्थिति को मजबूती से दर्ज करें। संकल्प-शक्ति के बूते अपने मनःजीवन को और पारदर्शी, क्रियाशील और विश्व-हृदय के सापेक्ष संवेदनशील और विवेकी बनाए। आमीन!!!

धूपगाड़ी


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आओ बाबू
बैठो साथ

निकालो अपना
अंजुरी-हाथ

बिन सीढ़ी
उतरी धूप

आजू-बाजू
पसरी धूप

गहन अन्धेरा
बिल्कुल चुप

सब जागे
जब चमकी धूप

Monday, July 15, 2013

मन...राग


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बहुत हुई भाषा में बातें
अब...नहीं कोई बात कहूंगा
गले मिलूंगा, गले पडूंगा

छोडूंगा चर्चा, बातूनी बहसें
अब....नहीं कोई प्रचार करूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

बहुत चलाया शब्द-धनुष को
अब...नहीं कोई वाक्य गढूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

यह समय है स्वांग-धरण का
अब...नहीं कोई पाँत बैठूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

जो होना-जाना तय था, सीखा
अब नहीं कोई राग रटूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

‘करो या मरो’ दो ही पथ हैं
बस इस पथ का नेह धरूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

इस सबक के कई हैं साथी
उनसे सीधा संवाद जोडंूगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा।

Sunday, July 14, 2013

इस मौत को क्या नाम दें....?


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हमारा रूख कई मसलों पर चलताऊ किस्म का होता है। चाहे वह कितना ही गम्भीर क्यों न हों? हम जबतक खुद किसी दुर्घटना या समस्या का शिकार नहीं हो जाते; बुरी तरह उसकी चपेट में नहीं आ जाते; तबतक हमें अपनी ज़िदगी की खुशमिज़ाज रंगीनियाँ ही एकमात्र सचाई मालूम देती है-‘‘ये इश्क़-खुमारी तुमतक...तुमतक, ये सब तैयारी तुमतक...तुमतक’।

आपमें से कितने हैं जो जानते हैं पोस्ट ट्राॅमेटिक स्ट्रेस डिसआॅर्डर(पीटीएसडी) के बारे में। नहीं जानते हैं, तो जानिए ज़नाब!

यह दिमागी महामारी है। तनाव-अवसाद का ऐसा चरम रूप जो हाल के दिनों में युद्ध, हिंसा, अपराध, हत्या, अशांति इत्यादि के साए में जी रहे लोगों को तेजी से लील रहा है। यह तनाव, अवसाद, कुण्ठा, विफलता आदि के लक्षण के साथ हमारी ज़िदगी में सबसे पहले शामिल होता है....फिर आत्महत्या की परिणति के रूप में इंसान की इहलीला ख़त्म करके ही मानता है।

यह मनोविकार/स्नायुविकार है। परिवेश/परिस्थिति की प्रतिकूलताओं के साथ जब हमारा देह-दिमाग सन्तुलन नहीं बिठा पाता है, तो पीटीएसडी का उभार हमारे भीतर दिखने लगता है। हम अंतर्मुखी होते चले जाते हैं। जरूरी चीजों से अरुचि होने लगती है। बार-बार अतीत को टटोलते हैं। भयावह/भयानक सपने देखकर डरते हैं, बेवजह भयभीत होते हैं। इस स्थिति में चैन की साँस कैसे ली जाए, जब कई-कई दिनों तक नींद ही नहीं आते आँखों को।

एरिक फ्राम ने जोर देकर कहा था कि स्नायुविकारों की उत्त्पति सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों से होती है। आज हमारा सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण अत्यधिक डरावना हो चला है। हिंसा-प्रतिहिंसा के खेल ने हत्या और मौत को हमारे लिए रसभूमि(वैटिल फिल्ड) बना दिया है। विषम परिस्थितियों ने इसे ख़ासोआम के साथ ऐसे नत्थी कर दिया है जैसे यह हमारी नियति का अभिन्न हिस्सा हो। अतः भारत में जम्मू-काश्मीर का युद्धक्षेत्र हो, नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र हो; गैंगवार का इलाका हो.....आज लोगों में असुरक्षा की भावना बुरी तरह व्याप्त है। वे किसी न किसी मनोरोग या फिर पीटीएसडी से पीड़ित हैं। बचाव के लिए लोग नशीली दवाओं का सेवन कर रहे हैं। ग़लत राह चुन रहे हैं। कई बार आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध को भी अंजाम दे रहे हैं।

यह स्थिति हमारे द्वारा उपार्जित है। हमने विज्ञान, तकनीक, यंत्र, मशीन, पूँजी, साम्राज्य, वर्चस्व, प्रभुत्त्व आदि की जो अंतहीन लड़ाई शुरू की है। यह उसी का मिश्रधन है। ज़िदगी गणित नहीं होती। लेकिन आजकल हम ज़िदगी में गणित के फार्मूले ही बेहिसाब आजमा रहे हैं। दुनिया भर में बाज़ार की खोज/कब्जे के लिए अनचाहे/अनावश्यक ढंग से युद्ध लड़ रहे हैं। बदले में हम स्वयं ऐसी घातक/लाइलाज बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं जो हमारे जीवन की बुनियादी ताकत ही ख़त्म कर दे रही है। और हम विजेता होकर भी ज़िदगी का दाँव हार जा रहे हैं। ब्रिटेन में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अफगाानिस्तान और तालिबान में जितने सैनिक युद्ध के दरम्यान मारे गए...उससे अधिक वहाँ से बचकर लौटे सैनिक आत्महत्या कर मर गए। मुख्य वजह, पीटीएसडी जैसी संहारक बीमारी।

क्या इस विषय पर हम गम्भीरता से विचार करेंगे? अपने देश के दिन-ब-दिन ख़राब होते जा रहे माहौल को समय रहते दुरुस्त करने के बारे में कुछ बेहतर सोचेंगे?

आशा है, इस मसले पर आपसब बहसतलब नज़रिए से विचार-विमर्श एवं संवाद करेंगे।

Saturday, July 13, 2013

कायाकल्प


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उसे कोई नहीं देख रहा होता है, तब भी उसे लगता है कि कोई उसे देख रहा है, घूर रहा है, बेवजह छू रहा है या छूने की कोशिश कर रहा है।

इस भय का कोई निश्चित कारण नहीं होता, लेकिन वह भयभीत रहती है...या रहने के लिए अभिशप्त है।

14 साल की उस लड़की का नाम उसके पिता ने कीर्ति रखा है। इसके अलावे उसका पिता उसके लिए फूटी कौड़ी न रखा है। जबकि आजकल बेटा-बेटी जन्मते ही स्मार्ट फादर्स-मदर्स लाखों रुपए का बीमा चटपट करा डालते हैं अपने बच्चों के लिए।

खैर! खूब शराब पीने की लत में कीर्ति का पिता तब मर गया या कहें मार दिया गया जब वह छह साल की थी। पिता के मरने के बाद घर का कबाड़ हो गया। ज़मीन दबंगई की भेंट चढ़ गई। विधायक के बेटे ने वहाँ शो-रुम खोल दिया। वहाँ कपड़े बिकते हैं। लेकिन वे सोने की कनबालियों या छूछियाँ से ज्यादा महंगे होते हैं। कीर्ति अपने ही ज़मीन पर खड़े मकान के दूकान से खरीदारी नहीं कर सकती है। यह बाज़ार उसकी ज़मीन पर है। लेकिन उसे बाज़ार के भाव ने बेदखल कर दिया है।

देश में सुप्रीम कोर्ट है। कीर्ति यह नहीं जानती है।

पढ़ने का अधिकार है। कीर्ति नहीं जानती है।

गरीबों के लिए मर मिटने का दावा करने वाली सरकार है। कीर्ति को नहीं पता है।

देश में लेखक हैं, साहित्यकार हैं, बुद्धिजीवी हैं जो उस जैसों के लिए हर रोज शब्द लिख रहे हैं, नवलखा(वैचारिक) बोली बोल रहे हैं, जुबानी चोंच लड़ा रहे हैं, शोध-परिशोध कर रहे हैं। कीर्ति को यह सब नहीं पता है।

कीर्ति जिसे अब सब कूतिया बोलाते हैं क्योंकि वह किसी से ज़बान लड़ा देती है, एक बूँद नहीं डरती है, तमाचा मारने वाले के मुँह पर थूक देती है। भगवान को ठेंगा समझती है।

पूजा में उसका जी नहीं लगता है। वह दिनभर अपनी माँ के साथ भड़सार में दाना भूँजती है। वह दाने-दाने को भगवान मानती है। किसी रोज पेट में अनाज का दाना नहीं जाता है, तो उसकी अंतड़ियाँ ऐंठने लगती है। सोचती है, पत्थर पूजने से ज्यादा जरूरी है पेट पूजा करना।

फुर्सत में रहे तब भी कीर्ति टेलीविज़न नहीं देखती है। बगल के ढाबेनुमा होटल में टीवी है। माँ उसे मना नहीं करती है। वह कीर्ति से कहती है कि टीवी देखने से मन बहल जाता है। जी आन-मान हो जाता है। कीर्ति माँ की बात पर कान नहीं देती है।

कीर्ति खुद कहानी है। वह दूसरों की मनगढ़त कहानी पर क्या आँख-कान दे।

वह तो उन लड़कियों को भी पलटकर नहीं देखती है जो उसी के उम्र की है। लेकिन वेशभूषा में उस जैसी नहीं हैं। फरार्टेदार अंगेजी बोलती हैं। ‘थैंक्स’, ‘वेलकम’, ‘वाऊ’, ‘शिट’ जैसे बात-बात में शब्द बोलती है। ये लड़कियाँ जिस घराने से हैं वहाँ लव-सब धुँआधार चलता है। जवानी दिवानी होती है। मामला घनचक्कर होता है। अमीर लाडले फुकरे की फूँक मारते हैं।

अभी-अभी उसके भड़सार में एक लड़की आई है। उसने अपना नाम आयशा बताया है। वह कीर्ति से बात करना चाहती है। कीर्ति भड़सार में आग बोझने का काम कर रही है। कीर्ति को पता है कि यह लड़की पास की काॅलोनी में रहती है। वह काॅलोनी बड़े-बड़े पार्कों वाला है। वहाँ कार रखे जाते हैं। उसमें तल्ले पर तल्ला वाला कतारबद्ध मकान है। वहाँ सबको जाना मना है। कीर्ति वहाँ से दूध का पैकेट लाने कई बार गई है। पिछले दिनों उसका भाई बीमार था, तो वह हफ्ते भर लगातार आती-जाती रही थी।

कीर्ति अंधी नहीं है। वह कानी, गूंगी, बहरी नहीं है। वह दुनिया के सभी रंग देख रही है। वह सभी रंगों का नाम भी जान रही है। लेकिन उन रंगों में उसका अपने कलेजे का रंग नहीं है। उसकी माँ का असमय बटलोही बना चेहरा नहीं है। दुःख-तकलीफ, ज़िल्लत-ज़लालत से सना उसका खुद का रंग-रूप नहीं है।

कीर्ति को क्या कोई आईएएस बना सकता है? कीर्ति से क्या कोई ऐसा लड़का ब्याह रचा सकता है जिससे कि उसके और उसकी माँ की जिन्दगी सँवर जाए? क्या कोई उदारमना उसके लिए ऐसा कुछ उपाय कर सकता है जिससे उसकी ज़िन्दगी जो इस कदर बेपटरी है, वह पटरी पर आ जाए? क्या ऐसा कोई आसरा है जो यह विश्वास दिला सके कि गरीब के घर पैदा भले हुई है...लेकिन उसे अमीर लाडली बनाने वाले सैकड़ों, हजारों, लाखों, करोड़ों हाथ हैं, हमदर्द साथी हैं, शुभचिन्तक समाज है?

नहीं....नहीं.....नहीं.....!!!

हाँ, अगर आप लेखक-साहित्यकार हैं, तो कीर्ति के इस नारकीय ज़िन्दगी पर एक धांसू कहानी लिख सकते हैं और सेटिंग-गेटिंग ठीक रही तो लोकप्रिय सम्मान पा सकते हैं।

हाँ, अगर आप विशेषज्ञ-आलोचक हैं, तो कीर्ति का उदाहरण सामने रख ‘जीने का अधिकार’, ‘खाने का अधिकार’, ‘पढ़ने का अधिकार’ इत्यादि शीर्षकों से चोखा आलेख लिख और चर्चा अवश्य बटोर सकते हैं।

हाँ, अगर आप समाजसेवी या सामाजिक कार्यकत्र्ता हैं तो जंतर-मंतर पर आमरण अनशन कर लोगों की नज़र में चढ़ सकते हैं, देश का दूसरा-तीसरा-चैथा गाँधी बन सकते हैं।(पहले की कद्र अब बची नहीं सो अन्यों की तलाश हिन्दुस्तान को बेसब्री से है)

आज देश की अटारी पर चढ़कर बांग देने वाल हम-आप जैसे तीसमारखाँओं की कमी नहीं है........लेकिन हमारे इन कौआनहान हरकतों से कीर्ति या कीर्ति की माँ जैसे अनगिनत लोगों का क्या और कितना उद्धार हो रहा है....इसपर रजीबा को शोध अवश्य करना चाहिए।(राहुल गाँधी, अखिलेश यादव जैसों पर शोध करने से ठेंगा न होगा कुछ)

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...