Monday, March 2, 2015

हिन्दुस्तान समाचारपत्र के प्रधान सम्पादक को प्रेषित अपनी असहमति का पत्र






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आज की भारतीय पत्रकारिता पाठकों को अंधा, बेवकूफ और गंवार मानती है; और खुद सत्यपाठ करते हुए झूठ में गोता लगाती है। घटिया राजनीति देश को कंगाल बनाती है जबकि विचारहीन और दृष्टिहीन पत्रकारिता पूरे देश को मानव-कंकाल में बदल कर रख देती है। वह अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती है। वह अवहेलना और नजरअंदाज द्वारा आपको हरसंभव खामोंश करने का कुचक्र रचती है। यह खेल भारतीय लोकतंत्र के लिए महंगाा साबित होने वाला है ; लेकिन बदलाव की लकीर भी भविष्य में ही खींची जाएगी। पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति का नमूना यह है कि संसद में प्रधानमंत्री कैंटीन में भोजन करते हैं, तो पार्टी कहती हैं इसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महाखबर होना चाहिए; और सभी पत्रकार इसे 24x7 में घंटों ख़बर बनाकर चलाते हैं...सरकार कहती है कि देश में भूखमरी की ख़बर आए, तो क्रिकेट मैच दिन भर चलाओ। हत्या-बलात्कार की अधिकता हो, तो उसकी जगह ‘सोप ओपेरा’ धारावाहिकों के कुछ रियल स्टंट और दूसरे रियलिटी शो दिखाओ। सरकार कहती है कि टेलीविजन माध्यम से पूरी दुनिया भारत की तस्वीर देखती है; इसलिए आज मीडिया में वही दिखाओ जो चित्ताकर्षक, मनोरंजक और आनंददायी हो। अख़बार और पत्रिकाओं को भी साफ शब्दों में कहा जा रहा है कि सच कहने-दिखाने से ज्यादा यह बताओ कि हम जो कह रहे हैं वही सच है; उतना ही सच है। पूरा विश्व आजकल इसी तरह के धंधेबाजी-सौदेबाजी पर चल रहा है। वे हर उस व्यक्ति को जो सच्चा है या सच्चा बने रहने की कोशिश में है, वे उसके उीएनए में बदलाव चाहते हैं। आज पूरे देश की शल्य-क्रिया जारी है। आप अपनी जान बचाइए।
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Rajeev Ranjan rajeev5march@gmail.com


AttachmentsFeb 27 (3 days ago)
 
to shashi.shekhar
 

परमआदरणीय शशि शेखर जी,
सादर अभिवादन!

‘‘आज से ठीक 32 साल पहले 20 साल का नौजवान अपने पिता का स्कूटर चलाता हुआ
हिंदी के एक बेहद सम्मानित अख़बार में किस्मत आजमाने के लिए पहुंचा।
अख़बार की उस इलाके में काफी धाक थी। इसके संस्थापकों ने राष्ट्रभाषा की
उन्नति और आजादी की लड़ाई में फैसलाकुन काम किया था। नौजवान का रोमांचित
होना लाजिमी था।, पर अख़बार में पहला दिन उस पर बहुत भारी बीता। पहले तो
सम्पादक जी ने उसे अपने कमरे के बाहरछह घंटे तक .ासद इंतजार
करवाया।...लम्बे इंतजार के बाद उन तक पहुंचे नौजवान के लिए उस दिन का यह
दूसरा आघात था।....जिससे युवक के मन में विचार कौंधा कि जो लोग खुद
सद्व्यवहार और सद्विचार से वंचित हैं, वे समाज को क्या दिशा देंगे? कुछ
भुनभुनाहटें भी कान से टकरा रही थीं कि हे भगवान! हिंदी पत्रकारिता का
क्या होगा?’’

यह अल्फ़ाज आप ही के हैं जिसे पढ़कर(23 सितम्बर, 2012) मैं आप पर मोहित हो
गया था। लगा, कुछ तो लोग हैं अब भी ज़माने में जो सच्ची नियत से खरी-खरी
बात करते हैं। आज उस युवक की जगह मैं हूं; क्योंकि वह युवक खुद उस
सम्पादक की जगह चला गया है। आज मैं आपसे कह रहा हूं कि-‘हाय राम, क्या
होगा इस हिंदी पत्रकारिता का जिस अखबार में ‘राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं
प्रत्यायन परिषद’(नैक) लिखने की जगह अंग्रेजी में पूरा नाम लिखा-बताया जा
रहा है। किस गणनामीति और भाषाविज्ञान के सामाजिक-सांस्कृतिक आधार पर
आपलोग यह तय करते हैं कि अमुक अथवा फलानां  भाषिक शब्दावली को हिंदी में
रोमनीकृत कर परोसा जाना ही उचित, उपयुक्त है? यह तर्क कि इसे सबलोग समझ
लेंगे या यह हिंदी की तरह जटिल नहीं है; क्या आधार है आपके पास?

मीडिया, कंप्यूटर, इंटरनेट शब्दों के सामान्य समझ और प्रचलन में कहीं कोई
गिला-शिकवा नहीं है; लेकिन ‘राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद’ की
जगह ‘नेशनल असेसमेंट ऐंड एक्रिडिएशन काउंसिल’ लिखना तो भाषागत गुलामी,
वर्चस्व और कोढ़ियापा हो गई जनाब!

मुझे उम्मीद है आप जवाब देंगे; क्योंकि मेरे भीतर प्रतिरोध अथवा विरोध
करने की पत्रकारीय लौ आप जैसे प्रतिबद्ध पत्रकारों ने लगाई है। यदि आप ही
इसे बुझाने के लिए सरकारी दमकल बुलाने लगे, तो वह अलग बात! वैसे मुझे आदत
हो गई है। जानते हैं, एक बार एक नामी-गिरामी विश्वविद्यालय में
साक्षात्कार के दौरान मेरे लिखे का तेवर तल्ख़ और कुछ अधिक तीक्ष्ण देख
साक्षात्कार लेने वाले सज्जन ने कहा कि-''यहां नियुक्ति हो जाएगी आपकी;
लेकिन आपको अदब और लिहाज के साथ अकादमिक प्रबंधक के आगे सलामी ठोंकनी
होगी; निर्देशित ढंग से अपने काम करने होंगे...तैयार हैं?'' मैंने कहा
कि-''माफ कीजिएगा, सिर्फ पचास हजारी मासिक तनख़्वाह के लिए मैं अपने ज़मीर
से समझौता नहीं कर सकता हूं और न ही इस तरह के किसी लुभावने प्रस्ताव के
सन्दर्भ में सोच तक सकता हूं।’’

परिणाम, तमाम योग्यता धरी रह गई। यह निर्णय मैंने तब लिया जब मैं और मेरा
परिवार घोर संकट के दौर से गुजर रहा था। सात साल के अपने बेटे की श्रवण
सम्बन्धी अपंगता की पहली बार जानकारी होने के बाद  मैं बुरी तरह
विक्षिप्त और हलकान-परेशान था। अंततः मैं अपनी दृढ़इच्छााशक्ति के बदौलत
उबरा; अपने अबोध बेटे से माफी मांगा कि मैं एक जवाबदेह पत्रकार पहले हूं;
तुम्हारा पिता बाद में।

जाने दीजिए, ये अपने-अपने किस्से हैं; लेकिन मुझे तो आपसे अपने प्रश्न का
माकुल जवाब चाहिए। उस अभिभावक से जो हकड़ कर लिखता है-‘‘सच कभी हारता
नहीं, इसएि जो लोग इस रास्ते पर चल रहे हैं, वे ही एक नई रहगुजर का
निर्माण करेंगें’’

शशि शेखर जी, कभी किसी जगह पर  मैं ग़लत भी हो सकता हूं; लेकिन इसे
दुरुस्त भी तो आप जैसे हमारे शुभचिंतक अभिभावकों को ही करना है। आमीन!

भवदीय
राजीव रंजन प्रसाद
(वरिष्ठ शोध अध्येता)
जनसंचार एवं पत्रकारिता
हिंदी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी-221 005
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Monday, January 26, 2015

इस बार 'पीके' का दिमाग मरम्मत पर है...तनका ढेरका लम्बइया वाला wait pls

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इस गणतंत्र के आधे उम्र के लगभग हो चले हैं; लेकिन ससूरी कोई काम नहीं मिला। 
बेगारी में लिख-पढ़ के आप सबन के कपार दुखाई दिए; अब आप भी  राहत चाहत हौ, तो हम कही देत हैं कि हमके इरादा भी तोहन के माथा चाटे के नाई है। असल में ई गोला पर जो आदमी है न सब रंग देखत है; लेकिन जब माने के कहौ, तो अपनी दूजी रंग दिखावे लागत हौ....तो फाइनली हम डिसाइड किया कि अपन लोगन के अपनही रंग में रंगे देवे के और खुश होवे देवे के, 
तो भारत मइया की जय!!!
जरका चिचियाई के कहो...का रजीबा जैसा मरियल बोलत हौ?
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अपने देव-दीप के लिए यह कविता

इन ढलानों पर वसंत आएगा
- मंगलेश डबराल

इन ढलानों पर वसंत आएगा
हमारी स्मृति में
ठंड से मरी हुई इच्छाओं को
फिर से जीवित करता
धीमे-धीमे धुँधुवाता खाली कोटरों में
घाटी की घास फैलती रहेगी रात को
ढलानों से मुसाफिर की तरह
गुजरता रहेगा अँधकार

चारों ओर पत्थरों में दबा हुआ मुख
फिर से उभरेगा झाँकेगा कभी
किसी दरार से अचानक
पिघल जाएगा जैसे बीते साल की बर्फ
शिखरों से टूटते आएँगे फूल
अंतहीन आलिंगनों के बीच एक आवाज
छटपटाती रहेगी
चिड़िया की तरह लहूलुहान
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भारतीय नेता प्रधानमंत्री हैं, ओबामा हमारे ‘गाॅडफादर’ नहीं हो सकते!

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अकूत पैसे और सुविधाएं मिलने पर भी बुद्धिजीवियों के लिए वैचारिक नंगापन नामुमकिन है!
यह अलग बात है कि हमारे पास बुद्धिजीवी हैं कितने?
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 राजीव रंजन प्रसाद 

लेफ्टिनेंट हडसन फिरंगी था। यह वही शख़्स था जिसने बहादुर शाह जफ़र के दोनों पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया था। सन् सनतावन की पराजय ने मुगल बादशाहियत के अंतिम नायक बहादुर शाह जफ़र को लगभग निहत्था कर दिया था। शासक की इस स्थिति पर हडसन ने उसका माखौल उड़ाते हुए कहा था-
‘दमदमे में दम नहीं, अब खैर मांगो जान की/ ऐ जफ़र ठंडी हुई शमशीर हिन्दुस्तान की।’ 
जफ़र का उस समय कहा बड़बोलेपन और झूठी शान की निशानी मानी गई थी, जफ़र का जवाब था-
‘गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की/तख़्ते लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की।’
विश्व-भूगोल में इन दिनों लंदन की हैसियत अमेरिकी ताकत के आगे बौनी है, तो क्या यह मानें की आज भारतीय बुलंदी की गूंज अमेरिका पूरे धैर्य के साथ सुन रहा है और उसका सर्वशक्तिमान राष्ट्राध्यक्ष भारतीय प्रधानमंत्री के साथ कहकहे लगाने में मशरूफ़ है। आज मोदी बराक ओबामा के संग-साथ गलबहियां करते दिखाई दे रहे हैं। ...तो क्या भारतीय जनमानस को नाहक चिंताओं और अपनी जिंदगी के जद्दोजहद के बीच भविष्य के फिक्र से मुक्त हो जाना चाहिए। यह सोचते हुए कि हमारे देश का नेतृत्व और आलाकमान उस अमेरिका के साथ बराबरी पर खड़ा है जिसके राष्ट्राध्यक्ष के समक्ष खड़े होने के लिए ठोस व्यक्तित्व होना जरूरी है। टेलीविज़न के अपने बयान में बराक ओबामा मोदीजी की तारीफ़ ही नहीं करते हैं; बल्कि जादू ऐसा कि वह अपनी पत्नी मिशेल ओबामा तक को ‘फैशन आइकाॅन’ के मामले में दूसरे पायदान पर रख रहे हैं। उनके मुताबिक दुनिया को फैशन का पहला सितारा मोदी के रूप में मिल गया है। दोनों एक-दूसरे को हमनाम सम्बोधन के साथ पुकार रहे हैं। यारीपन का बेमिसाल दौर टेलीविज़न पर देखते हुए मुझे तो यह लगने लगा है कि आज के ज़माने में ऐसा मित्र भाग्यशालियों को ही मिलते हैं; तो क्या मोदी भाग्यशाली हैं? क्या यह कमेस्ट्री भारत की बदहाल भौतिकी और गणित(भूख, गरीबी, निम्न स्तरीय अशिक्षा, भाषा-वर्चस्व, चिकित्सा-सुविधा, पेयजल संकट, बिजली, पर्यावरण, उन्नत प्रौद्योगिकीगत समझौते, सैन्य करार आदि के मसले को स्वयं में समेटे हुए) को आमूल-चूल बदल देंगी।

ईमानपेश मीडियाविदों और देश के समाजविज्ञानियों और राजनीतिक विश्लेषकों से राजनीति के इस नए हुक्केबाजी या दोस्ताना अंदाज पर आगे-पीछे नहीं तत्काल प्रकाश डालने की दरख़्वास्त है। ताकि हम सच को एक वस्तुनिष्ठ और प्रायोगिक व वैज्ञानिक प्रक्रिया एवं विश्लेषण के तहत देख सकें; उनका मूल्यांकन कर सकें और देश की अपनी बड़ी आबादी के लिए एक सफल संदेश दे सकें। अगर सचाई इन दृश्योंमें कूट-कूट कर भरी है तो यह जागरूक और शिक्षित लोगों का पहला कर्तव्य है कि वे अपनी जनता को सबकुछ साफ-साफ बताएं। उन्हें बताएं कि टेलीविज़न पर उतरा चेहरे का यह रंग सिर्फ तकनीकी करिश्मों का नतीजा/परिणाम नहीं है; बल्कि पूर्णतया समावेशी तथा सर्वजनीन विकास पर केन्द्रित है। जल्द ही मुल्क में नया स्वराज आएगा; अच्छे दिन की घड़ियां टिक-टिक करेंगी; और अमेरिका की तरह हम भी अपनी बड़ी आबादी की महत्त्वाकांक्षाओं को नई क्षितिज प्रदान करेंगे। यह खास और विशेष ‘सिविल सोसायटी’ के लिए शर्तिया अवसर पैदा करने के विपरीत सब हाथों को काम देगा और विकास की नई सुनहली इबारत लिखेगा। बुद्धिजीवियों से आग्रह है कि वे शब्दों की हेराफेरी कर देश की जनता को बरगलाकर राजनीति करने वालों से दूर रहने को कहें या उनकी दलीलों पर विश्वास न करने की उनमें सप्रयास जागरूकता पैदा करें। आज का वर्तमान परिदृश्य जितना रोमांचक और अतिशय सुखदायी प्रतीत हो रहा है, तो कल के लिए भी ऐसी आश्वस्ति की जा सकती है या नहीं उसका आप मूल्यांकन करें, उस पर सीधे संवाद और चर्चा-परिचर्चा करें। पूरी दुनिया को यह जताएं कि यह कमेस्ट्री जनता की जीवनरक्षक मिशनरी तैयार करने में जुटी है; न कि उसके लिए जहरीले गैस का टैंकर खड़ा करने का मन बना रही है। 
 
यदि आप आज की तारीख में यह नहीं कर सकें; उपर्युक्त बाते सही तरीके से नहीं बता सकें या उन्हें अपने भरोसे में ले सके; तो निश्चय जानिए कि आपका ज्ञानवान और मार्गदर्शक होने का पाखंड और अधिक दिन नहीं चलने वाला है। आपके प्रतिमान निष्फल होने वाले हैं; और आप कृतध्न शासक से पहले देश की जनता द्वारा शापित होंगे। 
 
अभिव्यक्ति का सांविधानिक अधिकार प्राप्त देश के पढ़े-लिखें और जागरूक लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सावधान-मुद्रा में मुर्गे भी बांग नहीं देते; हम तो इंसान हैं।
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Sunday, January 25, 2015

पुनर्रचना के निकष पर एक लड़की

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लड़की कुदरती तौर पर लड़कों के समान ही प्रसव-वेदना देते हुए स्त्री-कोख़ से जन्मती  हैं। लेकिन लड़की अपने जन्म के बाद बार-बार रची-बुनी जाती हैं; जबकि लड़कों को जिलाया-बढ़ाया जाता है। स्त्रियों के लिए समाज की आंखों में रंगीनियत के चादर बहुपाट में फैले दिखाई देते हैं जिनके लिए खुद उसका मापदंड और निकष बेहद भेदभावपूर्ण, विषमताजनक और लिंगभेद पर आधारित है। भारतीय समाज आधुनिक इस मामले में है कि भारतीय मर्द पहले से अब अधिक उच्छश्रृंख्ल और असभ्य आचरण वाले हो गए हैं; जबकि स्त्रियों के लिए हमारे सोच का पारा/तापमन अभी भी मध्ययुगीन ज़माने की है। हम उन्हें बोलने देना नहीं चाहते, क्योंकि उनके बोलते ही हमसब मर्दों की कलई खुल जानी तय है। लेकिन अब यह जोर-दबाव एकतरफा नहीं रह गया है। औरतों ने अपना मोर्चा खोल दिया है। वह बाज़ार में घुसने लगी हैं; बाज़ार पर अधिकार ज़माने लगी और बाज़ार को अपनी इच्छानुसार अपने इशारे पर सम्बोधित भी करने लगी हैं। संभव है, मर्दों की ज़मात के इंसानी खोल में भेड़िए जो अपने खुंखार रवैए और हिंसक वारदातों के लिए जाने जाते हैं; इन स्त्रियों पर टूट पड़े; लेकिन पानी सर के उपर से निकल चुका है। अतः स्त्रियां भी अपने कदम पीछे खींचने के बजाए सीधे मुकाबला करने के लिए ताल ठोंकने में जुटी है। अब तक नैतिकता का एकतरफा पाठ किया जाता रहा है और स्त्रियां मन-मार कर सुनने को अभिशप्त रही हैं। अब समीकरण और रसायन सब पलट गए हैं। आज औरते कहेंगी और मर्दों को उनकी सुनना पड़ेगा। क्यों?

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‘‘समाज उसके लिए रंगमंच है
 और कला उसकी मेधा की क्रीड़ा है
 वह कलाकार होने के साथ मनुष्य भी है
 कहना कितनी बड़ी पीड़ा है।’’
            -डाॅ. रामदरश मिश्र

एक लड़की का अभिनयकुशल होना; कला में निष्णात होना; उसके मनुष्य होने की निशानी नहीं है। तो फिर उसके होने सम्बन्धी निशान या तारक-बिन्दु क्या है? पहचान की हाँडी में सीझती ऐसी ही लड़कियों के बारे में प्रो. कृष्ण कुमार बड़ी शिद्दत से विचार करते दिखाई देते हैं। ‘लड़की की पुनर्रचना’(hindisamay.com) नामक अपने लेख में वे एक लड़की की आत्मा, मस्तिष्क, मन और देह सबकी आपबीती अपनी कानों से सुनते हैं; तब जा कर उसे व्यक्तिगत विचार-सरणि में ढालते हैं, उसे एक मेखमाला का रूप, आकार या कि कोई ‘नज़रिया’ नाम देते हैं। उनका खुद का यह मानना है कि अध्यापकीय पेशे से जुड़े होने के कारण वे कई लड़कियों को काफी करीब से देखते रहे हैं जो सयाने होने की दहलीज पर होती हैं; जिन्हें समाज रच रहा होता है क्षण-प्रतिक्षण। बकौल प्रो. कृष्ण, ‘‘मैंने अपने अध्यापक जीवन में हजारों लड़कियों को पढ़ाया है; उनमें से ऐसी बहुत कम देखी हैं जिन पर किशोरावस्था के नाटकीय मोड़ पर लगे घाव साफ-साफ न दिखते हों। अपनी शख़्सियत को ले कर आश्वस्त लड़कियाँ सैकड़ों में एक मिलती हैं। उनमें निहित क्षमताएँ विभिन्न संस्थाओं के वातावरण में किस हद तक थोड़ा-बहुत खिल पाती हैं, यह एक कठिन प्रश्न है।’’

यह प्रश्न सचमुच कठिन है, क्योंकि समाज और पुरुष दोनों में दुरःभिसन्धि बनी हुई है। जिस कारण लड़कियाँ अपने ही दुःख और संत्रास का सही ‘डायग्नोसिस’ करने का अधिकारिणी नहीं हंै। ऐसे में, उनकी तड़प और हुक का गोलार्द्ध काफी विस्तृत और व्यापक हो जाता है। विडम्बना यह है कि सामाजिक नैतिकता का दहन-दोहन अधिसंख्य पुरुष करते हैं जबकि अग्निपरीक्षा से गुजरती लड़कियाँ हैं। यह भेदभाव मिथकीय परम्परा तक में अभिव्याप्त है। भारतीय वाड.मय में राम जैसे व्यक्तित्व को वीरता, साहस, तर्क, बुद्धि, वाग्मिता, देवत्व आदि के निकष पर श्रेष्ठ घोषित किया गया है जिन पर सीता जैसी राजपुत्री पहली ही नज़र में रीझ(कहीं ऐसा तो नहीं कि यह केवल कवि-मन का हृदय-प्रसंग हो) जाती हंै। राजा जनक के यह कहने पर कि-‘वीर विहीन मही मैं जानी।’ राम के निजभ्राता लक्ष्मण की भुजा फड़कती है और वे प्रत्युŸार क्या देते हैं, यह छोड़िए; जिस अन्दाज़ में वे कहते हैं उसका वर्णन अद्भुत है-‘‘लषण सकोप बचन जब बोले, डगमगानि महि दिग्गज डोले।’

प्रसंगवश यहाँ यह तर्क करना वाज़िब होगा कि जब प्राणियों में देवतुल्य राम जैसा पुरुष लोकलाज और लोकनिन्दा की डर से सीता को वन में छोड़ने के लिए लक्ष्मण से कहता है, तब लक्ष्मण की अनुश्रवण-शक्ति कहाँ चली जाती है? यह ताज़्जुब और खोज दोनों का विषय है। यहाँ तक कि जनसमाज में भी इस प्रसंग को लेकर कहीं कोई असंगति उत्पन्न होते नहीं दिखाई देता है। इस मिथकीय इतिहास के बिरवे भारतीय समाज में इतनी चालाकी से रोपे गए हैं कि वह अब विषवृक्ष का रूप धारण कर चुका है। प्रो. कृष्ण जनसमाज के इस चालाकी भरे वातावरण का हवाला देते हुए कहते हैं-‘‘चूड़ी की दुकान में प्रवेश करते समय लड़कियों की सामाजिक ढलाई का कार्यक्रम एक खास मुकाम पह पहुँच जाता है। जब कोई लड़की चूड़ियों के रंग और डिजाइन की विविधता देखती है, दुकान में रखी चूड़ियों की विपूल राशि में से अपने लिए चूड़ियाँ चुनती है, उन्हें पहनने के लिए अपने हाथ दुकानदार के हाथों के सामने पेश करती है, तो वह संस्कृति के एक लम्बे एजेण्डा की तामील कर रही होती है।’’

यह तामील एक लड़की के दिमाग में इस तरह टँका होता है कि वह इन बंधनों से ही ताउम्र सबसे ज्यादा प्रेम करती दिखाई देती है। यथा-फ्राॅक के गोल घेरे, ओढ़नी के चौड़े पाट, समीज-सलवार पर काढ़ा हुआ कसीदा, साड़ी पर रंगीन बाॅर्डर या छापदार डिजाइन इत्यादि। परिधान का मामला सुलटता है, तो हाथ, पैर, होंठ, आँख, चेहरे को रंगने-पोतने की बारी आ जाती है। इसके बाद फिर आभूषण का मामला सामने आ खड़ा होता है। लड़की खुद पर यही सब वारती हुई कब सयानी हो आती है, पता तक नहीं चलता है। एक लड़की बचपन के भेदभाव और अनदेखेपन को शायद ही नोटिस करती हो। उसे सर्वप्रथम इस दोहरेपन का अहसास तब होता है जब वह अपने देह में कई प्रकार के बदलाव उमगते हुए देखती है; उसे अपने ही वय के लड़कों के संगत में रहने से अलगाया जाने लगता है; यह करो और वह न करो की शब्दावली में जब उस पर एक के बाद एक चीजें थोपी जाने लगती है; या उसके हँसी-बोली के नाप को बड़े तो बड़े छोटे तक तय और नियंत्रित करने लगते हैं; उस घड़ी लड़की की पीड़ा कितनी कष्टप्रद और असह्î होती है? उसकी आत्मा पर कैसी और किस तरह की रेघारी या खरोचें उगी होती हैं; इस बारे में स्त्रियाँ ही सटीक और निष्पक्ष अभिव्यक्ति दे सकती हैं। नितान्त निजी मौके पर स्त्रियों के सन्दर्भ में अधिसंख्य पुरुष खोखले सिद्ध होते हैं जबकि स्त्रियाँ तब भी उनके प्रति आशावान और गहरे संवेदनाओं से सम्बलित होती हैं। स्त्रियों की भाषा में प्रायः वक्रता अधिक होती है, कटुता नाममात्र भी नहीं।

वर्तमान 21वीं शताब्दी के इस खुले माहौल की बात करें, तो आज भी पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों के खुलापन को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। कोई लड़की जैसे ही किसी दुर्घटना या मानवीय-दुव्र्यवहार का शिकार होती है। तथाकथित शुभेच्छु-जन लड़कियों को सामान्य वस्त्र नहीं चादर लपेटकर चलने की सलाह देते नजर आ जाते हैं। लड़कियों को ले कर समाज के मन में असुरक्षा-बोध और अकर्मण्यता दोनों जबर्दस्त है। लैंगिक भेदभाव की पराकाष्ठा ऐसी कि घुप्प अन्धेरी रात में ‘फिल्मी शो’ देखकर लौटता लड़का चारदिवारी फाँदकर घर में घुस सकता है; लेकिन, एक लड़की अन्जोरिया रात में भी अपनी सहेली की शादी से अकेली वापिस नहीं लौट सकती है। यदि लौटती दिख गई, तो कहने वाला टोला-मोहल्ला अगले दिन दरवाजे पर हाज़िर होंगे, ‘युग-ज़माना ख़राब है, और राऊर बिटिया....., भगवान! न करे कि....,’’

किसी भी लड़की के लिए ये वाक्य सुभाषितानी नहीं कहे जा सकते है। दरअसल, यह एक प्रकार की सामाजिक-मानसिक कुंठा है जो लड़कियों को बेड़ियों में जकड़ कर ही उनकी स्वतन्त्रता को परिभाषित करता है। उनकी दृष्टि में एक लड़की का तर्कशील या विचारवान होना(जिसे प्रायः शहराती बुद्धि का मान लिया जाता है) भारतीय समाज के लिए बाँस का फूल होने जैसा है जिसके बारे में बहुश्रुत है कि यह किसी बड़ी विपत्ति या अपशकुन का द्योतक है। ऐसे में उस लड़की को तत्काल सामाजिक अपकृति या समाज के लिए खतरा घोषित कर देना आमबात है। यही कारण है कि बहुसंख्यक लड़कियाँ खुद ही मन मारकर मौन रहना सीख जाती हैं या कि अपनी ही देह में लज़्जा और संकोच को एक आवरण की तरह लपेट कर अपनेआप में सिकुड़ी-सिमटी रहने लगती है। उनके भीतर डर या खौफ इस कदर व्याप्त होता है कि उन्हें लगता है कि वह जैसे ही परिधान बदलेंगी या कि अपने पोशाक की नाप में कटौती करेंगी; नैतिक-ठेकेदार उन्हें ग़लत करार दे देंगे। और कुछ नहीं तो कोई शोहदा सरेराह यह कहता मिल ही जाएगा-‘तनी-सा जिंस ढिला करऽऽऽ...,’

कहने को तो हम 21वीं सदी के उत्तर आधुनिक समाज में हैं लेकिन प्रकटतः लैंगिक भेद, असुरक्षा-बोध, भेदभाव, दोहरापन, लांछन, सामूहिक बलात्कार इत्यादि की शिकार लड़कियाँ ही सबसे अधिक हैं। वे मौन रहकर सबकुछ करते रहने के लिए स्वतन्त्र हैं जबकि अपने मन का कुछ भी न करने के लिए अभिशप्त हैं। प्रायः लड़कियों के जिस सौन्दर्य-बोध का गुणगान/महागान किया जाता है, वह उनका नैसर्गिक गुण कम आरोपित-कर्म ज्यादा है। आभूषण धारण करने के लिए शरीर-छेदन की जिस पीड़ाजनक प्रणाली से उन्हें गुजरना होता है; वह उनकी स्वैच्छिक चयन-प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। दरअसल, ये रवायतें एक लड़की को सामाजिक उŸाराधिकार में प्राप्त है। आमोखास सभी वर्ग में आधी-आबादी को सामाजिक कारागार के भीतर ही कुलरक्षिता के रूप में अधिष्ठित किया गया है। एक लड़की अपनी कर्म-चेतना में चाहे कितना भी प्रखर, गुणी, निष्णात अथवा पारंगत क्यों न हो; वह लैंगिक-पूर्वग्रह और लैंगिक-भेदभाव से बच कम ही पाती है।

अपने इर्द-गिर्द को ही प्रतिदर्शात्मक इकाई मानकर देखें, तो कमोबेश सभी लड़की जवाबदेहियों का पठार आजीवन ढोते हुए मिल जाएंगी जबकि उनका श्रम-मूल्य ‘भारहीनता’ का शिकार है। उस पर आरोपित पारिवरिक एवं सामाजिक गुरुत्वाकर्षल बल(g और G) पीड़ाजनक है। एक लड़की भ्रम और भुलावे की जिस परिधि में जन्म के बाद से निरन्तर चक्कर काटती है, एक दिन यकायक उसे उस वृत्तीय-परिक्षेत्र से बाहर कर दिया जाता है। सोने, ओढ़न,े बिछाने का मामूली साजोसमान दे कर किसी लड़की के सम्पूर्ण मानवीय अधिकार को छीन लेना सरासर अन्याय नही ंतो और क्या है? लेकिन, न्याय की परिभाषा गढ़ने वाले होते, तो आखिरकार पुरुष ही हैं; अतः सामाजिक अन्याय उन्हीं के हितों का समर्थक और मुखापेक्षी बना हुआ है।

पितृसत्तात्मक समाज अपनी प्रवृत्ति और निर्णय में कितना पक्षपाती है; कवयित्री अनामिका का मत इसे समझने की दृष्टि से उपयुक्त है-‘‘स्त्रियों का दोहन क्यूंकि दोहरा होता है(विस्थापन का दुःख, यौन शोषण के नए सिलसिले एक साथ झेलने पड़ते हैं उन्हें), अपनी मूल भाषा से उनका लगाव भी दोहरा हो जाता है। यही कारण है कि अपनी सन्तति को क्षेत्रीय लोककथाएँ, लोरियाँ, पहेलियाँ और चुटकुले वे भरपूर सुनाती हैं। वैसे भी अतृप्त मनुष्य ही बोलना चाहता है, पर संरचनागत दबाव कुछ ऐसे होते हैं कि जो कहना चाहता है, साफ कह नहीं पाता और कई दरारें निकल आती हैं। शब्द और शब्द के अनन्तर जिसमें कई अर्थ-छवियाँ फँसी पड़ी होती हैं। स्त्रियाँ इस अतृप्ति का उपाय अधिक सर्जनात्मक और हँसमुख ढंग से कर लेती हैं। जिसे भी अधिक त्रास झेलने होते हैं, वह विपरीत परिस्थिति में भी मस्त रहना सीख जाता है।’’

कवयित्री अनामिका अपने आकलन में दुरुस्त हैं। आज हर लड़की वाकई अपने मनुष्य होने के पूरेपन को जीना चाहती है। अतएव, उसकी मस्ती और हँसी-ठिठोली में जागृति का रंग गहरा है। ‘गंगा से वोल्गा’ तक यात्रा कर चुकी ये लड़कियाँ प्रवाह में बहते जाने के विपरीत जीवनधारा में हमेशा बने रहने की इच्छुक हैं। देखना होगा कि वे शरीर उघाड़ने वाली (अप)संस्कृति का ‘कोर मेम्बर’ नहीं हैं जबकि अपनी स्वाधीनता के उजास में उन्हें अपनी आत्मा, मन, दिमाग और देह सब को मुक्त छोड़ देना क़बूल है। इन आधुनिक लड़कियों के स्वभाव में जो बेलाग-बेलौसपन दिखाई दे रहा है; वह मुक्ति का मुक्तकंठ पाठ है। ‘माइलस्टोन’ पर बिना आँख रखें आगे बढ़ती इन लड़कियों के सामने दुश्वारियाँ पहले से कहीं अधिक है, चुनौतियाँ और संघर्ष तो और भी असीमित। कुल के बावजूद निर्भय-निडर इनमें से अधिसंख्य साहसी और आत्मविश्वासी लड़कियाँ ज्ञान और चेतना का ‘कोलाज’ या कि ‘मास्टर काॅपी’ बनाने में लड़कों से काफी आगे हैं।

वैश्वीकरण के इस संकटकालीन दौर में यह भी स्पष्ट दिख रहा है कि ‘मार्केट कारपोरेटलिज़्म’ इन लड़कियों को वस्तु-छवि या कि ‘कमोडिटी’ के रूप में भुनाने की जबर्दस्त जुगत में है। बाज़ारवादी ताकतें उनकी आजादी को अलग ढंग से विज्ञापित/विरुपित कर रही हैं जिसमें उन्हें आंशिक सफलता भी प्राप्त है। तब भी बहुसंख्यक भारतीय तरुणी इन सम्मोहनास्त्रों से स्वयं को बरका ले जाने या बचाए रखने में सफल हैं। असल में, उपभोक्तावादी संस्कृति के मकड़जाल से खुद को बरका ले जाना इन लड़कियों के प्रखर चेतना और उपयुक्त निर्णय-क्षमता का प्रतीकीकरण है जो ‘डाउ जोन्स’(अमेरिकी प्रकाशन व वित्त सूचना संघ) से नहीं तय हो रही होती है। यह तो तय उनसे भी नहीं हो रही होती है जो नैतिकता के झण्डाबदार हैं या कि सामाजिक व्यासपीठ पर आसीन हैं। भूमण्डलीकृत विश्व का उपभोक्ता माने जाने के कारण यूँ तो पूरी दुनिया इन लड़कियों के कदमों का वजन नाप और तौल रही है; लेकिन, पुनर्रचना के निकष पर सवार ये लड़कियाँ अपनी गति, ऊर्जा और संभाव्य चेतना से निरन्मर अपना कदम आगे की ओर बढ़ा रही हैं। यद्यपि तराजू की तौल पर लड़कियों का वजन लगातार वजनदार सिद्ध हो रहा है, तथापि ये लड़कियाँ झूठी गुमान की जगह गर्वीली मुसकान के साथ हाट-बाज़ार में बैठी हुई चूड़ीहारिनों के आगे अपनी दोनों हाथ बढ़ाए हुए मानों कह रही है...रिंग-रिंग-रिंगा....2 रिंग-रिंग-रिंगा...रिंगा-रिंग।  

गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य पर व्यावहारिक सुभाषितानी

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कहा गया है-‘विद्या सर्वाथ साधनम्’’। 
यह भी कहा गया है कि विद्या वही है जो हमें बंधन से मुक्त करती है। 
यह भी कि ‘Learn for Live’।
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लेकिन इन सद्विचारों का अवगाहन, पालन और अनुसरण करने के लिए पेट में दाना चाहिए। चिड़ियां या पंक्षी भी भोजन की खोज-तलाश में आसमान-जमीन, डाल और पेड़ बदल देते हैं या बदल देने के लिए विवश होते हैं।
किसी भी मनुष्य के लिए ज़िदा होने का प्रश्न तथाकथित सुसभ्य और सुसंस्कृत मनुष्य होने से अधिक महत्त्वपूर्ण है। अतः अपनी जहां कीमत मिले काम करो और न मिले तो कहो ब...ब्बाय इंस्टिट्युशन! चाहे वह गुरुकुल ही क्यों न हो?
Happy Republic Day



ओ रजीबा!

हाइवे फिल्म का गाना सुन!

‘आली...आली...आली...ओ....,
जुगनी ओ...’

Mathematical Communication : Formulation & Ethnical entity of Universe


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New Approach of Natural Science 
By 
राजीव रंजन प्रसाद 
गणित हमारे लिए कठिन है, और जटिल भी।

हममें से कितने हैं जो 5 को बाइन
री में बदलना जानते हैं या कि बाइनरी से अंक में बदलने के सूत्र से अवगत हैं; लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आप कंप्यूटर ही नहीं चला सकते या स्मार्ट फोन पर ‘मैसेजिंग’ नहीं कर सकते। यह एक-दूसरे से अभिन्न होते हुए भी व्यावहारिक स्तर पर उपयोगितावादी तरजीह के हिसाब से हमारे दिमाग द्वारा नोटिस में लिए जाते हैं। मतलब कोई चीज जिस सिद्धान्त पर टिकी हुई है, उसे जाने बगैर भी आप उठ सकते हैं; चल सकते हैं, दौड़-भाग सकते हैं; यहां तक कि सो यानी आराम भी फरमा सकते हैं।
दरअसल, गणित को हमेशा हमारे समाज ने चलता ढंग से लिया है। वे(हम आधुनिक मनुष्य) यह जान पाने की ओर कभी प्रवृत्त नहीं होते कि गणित ही सभी विधाओं का मूलाधार है और मानवजातीय विकास की सारी रूपरेखा एवं जटिल संरचनाएं इसी बीजक में कैद हैं। ज्योतिष जो आजकल अपने दंभ और अहमन्यतावादी दृष्टिकोण के कारण मनुष्यों का भाग्यफल बांचने तक सीमित है; वास्तविक अर्थों में दुनिया की निर्मिति के बारे में सबसे सही और उपयुक्त जानकारीअपने गर्भ में ही छुपा रखा है। 
एक बात लें, वह यह कि पहले का मनुष्य अधिक ताकतवर था; उसके पास कार्य करने की अधिक क्षमता थी; वजन उठा सकने का अधिक सामथ्र्य था और गहराई में डूबकर अधिक चिंतन-मनन द्वारा मानसिक संतुष्टि हासिल कर पाने के उसे अनेकानेक गुण पता थे। फिर आज ऐसा क्या हो गया कि हम पहले की तुलना में अधिक अस्वस्थ, बीमार और स्वयं को थके-हारे महसूस कर रहे हैं। इसका कारण है कि हमारा गणित हिसाब गड़बड़ हो गया है और हम उसमें सुधार के बारे में नहीं सोच रहे हैं। इस गणित का व्यावहारिक ज्ञान उत्तरोत्तर किताबी होते गए हैं; और यह विषय दिमागी कसरत और दांव-पेंच के अलावा कुछ नहीं माना जाने लगा है। जबकि सचाई है कि हम सिर्फ एक सप्ताह अपने सांस लेने की रफ्तार में बढ़ोतरी कर दें अथवा अपनी क्रियाशीलता में इज़ाफा कर दें, तो ताज्जुबकारी परिणाम देखने को मिलेंगे। हां, इसके लिए कुछ समय सूर्य के प्रकाश का सम्पर्क बहुत जरूरी है। 

तकनीकी-प्रौद्योगिकी के इस ज़माने में गणित को सभी मनुष्यों के जीवन का अंग-उपांग मानने की बजाए इंजीनियरों के दिमाग को चलाने वाला खुरापाती ज्ञान घोषित कर चुके हैं। यह ग़लत धारणा हमारे मन-मस्तिष्क में पैठे होने के कारण हम एक हद तक कामयाब तो हो रहें हैं; लेकिन काफी हद तक पिछड़ते भी जा रहे हैं।

आइए इस पर सिलसिलवार ढंग से बात करने का मन बनाएं। पर आज इतना ही।

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...