आपसदारी का संवाद और भारतीय भाषाएँ


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भाषा के मसले पर बात करते हुए ‘अहो रूपम, अहो ध्वनि’ की नकार जरूरी है।
श्रेष्ठता-ग्रंथि से चिपकी कोई भी दृष्टिकोण सफल कतई नहीं हो सकती है। इस प्रसंग में
भाषा-विशेषज्ञों/जानकारों को भारतीय समाज की बहुभाषिकता और भाषागत
विविधता को केन्द्र में रखकर ही अपनी बात कहनी होगी जिसका वर्तमान
परिप्रेक्ष्य में प्रायः नितान्त अभाव दिखता है। अधिसंख्य बौद्धिक
तजबीज़कारों ने भाषा के इस प्रश्न को सामाजिक-सांस्कृतिक मुहिम कम
राजनीतिक मामला अधिक बना दिया है। जबकि हिन्दी को लेकर सचमुच सजग और
सचेष्ट होने की जरूरत है।बुद्धिपंथी आरोप-प्रत्यारोपों से फायदा अंग्रेजी
का ही अंततः होगा; न कि हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं का इससे कहीं कुछ
उबार होने वाला है।

आज भी हिन्दी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं के अन्तरानुशासनिक ज्ञान-पक्ष
एवं सृजनात्मकता पर जोर देने का चलन न के बराबर है। यदि कोई इस बारे में
ईमानदारी बरतने की चेष्टा भी करे, तो उसे हतोत्साहित करने वाले
पराक्रमियों की फौज अपने ही भीतर से हमलावर हो उठेगी। दरअसल, हमारे ‘सो
काॅल्ड’ बुद्धिजीवी मूल-समस्या के भीतरी कारणों पर विचार-मंथन कम करते
हैं उसके इर्द-गिर्द चक्कर अधिक लगाते हैं। यह पुरोहिताना कर्मकाण्ड
इसलिए भी संभव होता दिखता है क्योंकि हमारा वैचारिक दायरा
संकीर्ण-संकुचित  है या किसी मरियल अनुवादी संस्था के हवाले। लिहाजा,
जन-संवाद का पक्ष बिल्कुल निर्बल अथवा कमजोर है। 
बीते चुनाव में कांग्रेसी नेताओ का जनता से
संवाद, संवेदन, प्रत्यक्षीकरण इत्यादि सिरे से गायब थे। एक तरह जहाँ
भारतीय जनता पार्टी की उत्तेजन/उद्वेलन(हुंकार-शंखनाद) से भरी-पूरी
सम्मोहक प्रचार-प्रणाली अगुवाई में थी वहीं कांगे्रस नाक से सिगार पीने
का अजीबोगरीब करतब करती दिखाई दे रही थी। राहुल गाँधी जिनके पास जनता के
लिए आत्मीय सम्बोधन तक की गूँजाइश नहीं है...बोलना कब तलक सीखेंगे,
नामालूम। गोकि भारतीय जनमानस जिसे राहुल गाँधी ‘सुनो’, ‘देखो’, ‘मैं
तुम्हें बताता हूँ’, ‘तुमलोगों को क्या चाहिए’ आदि शब्दावलियों से
सम्बोधित करने का आदी हैं; एक जनप्रतिनिधि होने के नाते अनुचित प्रयोग
है। सम्प्रेषणीयता का यह संकट भारत के लगभग हर संवर्ग में दिखाई देता है
जो भाषावलम्बियों को 'ज्ञानात्मक संवेदन' और 'संवेदनात्मक
ज्ञान'(मुक्तिबोध) के उत्कर्ष तक जाने से सीधे रोकती/छेंकती है।

यही स्थिति भारतीय अकादमियों में हिन्दीभाषी और हिन्दीतरभाषी
बुद्धिजीवियों के बीच है। आपसदारी का साझा विचार-मंच न होना अथाव मौजूदा
मंचों से आपसी संवाद का एकदम न्यूनतम होना; वैचारिक निठल्लेपन और
सम्प्रेषणीयता के संकट का ही नमूना है। अंतिम बात यह कि प्रत्येक भाषा
अपनी प्रस्तुति में सामूहिक अचेतन का अकूत भंडार(भारत के सम्बन्ध में
ज्ञान सम्बन्धी वे प्रवृत्तियां जिसे युंग, सस्यूर आदि ने भारत के
सन्दर्भ में जाना और स्वीकार तक किया) लेकर उपस्थित होती हैं...अब यह
प्रयोक्ता के प्रयोग-सापेक्ष नियत/मंशा पर निर्भर करता है कि वह उसका
प्रयोग किस तरह करे। वस्तुतः कोई भी भाषा चाहे जिस कीसी ज्ञान-परम्परा और
ज्ञानानुशासन से सम्बन्धित हों, अक्षम हरगिज़ नहीं होती हैं; यदि अक्षम
साबित होते भी हैं तो भाषा के झंडाबदार वे प्रयोक्ता जिन्होंने अपनी भाषा
को लेकर कहा-सुना बहुत हो; लेकिन रचा-बुना-गुना कुछ भी नहीं। आजकल हमारी
हिन्दीपट्टी के बौद्धिकों पर यह चलताऊपन अधिक हावी है। अतएव, भारतीय
भाषाओं के शुभचिन्तकों-बुद्धिजीवियों को अपनी ‘मुख-सुख की बानी’ को
ज्ञानयुक्त, नवाचारी एवं सम्प्रेषणीय बनाने की दिशा में सामूहिक पहलकदमी
और व्यावहारिक चुनौतियों से सीधे टकराने की जरूरत है। हम आपकी अगली पीढ़ी
में हैं, आप की इन भाषा-निर्मितियों से ही हमारे चेहरे और चरित्र का
निष्कलुष, अकुंठ और संवादधर्मी बनना सुनिश्चित है।
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प्रो. आर्जीव
Director : University of Soul
India
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