भारत का उत्तर वेद*

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भारतीय चिन्तन की व्यावहारिक कठिनाई छद्म अध्यात्म और मनुवादी दर्शन का लबादा ओढ़े रखना है। भारतीय ज्ञानशास्त्रियों का अकंुठ न होना दूसरी बड़ी कठिनाई है। भारतीय ज्ञान का सही अर्थों में अवमूल्यन आर्य-वैदिक पण्डितों/आचार्यों ने किया है। वे आज भी पुरानी मानसिकता से मोहग्रस्त हैं। संत-समागम, सामूहिक संवाद-विमर्श में अबूझ/अमर्यादित ढंग से वेद-वाक्यों, मंत्रों, ऋचाओं इत्यादि को हौंकना उनकी श्रेष्ठताग्रंथि बन चुकी है। हर चीज अथवा मामूली से मामूली संस्कार-पद्धति को भी वे वेदस्यूत बताते हुए अपनी हीन-उत्कंठा से विभार दिखाई देते हैं जो कि सरासर ग़लत है। क्योंकि आर्थिक और सामाजिक धरातल को नकारते हुए कोई भी अखिल भारतीय दर्शन की स्थापना असंभव है। यूँ तो सामाजिक अस्मिता और भारतीय जीवन-मूल्यों की अनदेखी कर आर्यों ने वैदिक परम्परा और वेदश्रुत विचारधाराओं को सायासतः प्रश्रय दिया। भारत सन्दर्भित उल्लेखित इतिहासों में आर्यों के आक्रमण को सामाजिक-राजनीतिक विकास-चक्र के अर्थों में ‘आगमन’ कहा गया है। यह प्रयोग सर्वथा अव्यावहारिक और अनुचित है। के. दामोदरन की दृष्टि में-‘‘भारत के राष्ट्रवादी इतिहासकार आर्य सभ्यता की प्राचीनता का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन करते थे और उसकी महिमा की भूरि-भूरि प्रशंसा करते रहते थे।....भारतीय सभ्यता की आर्य उत्पत्ति और उसकी अपरिवर्तनशीलता की ये कल्पित कथाएँ देश के भिन्न-भिन्न भागों में प्राचीन आर्यपूर्व समाज के ध्वंसावशेषों के खोज निकाले जाने के बाद बिल्कुल निर्मूल सिद्ध हो गयीं।’’

दरअसल, धार्मिक कर्मकाण्डों और दार्शनिक विचारधाराओं पर लोट-पोट भारतीय जबतक आर्य और अनार्य(मूलवंशी) के बीच के असली विभेद को नहीं जान लेंगे; भारत का वैदिक दर्शन ‘इण्डो-यूरोपियन’ मेहराबों या ‘आंग्लो-इण्डियन’ आधे-अधूरे साक्ष्यों के बीच झूलता रहेगा। अब यह लगभग सिद्ध हो चुका है कि जिन दिनों भारतीय अन्न-संग्राहक की आजीविका के साथ गुजर-बसर कर रहे थे और वे धातुओं के प्रयोग से अनजान थे; भारत में एक भरी-पूरी सभ्यता शनैः-शनैः अपनी उन्नति की ओर निरन्तर उन्मुखी थी। सहबोध, सहमेल और सहजीवन पर टिकी आर्य-पूर्व भारतीय संस्कृति पूर्णतया आत्मनिर्भर थी और सामूहिक-श्रम की विकासमान चेतना से पूरित भी। विभिन्न मतान्तरों के बावजूद यह सर्वमान्य तथ्य बन चुका है कि-‘‘भारत के आदिम मनुष्यों के बीच कोई वर्ग-विभाजन’ नहीं था।’’ इस तथ्य की पुष्टि में सर जाॅन मार्शल का कहा मानें, तो-‘‘पाँच हजार वर्ष पहले जब आर्यों का नाम तक नहीं सुन पड़ता था, पंजाब और सिन्धु में एक उन्नत सभ्यता विद्यमान थी जो तत्कालिन मेसोपोटामिया और मिस्र देश की सभ्यता से मिलती-जुलती थीं किन्तु कुछ अंशों में उससे बढ़-चढ़कर भी थीं। आज हड़प्पा और मोहेंजो-दड़ो की खोजें सन्देह के परे इसी तथ्य को साबित करती हैं।’’

शास्त्रीयतापूर्ण समस्त ज्ञान वेद से निकसित नहीं है। सिन्धु घाटी से प्राप्त साक्ष्य के मुताबिक-‘‘उन्होंने(मूलवंशी) तीन सौ अक्षरों की एक लिपि का आविष्कार कर लिया था जो स्पष्टतः चित्रलिपि वर्ग की है।’’ भारतवासियों पर आक्रमणकारी आर्यों ने खूब जु़ल्म ढाहे हैं। ऋग्वेद में उनके इस कृत्य को वीरतापूर्वक चित्रित किया गया है। उसमें ‘असुरों और दस्युओं को जीतने के लिए इन्द्र की सहायता की बार-बार अराधना की गयी है। ये असुर और दस्यु निश्चय ही सिंधु घाटी के निवासी थे।’ अन्याय की रीति-नीति ऋग्वेद कुल-परम्परा में विरोचित भाव से दर्ज किया गया है। के. दामोदरन ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय चिन्तन परम्परा’ में यह साफ वर्णित किया है कि-‘‘उन्होंने अपनी प्रसन्नता के लिए जनों को कुचल डाला और ‘बन्द कर रखे पानी को(बाँध तोड़कर) बहा दिया और यौवनपूर्ण पुरुकुत्स के लिए शत्रु को मार डाला...वे(आर्य) अपने को उन लोगों से उच्च और श्रेष्ठ समझते थे जिनको उन्होंने परास्त किया था। मूल निवासियों को आर्य मलेच्छ अथवा दस्यु अथवा दास कहकर पुकारते थे। दास शब्द, मूलतः जिसका अर्थ शत्रु है, ‘नौकर’ के अथवा ‘गुलाम’ के अर्थों में उस समय इस्तेमाल होना शुरू हुआ जब आर्यो ने इन मूल निवासियों को पराजित कर अपना दास बना लिया।’’

वर्तमान लोकतांत्रिक ‘फ्लेवर’ में यह असंगत/असमान भेदभाव आज भी जारी है। औसत दरजे के लोग सभी सरकारी/गैर-सरकारी पदों पर आसीन है; क्योंकि उनका कथित इतिहास और अनिर्वचनीय वेद उन्हें इस योग्य समझता है। जबकि उनसे अच्छी योग्यता और सच्चे संस्कार वाले शान्त, धीर, प्रसन्नमुख, योग्य, कुशल, नैतिक रूप से श्रेष्ट लोग आज भी अधम/नीच(सामिजिक/आर्थिक निकष पर) माने जा रहे हैं। यह साबित/प्रमाणित होते हुए भी की असलियत क्या है? के. दामोदरन ने अपनी पुस्तक में इसका जिक्र करते हुए लिखा है-‘‘ऋग्वेद से पता चलता है कि दस्युओं की संस्कृति आर्य संस्कृति से ऊँचे किस्म की थी। दस्युओं के किले बहुत मजबूत बताये गये हैं। उनके धार्मिक विश्वास अत्यन्त उन्नत प्रतीत होते हैं क्योंकि उनके देवतर आर्यों के देवताओं के समान मुख्य रूप से प्राकृतिक शक्तियों के ही प्रतिनिधि नहीं थे। वे शिव, देवी माता, लिंग और पवित्र ऋषभ(बैल) की पूजा करते थे। वेद दस्युओं का विशेष रूप से यह कहकर उल्लेख करते हैं कि वे आर्यों के देवों को नहीं मानते थे। उनकी अराधना नहीं करते थे, पुरोहितों को दक्षिणा नहीं देते थे या यज्ञ नहीं करते थे।’’
वेद की यही कटुक्तियां आज भी नास्तिकों के सन्दर्भ में यही सब कहती हैं। यह तब जब घोर आस्तिकों का स्वछन्द यौनाचार-व्याभिचार के मामले रोज नंगा नाच पस्तुत कर रहे हैं। दरअसल, वेद और वेदांचियों का अहम-बोध इतना तगड़ा है कि वे चाहे कुकर्म करें या सुकर्म उनके लिए तो स्वर्ग/मोक्ष सौ फ़ीसदी आरक्षित है।
*इसी शीर्षक से लिख रहे अपनी पुस्तक में राजीव रंजन प्रसाद   
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