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अब यहां से देखिए ‘इंडिया टुडे' को |
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यह उपभोक्ता समय है; और राजनीतिक उपभोक्ताओं के पास अकूत धन है। बेच-बाच के लिए। खरीद-फ़रोख्त के लिए। वे सौदेबाजी सोच-विचार कर करते हैं। वैसी चीज पर दाम फेंकते हैं जो आश्चर्यजनक हो; थोड़ा अचरज़नुमा हो। पत्र-पत्रिकाओं का बिकाऊ होना नई बात नहीं है। ‘कवर’ के अन्दरूनी पृष्ठ पर विज्ञापन आम-चलन में है; लेकिन अब उसे आवरण के बाद कई-कई पृष्ठों तक खरीद लेने की होड़ है। ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका का ताजा अंक(27 अगस्त) उदाहरण है।
सामान्य पाठक बगैर किसी हैरानी के बताते हैं कि ऐसी पत्रिकाओं और पत्रों का यह सामान्य चरित्र बन चुका है। यदि ये इस तरह बिकाऊ न बने रहे, तो उनका घर भूतबंगला बन जाएगा; विदेशी राजनीतिक यात्रा का लाभ इन्हें नहीं मिलेगा; बेटे-बेटियाँ हजारों की पाॅकेटखर्ची रोज न कर सकेंगी। यानी पाठकों का साफ मानना है कि आज के राजनीतिज्ञ और मीडियाविज्ञ अपना चरित्र और नियत बेचकर मालामाल हो रहे हैं। सचाई यह भी है कि पाठक स्वयं भी अपने मानसिक और चारित्रिक गठन में उपभोक्ता बन चुका है। वह जान रहा है कि अब पत्रकारीय नैतिकता, आत्म-बोध और सामाजिक सरोकार की बात बेमानी हो चुकी है। नरककुंड में यज्ञ और हवन शैतान ही कर सकता है। जो लोग देवताओं द्वारा समिधा करना/करवाना चाहते हैं....वे पहले स्वर्ग जाएँ तो सही!
हमारे राजनीतिज्ञों के पास सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। वे दूषित/संक्रमित राजनीतिक एजेण्डे के आधार पर सत्ता-शसन संभालते हैं। उनके भीतर इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति का घोर अभाव है। इस अभाव को वे एक ख़ालिस विभ्रम/सम्मोहन के आधार पर पाटना चाहते हैं। अपनी कमियों को वे महसूस करने की बजाए उन अच्छाइयों को मौजूदा राजनीतिज्ञ अपने ऊपर आरोपित करना चाह रहे हैं जो वे हैं ही नहीं। इसके लिए बाज़ार के पास पेशेवर भाट-चारण हैं। रुपए पर पलती-उमगती इस पीढ़ी के लिए अमेरिका, भारत, मोदी, अखिलेश....सब एक हैं। यह नई ज़वान पीढ़ी इतनी स्मार्ट और फैक्चुअल है कि उल्लू बनते लोगों के मुँह से यह कहवा सकती है कि ‘उल्लू ना बनाओ’।
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