भारत का उत्तर वेद*


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आज के आदिवासी समाज को लक्षित कर कहें, तो एक बात तो निश्चय जानिए कि अनार्यों का अन्तःकरण बहुत साफ था। अन्तःकरण की निर्मिति चार प्रधान तत्त्वों से होती है। यथा: मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त। अजीब विडम्बना है कि इस शास्त्रीय ज्ञान का उल्लेख आर्य करते हैं और खरे उतरते हैं अनार्यजन।(भारतीय मूलवंशी/शुद्धजन जिन्हें वर्तमान में ‘शूद्र’ कह अपमानित करने का चलन है) अनार्यों का अपना मानना था कि-‘‘ज़बानी जमा खर्च से, बहुत भाषण सुनाने से, बहुत पढ़ने-लिखने आदि से ब्रह्यज्ञान(सत्य और ऋत आधारित) की प्राप्ति नहीं होती है। उसके लिए पात्रता ग्रहण करना अनिवार्य है। वह बलहीन को नहीं मिल सकता। बल का अभिप्राय सदाचरण-बल और ज्ञान-बल से है।’’ जो लोग भुजबल या बाहुबल को सर्वोपरि मानते हैं; दरअसल, वे उल्टी खोपड़ी से सोचते हैं। इसी तरह धनबल को महत्तव देने वाले लोग झूठ, पाखण्ड, प्रपंच, स्वार्थ, कुत्सा इत्यादि में सदा आसक्त दीखते हैं। वह यह सोच ही नहीं पाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य का जन्म कई-कई पीढ़ियों के अन्तराल के बाद हुआ है। यानी पूर्वज आज के अधिभौतिक संसार की तुलना में अधिक संपति का मालिक थे। उनके पास धरती के खजाने का विपुल भण्डार, खजाना और इफ़रात जवाहरात-आभूषण थे। यानी आर्यपूर्व भारतवंशी हर दृष्टिकोण से आर्यों से अधिक श्रेष्ठ थे; लेकिन उनमें भौतिक/दैहिक लिप्सा लेशमात्र भी नहीं थी। आर्यों के अपने जाले फैलाने के बाद से ही ऐसी विषमता और असमानता देखने को मिलती है। इसका कारण यह है कि अनार्यजन हर प्रकार की कलुषित इच्छा से मुक्त थे। वास्तव में इच्छा या कामना ही मुख्य कारक है जिससे बँधा मनुष्य कुमार्गी/कुकर्मी या कि अधम/नीच बन जाता है। वास्तव में जिस वस्तु की इच्छा हो जाती है वह सूक्ष्म रूप से आत्मा का खुला आँगन छेंक लेती है। और यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि रोशनी की अधिकतम न्यूनता ही अन्धकार का वास्तविक आमंत्रक है।
 
वस्तुतः किसी कार्य को हम इच्छानुरूप क्यों करें? इसका निर्णय आत्मसजग विवेक करता है जो हमारे आत्मज्ञान पर निर्भर है। अनार्य मूलतः आत्मज्ञानी थे। वे वस्तुनिष्ठता और सत्यापनशीलता के आग्रही थे। वे किसी कार्य के पक्ष में हामी भरने से पहले यह विचारते थे कि अमुक कार्य का परिणाम कैसा होगा? इसका प्रभाव हमारे शरीर, इन्द्रिय, मन तथा आत्मा पर कैसा पड़ेगा? अनार्य लोग अपनी आत्मा पर दृष्टि रखकर किसी कार्य को करने के बारे में सोचा करते थे। जबकि आर्यों की दृष्टि सर्वथा भिन्न थी। यह अलग बात है कि सत्य का हमेशा पराजित होना भी एक अजीब नियति है। यह नारा शास्त्रसम्मत भले हो-‘सत्यमेव जयते’; लेकिन यह सदा जनविरूद्ध ही साबित हुआ है। सामान्य लोग सत्य का रट्टा मारते हुए या कि स्थापित/रूढ़ आदर्शों-मान्यताओं को ढोते-पूजते हुए लगातार पिछड़ते जाते हैं वहीं सच्चे आदर्श की कोरी-बात करने वाले लोग उन तमाम चीजों पर अपना एकाधिकार जमा लेते हैं जो उनका है ही नहीं। वेद-वेदांचियों ने आर्यों को दैवी-पुरुष के रूप में वर्णित किया है। वे कई तरह के सुरक्षा-कवच और अंधाधुँध भौतिक सुख-सुविधाओं के बीच रहने के आदि थे। जबकि अनार्यों के लिए उन्होंने कई प्रकार का टिटिमा/कर्मकाण्ड बना रखा था। आर्य स्वयं को पंचमहायज्ञ का अधिष्ठाता मानते थे। पंचमहायज्ञ यानी ब्रह्ययज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ, भूतयज्ञ। ब्रह्ययज्ञ ज्ञान का यज्ञ होता था। देवयज्ञ के अन्तर्गत उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना होता था जो मनुष्यनिर्मित न होकर दैव निर्मित हैं। पितृयज्ञ के अनुसार अपने वंश-परम्परा का सम्मान करना लक्षित होता था। अतिथियज्ञ में अतिथियों का पूरे मान-सम्मान के साथ सेवा-सुश्रुषा करना निश्चित था। भूतयज्ञ में उन पंचभूतों के प्रति आभार प्रकट करना होता था जिससे मनुष्य का निर्माण हुआ है। यथा: क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर। ये ऐसे आदर्श थे जिनसे आर्य-जाति खुद मुक्त थी; लेकिन अनार्यों को इस भव-बंधन से गुजरना अनिवार्य था; क्योंकि मुक्तिमार्ग का ज्ञााता/दर्शी(?) सिर्फ आर्यजन ही थे! आज भी गंगा आचवन कराते अधिसंख्य पण्डित/पुरोहित खुद टाइल्स और शाॅवर लगे बाथरूम से नहा-धो कर क्यों न आये हो; लेकिन कड़ाके की ठंड में गंगा में डूबकी लगाने की सलाह वे दूसरों को देंगे ही देंगे।   
 
दरअसल, आदर्श कोई अमूर्तन चीज नहीं है। इसकी स्थापना लोक-व्यवहार की चीजों(संस्कार, अनुभव, आदत, चेतना) का सकारात्मक ढंग से उच्चतम शिखर पर विराजमान हो जाने से होता है। वर्तमान के सन्दर्भ में देखें, तो आज जो विराजमान है; वह बेज़ा/बेढंगा बाजा बजाने में मशगूल है। यह मशगूलता इसलिए है कि अर्जुनसेन कमिटी की रपट उस पर लागू नहीं होती है। उसके शरीर में कैलोरी की कमी नहीं है। वह दौलतमंद है, इसलिए शक्तिमान है; और जनपक्षीय कार्यों का नीति-नियंता भी। चूँकि वह आर्यवंशी(झूठ और मक्कारी से लदा-फदा) है इसलिए उसकी दावेदारी वेदस्यूत है। अन्य सभी अनार्य हैं जिनके हिस्से में शासकीय अराजकता का शिकार होना लिखा है। यह इसलिए भी कि उनकी संताने डाॅक्टर नहीं है जो उनके या उनके जैसों के बीमार पड़ने पर देखभाल और समुचित सेवा-टहल कर सके। उनकी संताने इंजीनियर नहीं हैं जो कि उनके लिए या उनके जैसों के लिए बड़े-बड़े बंगले और कोठी बनवा सके; अतः अनार्यों का मुख्य कार्य हथजोरी/विनती करना है; साहबों-बाबूओं का कहा मानना और उनके जोरू-जमातों की हर कहे पर जोरदार हामी भरना है। ऐसे लोगों की पहचान प्राचीन काल से अब तक अदेखी/अलिखी ही रही है। वेदयुगीन ज़माने में व्याप्त बर्बरता और व्याभिचार जिसका सर्वाधिक शिकार अनार्यजन रहे हैं; के बारे में वेद कहता बहुत कुछ है; लेकिन उनकी वास्तविक इयता को समाप्त करके। दासप्रथा, सतीप्रथा, छुआछूत, बाल-विवाह, अतिशय विषय-भोग और यौन-कुकर्मों को लेकर वेद चुप है, वेदान्ती मौन है; क्योंकि सभी अनार्य शत्रुपक्ष घोषित किए जा चुके हैं। अतः उनके साथ आदिम बर्ताव या मानवीय-व्यवहार की गूँजाइश ही कहाँ बनती है? आज भी साम्प्रदायिक विवादों, दंगों और हिंसक कार्रवाईयों में यह सब कहाँ सोचा जाता है? और जो लोग सोचते हैं वे गणेश शंकर विद्यार्थी और महात्मा गाँधी की तरह मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। आज दोनों अपने समय में घोषित प्रासंगिकता का विज्ञापन कर रहे हैं; जबकि जन-जन के बीच से उन्हें सायासतः विस्मृत किया जा चुका है। आधुनिक आर्यवंशियों का एकमात्र लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण अपनी श्रेष्ठता-ग्रंथि को अपदस्थ होने से बचाना है। वे तमाम तरह के घोटालों और भ्रष्ट आचरणों में सीधे संलिप्त होकर भी सामाजिक सम्मान का हक़दार हैं क्योंकि आर्यवंशी समाज उसका पूरा पोषण-पालन करने के लिए तत्पर हैं। उनका साफ मानना है कि यदि वर्तमान भरा-पूरा, समृद्ध, सम्पन्न, धन-धानय, ऐश्वर्य इत्यादि से सुसज्जित हो, तो वह यमदूत/काल को भी मोलभाव कर खरीद सकते हैं और अपनी मृत्यु की तारीख़ में हरसंभव उलटफेर अथवा फेरफार कर सकते हैं। जिस देश में सामान्य जन खाँसी, कालाजार, बुखार और टायफाॅयड जैसी बीमारियों से असमय मौत का भागी बन रहे हैं; वहीं भोग-विलासी लोगों के लिए कुछ भी लाइलाज नहीं है। वे कैंसर से भी बच सकते हैं और अन्य प्रकोपशाली रोगों से भी।
 
यहाँ पंक्तिलेखक का ध्येय किसी को सही या ग़लत ठहराना नहीं है। बल्कि यह दिखाना है कि ख़लकामी आर्यो ने किस तरह भारत की मूल चेतना को नष्ट-विनष्ट किया है जो आजतक जारी है; वर्तमान समय के ‘जीन कोड’ में विद्यमान है। पंक्तिलेखक का मुख्य प्रतिरोध उसे दूषित चेतना से है जो आर्य जाति को भारत के उद्धारकत्र्ता के रूप में चित्रित/वर्णित करती है। गोकि झूठ को महिमामंडित करने की आर्य-संस्कृति पुरानी है। वे अनार्यों को सर्वथा तुच्छ और स्वयं से भिन्न हेयदृष्टि से देखते रहे हैं; लेकिन उन्होंने अपनी ग्रंथावलियों में समरसता, सदाशयता और समानता का भरपूर बखान/गुणगान किया है। पुरोहितवाद के कारखाने से उपजे ऐसे लोग जो आरक्षण के मुद्दे पर नाक-भौं सिकुड़ते हैं; वे(खाए-पिए-अघाए जन) इस बात पर तर्क/चिन्तन करना भूल जाते हैं कि इस स्वाधीन देश में आर्थिक विषमता की इतनी बड़ी खाई स्वाधीनता प्राप्ति के इतने बरस बाद भी पत्थरवत क्यों है? क्योंकर धनवान की चाहरदिवारी-मीनार और छत-छज्जे बेशकीमती पत्थरों और महँगे रंग-रोगन से अटे पड़े हैं जबकि एक किसान की टूटी मड़ई चारों कोने से चू रही है? क्यों एक निजी स्कूल का ड्राइवर एक जोड़ी फटा-सुथन्ना पहने गाड़ी चलाता रहता है; जबकि उस विधालय में आधुनिक साज-सामानों की आमद हमेशा बढ़ती जाती है? क्यों नहीं यह सोचा जाता है कि हुनरमंद युवा सरकारी/शैक्षिक उपाधियाँ हासिल कर लेने के बावजूद बेरोजगारी की मार झेलता रहता है; वहीं सुविधा-सम्पन्न लोग सहज प्रगति के पायदान पर ऊँचे चढ़ जाते हैं, पद पा जाते हैं, नेतृत्व करने लगते हैं और उन्हें हुक्म बजाने का अधिकार भी मिल जाता है? मौजूदा जातिधार्म समाज क्यों नहीं निराला द्वारा दिए उस सूत्र को अपनाता है जिसमें उन्होंने मनुवादी वर्ण-व्यवस्था के विपरीत आधुनिक अर्थ/व्याख्या प्रस्तुत किया है?
 
याद रहे कि आर्य और अनार्य की परिभाषा आज के बदले स्वरूप में सिर्फ जातिवादी मठाधिशी से नहीं है; बल्कि इसका सम्बन्ध सत्ता-शक्तियों के लगातार केन्द्रीकृत/वैश्वीकृत होते जाने से है। उन व्यक्ति-समूहों से है जिसके उन्नयन-विकास मात्र को  ‘इंडिया शाइंनिंग’ या ‘भारत उदय’ का पर्याय मान/समझ लिया जाता है। यहाँ आर्य और अनार्य का अर्थ/आशय किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा-विशेष से भी नहीं है; बल्कि उस छलयुक्त नीति-नियमावली से है जिसमें साथ सबका होता है; किन्तु हासिल सबको नहीं होता है। इन सब विवेचनाओं के आधार पर इतिहासकालीन अनार्यों को देखें, तो वे भी इन्हीं सब राजनीति का शिकार रहे हैं जिसे हम वर्तमान में घटित होते देख रहे हैं। सवाल है, इनका इतिहास कौन लिखेगा और कहाँ लिखेगा? क्या इसके लिए भी कोई नवआधुनिक वेद लिखा जाना तय है; या वे पुराने नियम ही घुटी की तरह पीते हुए यों ही मरते-खपते रहेंगे जिस नियम का वैदिक अर्थ होता था: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरीय-आस्था या ध्यान-जाप।

*इसी शीर्षक से लिख रहे अपनी पुस्तक में राजीव रंजन प्रसाद

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