राहुलीय कांग्रेस: अब भी बाकी है बहुत कुछ!


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‘‘राजाओं के कुमारों पर निगाह रखनी चाहिए; क्योंकि कुमार(आधुनिक सन्दर्भ में युवराज) ‘केकड़ों’ की भाँति अपने जनक को ही खा सकते हैं।’’



क्या महर्षि वृहस्पति का यह कथन कांग्रेस पर अक्षरशः लागू होता है। क्या राहुल गाँधी वाकई विफल रहे इस सोलवहीं लोकसभा चुनाव का सफल नेतृत्व कर सकने में? क्योंकर कांग्रेस इस बार इतनी लस्त-पस्त और लुंज-पुंज ढंग से चुनावी-लोकतंत्र में हिस्सा ले रही थी? क्या उसे आगामी हार का अंदाजा पहले से हो गया था या कि उसके पास अपनी नाकामियत को छुपा ले जाने लायक ‘स्पीन डाॅक्टर्स’/मैनेजेरियल प्रबंधकों की भारी कमी हो गई थी? सोलहवीं लोकसभा चुनाव में राहुल के तेवर/मिज़ाज ‘पसेरी के आगे पाव भर’ कहावत चरितार्थ कर रहे थे। कांग्रेस-विरोधी लहर में भाजपा की ओर से घोषित प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी लगातार राहुल, सोनिया और कांग्रेस पर निशाने साध रहे थे; जबकि कांग्रेसी-सरकार भाजपा की इस आक्रामक शैली और ठोस रणनीतिक प्रचार के आगे अपना नसबल ढीली करती दिखाई दे रही थी। सर्वाधिक पिछड़ापन राहुल गाँधी के व्यक्तित्व-नेतृत्व में दिखा जो पिछले एक दशक से राजनीतिक नेतृत्व का निर्णायक अंग-उपांग बने हुए थे। यह तब जबकि उनकी बात को पार्टी में खासमखास तवज्ज़ो है। वे आलाकमान के बाद कांग्रेसी-गिरबान के ऊपर काबिज़ हैं। फिर ऐसी राजनीतिक अपरिपक्वता, नासमझी और अधूरापन उनके व्यक्तित्व-नेतृत्व में क्योंकर देखने को मिला; यह अत्यन्त सोचनीय है?.....
प्रो. आर्जीव




काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में वरिष्ठ शोध अध्येता राजीव रंजन प्रसाद भारतीय युवा राजनीतिज्ञों के संचार विषयक मनोव्यवहार और मनोभाषिकी पर शोध-कार्य कर रहे हैं। अगले माह ‘इस बार’ ब्लाॅग पर उनकी विस्तृत पड़ताल और मानीख़ेज रपट  'राहुलीय कांग्रेस: अब भी बाकी है बहुत कुछ!'  शीर्षक से प्रस्तुत हो रही है।.....क्या आप पढ़ना चाहेंगे?
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