Wednesday, August 20, 2014

टाॅपलेस हुई पत्रिका ‘इंडिया टुडे’

परोक्ष रूप से मुख्य कवर-फोटो

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अब यहां से देखिए ‘इंडिया टुडे' को

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यह उपभोक्ता समय है; और राजनीतिक उपभोक्ताओं के पास अकूत धन है। बेच-बाच के लिए। खरीद-फ़रोख्त के लिए। वे सौदेबाजी सोच-विचार कर करते हैं। वैसी चीज पर दाम फेंकते हैं जो आश्चर्यजनक हो; थोड़ा अचरज़नुमा हो। पत्र-पत्रिकाओं का बिकाऊ होना नई बात नहीं है। ‘कवर’ के अन्दरूनी पृष्ठ पर विज्ञापन आम-चलन में है; लेकिन अब उसे आवरण के बाद कई-कई पृष्ठों तक खरीद लेने की होड़ है। ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका का ताजा अंक(27 अगस्त) उदाहरण है।

सामान्य पाठक बगैर किसी हैरानी के बताते हैं कि ऐसी पत्रिकाओं और पत्रों का यह सामान्य चरित्र बन चुका है। यदि ये इस तरह बिकाऊ न बने रहे, तो उनका घर भूतबंगला बन जाएगा; विदेशी राजनीतिक यात्रा का लाभ इन्हें नहीं मिलेगा; बेटे-बेटियाँ हजारों की पाॅकेटखर्ची रोज न कर सकेंगी। यानी पाठकों का साफ मानना है कि आज के राजनीतिज्ञ और मीडियाविज्ञ अपना चरित्र और नियत बेचकर मालामाल हो रहे हैं। सचाई यह भी है कि पाठक स्वयं भी अपने मानसिक और चारित्रिक गठन में उपभोक्ता बन चुका है। वह जान रहा है कि अब पत्रकारीय नैतिकता, आत्म-बोध और सामाजिक सरोकार की बात बेमानी हो चुकी है। नरककुंड में यज्ञ और हवन शैतान ही कर सकता है। जो लोग देवताओं द्वारा समिधा करना/करवाना चाहते हैं....वे पहले स्वर्ग जाएँ तो सही!

हमारे राजनीतिज्ञों के पास सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। वे दूषित/संक्रमित राजनीतिक एजेण्डे के आधार पर सत्ता-शसन संभालते हैं। उनके भीतर इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति का घोर अभाव है। इस अभाव को वे एक ख़ालिस विभ्रम/सम्मोहन के आधार पर पाटना चाहते हैं। अपनी कमियों को वे महसूस करने की बजाए उन अच्छाइयों को मौजूदा राजनीतिज्ञ अपने ऊपर आरोपित करना चाह रहे हैं जो वे हैं ही नहीं। इसके लिए बाज़ार के पास पेशेवर भाट-चारण हैं। रुपए पर पलती-उमगती इस पीढ़ी के लिए अमेरिका, भारत, मोदी, अखिलेश....सब एक हैं। यह नई ज़वान पीढ़ी इतनी स्मार्ट और फैक्चुअल है कि उल्लू बनते लोगों के मुँह से यह कहवा सकती है कि ‘उल्लू ना बनाओ’।

माननीय कुलपति को एक शोधार्थी का विदाई-पत्र

परमआदरणीय कुलपति महोदय,
नमस्कार!

श्रीमान्!

पिछली दफ़ा नए ‘वाइस-चांसलर’ की काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में नियुक्ति
बड़े ही लोकतांत्रिक ढंग से की गई थी। इस बार भी होगी; क्योंकि यह एक
प्रक्रिया है जिसके पराक्रम से हमसब अवगत हैं। पिछली मर्तबा बड़े उत्साह
से मैंने इस ‘खोज प्रकरण’ की ‘आॅनलाइन रपट' लिखी थी। इसके बदले में हमें
प्रो. लालजी सिंह यानी आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के नवनियुक्त कुलपति
के रूप में पदभार ग्रहण करते हुए मिले। आपके आते ही ख़बरों में यह चर्चा
‘प्याली के तूफान’ की तरह हम विद्यार्थियों के बीच तड़का मारते दिखी कि अब
तो इस विश्वविद्यालय का कायाकल्प सौ फिसदी संभव है। पिछले कुलपति महोदय
इस विश्वविद्यालय को ‘सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय’ की ऊँचाई पर टांग(?) कर
गए थे; लगा नवागंतुक कुलपति प्रो. लालजी सिंह इसे सचमुच ज़मीन पर
उतारंेगे। हमारे लिए सोच लेना आसान है, किन्तु आपके लिए हमारे सोचे
अनुरूप कर पाना कितना कठिन; इसकी बानगी मैं अपने परास्नातक पाठ्यक्रम
प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता के उदाहरण से देना चाहता हूँ जो कि घोषित
रूप से विश्वविद्यालय का ‘प्रोफेशनल कोर्स’(?) है। हमने इस सम्बन्ध में
‘प्रोपर चैनल’ से कई बार मिन्नत-दरख़्वास्त की, रिरियाए और अंत में
हार-दांव मान चुप्पी भी साध ली। यह हमारी सीमा थी, लेकिन इसे होनहारी
कहना श्रेयस्कर है। हमारा अपना मानना था कि प्रयोजनमूलक हिन्दी
पत्रकारिता आज जिस अवस्थिति में है उसका एक मुख्य (हानि)कारक इसके प्रति
सही सोच एवं संतुलित दृष्टि का सर्वथा अभाव होना है; यदि इसमें उपयुक्त
बदलाव की गूँजाइश बनती है, तो यह प्रोफेशनल कोर्स आने वाले दिनों में
अपनी लोकप्रियता के उच्चतम शिखर पर काबिज़ होगा।

हमारी माँगे थी:

1.      प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता पाठ्यक्रम के लिए योग्य अध्यापकों की
यथाशीघ्र नियुक्ति की जाये जिसके लिए तीन पद यूजीसी द्वारा स्वीकृत/घोषित
है; लेकिन नियुक्ति-प्रक्रिया पिछले तीन साल से लम्बित है।
2.      इसे हिन्दी विभाग में स्वतन्त्र अनुभाग के रूप में विकसित करना जिसमें
कक्षाएँ, हाॅल, सेमिनार-कक्ष, व्याख्यान कक्ष, स्वतन्त्र पुस्तकालय
उपलब्ध हो।(यह अनुरोध स्वतन्त्र तो नहीं; केन्तु विभा के मुख्य अंग के रूप में
मान ली गई और कल ही इसका उद्घाटन हुआ)
3.      सभी कक्षाओं को ‘प्रोजेक्टर’ और ‘पीपीटी’ की आधुनिक सुविधा से लैस
किया जाए ताकि हम न सिर्फ समय के साथ सही तालमेल बिठा पाये बल्कि हिन्दी
पत्रकारिता की दृष्टि से यह पाठ्यक्रम अपनी उत्कृष्टता का मिसाल भी पेश
कर सके।
4.      यहाँ दाखिला लिए विद्यार्थियों के लिए सलाना ‘कार्यशाला’ और
‘संगोष्ठी’ के आयोजन का समुचित प्रबन्ध हो; ताकि हम अपने भाषिक-विधानों
और भाषिक ज्ञान-सम्पदा को व्यावहारिक अंतःदृष्टि और बाह्यदृष्टि के सहमेल
संग बाँध/जोड़ सके।

महोदय, मुझे खुशी एवं प्रसन्नता हुई कि मैंने इस पाठ्यक्रम से सर्वप्रथम
‘जनसंचार एवं पत्रकारिता’ विषय के अन्तर्गत 'नेट/जेआरएफ' परीक्षा
उत्तीर्ण किया। सोचा, अब श्रीमान्!  कुलपति जी से अपनी योग्यता का हवाला
देकर इस पाठ्यक्रम के बारे में गंभीरतापूर्वक और संवेदनशील हो कर विचार
करने के लिए राजी कर सकूंगा....लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हमारे सारे
प्रयास खाली हाथ लौटे। हमें हर मौके पर निराश किया गया। आपसे सीधे मिलने
और बात करने पर कितनी पाबन्दी है इस सच से आप खुद भी वाकिफ़ होंगे। हम
हमेशा ‘प्रोपर चैनल’ की राह तकते रहे....और आज आप इस विश्वविद्यालय में
अपना कार्यकाल पूरा कर जा भी रहे हैं।

महोदय, यह सच है कि हम माननीय कुलपति महोदय के उन कार्यों से आह्लाद
महसूस कर रहे हैं जिसकी आपने नींव रखी है...उनका उद्घाटन किया है। ये
सकरात्मक, विकासमूलक और प्रगतिशील चीजें हमारी आँख में है जिसे आपकी
इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति द्वारा पूरा किया जा सका है। जैसे-साइबर
लाइब्रेरी, ट्रामा सेन्टर, बीएचयू अस्पताल सम्बन्धी चिकीत्सीय सुविधा और
उपलब्धता में अभिवृद्धि, मंदिर का सुन्दरीकरण, चैराहों का सौन्दर्यीकरण,
अन्यान्य निर्माण कार्य....। पर प्रश्न है कि फिर हम और हमारे पाठ्यक्रम
को क्यों इस कदर आपके अनदेखेपन/अजनबीपन का शिकार होना पड़ा है। मैं खुद
व्यक्तिगत स्तर पर शोध-सम्बन्धी कार्य में जीजान से जुटा रहा हूँ। मैंने
पहली बार हिन्दी विभाग में शोध-पत्र वाचन और प्रस्तुति का नवाचारी माॅडल
रखा जिसकी विडम्बना यह रही कि एक के बाद कोई ‘फाॅलोआप’ नहीं मिला। इन सब
के बावजूद यह सचाई है कि हम विद्यार्थी  ‘प्राग स्कूल’, ‘टोरेंटो स्कूल’,
शिकागो स्कूल’, ‘फ्रैंकफूर्त स्कूल’ इत्यादि के अन्तराष्ट्रीय मानकों से
लड़ने-भिड़ने की पूरी दमखम और ताकत रखते हैं। एक वैज्ञानिक और बहुआयामी
व्यक्तित्व के धनी कुलपति जी से हमारी अपेक्षा इसी संघर्ष की चेतना में
सहयोग पाने का था।

खैर, यह मेरा आपको प्रेषित दूसरा ई-मेल है। पहला तब भेजा था जब हमारे
विभाग के एक सुयोग्य शोध-छात्र की मृत्यु शोध-कार्य के तनाव भरे माहौल की
वजह से हो गई थी; और मैं चाहता था कि आप उनके श्रद्धांजलि भेंट में
उपस्थित हो कर हमसे सकारात्मक संवाद स्थापित करें; हमारी आवश्यकताओं एवं
कठिनाइयों को सुने....पर यह सुअवसर हमें नहीं मिला और न ही आपकी ओर से
कोई जवाब ही आया। किन्तु इस घड़ी आप जब इस विद्यालय से विदा ले रहे
हैं...हम समस्त अपेक्षाओं और अपनी नाराजगियों को दरकिनार करते हुए आपका
आभार व्यक्त करते हैं।
सादर,

भवदीय
राजीव रंजन प्रसाद
वरिष्ठ शोध अध्येता(जनसंचार एवं पत्रकारिता)
हिन्दी विभाग
काशी हिन्दू विष्वविद्यालय
वाराणसी।
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Tuesday, August 19, 2014

'A Culture of Impulsive American' : Analysis of Psycho Cognitive Wandering of American Politics

From Google
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 Publish : October, 2014 by Prof. Aarjeev
एक समाजभाषावैज्ञानिक एवं मनोभाषावैज्ञानिक पड़ताल



Monday, August 18, 2014

राहुलीय कांग्रेस: अब भी बाकी है बहुत कुछ!


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‘‘राजाओं के कुमारों पर निगाह रखनी चाहिए; क्योंकि कुमार(आधुनिक सन्दर्भ में युवराज) ‘केकड़ों’ की भाँति अपने जनक को ही खा सकते हैं।’’



क्या महर्षि वृहस्पति का यह कथन कांग्रेस पर अक्षरशः लागू होता है। क्या राहुल गाँधी वाकई विफल रहे इस सोलवहीं लोकसभा चुनाव का सफल नेतृत्व कर सकने में? क्योंकर कांग्रेस इस बार इतनी लस्त-पस्त और लुंज-पुंज ढंग से चुनावी-लोकतंत्र में हिस्सा ले रही थी? क्या उसे आगामी हार का अंदाजा पहले से हो गया था या कि उसके पास अपनी नाकामियत को छुपा ले जाने लायक ‘स्पीन डाॅक्टर्स’/मैनेजेरियल प्रबंधकों की भारी कमी हो गई थी? सोलहवीं लोकसभा चुनाव में राहुल के तेवर/मिज़ाज ‘पसेरी के आगे पाव भर’ कहावत चरितार्थ कर रहे थे। कांग्रेस-विरोधी लहर में भाजपा की ओर से घोषित प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी लगातार राहुल, सोनिया और कांग्रेस पर निशाने साध रहे थे; जबकि कांग्रेसी-सरकार भाजपा की इस आक्रामक शैली और ठोस रणनीतिक प्रचार के आगे अपना नसबल ढीली करती दिखाई दे रही थी। सर्वाधिक पिछड़ापन राहुल गाँधी के व्यक्तित्व-नेतृत्व में दिखा जो पिछले एक दशक से राजनीतिक नेतृत्व का निर्णायक अंग-उपांग बने हुए थे। यह तब जबकि उनकी बात को पार्टी में खासमखास तवज्ज़ो है। वे आलाकमान के बाद कांग्रेसी-गिरबान के ऊपर काबिज़ हैं। फिर ऐसी राजनीतिक अपरिपक्वता, नासमझी और अधूरापन उनके व्यक्तित्व-नेतृत्व में क्योंकर देखने को मिला; यह अत्यन्त सोचनीय है?.....
प्रो. आर्जीव




काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में वरिष्ठ शोध अध्येता राजीव रंजन प्रसाद भारतीय युवा राजनीतिज्ञों के संचार विषयक मनोव्यवहार और मनोभाषिकी पर शोध-कार्य कर रहे हैं। अगले माह ‘इस बार’ ब्लाॅग पर उनकी विस्तृत पड़ताल और मानीख़ेज रपट  'राहुलीय कांग्रेस: अब भी बाकी है बहुत कुछ!'  शीर्षक से प्रस्तुत हो रही है।.....क्या आप पढ़ना चाहेंगे?

Sunday, August 17, 2014

कैसे खेलते हैं अमेरीकी बच्चे?

1.

क्या अमेरीकी बच्चे
आपस में नहीं खेलते हैं....,
मिल-बहोर कर, जमात में जुट कर....!!!

क्या अमेरीकी बच्चे
आपस में नहीं गपियाते
संग-साथ बैठ कर, एक साथ जमा हो कर....!!!

क्या अमेरीकी बच्चे
आपस में प्रेम नहीं करते
आँख में पंख लगाकर, गले लगाकर....!!!

यदि अमेरीकी बच्चे
यह सब नहीं करते हैं
तो कैसे और किस तरह ज़िन्दा रहते हैं मनुष्य की संतान बनकर....!!!

मेरा पहला सवाल सिर्फ इतना ही है!

2. 

क्या अमेरीकी बच्चों के खिलौने
रसोई के बर्तन नहीं होते हैं....!!!
क्या उनके खेलने की जगह
घर-आँगन, दुआर-दालान नहीं होते हैं...!!!
 क्या अमेरीकी बच्चे
मेरे दोनों बेटे देव और दीप की तरह
गेंद और बाँसुरी से नहीं खेलते हैं...!!!

क्या अमेरीकी बच्चे
पैदा होते ही सीख जाते हैं
दूसरों की जान लेना
भारी टैंको पर चढ़ना-उतरना
बमवर्षक विमानों से निर्दिष्ट स्थानों की ओर रवाना होना...!!!

आखिर ये सयाने अमेरीकी जन
कैसे फ़र्क करते होंगे
हवा में मौत का साजो-सामान लिए हुये
अपने बच्चों और दूसरों के बच्चे में.....!!!

मेरा अन्तिम सवाल सिर्फ इतना ही है!
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कविता में बारिश का नाम


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ओरहन देते खेतों का
बदला है स्वर
यह बरसे बारिश का असर है!

भर गए हैं ताल-पोखर
पाँची* नदी गिर रही है झार के
यह बरसे बारिश का असर है!

बदला है मिजाज
जोंकटियों के रेंगने का पानी में
यह बरसे बारिश का असर है!

जुटे गए हैं किसान
अपने-अपने अभियान में
यह बरसे बारिश का असर है!

बच गई है खेतिहरों की आत्मा
अकालग्रस्त होने से
यह बरसे बारिश का असर है!

तवाँ गई हथेली अफ़सरों-बाबूओं की
कि नहीं मिलेगी रेवड़ियाँ** इस बार 
यह बरसे बारिश का असर है!

आदमी होने की जद्दोज़हद मे
आखिर सफल हुए किसान
यह बरसे बारिश का असर है!

लेकिन कहना भाई मोदी जी से
एक विज्ञापन रचे और
कि यह ‘अच्छे दिन’ का असर है!!!
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*कैमूर की पहाड़ी की एक घाटी झील
**जो अकाली क्षेत्र घोषित होने पर मिलती है

Saturday, August 16, 2014

भारत का उत्तर वेद*


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आज के आदिवासी समाज को लक्षित कर कहें, तो एक बात तो निश्चय जानिए कि अनार्यों का अन्तःकरण बहुत साफ था। अन्तःकरण की निर्मिति चार प्रधान तत्त्वों से होती है। यथा: मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त। अजीब विडम्बना है कि इस शास्त्रीय ज्ञान का उल्लेख आर्य करते हैं और खरे उतरते हैं अनार्यजन।(भारतीय मूलवंशी/शुद्धजन जिन्हें वर्तमान में ‘शूद्र’ कह अपमानित करने का चलन है) अनार्यों का अपना मानना था कि-‘‘ज़बानी जमा खर्च से, बहुत भाषण सुनाने से, बहुत पढ़ने-लिखने आदि से ब्रह्यज्ञान(सत्य और ऋत आधारित) की प्राप्ति नहीं होती है। उसके लिए पात्रता ग्रहण करना अनिवार्य है। वह बलहीन को नहीं मिल सकता। बल का अभिप्राय सदाचरण-बल और ज्ञान-बल से है।’’ जो लोग भुजबल या बाहुबल को सर्वोपरि मानते हैं; दरअसल, वे उल्टी खोपड़ी से सोचते हैं। इसी तरह धनबल को महत्तव देने वाले लोग झूठ, पाखण्ड, प्रपंच, स्वार्थ, कुत्सा इत्यादि में सदा आसक्त दीखते हैं। वह यह सोच ही नहीं पाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य का जन्म कई-कई पीढ़ियों के अन्तराल के बाद हुआ है। यानी पूर्वज आज के अधिभौतिक संसार की तुलना में अधिक संपति का मालिक थे। उनके पास धरती के खजाने का विपुल भण्डार, खजाना और इफ़रात जवाहरात-आभूषण थे। यानी आर्यपूर्व भारतवंशी हर दृष्टिकोण से आर्यों से अधिक श्रेष्ठ थे; लेकिन उनमें भौतिक/दैहिक लिप्सा लेशमात्र भी नहीं थी। आर्यों के अपने जाले फैलाने के बाद से ही ऐसी विषमता और असमानता देखने को मिलती है। इसका कारण यह है कि अनार्यजन हर प्रकार की कलुषित इच्छा से मुक्त थे। वास्तव में इच्छा या कामना ही मुख्य कारक है जिससे बँधा मनुष्य कुमार्गी/कुकर्मी या कि अधम/नीच बन जाता है। वास्तव में जिस वस्तु की इच्छा हो जाती है वह सूक्ष्म रूप से आत्मा का खुला आँगन छेंक लेती है। और यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि रोशनी की अधिकतम न्यूनता ही अन्धकार का वास्तविक आमंत्रक है।
 
वस्तुतः किसी कार्य को हम इच्छानुरूप क्यों करें? इसका निर्णय आत्मसजग विवेक करता है जो हमारे आत्मज्ञान पर निर्भर है। अनार्य मूलतः आत्मज्ञानी थे। वे वस्तुनिष्ठता और सत्यापनशीलता के आग्रही थे। वे किसी कार्य के पक्ष में हामी भरने से पहले यह विचारते थे कि अमुक कार्य का परिणाम कैसा होगा? इसका प्रभाव हमारे शरीर, इन्द्रिय, मन तथा आत्मा पर कैसा पड़ेगा? अनार्य लोग अपनी आत्मा पर दृष्टि रखकर किसी कार्य को करने के बारे में सोचा करते थे। जबकि आर्यों की दृष्टि सर्वथा भिन्न थी। यह अलग बात है कि सत्य का हमेशा पराजित होना भी एक अजीब नियति है। यह नारा शास्त्रसम्मत भले हो-‘सत्यमेव जयते’; लेकिन यह सदा जनविरूद्ध ही साबित हुआ है। सामान्य लोग सत्य का रट्टा मारते हुए या कि स्थापित/रूढ़ आदर्शों-मान्यताओं को ढोते-पूजते हुए लगातार पिछड़ते जाते हैं वहीं सच्चे आदर्श की कोरी-बात करने वाले लोग उन तमाम चीजों पर अपना एकाधिकार जमा लेते हैं जो उनका है ही नहीं। वेद-वेदांचियों ने आर्यों को दैवी-पुरुष के रूप में वर्णित किया है। वे कई तरह के सुरक्षा-कवच और अंधाधुँध भौतिक सुख-सुविधाओं के बीच रहने के आदि थे। जबकि अनार्यों के लिए उन्होंने कई प्रकार का टिटिमा/कर्मकाण्ड बना रखा था। आर्य स्वयं को पंचमहायज्ञ का अधिष्ठाता मानते थे। पंचमहायज्ञ यानी ब्रह्ययज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ, भूतयज्ञ। ब्रह्ययज्ञ ज्ञान का यज्ञ होता था। देवयज्ञ के अन्तर्गत उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना होता था जो मनुष्यनिर्मित न होकर दैव निर्मित हैं। पितृयज्ञ के अनुसार अपने वंश-परम्परा का सम्मान करना लक्षित होता था। अतिथियज्ञ में अतिथियों का पूरे मान-सम्मान के साथ सेवा-सुश्रुषा करना निश्चित था। भूतयज्ञ में उन पंचभूतों के प्रति आभार प्रकट करना होता था जिससे मनुष्य का निर्माण हुआ है। यथा: क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर। ये ऐसे आदर्श थे जिनसे आर्य-जाति खुद मुक्त थी; लेकिन अनार्यों को इस भव-बंधन से गुजरना अनिवार्य था; क्योंकि मुक्तिमार्ग का ज्ञााता/दर्शी(?) सिर्फ आर्यजन ही थे! आज भी गंगा आचवन कराते अधिसंख्य पण्डित/पुरोहित खुद टाइल्स और शाॅवर लगे बाथरूम से नहा-धो कर क्यों न आये हो; लेकिन कड़ाके की ठंड में गंगा में डूबकी लगाने की सलाह वे दूसरों को देंगे ही देंगे।   
 
दरअसल, आदर्श कोई अमूर्तन चीज नहीं है। इसकी स्थापना लोक-व्यवहार की चीजों(संस्कार, अनुभव, आदत, चेतना) का सकारात्मक ढंग से उच्चतम शिखर पर विराजमान हो जाने से होता है। वर्तमान के सन्दर्भ में देखें, तो आज जो विराजमान है; वह बेज़ा/बेढंगा बाजा बजाने में मशगूल है। यह मशगूलता इसलिए है कि अर्जुनसेन कमिटी की रपट उस पर लागू नहीं होती है। उसके शरीर में कैलोरी की कमी नहीं है। वह दौलतमंद है, इसलिए शक्तिमान है; और जनपक्षीय कार्यों का नीति-नियंता भी। चूँकि वह आर्यवंशी(झूठ और मक्कारी से लदा-फदा) है इसलिए उसकी दावेदारी वेदस्यूत है। अन्य सभी अनार्य हैं जिनके हिस्से में शासकीय अराजकता का शिकार होना लिखा है। यह इसलिए भी कि उनकी संताने डाॅक्टर नहीं है जो उनके या उनके जैसों के बीमार पड़ने पर देखभाल और समुचित सेवा-टहल कर सके। उनकी संताने इंजीनियर नहीं हैं जो कि उनके लिए या उनके जैसों के लिए बड़े-बड़े बंगले और कोठी बनवा सके; अतः अनार्यों का मुख्य कार्य हथजोरी/विनती करना है; साहबों-बाबूओं का कहा मानना और उनके जोरू-जमातों की हर कहे पर जोरदार हामी भरना है। ऐसे लोगों की पहचान प्राचीन काल से अब तक अदेखी/अलिखी ही रही है। वेदयुगीन ज़माने में व्याप्त बर्बरता और व्याभिचार जिसका सर्वाधिक शिकार अनार्यजन रहे हैं; के बारे में वेद कहता बहुत कुछ है; लेकिन उनकी वास्तविक इयता को समाप्त करके। दासप्रथा, सतीप्रथा, छुआछूत, बाल-विवाह, अतिशय विषय-भोग और यौन-कुकर्मों को लेकर वेद चुप है, वेदान्ती मौन है; क्योंकि सभी अनार्य शत्रुपक्ष घोषित किए जा चुके हैं। अतः उनके साथ आदिम बर्ताव या मानवीय-व्यवहार की गूँजाइश ही कहाँ बनती है? आज भी साम्प्रदायिक विवादों, दंगों और हिंसक कार्रवाईयों में यह सब कहाँ सोचा जाता है? और जो लोग सोचते हैं वे गणेश शंकर विद्यार्थी और महात्मा गाँधी की तरह मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। आज दोनों अपने समय में घोषित प्रासंगिकता का विज्ञापन कर रहे हैं; जबकि जन-जन के बीच से उन्हें सायासतः विस्मृत किया जा चुका है। आधुनिक आर्यवंशियों का एकमात्र लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण अपनी श्रेष्ठता-ग्रंथि को अपदस्थ होने से बचाना है। वे तमाम तरह के घोटालों और भ्रष्ट आचरणों में सीधे संलिप्त होकर भी सामाजिक सम्मान का हक़दार हैं क्योंकि आर्यवंशी समाज उसका पूरा पोषण-पालन करने के लिए तत्पर हैं। उनका साफ मानना है कि यदि वर्तमान भरा-पूरा, समृद्ध, सम्पन्न, धन-धानय, ऐश्वर्य इत्यादि से सुसज्जित हो, तो वह यमदूत/काल को भी मोलभाव कर खरीद सकते हैं और अपनी मृत्यु की तारीख़ में हरसंभव उलटफेर अथवा फेरफार कर सकते हैं। जिस देश में सामान्य जन खाँसी, कालाजार, बुखार और टायफाॅयड जैसी बीमारियों से असमय मौत का भागी बन रहे हैं; वहीं भोग-विलासी लोगों के लिए कुछ भी लाइलाज नहीं है। वे कैंसर से भी बच सकते हैं और अन्य प्रकोपशाली रोगों से भी।
 
यहाँ पंक्तिलेखक का ध्येय किसी को सही या ग़लत ठहराना नहीं है। बल्कि यह दिखाना है कि ख़लकामी आर्यो ने किस तरह भारत की मूल चेतना को नष्ट-विनष्ट किया है जो आजतक जारी है; वर्तमान समय के ‘जीन कोड’ में विद्यमान है। पंक्तिलेखक का मुख्य प्रतिरोध उसे दूषित चेतना से है जो आर्य जाति को भारत के उद्धारकत्र्ता के रूप में चित्रित/वर्णित करती है। गोकि झूठ को महिमामंडित करने की आर्य-संस्कृति पुरानी है। वे अनार्यों को सर्वथा तुच्छ और स्वयं से भिन्न हेयदृष्टि से देखते रहे हैं; लेकिन उन्होंने अपनी ग्रंथावलियों में समरसता, सदाशयता और समानता का भरपूर बखान/गुणगान किया है। पुरोहितवाद के कारखाने से उपजे ऐसे लोग जो आरक्षण के मुद्दे पर नाक-भौं सिकुड़ते हैं; वे(खाए-पिए-अघाए जन) इस बात पर तर्क/चिन्तन करना भूल जाते हैं कि इस स्वाधीन देश में आर्थिक विषमता की इतनी बड़ी खाई स्वाधीनता प्राप्ति के इतने बरस बाद भी पत्थरवत क्यों है? क्योंकर धनवान की चाहरदिवारी-मीनार और छत-छज्जे बेशकीमती पत्थरों और महँगे रंग-रोगन से अटे पड़े हैं जबकि एक किसान की टूटी मड़ई चारों कोने से चू रही है? क्यों एक निजी स्कूल का ड्राइवर एक जोड़ी फटा-सुथन्ना पहने गाड़ी चलाता रहता है; जबकि उस विधालय में आधुनिक साज-सामानों की आमद हमेशा बढ़ती जाती है? क्यों नहीं यह सोचा जाता है कि हुनरमंद युवा सरकारी/शैक्षिक उपाधियाँ हासिल कर लेने के बावजूद बेरोजगारी की मार झेलता रहता है; वहीं सुविधा-सम्पन्न लोग सहज प्रगति के पायदान पर ऊँचे चढ़ जाते हैं, पद पा जाते हैं, नेतृत्व करने लगते हैं और उन्हें हुक्म बजाने का अधिकार भी मिल जाता है? मौजूदा जातिधार्म समाज क्यों नहीं निराला द्वारा दिए उस सूत्र को अपनाता है जिसमें उन्होंने मनुवादी वर्ण-व्यवस्था के विपरीत आधुनिक अर्थ/व्याख्या प्रस्तुत किया है?
 
याद रहे कि आर्य और अनार्य की परिभाषा आज के बदले स्वरूप में सिर्फ जातिवादी मठाधिशी से नहीं है; बल्कि इसका सम्बन्ध सत्ता-शक्तियों के लगातार केन्द्रीकृत/वैश्वीकृत होते जाने से है। उन व्यक्ति-समूहों से है जिसके उन्नयन-विकास मात्र को  ‘इंडिया शाइंनिंग’ या ‘भारत उदय’ का पर्याय मान/समझ लिया जाता है। यहाँ आर्य और अनार्य का अर्थ/आशय किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा-विशेष से भी नहीं है; बल्कि उस छलयुक्त नीति-नियमावली से है जिसमें साथ सबका होता है; किन्तु हासिल सबको नहीं होता है। इन सब विवेचनाओं के आधार पर इतिहासकालीन अनार्यों को देखें, तो वे भी इन्हीं सब राजनीति का शिकार रहे हैं जिसे हम वर्तमान में घटित होते देख रहे हैं। सवाल है, इनका इतिहास कौन लिखेगा और कहाँ लिखेगा? क्या इसके लिए भी कोई नवआधुनिक वेद लिखा जाना तय है; या वे पुराने नियम ही घुटी की तरह पीते हुए यों ही मरते-खपते रहेंगे जिस नियम का वैदिक अर्थ होता था: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरीय-आस्था या ध्यान-जाप।

*इसी शीर्षक से लिख रहे अपनी पुस्तक में राजीव रंजन प्रसाद

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...