नबारुण भट्टाचार्या: जैसा मैंने दूसरों से जाना

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जाने-माने कवि और जननायक नबारुण भट्टाचार्या का 31 जुलाई को निधन
बीते 31 जुलाई को नबारुण भट्टाचार्या इस दुनिया से रुख्स्त हो लिए। हिन्दुस्तान समाचारपत्र ने अभिषेक श्रीवास्तव के ‘जनपथ' के हवाले से बताया कि ‘जाते हुए लोग’ में इस बार नबारुण दा शामिल हैं। अहा! पत्रकारिता। मुआ इस अख़बार को भी पूरा पता है कि नबारुण दा एक क्रांतिधर्मी कवि हैं। जन-जन के उद्घोषक। अतः अपने काॅरपोरेट आकाओं/रहनुमाओं की डर से इस अख़बार ने एक काॅलम का ख़बर तक देना मुनासिब नहीं समझा। मैं जनपथ ब्लाॅग की ओर भागे हुए गया। ख़बर सच थी; लेकिन उसे जिस तरह लिखा गया था वह व्यंग्य-बाण मुझे काफी तल्ख़ किन्तु अचूक लगी। हिन्दीपट्टी के लेखकों की असलियत को अभिषेक श्रीवास्तव ने अनोखे रंग-ढंग में जिस तरह साझा किया था। वह ओरहन मात्र न थी। ‘भाषा-बंधन’ के सर्जक नबारुण दा को हिन्दी पट्टी के स्वनामधन्य लेखकों ने मौन श्रद्धांजलि की बिनाह पर मिनटों की बजाय सेकेंडों में निपटा दिया था।   

खैर! इस जघन्य समय में नबारुण दा को रवीन्द्रनाथ टैगोर की तरह ही ढूँढ पाना मुश्किल होगा। यह बात उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर के सन्दर्भ में खुद एक साक्षात्कार में कही थी। वे वर्तमान साहित्यिक मठागिरी और चारणगिरी से आहत थे। लिहाजा वे साहित्यिक प्रपंचों से दूर अपनी ही शैली की कुटिया में निवास करते थे। उनकी बेबाक टिप्पणी होती थी: ‘‘आजकल बहस और संवाद की जगह प्रशस्ति पाठ हो रहा है। साहित्य आगे बढ़ता है जब उसका एक समीक्षात्मक या आलोचनात्मक मूल्यांकन होता है। उस मूल्यांकन के अन्तर्गत विरोधाभास होता है। फिर संवाद होता है। लेकिन इससे भी जरूरी है राजनीति की आलोचना होना। राजनीति की जब आलोचना होती है तब नया साहित्य सामने आता है।’’ देशकाल, समाज, राजनीति, भूगोल, अर्थजगत, संस्कृति सबकी नबारुण दा बारीकी से टोह लेते थे। उनके विचारों में पश्चिम और पूर्व का जबर्दस्त सहमेल था। वह यह मानने लगे थे कि-‘‘आज का संस्कृति उद्योग थियोडोर एडोर्नो के कन्सेप्ट से नहीं चलता है।’’

नबारुण दा वर्तमान से बेहद ख़फा थे। जो कुछ घटित हो रहा है इस वक्त उस पर उनकी पैनी निगाह थी। उनमें इतिहासबोध गहरा और उसकी अभिव्यक्ति विलक्षण थी। वे कवि के भीतर अंतरात्मा में पैठी बेचैनी को एक्टिविज़्म में रुपायित होने देने के पक्षधर थे। उनका अपना मानना था कि कवि में एक्टिविज़्म यदि न हो तो कविता अपनी प्राणवायु कहाँ से पायेगी। वे इस सम्बन्ध में माकर्स को उद्धृत करते हुए कहते थे-‘कविता मनुष्य के अन्तरमन की भाषा है।’’ नबारुण दा की चर्चित पुस्तक है-‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’। इसी शीर्षक की कविता में नबारुण दा के स्वर की त्वरा और कहन की ताकत दिलचस्प है:

यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश
जो पिता अपने बेटे की लाश की शिनाख़्त करने से डरे
मुझे घृणा है उससे
जो भाई अब भी निर्लज्ज और सहज है
मुझे घृणा है उससे
जो शिक्षक बुद्धिजीवी, कवि, किरानी
दिन-दहाड़े हुई इस हत्या का
प्रतिशोध नहीं चाहता
मुझे घृणा है उससे...

यही समय है कविता लिखने का
इश्तिहार पर, दीवार पर स्टेंसिल पर
अपने ख़ून से, आँसुओं से हड्डियों से कोलाज शैली में
अभी लिखी जा सकती है कविता
तीव्रतम यंत्रणा से क्षत-विक्षत मुँह से
आतंक के रू-ब-रू वैन की झुलसाने वाली हेड लाइट पर आँखें गड़ाए
अभी फेंकी जा सकती है कविता
38 बोर पिस्तौल या और जो कुछ हो हत्यारों के पास
उन सबको दरकिनार कर
अभी पढ़ी जा सकती है कविता....

मैं छीन लाऊँगा अपने देश को
सीने मे‍ छिपा लूँगा कुहासे से भीगी कांस-संध्या और विसर्जन
शरीर के चारों ओर जुगनुओं की कतार
या पहाड़-पहाड़ झूम खीती
अनगिनत हृदय,हरियाली,रूपकथा,फूल-नारी-नदी
एक-एक तारे का नाम लूँगा
डोलती हुई हवा,धूप के नीचे चमकती मछली की आँख जैसा ताल
प्रेम जिससे मैं जन्म से छिटका हूँ कई प्रकाश-वर्ष दूर
उसे भी बुलाउँगा पास क्रांति के उत्सव के दिन।.....

(पिछली शताब्दी के सत्तर के दशक में कोलकाता के आठ छात्रों की हत्या कर धान की क्यारियों में फेंक दिया था। उनकी पीठ पर लिखा था देशद्रोही.  http://durvaa.blogspot.in/2011/11/blog-post_1)

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हम संस्कारच्यूत लोग हैं। अपनी ज्ञान में पिलाए हुए अकर्मण्य पुरुष/स्त्री। हम अपने लिए भी ‘अपनापा’ नहीं रखते हैं। सिवाए स्वार्थ, लाभ और अति-महत्वाकांक्षी चाह के हमारे लिए कुछ भी योग्य नहीं, स्तुत्य नहीं, आदरणीय और विचारणीय नहीं। हम गुजर-बसर चाहे कितनी भी ठाट(विराट भाव-भंगिमा) से कर रहे हों; लेकिन हमारा मनुष्यत्व खो चुका है। हम सामाजिक मान-प्रतिष्ठा का ‘टोकन’ ले जीने का अभ्यस्त हो चुके हैं; लेकिन सही अर्थों में हमारा कद-काठी ठठरी-पिलाई है; अतिरिक्त कुछ नहीं। यथा: कवि, कहानीकार, सम्पादक, अधिवक्ता, न्यायाधीश, नेता, मंत्री, संतरी, करोड़पति, अरबपति आदि। ऐसे छद्म माहौल में हम जनपथ की राह तब तकते हैं जब खुदा-न-ख़ास्ते हमें खुद उस पर चलना होता है या उससे लाभ/मुनाफे की बात दिमाग में चक्करघिन्नी की तरह चल रही होती है। लेकिन नबारुण भट्टाचार्या इसी राह के ताउम्र हमसफ़र रहे। भाव और भाषा के वे ज़िन्दादिल/क्रांतिधर्मा पथिक थे जिसमें आम आवाज़ का बसेरा था, सर्वहारा की धुन बजती थी। उनका व्यक्तित्व हो-हुल्लड़ से दूर एकदम सादगीपूर्ण था। 

मैं उन्हें नहीं जानता था। अपने संचार एवं राजनीति केन्द्रित शोध के अन्तर्गत एकबारगी  अक्षरों/शब्दों में वे टंके हुए मिले। वह कोई इंटरव्यू था। महत्त्वपूर्ण हिन्दी पत्रिका प्रगतिशील वसुधा के 92-93वें अंक में ‘लेखन, लेखकीय कवायद’ शीर्षक से प्रकाशित। इस इंटरव्यू में मुझे नबारुण दा के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। जैसे इसमें जिक्र है-‘‘वे जितने सरल हैं, अंदर से, कविता को लेकर, पूरे राजनीतिक परिदृष्य को लेकर, साहित्य-सिनेमा-समाज और मनुष्य की मनुष्यता को लेकर जिस जिद्दीपन की सीमा तक आशावान हैं, वह अद्भुत है।'' मैंने उन्हें अपने काॅपी के नोट-बुक में ‘कट-पेस्ट’ किया था:

‘‘प्रथमतः तो राजनीति को इंटरेस्टिंग होना होगा। उत्तरदायित्वपूर्ण होना होगा। व्यक्ति को जब तक यह समझ में नहीं आएगा कि हृदय की धड़कन के लिए राजनीति जरूरी है। मेरे बच्चे के भविष्य के लिए राजनीति जरूरी है। तब तक कुछ नहीं होगा। राजनीतिक पार्टियों का यह कर्तव्य है कि इस बोध को बनाए। जब तक इस बोध को नहीं बनाएँगे तब तक कुछ नहीं होगा। भारत में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं होगा।’’(नबारुण भट्टाचार्या)

‘‘मनुष्य को जागरूक न होने दिया जाए तो सरकार के अपने लाभ हैं। इसमें सरकार टेलीविजन का भयानक ढंग से अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रही है। एक आम-आदमी शाम को थककर घर पहुँचकर टेलीविज़न खोलता है। वह नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है? टेलीविज़न को खोलना ड्रग लेना है। यह दूसरे ड्रग्स, हेरोइन, चरस और अफ़ीम से भी ज्यादा ख़तरनाक है और इसका चरित्र दोहरा भी है। वह एक तरफ इन चीजों को बढ़ावा दे रहा है। जैसे-बाज़ारीकरण, अपसंस्कृति आदि तो दूसरी तरफ इनकी दबे मुँह आलोचना भी करेगा। और मजे की बात है कि इस आलोचना के पीछे भी उसकी बाज़ारू मानसिकता है।’’ और वे अपनी  अब उनके नाम का रट्टा मारा जा सकता है। मिलना असंभव। आगे के दिनों पर उनके बारे में कहने-सुनने को ढेरों बातें मिलेंगी। लेकिन हिन्दी के लेखकीय समाज की असलियत को जिस रूप में अभिषेक जी ने प्रस्तुत किया है; उसका मर्म बूझना आवश्यक है।’’
(नबारुण भट्टाचार्या)

‘‘हमारे सामने, खासकर युवा पीढ़ी, एक आदर्श व्यक्ति की कमी को महसूस कर रही है, क्यों? क्योंकि उसमें विचारधारा की कमी है? और दूसरी बात कि आज कि पूँजी आधारित व्यवस्था नहीं चाहती है कि ‘रोल माॅडल’ का निर्माण हो। क्योंकि ‘रोल माॅडल’ हमेशा प्रतिरोध को स्वर देता है। यह व्यवस्था ‘रोल माॅडल’ के प्रतिस्पर्धात्मक या उसके बदले किसी सिनेमा के नायक या टेलीविज़न के किसी विज्ञापन को नायक बनाकर पेश कर रही है।’’
(नबारुण भट्टाचार्या)

‘‘किसी भी कला से जुड़ने की राजनीति और उससे भागने की राजनीति अर्थात कला की जिम्मेदारी उठाने को तैयार व्यक्ति और उस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर चले जाने, भाग जाने वाला व्यक्ति’ ये दो तरह के लोग होते हैं। आजकल जिम्मेदारी से भागने वाले ज्यादा हैं। सामाजिक मीडिया और पूँजी के दबाव ने मनुष्य के भागने की प्रवृत्ति को तीव्र किया है।’’ 
(नबारुण भट्टाचार्या)

इस मंतव्य का असली गंतव्य आम-आदमी की जीत, उसकी भलाई और सुख-चैन की आकांक्षा है। आइए, इन शब्दों को कहे से आगे के अर्थ तक पहुँचाए। हम सही मायने में पूर्ण मनुष्य बने। सम्पूर्ण जीव-जगत की रक्षा का संकल्प लें। हम अपनी सोच में, सपनों में और भविष्य के पहलूओं में आमजन को शामिल करें। उनके साथ कदमताल मिलायें और वास्तविक अर्थों में सच्चा जीवन जिएं। मेरे लिए नबारुण दा को जानने और उनसे मोहब्बत करने का यही सबसे सच्चा और ताकतवर भाव-भक्ति है...श्रद्धांजलि है। आमीन!
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