Thursday, August 14, 2014

भारत का उत्तर वेद*

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भारतीय चिन्तन की व्यावहारिक कठिनाई छद्म अध्यात्म और मनुवादी दर्शन का लबादा ओढ़े रखना है। भारतीय ज्ञानशास्त्रियों का अकंुठ न होना दूसरी बड़ी कठिनाई है। भारतीय ज्ञान का सही अर्थों में अवमूल्यन आर्य-वैदिक पण्डितों/आचार्यों ने किया है। वे आज भी पुरानी मानसिकता से मोहग्रस्त हैं। संत-समागम, सामूहिक संवाद-विमर्श में अबूझ/अमर्यादित ढंग से वेद-वाक्यों, मंत्रों, ऋचाओं इत्यादि को हौंकना उनकी श्रेष्ठताग्रंथि बन चुकी है। हर चीज अथवा मामूली से मामूली संस्कार-पद्धति को भी वे वेदस्यूत बताते हुए अपनी हीन-उत्कंठा से विभार दिखाई देते हैं जो कि सरासर ग़लत है। क्योंकि आर्थिक और सामाजिक धरातल को नकारते हुए कोई भी अखिल भारतीय दर्शन की स्थापना असंभव है। यूँ तो सामाजिक अस्मिता और भारतीय जीवन-मूल्यों की अनदेखी कर आर्यों ने वैदिक परम्परा और वेदश्रुत विचारधाराओं को सायासतः प्रश्रय दिया। भारत सन्दर्भित उल्लेखित इतिहासों में आर्यों के आक्रमण को सामाजिक-राजनीतिक विकास-चक्र के अर्थों में ‘आगमन’ कहा गया है। यह प्रयोग सर्वथा अव्यावहारिक और अनुचित है। के. दामोदरन की दृष्टि में-‘‘भारत के राष्ट्रवादी इतिहासकार आर्य सभ्यता की प्राचीनता का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन करते थे और उसकी महिमा की भूरि-भूरि प्रशंसा करते रहते थे।....भारतीय सभ्यता की आर्य उत्पत्ति और उसकी अपरिवर्तनशीलता की ये कल्पित कथाएँ देश के भिन्न-भिन्न भागों में प्राचीन आर्यपूर्व समाज के ध्वंसावशेषों के खोज निकाले जाने के बाद बिल्कुल निर्मूल सिद्ध हो गयीं।’’

दरअसल, धार्मिक कर्मकाण्डों और दार्शनिक विचारधाराओं पर लोट-पोट भारतीय जबतक आर्य और अनार्य(मूलवंशी) के बीच के असली विभेद को नहीं जान लेंगे; भारत का वैदिक दर्शन ‘इण्डो-यूरोपियन’ मेहराबों या ‘आंग्लो-इण्डियन’ आधे-अधूरे साक्ष्यों के बीच झूलता रहेगा। अब यह लगभग सिद्ध हो चुका है कि जिन दिनों भारतीय अन्न-संग्राहक की आजीविका के साथ गुजर-बसर कर रहे थे और वे धातुओं के प्रयोग से अनजान थे; भारत में एक भरी-पूरी सभ्यता शनैः-शनैः अपनी उन्नति की ओर निरन्तर उन्मुखी थी। सहबोध, सहमेल और सहजीवन पर टिकी आर्य-पूर्व भारतीय संस्कृति पूर्णतया आत्मनिर्भर थी और सामूहिक-श्रम की विकासमान चेतना से पूरित भी। विभिन्न मतान्तरों के बावजूद यह सर्वमान्य तथ्य बन चुका है कि-‘‘भारत के आदिम मनुष्यों के बीच कोई वर्ग-विभाजन’ नहीं था।’’ इस तथ्य की पुष्टि में सर जाॅन मार्शल का कहा मानें, तो-‘‘पाँच हजार वर्ष पहले जब आर्यों का नाम तक नहीं सुन पड़ता था, पंजाब और सिन्धु में एक उन्नत सभ्यता विद्यमान थी जो तत्कालिन मेसोपोटामिया और मिस्र देश की सभ्यता से मिलती-जुलती थीं किन्तु कुछ अंशों में उससे बढ़-चढ़कर भी थीं। आज हड़प्पा और मोहेंजो-दड़ो की खोजें सन्देह के परे इसी तथ्य को साबित करती हैं।’’

शास्त्रीयतापूर्ण समस्त ज्ञान वेद से निकसित नहीं है। सिन्धु घाटी से प्राप्त साक्ष्य के मुताबिक-‘‘उन्होंने(मूलवंशी) तीन सौ अक्षरों की एक लिपि का आविष्कार कर लिया था जो स्पष्टतः चित्रलिपि वर्ग की है।’’ भारतवासियों पर आक्रमणकारी आर्यों ने खूब जु़ल्म ढाहे हैं। ऋग्वेद में उनके इस कृत्य को वीरतापूर्वक चित्रित किया गया है। उसमें ‘असुरों और दस्युओं को जीतने के लिए इन्द्र की सहायता की बार-बार अराधना की गयी है। ये असुर और दस्यु निश्चय ही सिंधु घाटी के निवासी थे।’ अन्याय की रीति-नीति ऋग्वेद कुल-परम्परा में विरोचित भाव से दर्ज किया गया है। के. दामोदरन ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय चिन्तन परम्परा’ में यह साफ वर्णित किया है कि-‘‘उन्होंने अपनी प्रसन्नता के लिए जनों को कुचल डाला और ‘बन्द कर रखे पानी को(बाँध तोड़कर) बहा दिया और यौवनपूर्ण पुरुकुत्स के लिए शत्रु को मार डाला...वे(आर्य) अपने को उन लोगों से उच्च और श्रेष्ठ समझते थे जिनको उन्होंने परास्त किया था। मूल निवासियों को आर्य मलेच्छ अथवा दस्यु अथवा दास कहकर पुकारते थे। दास शब्द, मूलतः जिसका अर्थ शत्रु है, ‘नौकर’ के अथवा ‘गुलाम’ के अर्थों में उस समय इस्तेमाल होना शुरू हुआ जब आर्यो ने इन मूल निवासियों को पराजित कर अपना दास बना लिया।’’

वर्तमान लोकतांत्रिक ‘फ्लेवर’ में यह असंगत/असमान भेदभाव आज भी जारी है। औसत दरजे के लोग सभी सरकारी/गैर-सरकारी पदों पर आसीन है; क्योंकि उनका कथित इतिहास और अनिर्वचनीय वेद उन्हें इस योग्य समझता है। जबकि उनसे अच्छी योग्यता और सच्चे संस्कार वाले शान्त, धीर, प्रसन्नमुख, योग्य, कुशल, नैतिक रूप से श्रेष्ट लोग आज भी अधम/नीच(सामिजिक/आर्थिक निकष पर) माने जा रहे हैं। यह साबित/प्रमाणित होते हुए भी की असलियत क्या है? के. दामोदरन ने अपनी पुस्तक में इसका जिक्र करते हुए लिखा है-‘‘ऋग्वेद से पता चलता है कि दस्युओं की संस्कृति आर्य संस्कृति से ऊँचे किस्म की थी। दस्युओं के किले बहुत मजबूत बताये गये हैं। उनके धार्मिक विश्वास अत्यन्त उन्नत प्रतीत होते हैं क्योंकि उनके देवतर आर्यों के देवताओं के समान मुख्य रूप से प्राकृतिक शक्तियों के ही प्रतिनिधि नहीं थे। वे शिव, देवी माता, लिंग और पवित्र ऋषभ(बैल) की पूजा करते थे। वेद दस्युओं का विशेष रूप से यह कहकर उल्लेख करते हैं कि वे आर्यों के देवों को नहीं मानते थे। उनकी अराधना नहीं करते थे, पुरोहितों को दक्षिणा नहीं देते थे या यज्ञ नहीं करते थे।’’
वेद की यही कटुक्तियां आज भी नास्तिकों के सन्दर्भ में यही सब कहती हैं। यह तब जब घोर आस्तिकों का स्वछन्द यौनाचार-व्याभिचार के मामले रोज नंगा नाच पस्तुत कर रहे हैं। दरअसल, वेद और वेदांचियों का अहम-बोध इतना तगड़ा है कि वे चाहे कुकर्म करें या सुकर्म उनके लिए तो स्वर्ग/मोक्ष सौ फ़ीसदी आरक्षित है।
*इसी शीर्षक से लिख रहे अपनी पुस्तक में राजीव रंजन प्रसाद   

Tuesday, August 12, 2014

भारत का उत्तर वेद

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घोर आश्चर्य है कि जिस वेद को अपौरुषेय अथवा अनिर्वचनीय कहा गया है; वह आज की भाषा में ‘डाउन टू अर्थ’ नहीं है। देवी-देवताओं की जिन ‘एलियननुमा’ फौजों का गुणगान/स्तुति ऋग्वेद में विद्यमान है वह उन लोगों द्वारा महिमामंडित है जिनका लोक-विधान और लोक-मर्यादा से कोई वास्तविक-रिश्ता नहीं था। ये ऐसे लोग थे जो पापाचार और कदाचार में आकंठ डूबे थे। रामशरण शर्मा ठीक ही कहते हैं कि-ऋग्वेद में वैदिक जनों के जिन नेताओं को आर्य कहकर गुणगान किया गया है वे या तो समृद्ध थे या अभिजात थे। उनकी नस्ल वर्तमान सत्ताशाही की तरह ही जनचेतना से विमुख थी। उनकी पक्षधरता और सरोकार अपने कुल/वंश के लोगों तक सीमित थी। अपनी वृद्धि और विकास के लिए उन्होंने कई विश्वासों को सामाजिक प्रथा के रूप में चला रखा था। ‘‘आर्यों की पहचान ऋग्वेद में इस बात से होती थी कि वे (अ)व्रत का पालन करते थे, (अ)यज्ञ करते थे।’’ इसके विपरीत जिन्हें आर्यो ने अव्रति कहा है; वास्तव में वे विशुद्ध व्रती थे, लोकमंगल की भावना से पूरित सच्चे मनुष्य थे। जनकल्याण के निमित अपना सबकुछ होम/दान कर देना सामान्य बात थी।  विश्व-दृष्टिकोण और सच्चे अर्थों में ‘सत्यं शिवम् सुन्दरम्’ के कत्र्ता ‘शुद्ध/शूद्य’ लोग थे जिनकों ऋग्वेद के कथित धर्मात्माओं(मौजूदा राजनीतिज्ञों) ने दस्यु कहा है। ऋग्वेद के हवाले से रामशरण शर्मा कहते हैं-‘‘दस्युओं जिनसे आर्यो का सतत संघर्ष चल रहा था, अव्रत और अपव्रत कहा गया है। दस्यु को अयज्वन अर्थात यज्ञ नहीं करनेवाला बतलाया गया है। दस्यु यज्ञ नहीं करते थे। यज्ञ नहीं करने के कारण उन्हें अक्रतनु कहा गया है। वे दूसरे प्रकार का अनुष्ठान करते थे जिससे उन्हें अन्यव्रत कहा गया है।’’

दरअसल, आर्यो का यज्ञ-विधान प्रपंच और पाखण्ड का धत्कर्म था। उसमें ‘समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व’ जैसे आधुनिक विचार या आधुनिकता बोध समाहित नहीं थी। तब भी अनार्यों ने इस परम्परा को अनदेखा नहीं किया। पर भारी गड़बड़ी इस प्रथा में यह थी कि आर्यों द्वारा चालित इन यज्ञों में भारी-भरकम दान देने की परम्परा थी जिससे च्यूत होने पर मृत्यु तक का भागी होना पड़ता था। कुकर्मी आर्यों की संताने अनार्यों की कुँवारी कन्याओं तक का अपहरण कर लेते थे। उनका यौन-शोषण करते थे या उनकी हत्या कर देते थे। कई प्रतिकार की चेतना वाली मुखर स्त्रियों को इन्होंने ‘डायन’ या ‘कुलटा’ कर सरेआम मौत की सजा दे दी।  ‘शूद्य’(सही अर्थों में जो पूर्णतः शुद्ध है, पवित्र और निर्मल है) जिन्हें आज शूद्र कह अपमानित किया जा रहा है वे आज भी इसी ताड़ना/कोप को भुगत रहे हैं क्योंकि वे आज भी अपनी सत्ता-शक्ति और सामथ्र्य में केन्द्र में नहीं हैं; और जो केन्द्रीय सत्ता में है वह आज भी पुराने मानसिकता वाले जनशोषक आर्यों के वंशकुल के लोग/जन हैं।

वर्तमान में भी ‘शूद्य’ लोग वे ही हैं जो अभिजात नहीं है; जो बलशाली और पराक्रमी नहीं हैं। लेकिन वे ऐसा क्यों नहीं बन सके, इस बारे में सुचिंतित सोच, दृष्टि अथवा विचार का पूर्णतया अभाव है। ऋग्वेद जिसको सवर्ण आज भी कथित रूप से निष्कलुष कहे जाने की जिद ठानते हैं या अपनी उच्च चेतना का जिसे वे स्रोत घोषित करते हैं; वह वास्तव में अन्यायमूलक एवं शोषणमूलक है। यह इसलिए भी कि ‘‘संस्कृत साहित्य में आर्य उनको कहा जाता था जो सम्मानित, आदरणीय अथवा उच्च पदस्थ थे। उच्च वंश के लोग भी आर्य माने जाते थे। उत्तर वैदिक और वैदिकोत्तर साहित्य में आर्य से ‘ऊपर के उन तीन वर्णो का बोध होता था जो द्विज(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) कहलाते थे। शूद्रों को आर्य की कोटि में नहीं रखा जाता था। यह ब्राह्मणवादी अवधारणा प्राचीन भारत में चलती रहीं। आर्य को स्वतंत्र समझा जाता था और शूद्र को परतंत्र।’’

यह अवधारणा इसलिए प्रचलित है कि लोकश्रुत इसी तथ्य पर सबकी हामी है। सवर्णवादी विशेषतया इन बातों को भारी तवज़्जों देते हैं। जबकि शूद्यों को ये खलकामी प्रथा/परम्परा उन दिनों भी बिल्कुल नहीं जमती थी। वे प्रकृतिपूजक थे। उन्हीं की उपासना को वे देवत्व-ग्रहण करने का बीजगुण अथवा बीजधर्म मानते थे। आज भी आदिवासियों में यही लोकाचार प्रचलित है। लेकिन वास्तव में है क्या? आदिवासी मुख्यधारा के समाज से बहिष्कृत हैं। आदिवासी जन प्रारंभ से ही प्रकृतियोंपासना में लीन रहे और जंगल को ही अपना वास्तविक गेह मान लिया। उनके लिए मुख्यधारा का समाज कभी प्रिय नहीं रहा। वे अपनी चेतना को प्रकृतिप्रदत संस्कार से आजीवन गढ़ते रहे जिसे हम आज भी उसी रूप में अधिकांशतः देखते हैं। जबकि शूद्यों ने आर्यो से लोहा ली। उनके मान्यताओं को चुनौती दी और अपनी जगह मुख्यधारा के वर्ण-समाज में बनाई जिनकी श्रेष्ठता/उच्चता को दरकिनार करते हुए आर्य महापण्डितों ने उन्हें ‘शूद्र’ के रूप में मान्यता दी। उन्होंने अपने लिखे में कथित शूद्रों(शूद्यों) को नीच/निम्न बताया है; किन्तु वास्तविकता तो यह है कि अपने ही लिखे की विवेचना उन्होंने उनके समक्ष भिन्न प्रकार से की होगी, इसमें कोई शक-शुबहा नहीं है। सचाई तो यह थी कि जिस कार्यें को करने में आर्यजन विफल थे या जिनकी ओर वे प्रवृत्त नहीं थे; उनको उन्होंने जानबूझककर उपास्य अथवा पूजनीय बना दिया। वे उनका मौखिक गुणगान या कहें स्तुतिगान करने लगे। आर्यजनों ने सायासतः अपने सभी आडम्बर एवं पाखण्ड को स्वयंसिद्ध नियमों-विधानों में ढाला और उसे अनिवर्चनीय भी घोषित कर दिया। यह सबकुछ आसानी से संभव हो सका क्योंकि वे उन्नत औजारों-शस्त्रों से लैस बाहरी कबिलाई समाज के लोग थे जिनकी भाषा भी भारतीय नहीं थी। वे सभी हिन्द-यूरोपियन भाषा बोलते थे। 
 
भलमनसाहत अथवा आमजन के साथ छल भारत की विधान-परम्परा है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। यह राजनीति आज के सन्दर्भ में आसानी से समझी जा सकती है जिसमें राजनीतिज्ञ मौका पड़ने पर किसी दलित बड़े/बुजुर्ग या दलित चिन्तक/नेता का पैर पड़ने या उन्हें सराबोर गले लगाने से भी नहीं हिचकते हैं....
 
*इसी शीर्षक से लिख रहे अपनी पुस्तक में राजीव रंजन प्रसाद

Monday, August 11, 2014

भारत का उत्तर वेद*

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भारत का अद्धैत दर्शन दिलचस्प है। यह सूक्ष्म है और जड़ीभूत भी। वर्ण-व्यवस्था इन दोनों का फलाफल है। यह चेतना में श्रेष्ठ कथित निचली जातियों का प्रबल प्रताप है कि भारत की संस्कृति इन तमाम अन्तर्विरोधों के बीच जीवित है; विकसनशील बनी हुई है। आज हम जिन्हें ‘शूद्र’ कह अपमानित कर रहे हैं वे सदियों/सहस्त्राब्दियों से मानवीय, करुणामय, क्षमाशील और उदात्तचित्त बने हुए हैं। यह सहमेल अथवा सह-अस्तित्व आधुनिक मनुष्य के देखने की दृष्टि में बेढंगा अथवा भौड़ा जान पड़ेगा; किन्तु हकीकत यही है कि भारत के मूलवंशियों पर घोर अत्याचार कर आर्यों ने अपना एक मनुवादी समाज बनाया जो वर्ण-व्यवस्था का निर्माता था और उसका नीति-नियंता भी। यह कितनी अजीबोगरीब बात है कि ‘‘एक संविधान स्वतन्त्र आर्यावत में मनु ने रचा था; और दूसरा देश के फिर से स्वाधीन होने पर डाॅ. आॅम्बेडकर ने रचा। मनु के विधान में आम्बेडकर के लिए स्थान नहीं था, या नही ंके बराबर था जबकि आम्बेडकर के विधान में मनु के लिए पूरा स्थान है। तमाम लेकिन-किन्तु-परन्तु के बावजूद यह छूट/आजादी आम्बेडकर को इसलिए मिल सकी कि इसे कथित देवभाषा संस्कृत में नहीं रचा-बुना गया था जिस पर कि आज भी सनातनी पोगापंथियों/पाखण्डियों का वर्चस्व या कह लें एकाधिकार है। बाद में प्राकृत-पालि का आगमन हुआ और इन्हें आर्यभाषा में मान्य मान लिया गया क्योंकि वर्चस्वशाली ताकतें सामाजिक रूप से संगठित होकर अपनी राजनीतिक भूमिका के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी थीं।
 
मौजूदा सन्दर्भ में देखें, तो ‘समरथ को नहीं दोष गोसाई’ राग अलापने वाली सवर्णवादी जातियाँ आज अंग्रेजी पर कृपालु हैं या उनको अपनाए जाने की समर्थक हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वे(सुविधा-सम्पन्न, अमीर, धनाढ्य, पूंजीवादी वर्ग....) प्रयत्नपूर्वक इसे आसानी से सीख सकते हैं जबकि देश की करोड़ों-करोड़ जनता के लिए यह आज भी दूर की कौड़ी है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था का मौजूदा अधःपतन इन्हीं वर्चस्वशाली सवर्ण जातियों की देन है जो चाहती ही नहीं है कि पूरे देश की जनता किसी ऐसी सक्षम भाषा में दक्ष-प्रवीण हो/बन सके जिसमें उन्नयन के खुले मार्ग हों; विकास के समानधर्मा अवसर हों या कि सभी को एक ही जैसा सम्मान-भाव बरतने का मौका मिल सके।
 
भारत के मूलवंशी जो ‘शुद्ध-जन’(वर्तमान में कथित शूद्र) थे को रामशरण शर्मा की पुस्तक ‘आर्य संस्कृति की खोज’ के आधार पर व्रती कह सकते हैं। वे कहते हैं-‘‘संघर्ष दो संस्कृति-समुदायों के बीच होता है जिसमें एक व्रत का पालन करता है और दूसरा अव्रत का।...यदि शरीर के रंग को पहचान का आधार माना जाये तो ऋग्वेद के कुछ मंत्रों के अनुसार आर्यों की अपनी अलग जाति बनती है। वे जिन लोगों से लड़ते थे उनको काले रंग का बतलाया गया है। आर्यो को मानुषी प्रजा कहा गया है जो अग्नि वैश्वानर की पूजा करते थे और कभी-कभी काले लोगों के घर में आग लगा दते थे। आर्यो के देवता सोम के बारे में कहा गया है कि वह काले लोगों की हत्या करता था। यह भी कहा गया है कि वह काली त्वचा वाले राक्षसों से लड़ता था और उसने पचास हजार कृष्ण लोगों को मारा तथा असुर के काले चमड़े को उधेड़ डाला।’’ 
 
ध्यान देना होगा कि कई-कई वैयाकरणों ने यह माना है कि प्राचीन अर्थों में ‘असुर’ का अर्थ देवता था जो बाद में अर्थादेश के कारण अपना मूल अर्थ छोड़कर नकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त होने लगा। इस शब्द की प्रयुक्ति में फेरफार अथवा हेरफेर सायास ही हुआ होगा, यह कहने में हमें हिचक नहीं होनी चाहिए। यहाँ यह स्वयंसिद्ध है कि वर्ण-व्यवस्था को जन्म देने वाली नियामक-संस्था घोर आताताई और चारित्रिक रूप से दुष्ट थीं। उन्होंने आर्य-परम्परा के नाम पर एक सम्मोहक संस्कृति को अनावृत किया जिसमें जो भारत के वास्तविक रहवासी थे उन्हें गुलाम बनाया और अपनी सत्ता उन पर लाद-थोप दी।

*इसी शीर्षक से लिख रहे अपनी पुस्तक में राजीव रंजन प्रसाद

Sunday, August 10, 2014

भारत का उत्तर वेद*

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भारतीय की धार्मिक मान्यताएँ बेजोड़ हैं। आर्यों के आगमन-पूर्व भारतीय मनीषा पंचस्कन्ध से पूरित थी। यह धार्मिक विलक्षणता पंचस्कन्ध(देशगत, कालगत, आकारगत, विषयगत और गतिगत)कहे गये हैं। इनकी प्राण-प्रतिष्ठा मनुवंशयिों ने नहीं की; क्योंकि उनकी चारित्रिक निष्ठा संदिग्ध थी। मनुवंशी वर्ण-व्यवस्था के घनघोर समर्थक थे जबकि पंचस्कन्ध के उद्घोषक वर्ण-व्यवस्था को सामाजिक जकड़बन्दी का पर्याय मानते थे। उनके लिए जो सर्वोपरि था; वह था: सत्य, अहिंसा, आस्तेय, दान, भूतदया, ब्रह्मचार्य, दयालुता, करुणा, धैर्य और क्षमा। इन सभी सनातन-भावों से पूर्ण मनुष्य को ही भारतीय ऋषि-मुनियों ने ‘शुद्ध योनि’ माना। बाद के समय में खलकलुष प्रवृति के मतावलम्बियों ने इन्हीं को ‘शूद्र’ कहना शुरू कर दिया। आज तक प्रचलन में यही अवधारणा बनी हुई है जिसे बनाये रखने में मनुवंशियों/ब्राह्मणवादियों का योग सर्वाधिक है...


*इसी शीर्षक से लिख रहे अपनी पुस्तक में राजीव रंजन प्रसाद

Wednesday, August 6, 2014

अनुरोध!!!

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 दिमाग मरम्मत पर है....कृपया अपना धैर्य बनाए रखें।




चित्र: साभार गूगल

Monday, August 4, 2014

‘फ्युचर क्राईंग’(Future Crying) के बारे में:


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चीख-पुकार से सनी धरती का भविष्य क्या होगा? चिल्ल-पों, शोरगुल और कोहराम की ध्वनि-तरंगें एक नए तरह का समस्या पैदा करने जा रही हैं-‘साउंडहोल’। 
यह ‘ब्लैकहोल’ की तरह ही है। दोनों में फर्क बस इतना है कि एक प्रकाश को दबोचता है और दूसरा हमारे सोचने-विचारने की क्षमता को। 
 
अब दिमाग के परखच्चे उड़ने वाले हैं। सामान्य मनुष्य की श्रवण-सीमा 20 हट्र्ज(Hz) से 20 हजार हटर्ज(Hz) तक ही सुनिश्चित है। क्या होगा जब सारी ध्वनियाँ उच्च तीव्रता पर गतिमान होंगी? खैर! यदि आप यह सोच रहे हैं कि हम सुरक्षित और निश्चिंत हैं; तो कोई बात नहीं? लेकिन यह बात अवश्य गौरतलब है कि मौजूदा मशीनी कौंध में हम पुरानी अपनापायुक्त मौन खो चुके हैं या खोते जाने को अभिशप्त हैं। आजकल मौन, चुप और खामोश रहना एक किस्म का दब्बूपन माना जाने लगा है। इसलिए लोग न चाहते हुए भी खूब बोल रहे हैं, तेज बोल रहे हैं या फिर बोलती हुई दुनिया के बीच अपने को रखने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। यह बोल-बचन कितनी घातक और खतरनाक है, इसका हमारे पास अभी कोई साफ-सुथरा मानचित्र नहीं है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि लिखित सामग्री भी हमारे भीतर ध्वनि का सृजन करती हैं। जैसे ही हम कोई शब्द सोचते या उसे लिखते हैं, उनका मस्तिष्क में कई बार ‘स्फोट’ हो चुका होता है। इसीलिए कहा जाता है कि सोचने-विचारने में बोलने से अधिक ऊर्जा लगती हैं। लेकिन उनकी त्वरा और प्रभावी बल कम होने के कारण वे हमारे स्नायु-तंत्र एवं मस्तिष्कीय-कोशिका को कोई नुकसान/क्षति नहीं पहुँचा पाती हैं। लेकिन बोलते हुए हमारी स्नायु-तंत्र को भीषण तरीके से कार्यशील रहना पड़ता है। कृत्रिम माहौल या यांत्रिक गतिविधियों में यह हमसे अतिरिक्त शारीरिक-मानसिक चेष्टाओं/उपक्रमों की मांग करती हैं। अतः फेसबुक/टिवटर, ब्लाॅगों एवं सोशल-नेटवर्किंग साइटों पर हमारा होना या वहाँ दिखने वाली अतिसक्रियता भी इसी बीमारी का हिस्सा है। इन दिनों सेलफोन के ईजाद ने हाथों की लिखावट और इशारों/संकेतों की भाषा पर विरामचिह्न लगा दिया है या फिर उन आदत-व्यवहारों को इतना सूक्ष्म-गूढ़ बना दिया है कि उसमें अधिक मानसिक-शारीरिक श्रम लगते हैं। यह भी एक किस्म का आधुनिक ईजाद है जो परोक्ष ‘साउंडहोल’ की भूमिका में मानव-जीवन का शत्रु बना हुआ है। लिहाजा, भौतिक गतिकी की दौड़ में खूब बोलना और बोलती हुई दुनिया के बीच धंसे/गुमे रहना हमारी विवशता बन चुकी है। ‘मौन भी अभिव्यंजना है’ वाली बात अब खुद को पिछडे़पन के अहसास से भरने लगा है। लगातार बोलते जाना या बोलते हुए भौड़ा आचरण प्रदर्शित करना जैसे सभ्य और संस्कारयुक्त होने की पहली और आखिरी शर्त हो। 
 
आज आदमी होने की तमीज बेतरह जीने का फलसफ़ा है। बेवजह बोलने की अदाकारी है और बेतरतीब तरीके से आचरण-व्यवहार करना पसंदीदा शगल है। जो भी हो हमारे भीतर का शोर-शराबा हमें पूरी तरह अपअपनी जकड़न में ले चुका है। हम चाहकर भी अब चुप्पी साधे नहीं रह सकते हैं। हमें प्रतिक्रिया देना ही होगा। हर हाल में बोलना ही होगा। गुस्से में उबलना और बात-बात पर क्रोधित होना होगा। क्योंकि ‘साउंडहोल’ का कीटाणु हमारे आत्मबल और सयंम को लगातार खाए जा रहा है। हमारे शरीर की मूल प्रकृति हमारी अपनी ही करतूतों का शिकार हो चुकी हैं। यानी हमारा भविष्य हमारे ऊपर चिल्ला रहा है...यह पुस्तक ‘फ्युचर क्राईंग’(Future Crying) इसी समस्या पर केन्द्रित है या कहें मानव-मन की मनोवैज्ञानिक/मनोभाषिक पड़ताल है।

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*फरवरी, 2016 तक पाठकीय शुभेच्छा एवं आग्रह पर प्रकाशित किए जा सकने की संभावना है।
-माॅडरेटर

Saturday, August 2, 2014

नबारुण भट्टाचार्या: जैसा मैंने दूसरों से जाना

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जाने-माने कवि और जननायक नबारुण भट्टाचार्या का 31 जुलाई को निधन
बीते 31 जुलाई को नबारुण भट्टाचार्या इस दुनिया से रुख्स्त हो लिए। हिन्दुस्तान समाचारपत्र ने अभिषेक श्रीवास्तव के ‘जनपथ' के हवाले से बताया कि ‘जाते हुए लोग’ में इस बार नबारुण दा शामिल हैं। अहा! पत्रकारिता। मुआ इस अख़बार को भी पूरा पता है कि नबारुण दा एक क्रांतिधर्मी कवि हैं। जन-जन के उद्घोषक। अतः अपने काॅरपोरेट आकाओं/रहनुमाओं की डर से इस अख़बार ने एक काॅलम का ख़बर तक देना मुनासिब नहीं समझा। मैं जनपथ ब्लाॅग की ओर भागे हुए गया। ख़बर सच थी; लेकिन उसे जिस तरह लिखा गया था वह व्यंग्य-बाण मुझे काफी तल्ख़ किन्तु अचूक लगी। हिन्दीपट्टी के लेखकों की असलियत को अभिषेक श्रीवास्तव ने अनोखे रंग-ढंग में जिस तरह साझा किया था। वह ओरहन मात्र न थी। ‘भाषा-बंधन’ के सर्जक नबारुण दा को हिन्दी पट्टी के स्वनामधन्य लेखकों ने मौन श्रद्धांजलि की बिनाह पर मिनटों की बजाय सेकेंडों में निपटा दिया था।   

खैर! इस जघन्य समय में नबारुण दा को रवीन्द्रनाथ टैगोर की तरह ही ढूँढ पाना मुश्किल होगा। यह बात उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर के सन्दर्भ में खुद एक साक्षात्कार में कही थी। वे वर्तमान साहित्यिक मठागिरी और चारणगिरी से आहत थे। लिहाजा वे साहित्यिक प्रपंचों से दूर अपनी ही शैली की कुटिया में निवास करते थे। उनकी बेबाक टिप्पणी होती थी: ‘‘आजकल बहस और संवाद की जगह प्रशस्ति पाठ हो रहा है। साहित्य आगे बढ़ता है जब उसका एक समीक्षात्मक या आलोचनात्मक मूल्यांकन होता है। उस मूल्यांकन के अन्तर्गत विरोधाभास होता है। फिर संवाद होता है। लेकिन इससे भी जरूरी है राजनीति की आलोचना होना। राजनीति की जब आलोचना होती है तब नया साहित्य सामने आता है।’’ देशकाल, समाज, राजनीति, भूगोल, अर्थजगत, संस्कृति सबकी नबारुण दा बारीकी से टोह लेते थे। उनके विचारों में पश्चिम और पूर्व का जबर्दस्त सहमेल था। वह यह मानने लगे थे कि-‘‘आज का संस्कृति उद्योग थियोडोर एडोर्नो के कन्सेप्ट से नहीं चलता है।’’

नबारुण दा वर्तमान से बेहद ख़फा थे। जो कुछ घटित हो रहा है इस वक्त उस पर उनकी पैनी निगाह थी। उनमें इतिहासबोध गहरा और उसकी अभिव्यक्ति विलक्षण थी। वे कवि के भीतर अंतरात्मा में पैठी बेचैनी को एक्टिविज़्म में रुपायित होने देने के पक्षधर थे। उनका अपना मानना था कि कवि में एक्टिविज़्म यदि न हो तो कविता अपनी प्राणवायु कहाँ से पायेगी। वे इस सम्बन्ध में माकर्स को उद्धृत करते हुए कहते थे-‘कविता मनुष्य के अन्तरमन की भाषा है।’’ नबारुण दा की चर्चित पुस्तक है-‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’। इसी शीर्षक की कविता में नबारुण दा के स्वर की त्वरा और कहन की ताकत दिलचस्प है:

यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश
जो पिता अपने बेटे की लाश की शिनाख़्त करने से डरे
मुझे घृणा है उससे
जो भाई अब भी निर्लज्ज और सहज है
मुझे घृणा है उससे
जो शिक्षक बुद्धिजीवी, कवि, किरानी
दिन-दहाड़े हुई इस हत्या का
प्रतिशोध नहीं चाहता
मुझे घृणा है उससे...

यही समय है कविता लिखने का
इश्तिहार पर, दीवार पर स्टेंसिल पर
अपने ख़ून से, आँसुओं से हड्डियों से कोलाज शैली में
अभी लिखी जा सकती है कविता
तीव्रतम यंत्रणा से क्षत-विक्षत मुँह से
आतंक के रू-ब-रू वैन की झुलसाने वाली हेड लाइट पर आँखें गड़ाए
अभी फेंकी जा सकती है कविता
38 बोर पिस्तौल या और जो कुछ हो हत्यारों के पास
उन सबको दरकिनार कर
अभी पढ़ी जा सकती है कविता....

मैं छीन लाऊँगा अपने देश को
सीने मे‍ छिपा लूँगा कुहासे से भीगी कांस-संध्या और विसर्जन
शरीर के चारों ओर जुगनुओं की कतार
या पहाड़-पहाड़ झूम खीती
अनगिनत हृदय,हरियाली,रूपकथा,फूल-नारी-नदी
एक-एक तारे का नाम लूँगा
डोलती हुई हवा,धूप के नीचे चमकती मछली की आँख जैसा ताल
प्रेम जिससे मैं जन्म से छिटका हूँ कई प्रकाश-वर्ष दूर
उसे भी बुलाउँगा पास क्रांति के उत्सव के दिन।.....

(पिछली शताब्दी के सत्तर के दशक में कोलकाता के आठ छात्रों की हत्या कर धान की क्यारियों में फेंक दिया था। उनकी पीठ पर लिखा था देशद्रोही.  http://durvaa.blogspot.in/2011/11/blog-post_1)

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हम संस्कारच्यूत लोग हैं। अपनी ज्ञान में पिलाए हुए अकर्मण्य पुरुष/स्त्री। हम अपने लिए भी ‘अपनापा’ नहीं रखते हैं। सिवाए स्वार्थ, लाभ और अति-महत्वाकांक्षी चाह के हमारे लिए कुछ भी योग्य नहीं, स्तुत्य नहीं, आदरणीय और विचारणीय नहीं। हम गुजर-बसर चाहे कितनी भी ठाट(विराट भाव-भंगिमा) से कर रहे हों; लेकिन हमारा मनुष्यत्व खो चुका है। हम सामाजिक मान-प्रतिष्ठा का ‘टोकन’ ले जीने का अभ्यस्त हो चुके हैं; लेकिन सही अर्थों में हमारा कद-काठी ठठरी-पिलाई है; अतिरिक्त कुछ नहीं। यथा: कवि, कहानीकार, सम्पादक, अधिवक्ता, न्यायाधीश, नेता, मंत्री, संतरी, करोड़पति, अरबपति आदि। ऐसे छद्म माहौल में हम जनपथ की राह तब तकते हैं जब खुदा-न-ख़ास्ते हमें खुद उस पर चलना होता है या उससे लाभ/मुनाफे की बात दिमाग में चक्करघिन्नी की तरह चल रही होती है। लेकिन नबारुण भट्टाचार्या इसी राह के ताउम्र हमसफ़र रहे। भाव और भाषा के वे ज़िन्दादिल/क्रांतिधर्मा पथिक थे जिसमें आम आवाज़ का बसेरा था, सर्वहारा की धुन बजती थी। उनका व्यक्तित्व हो-हुल्लड़ से दूर एकदम सादगीपूर्ण था। 

मैं उन्हें नहीं जानता था। अपने संचार एवं राजनीति केन्द्रित शोध के अन्तर्गत एकबारगी  अक्षरों/शब्दों में वे टंके हुए मिले। वह कोई इंटरव्यू था। महत्त्वपूर्ण हिन्दी पत्रिका प्रगतिशील वसुधा के 92-93वें अंक में ‘लेखन, लेखकीय कवायद’ शीर्षक से प्रकाशित। इस इंटरव्यू में मुझे नबारुण दा के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। जैसे इसमें जिक्र है-‘‘वे जितने सरल हैं, अंदर से, कविता को लेकर, पूरे राजनीतिक परिदृष्य को लेकर, साहित्य-सिनेमा-समाज और मनुष्य की मनुष्यता को लेकर जिस जिद्दीपन की सीमा तक आशावान हैं, वह अद्भुत है।'' मैंने उन्हें अपने काॅपी के नोट-बुक में ‘कट-पेस्ट’ किया था:

‘‘प्रथमतः तो राजनीति को इंटरेस्टिंग होना होगा। उत्तरदायित्वपूर्ण होना होगा। व्यक्ति को जब तक यह समझ में नहीं आएगा कि हृदय की धड़कन के लिए राजनीति जरूरी है। मेरे बच्चे के भविष्य के लिए राजनीति जरूरी है। तब तक कुछ नहीं होगा। राजनीतिक पार्टियों का यह कर्तव्य है कि इस बोध को बनाए। जब तक इस बोध को नहीं बनाएँगे तब तक कुछ नहीं होगा। भारत में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं होगा।’’(नबारुण भट्टाचार्या)

‘‘मनुष्य को जागरूक न होने दिया जाए तो सरकार के अपने लाभ हैं। इसमें सरकार टेलीविजन का भयानक ढंग से अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रही है। एक आम-आदमी शाम को थककर घर पहुँचकर टेलीविज़न खोलता है। वह नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है? टेलीविज़न को खोलना ड्रग लेना है। यह दूसरे ड्रग्स, हेरोइन, चरस और अफ़ीम से भी ज्यादा ख़तरनाक है और इसका चरित्र दोहरा भी है। वह एक तरफ इन चीजों को बढ़ावा दे रहा है। जैसे-बाज़ारीकरण, अपसंस्कृति आदि तो दूसरी तरफ इनकी दबे मुँह आलोचना भी करेगा। और मजे की बात है कि इस आलोचना के पीछे भी उसकी बाज़ारू मानसिकता है।’’ और वे अपनी  अब उनके नाम का रट्टा मारा जा सकता है। मिलना असंभव। आगे के दिनों पर उनके बारे में कहने-सुनने को ढेरों बातें मिलेंगी। लेकिन हिन्दी के लेखकीय समाज की असलियत को जिस रूप में अभिषेक जी ने प्रस्तुत किया है; उसका मर्म बूझना आवश्यक है।’’
(नबारुण भट्टाचार्या)

‘‘हमारे सामने, खासकर युवा पीढ़ी, एक आदर्श व्यक्ति की कमी को महसूस कर रही है, क्यों? क्योंकि उसमें विचारधारा की कमी है? और दूसरी बात कि आज कि पूँजी आधारित व्यवस्था नहीं चाहती है कि ‘रोल माॅडल’ का निर्माण हो। क्योंकि ‘रोल माॅडल’ हमेशा प्रतिरोध को स्वर देता है। यह व्यवस्था ‘रोल माॅडल’ के प्रतिस्पर्धात्मक या उसके बदले किसी सिनेमा के नायक या टेलीविज़न के किसी विज्ञापन को नायक बनाकर पेश कर रही है।’’
(नबारुण भट्टाचार्या)

‘‘किसी भी कला से जुड़ने की राजनीति और उससे भागने की राजनीति अर्थात कला की जिम्मेदारी उठाने को तैयार व्यक्ति और उस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर चले जाने, भाग जाने वाला व्यक्ति’ ये दो तरह के लोग होते हैं। आजकल जिम्मेदारी से भागने वाले ज्यादा हैं। सामाजिक मीडिया और पूँजी के दबाव ने मनुष्य के भागने की प्रवृत्ति को तीव्र किया है।’’ 
(नबारुण भट्टाचार्या)

इस मंतव्य का असली गंतव्य आम-आदमी की जीत, उसकी भलाई और सुख-चैन की आकांक्षा है। आइए, इन शब्दों को कहे से आगे के अर्थ तक पहुँचाए। हम सही मायने में पूर्ण मनुष्य बने। सम्पूर्ण जीव-जगत की रक्षा का संकल्प लें। हम अपनी सोच में, सपनों में और भविष्य के पहलूओं में आमजन को शामिल करें। उनके साथ कदमताल मिलायें और वास्तविक अर्थों में सच्चा जीवन जिएं। मेरे लिए नबारुण दा को जानने और उनसे मोहब्बत करने का यही सबसे सच्चा और ताकतवर भाव-भक्ति है...श्रद्धांजलि है। आमीन!

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...