Saturday, July 13, 2013

युवा राजनीति में आधी आबादी


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कुकुरमुते जमात में उगते-पनपते हैं। लेकिन, स्त्रियाँ कुकुरमुते की जात नहीं होती।

एक के बाद दूसरी लड़की हुई नहीं कि आदमी के भीतर का अदहन खौलने लगता है। इस अनचाही ताप से समाज का पितृसत्तात्मक चेहरा झुलस जाता है। कोहराम की भाषा में चर्चा के सोते फूट पड़ते हैं। लूटी किस्मत का हवाला दे कर उन नवजात लड़कियों को हीक भर कोसा जाने लगता है जिन्हें सयाने होने तक अनगिनत दुश्वारियाँ झेलनी होती है। राहचलते मजनूओं से निपटना होता है। शोहदों की सीटी की आवाज़ और भद्दे कहकहे सुन चुप्पी में सँवरना होता है। अनचाही आँख जब उनके देह को छूकर निकलती है, तो तन-मन पर क्या कुछ गुजरता है; यह वे क्या जाने जो सिर्फ यह गाना गाना जानते हैं-‘‘लड़की है या छड़ी है, शोला है, फुलझड़ी है....440 वोल्ट है...छूना है मना।’’

ऐसे कठिन परिवेश में पल-बढ़ कर युवा हुई लड़कियाँ भारतीय संसद/राज्य विधानसभाओं में कितनी मात्रा में उपस्थित हैं? अन्दाजिए जनाब! शरमाइए मत, गिनिए। यह सचाई है कि वर्तमान राजनीति आज भी लड़कों की बपौती है। राजनीतिक आकागण अपने बेटों को ही अपना सत्ताधिकारी घोषित करते हैं। उनके गुणगान-बखान में रैली-रेला ठेलमठेल करते हैं। और लड़कियाँ...? उनके लिए राजनीति में आने का रास्ता बंद रखा जाता है। ऐसा नहीं है। बल्कि इस दिशा में उन्हें सोचने ही नहीं दिया जाता है। हाँ, जिन प्रतापी राजनीतिज्ञों के लड़के नहीं होते....वे अपने बेटियों को ‘प्रमोट/प्रोजेक्ट‘ अवश्य करते हैं। यह उदारीपन नहीं है...यह काइयाँगिरी है जिसमें उनका लक्ष्यार्थ अपने राजनीतिक वंशावली के 'डीएनए' को हर हाल में बचाकर रखना होता है। यह कुटनीतिक चाल है जिसमें लड़कियों को राजनीति ‘लाइफलाइन एलीमेंट’ की तरह आजमाया करती है।

बने रहिए आप रजीबा के साथ....जल्द ही आप पढ़ेगें भारतीय राजनीति में शामिल आधी आबादी का सच, हाल-ए-हक़ीकत, मुकम्मल तफ़्तीश और पड़ताल....जो भारतीय राजनीति में आधी आबादी के उपस्थित होने या न होने सम्बन्धी ‘पाॅलिटिकल मोनोपाॅली’ का बखान/बयान करती है।

रजीबा की पाती

प्रिय देव-दीप,

कैसे हो आपदोनों? बिटना का जन्मदिन है 25 जुलाई को। याद है। मैं भूला नहीं हँू तारीख़। राजा बाबा आपका जन्मदिन भी याद था, 27 अप्रैल। आप ही नहीं थे मेरे पास। खैर! इस बार आपदोनों का जन्मदिन साथ-साथ मनाऊँगा। संयुक्त रूप से।

देव-दीप, आपदोनों के पिता होने का सुख मैं काट रहा हूँ। जबकि आपदोनों बेरोजगार पिता के बेटे होने का दंश झेल रहे हैं। इन हालातों का जवाबदेह मैं खुद हूँ। मेरा निकम्मापन जिसपर मुझे लाड़ आता है अक्सर....आपदोनों के लिए करता-धरता कुछ नहीं है। हाँ, बतकही-बकबकी में अव्वल अवश्य है। यह सब वैसे समय में जब प्रतिभावानों का झुण्ड मेरे आगे-पीछे दौड़ लगाता दिख रहा है; मैं अपने फिसड्डीपन का पीठ थपथपाने में अलमस्त हूँ।

देव-दीप, शोध जैसे महत्त्वपूर्ण काम के लिए मेरी पात्रता न के बराबर थी। मेरे गाइड ने हौसला आफजाई की, तो मेरा उत्साह कपार पर और सोच फुनगी पर चढ़ गया। मुझे खुद से ताज्जुब था कि जो लड़का ठीक से अपनी बबरी तक नहीं सँवार सकता है, सलीकेदार कपड़े(मुफ्ती, लिवाइस, काॅटन्स, फ्लाइंग मशीन....ब्रान्डेड) तक नहीं पहन सकता है....वह अपने गुणवान/प्रतिभावान मित्रों के संगत में रहकर इतनी जल्दी क्या कुछ सीख लेगा? खैर! आपदोनों अपनी उम्र के साथ बड़े होते चले गए और मैं जूनियर शोधार्थी से सीनियर शोधार्थी बनता चला गया। आज इस शोध में आए मुझे चार साल हो गए हैं...तब भी लगता है कि अगले साल के अंत से पहले शायद ही कुछ ठीक-ठाक(काॅपी-पेस्ट कतई नहीं)जमा कर पाऊँ?

देव-दीप, जहाँ मैं पढ़ता हूँ मेरे इर्द-गिर्द संवेदना, ज्ञान, भाषा, शिल्प, कला इत्यादि की गंगोत्री बहती है। इस गंगोत्री में दर्शन-चिन्तन की बड़ी-बड़ी मछलियाँ तैरती हैं। मेरे कई मित्रों की उठकी-बैठकी और हर-हर गंगे उस गंगोत्री के साथ जबर्दस्त है। वे उसमें चैबीसों घंटे पँवरते हैं, लेकिन डूबते कतई नहीं। इस गंगोत्री में कई सिद्ध साधक हैं जो खुद को दुनिया भर के मुद्दों का जानकार और अन्तरराष्ट्रीय प्रवक्ता कहते हैं। उनके आगे पीएम, सीएम, डीएम सब के सब पानी भरते हैं। वे सीधे सबसे बात कर लें...जुबान की मजाल नहीं। लेकिन वे मंच से तूफानी बोलते हैं। वजनदार ताली पिटवाते हैं। मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ी है। अतः मैं उनकी बातों को प्रायः पन्ने पर नोट-नाटकर उनकी नाक की नापजोख करता हूँ, अलोता में....अकेले में। और खुद से हिसाब-किताब करता हूँ कि क्या वे वाकई बहुत ज्ञानी हैं। प्रकाण्ड हैं। जिनके आगे सब सुननहारों की आँखें चुंधिया जाती है।

देव-दीप, ज्ञान बाँटने से बढ़ता है; यह बचपन की सीख है। विश्वविद्यालयों में तो ज्ञान मौके पर बोलने से ही बढ़ा मालूम देता है। कौन संवेदनशील है, मानवीय है, अद्भुत है, बेमिशाल है, सर्वहारा का साथी है, हाशिए की आवाज़ है...यह सब किसी को देखकर या उनके हाव-भाव, व्यक्तित्व-व्यवहार का सीधे मोल-तोल-परख कर नहीं जाना जा सकता है। इसके लिए मुझ जैसे की मोटी बुद्धि धोखा दे जाती है। सूक्ष्म दिमाग और तीक्ष्ण दृष्टि का जुगाड़-सुगाड़ हो तभी यह पहचान हो पावेगा। अब मैं यह पउवा कहाँ से लाऊँ। साथी कहते हैं, हीनताबोध खराब चीज है। संगत-पंगत में रहने से जो नहीं है, उस पर भी हक ज़माने का अधिकार मिल जाता है। उनका तर्क है कि यदि आपको पगुराना सीखना है, तो जानवरों के साथ गलबहियाँ तो करना ही पड़ेगा न! ठीक उसी तरह ज्ञानवान, महान या सम्मानित बनने के लिए ज्ञानियों के साथ धुनि तो रमाना ही पड़ेगा।

यदि यह सब नहीं कर सकते, तो आपके लिए टका-सा रेडिमेड जवाब रखा है-‘जाइए अपना हाथ जगन्नाथ कीजिए।’

....और मैं वर्षों से यही करता आ रहा हूँ।

तुम्हारा पिता

Friday, July 12, 2013

चला गया.....जो कहता था यारी है यार मेरी....यार मेरी ज़िन्दगी


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बरखुरदार! प्राण नहीं रहे।

नहीं रहा वह चरित्र अभिनेता जिसने सिनेमा के परदे को डायलाॅग बोलने की तमीज़ और अक़्लमंदी दी। भाषा के परिधान में लिपटी आपकी ज़ुबान बोलते ही कैसे पहचान ली जाती है....यह प्राण की संवाद अदायगी से जाना जा सकता है। प्राण साहब! का गेटअप, मेकअप, चाल-ढाल, उठने-बैठने और चहलकदमी के तौर-तरीके सब लाजवाब थे। नकल नहीं। दुहराव नहीं। बनावटीपन का किनारा या झोल नहीं।

उनके मन ने शौक पाला था फोटोग्राफरी का। बने फिल्म के चरित्र अभिनेता। धाकड़ खलनायक। बेजोड़ अदाकार। 1949 में ‘जिद्दी’ और ‘बड़ी बहन’ फिल्मों में उनकी भूमिका खलनायकी की जमी। सराही गई। 1956 में मीना कुमारी के साथ ‘हलाकू’ फिल्म में हलाकू डाकू की भूमिका से छा गए। फिर दिखें प्राण साहब फ़िल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में राका डाकू के रूप में। शम्मी कपूर की लगभग सभी फिल्मों में वे नकारात्मक भूमिका में रहे और लोगों के मन में पैठते चले गये। ‘उपकार’ फिल्म ने उनकी भूमिका का ‘फ्लेवर’ बदल दिया। इस फिल्म में प्राण साहब! ने मलंग बाबा की यादगार और अद्भुत चरित्र-अभिनेता की भूमिका अदा की। 1967 में आई इस फिल्म का गाना पूरे देश में लोकप्रिय रहा जो आज भी बड़े शान से ट्युन होता है-‘कस्में वादें प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या...!’

प्राण साहब! ने अमिताभ बच्चन के साथ ग़जब की जोड़ीदारी निभाई फिल्म ‘जंजीर’ में। शेरखान के चरित्र को उन्होंने निभाया क्या जिया मनगर। वे उसमें जब दिल से डूबकर गाते हैं तो फ़िल्मी परदे का सीना चैड़ा हो जाता है-‘‘यारी है यार मेरी...यार मेरी ज़िन्दगी’। अमिताभ बच्चन को तो फिर प्राण साहब! को साथ रखने की लत लग गई। जंजीर के बाद ‘डाॅन’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘शराबी’....एक के बाद एक बनती गई, फिल्मी परदे पर टंगती गई...और प्राण साहब! सबमें सप्राण अपनी अदाकारी का लाजवाब करतब दिखाते चले गए।

1940 में आई मोहम्द अली की पंजाबी फिल्म ‘यमला जाट’ से अपनी फिल्मी कैरियर शुरू करने वाले प्राण साहब! ने आज जब अंतिम सांस ली है तो उनके फिल्मी यात्रा में शामिल फिल्मों की संख्या करीब चार सौ हो चुकी है। इस घड़ी जब पूरे देश में उन्हें श्रद्धाजंली देने की रवायत चल रही है, मेरा आपको उनकी फिल्मों का नाम गिनाना नागवार गुजर सकता है। अतः मैं यह कहूँ कि प्राण साहब ने ‘छलिया’, ‘काश्मीर की कली’, ‘दो बदन’,:जाॅनी मेरा नाम’, ‘गुड्डी’, ‘परिचय’, ‘विक्टोरिया नं. 203’, ‘बाॅबी’, ‘नौकर बीवी का’, ‘कर्ज’, ‘नसीब’ जैसी सैकड़ों फिल्में बनाई है.......इससे अच्छा है कि आप उनकी फिल्म ‘धर्मा’ का यह गीत गुनगुनाए....‘राज को राज रहने दो.....,’

मेरी ओर से प्राण कृष्ण सिकन्द को ‘सैल्यूट’ जिसने अपनी अदाकारी से बीते वर्षों में भारतीय सिनेमा की दुनिया में अनगिनत नायकों-महानायकों को शिकस्त दी है....पटखनी खिलायी है...आज वे सभी प्राण साहब! के दुनिया को अलविदा कह जाने पर रो रहे होंगे....बरखुरदार!

आपदा

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आपदा पर गीत लिखा
गाने लगी मुर्गियाँ

आपदा पर लोरी लिखा
सुनाने लगी गाय अपने बच्चे को

आपदा पर कविता लिखी
कुतों ने ठोंक दिया ताल

आपदा पर कहानी लिखी
बकरियाँ भरने लगी हुंकारी

आपदा पर लिखता रहा कुछ न कुछ
सभी जानवर मनाते रहे उत्सव रोज-रोज

लोग कह रहे हैं
ये सभी आपदा में मृत उन जानवरों की आत्माएँ हैं....
जिन्होंने अभी तक आपदा-प्रबंधन करना नहीं सीखा था।

Thursday, June 27, 2013

रजीबा का विकीलिक्स....खुलासा!


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यह ठीक है कि देश की राजनीति रजीबा की राय से नहीं चलती है। पर रजीबा रायबहादुर है। दुनिया भर की राजनीति पर अपनी राय देता है। औकात ‘जीरो’। लेकिन, उसकी अक़्ल के आगे रायसीना हिल्स के लोग पानी भरते हैं...ऐसा उसका मानना है, दावा नहीं। दावा मोदी कर सकते हैं। मोदी के मद में पगलाए हुए लोग कर सकते हैं। राहुल कर सकते हैं जिनका देह राजनीति के नाम पर रोता है; लेकिन वे राजनीति से चिपके रहने को अभिशप्त हैं। मोदी धरम करते हैं। राहुल करम करते हैं। इसी करम-धरम में जनता का बेड़ागरक होता है...हो रहा है। बेड़ागरक का विज्ञापन टीवी पर मत देखिए। अपने आस-पास देखिए। हर महीने ख़त्म होने वाले गैस में देखिए। सब्जी बाज़ार में भाव सुन अपने चेहरे पर आते भाव में देखिए। अपने दुपहिया-चरपहिया के टैंक का ताला खोल तेल में देखिए। उस दिल्ली-शिक्षा में देखिए जो बच्चों का ‘कट आॅफ’ शत-प्रतिशत जारी करती है। उसके नीचे वालों को धकेल-बाहर करती है...जबकि शत-प्रतिशत उसे भी आता कुछ नहीं है।

जनता क्या कभी किसी को धकेल-बाहर कर सकती है...शत-प्रतिशत की तर्ज पर? क्या अपने ज़िन्दगी को चूसते उन जोंकों को खुद से अलगा सकती है जिन्हें न चिपकाये रखें, तो वे अपनी मौत आप ही मर जाए। अगर नहीं कर सकते, तो रजीबा क्यों करे? रजीबा पतरसुख है। जीभ इतनी पतली कि ज़मीन चाटने पर धुल तक ढंग से नहीं चपक पाते हैं उसकी जीभ पर। तलवा चाटने पर क्या गत होगी...अंदाजिए.....अंदाजिए गुरू!

Wednesday, June 26, 2013

सबसे बडा लड़ैया रे.....!


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टीवी लबालब भरे टब की तरह है। आजकल यह भरावट पानी की नहीं राजनीतिक बातों की है। पेट से बात निकलने में ईंधन की खपत नहीं होती है। इसलिए आप बातों की टब में एकल स्नान कीजिए या शाही-स्नान कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। दरअसल, चुनाव-पूर्व बातों का क्रेज विज्ञापन से अधिक टीआरपी देने वाला होता है। और बात का विषय अगर केन्द्र में झण्डे गाड़ने का हो, तो टेलीविज़न की हैसियत उस नई-नवेली बहुरानी की तरह हो जाती है जो चैबीसों घण्टे टीप-टाॅप में ही दिखती है।

इसीलिए आजकल टीवी पर राजनीतिक धींगामुश्ती और मुँहचपौवल का खेल चोखा है। एक बकबका रहा है धुँआधार, तो दूसरा उसकी बोलती बन्द करने की जुगत में जुटा है...। आँख-मुँह के सामने कैमरा हो तो जवाबी बात जबर्दस्त तरीके से मुँह से बाहर आती है....ध्रुवीकरण, तुष्टिकरण, अल्पसंख्यकवाद, बहुजनवाद, समाजवाद, सेक्यूलर, कम्यूनल वगैरह-वगैरह। ज्ञान का पाखण्ड हमेशा पारिभाषिक शब्दावली में प्रचारित/प्रसारित/आरोपित/प्रक्षेपित होता है। शब्दों का उलटफेर है। अर्थ सभी दलों में एकसम है।

टीवी पर बकुआने में राम/रहीम सब के सब माहिर हैं। इनमें से कोई किसी पार्टी में प्रवक्ता पद पर तैनात है, तो कई ऐसे भी अभय-निरंजन हैं जो राजनीतिक नहीं; लेकिन राजनीतिक-बुखारों के डाॅक्टर घोषित हैं। ऐसे जन प्रायः बुद्धिजीवी-बक्सा लिए अपनी बातों से ‘फस्र्ट एड’ करते मिल जाते हैं। चेहरे पर आब और आभा लिए ये बुद्धि-विशारद जब बोलेंगे, तो इनकी देहभाषा से भी बुद्धिरस ही टपकता दिखाई देगा। ऐसे लोगों को देखकर ही लग जाएगा कि ये अभी-अभी दो-चार अण्डे सीधे गटक कर आये हैं; या फिर शाकाहारी हुए तो रसगुल्ला या रसमलाई चाभ कर स्टुडियों में दाखिल हुए होंगे। ऐसे लोग जब बोलना शुरू करते हैं तो सबसे पहले उनकी मेहरारू टीवी बन्द करती हैं। अमुक महाशय अगर खुद अपना कार्यक्रम दुहराते मिल गए तो उन्हें बेलना लेकर धिराया/धमकाया जाता है। ऐसे लोगों की सारी बुद्धिगिरी मेहरारू के आगे गिली-गिली-छू करने लगती है।

टीवी उत्पाद बेचने का साधन है। लोकसभा चुनाव स्वयं एक बड़ा उत्पाद है। इसे बेचने के लिए बड़े बज़ट का विज्ञापन तैयार होता है। इसको ‘चियर्स गल्र्स’ नहीं बेच सकती हैं। इसके सेल्समैन बुद्धिजीवी होते हैं जो प्रायः मत नेता(ओपेनियन लीडर) की भूमिका निभाते हैं.....!

Monday, June 24, 2013

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प्रिय देव-दीप,

हम जहाँ-जहाँ आबाद(?) हुए....तहाँ-तहाँ बर्बादी हुई। विकास की बकावस और अंधाधुंध दौड़। चुहदौड़। बकरादौड़। घुड़दौड़। हाथीदौड़। सबकुछ ताबड़तोड़। कई बार यह सब हमने आस्था और विश्वास के मुलम्मे में किया। प्रकृति की घेरेबंदी की। यह बिना सोचे-समझे कि इस नाकेबंदी की वजह से नदी, पहाड़, जंगल इत्यादि का क्या होगा? उस शक्ति-सत्ता का क्या होगा जिसके रहमोकरम पर हम जी रहे हैं, जुगाली कर रहे हैं, बनावटी खोल/खोली ओढ़-बिछा रहे हैं; और उसमें विराज भी रहे हैं?

देव-दीप, प्रकृति गुपचुप कुछ नहीं करती है। वह दंड देती है, तो खुल्लमखुल्ला। एकसम। एकरूप। हम अपने निरीह, निर्दोष होने का थाली-तसला पिटते रहे...कोई सुनवाई नहीं। हमारा भोलापन अगर प्रकृति का भला नहीं कर सकती है, तो वह आपके भले के लिए सोचे क्योंकर? आज जिसे हम हिमालय की सुनामी कह रहे हैं...वह दरअसल, हमारे ही किए का ‘ब्लैकहोल’ है। यह यमराज का महाभोज नहीं है। यह कुपित देवताओं का दैवीय-न्याय(पोएटिक जस्टीस) नहीं है। यह हमारे अजर-अमर होने की लालसा(?) पर वज्रपात भी हरगिज़ नहीं है।

देव-दीप, यह तो हमारे उन करतूतों का हर्जाना है जिस पर हमारे सरकार की चुप्पी लाजवाब होती है। इरादतन प्रकृति को नुकसान पहुँचाने वाले पूँजीदारों का कब्जा जबर्दस्त होता है। यह जानते हुए कि जान रुपल्ली में नहीं हासिल की जा सकती है, लेकिन हम आज रुपयों के लिए जान तक को दाँव पर लगाने का खेल जरूर खेल रहे हैं।

देव-दीप, जहाँ प्रकृति निर्वासित है...देवताओं का पलायन वहाँ से सर्वप्रथम होता है। उन देवताओं का पलायन जो अगोचर/अलौकिक सत्ता के रूप में विद्यमान हैं। हमलोग चमत्कार करने वाले को देवी-देवता कहते हैं। उन्हें अराध्य मानकर पूजते हैं। अपने पप्पू और पम्पू तक को पास कराने के लिए पैरवी/सिफारिश करते हैं। हम उन शक्ति-स्थलों(जिनके बारे में हमारी यह धारणा बन चुकी है कि वे बेऔलाद को औलाद देते हैं; नामुरादों की मुराद पूरी करते हैं) के आगे आदमी बने रहने की सदाशयता तक नहीं बरत पाते। हम उन्हें कंक्रीट से घेरते हैं। प्राकृतिक मनोमरता का सब्जबाग दिखाकर लोगबाग और विदेशी सैलानियों को ठगते/चूसते हैं। बेवक्त या असमय ईश्वर का आसरा वही लोग जोहते हैं जो आत्महीन/व्यक्तित्वहीन हैं।

देव-दीप, ज़िन्दा रहने को तो पशु-पक्षी/कीट-पतंग भी ज़िन्दा रहते हैं....क्या उन्हें कभी हमने किसी देवालय/शिवालय के आगे सर नवाते देखा है। कभी ज़िन्दा नंदी को मूर्तिस्थ नंदी के कान में अपना जुगाड़ भिड़ाने का सिफारिश करते हुए देखा है। नहीं देखा, तो जबरिया मत देखिए। ऐसा प्राकृतिक रूप से नहीं होता है। प्रकृति का कोई भी जीव परवश नहीं है। हाँ, उनमें आपसी सह-सम्बन्ध, समन्वय, समायोजन, साहचर्य अवश्य है। फिर हम विवेकी-जन लोभ/स्वार्थ के वशीभूत क्यों हैं? हमें इस बारे में अवश्य सोचना चाहिए?

देव-दीप, सैरगाह/देवयात्रा आदि सब मन के भुलावे हैं। जो खुद से हारता है...वह पत्थर को विजेता साबित करता है। जिसमें अपने प्रति लाग-निष्ठा नहीं होती....वह अदृश्यमान के सामने साक्षात दंडवत करता है। हमें इनसब षड़यंत्रों/कर्मकाण्डों के आगे शीश नवाने या खुद के गढ़े आकार-आकृतियों के समक्ष माथा टेकने, नारियल फोड़ने, मंत्र-जाप या पूजा-पाठ करने जैसी कवायदों से परहेज करना सीखना होगा। आज हमें प्रकृति की सुध लेने की जरूरत है जो हमारे खुली आँखों के आगे ढह-ढिमला रही है....बर्बाद और बवंडर-सुनामी में तब्दील हो रही है।

देव-दीप, उत्तराखंड की आपदा-विपदा पर मैं अपनी ओर से सिर्फ इतना कर सकता हँू कि मैं खुद को प्रकृति के कद्रदानी के लिए न्योछावर कर दूँ...तुमदोनों को प्रकृति के महत्तव के बारे में अधिक से अधिक जना सकूं। आने वाले भविष्य में तुम्हारे दिन और रात में पर्याप्त रोशनी का हस्तक्षेप/दखल हो....इसके लिए फिलहाल मेरी लड़ाई अपने खुद के मन से है, अपनेआप से है।

....और मैं मृत्यु का स्वागत करते हुए प्रकृति की महानता का जयगान गा रहा हूँ...प्रकृति हमारी माता है....भाग्यविधाता है...कण-कण व्याप्त है...जिसकी अकथ कहानी असमाप्त है......!

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...