Saturday, July 5, 2014

नदी के दिन-दुर्दिन


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लोग झाड़ा फिरने आते थे
भिनसारे से सुबह तक
नदी की ओर

लोग नहाने आते थे
भोर होते या उदित होते सूरज संग
नदी की ओर

लोग कई-कई मर्तबा आते थे
इस-उस काम से
नदी की ओर

नदी की ओर
अब कोई नहीं आता
कहते हैं सब-‘बिन पानी की नदी किस काम की....?’


Friday, July 4, 2014

वर्तिका: ए लीडर आॅफ दोहागंज

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‘सहानुभूति जतलाने आये हैं, तो अपनी पाॅवर काहे दिखा रहे हंै।’

‘एई चशमलू....कबसे सुने जा रही हूँ। आप लोगन हमरी माई से जिस तरह एढ़ी-टेढ़ी बतिया रहे हैं न! बर्दाश्त नहीं हो रहा है। औरते रंडिया शहरी बाबुओं के लिए होती होंगी...हम गाँव की बेटियन हैं; हमन जल्दी बोलत नाहीं हैं...लेकिन जब हमारा मिज़ाज उखड़ जात है तऽ समझो बवंडर आई गवा बवंडर....’’

वर्तिका। खरी बोलने में उस्ताद। हाईस्कूल में जिला टाॅपर रही थी। उस रोज पंचायत में बोली, तो सबका दिमाग ही घूम गया। पुलिसखाने के हेड की तो बोलती बंद हो गई। एकदम से भकुआ गए। काफी देर तक वर्तिका को खा जाने वाली निगाह से घूरते-देखते रहे; लेकिन वर्तिका अपनी आँख नीचे नहीं की, तो नहीं की। हेडमास्टरनी की बेटी वर्तिका को जिसने भी पंचायत की सभा में बोलते हुए सुना...कईयों को तो जैसे काठ मार गया। मुख्य शहर से 12 किलोमीटर की दूरी पर बसे दोहागंज में पिछले दिनों गैंगरेप की वारदात हुई थी। पुलिस की आगवानी में पंचायत बुलाई गई थी। वर्तिका की माँ हेडमास्टरनी थीं। उन्होंने गाँव के अवारा लड़कों का नाम गिनाना शुरू किया तो जाति से बड़कुआ बनते कथित शरीफ़ानों को मिर्ची लगने लगी। कई तो आपे से बाहर हो गये। सभी हेडमास्टरनी को भला-बुरा कहने लगे थे।

वर्तिका से आखिरकार बर्दाश्त नहीं हुआ था। वह बीच में बोल पड़ी। उसके बोलते ही गाँव के अन्य लोग भी वर्तिका के समर्थन में आ गए। वर्तिका अकेली नहीं थी। गाँव की ढेरों औरतों ने थाना-पुलिस, मुखिया और सरपंच को अपनी बातों और आवाजों से छेंक लिया था। जिस घटना को भीतर-भीतर रफा-दफा करने की बात चल रही थी; वर्तिका के हस्तक्षेप के बाद उस सिलसिले में पुलिस को एफ.आर.आई. दर्ज करने पड़े। बाबूसाहबों का चिकन-मटन और दारू तंवा गया। जल्द ही वर्तिका की आवाज़ पूरे गाँव की आवाज़ बन गई थी। अख़बारों में भी रिपोर्ट छप गई। उन नामीगिरामी अख़बारों में जो ख़बरें उन्हीं की और उन जगहों की ही छापते हैं जहाँ से उन्हें विज्ञापन, परोक्ष सहयोग, राजनीतिक लाभ और मुनाफा आदि भरपूर मिलते हैं। आज दोहागंज की ख़बर छपी थी-‘बहादुर वर्तिका ने संभाला मोर्चा, गैंगरेप मामले में हुई एफ.आई.आर. दर्ज’।   

उस दिन के बाद वर्तिका आज दिखी थी। पड़ोस के सत्यनारायण की दुकान पर वह सौदा लेने आई थी। मैंने अपनी जगह से खड़े-खड़े हुलक कर उसे कई बार देखा था। वह थोड़ी-सी आड़ में थी। दुकान के एक तरफ चिमकिली का परदा लगा था जिससे उसका चेहरा तोपाया हुआ था। मैं इस फेर में था कि वह अब मुड़े कि तब मुड़े। लेकिन मेरी टकटकी जवाब दे गई। वह एकदम पंजरे से गुजर गई, लेकिन वर्तिका का चेहरा न दिखा। वह मुझे अख़बारी भैया कहती थी। उसे पता था कि मैं बीएचयू यानी बनारस में रहकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूँ। पिछले दिनों उसने पूछा, तो कहा कि अब मैं पीएच.डी. कर रहा हूँ। उसने कहा था-‘अरे! अब चाहे आप जो करो, मुझे तो बस वह दिन देखना है जब आपका नाम काले अक्षरों में अख़बार पर लिखा हो साफ-साफ।...... 

वाह! रजीबा वाह!

1.

बहुत दिन हो गए थे-‘हँसे’,
जब बुरे फँसे, तो खूब हँसे।

2.

सुना था-‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे’,
आज अपनी ही बालों का कचूमर निकाला।

3.

नौकरी लगी, तो क्या करूँगा,
पैर पसार हीक भर सोऊँगा।

4.

जिनके पास दौलत है बेशुमार
वे भी रहते हैं बुरी तरह बीमार।

5.

मोदी जी प्रधानमंत्री बनने के लिए खूब पापड़ बेले
आइए, हम सब बेले हुए पापड़ों को मिलकर खाएँ।

6.

जो कहा जाये-‘मत करो’, ‘नत करो’
दिल कहे, तो उसके लिए सब करो।

Wednesday, July 2, 2014

मैं मर जाऊँ कबूल....पर आमजन के ‘अच्छे दिन’ जरूर आयें

प्रिय देव-दीप,


खुली हवा में साँस लेने के लिए भारत का राष्ट्रपति होना जरूरी नहीं है, न ही रायसीना हिल्स में रहना जरूरी है। हवा किसी के रहमोकरम पर नहीं बहती है। साँस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया किसी पूँजीपति या तानाशाह के इशारे पर नहीं पूरी होती है। यानी हम स्त्री हो या पुरुष। राष्ट्रपति हों या साधारण विद्यार्थी। उम्रदराज पुरनिया हों या अभी-अभी जन्मा नवजात। 40 तल्ले की बिल्डिंग में रहते हों या बिना किसी छत या आसरे के खुली ज़मीन पर बना हुआ हमारा बसेरा हो। हवा, पानी, रोशनी आदि हमें  प्रकृति-प्रदत हंै। यानी इन्हें हासिल करने के लिए युद्ध लड़ने की नौबत नहीं आती है और न ही ऐसे किसी सिरफिरे प्रयास की जरूरत पड़ती है। अपनी कारगुजारियों से दुनिया के जन-जीवन को संकट में डालने वाले योद्धा अथवा वीर-बहादुर कतई नहीं कहला सकते हैं। इतिहास में जितनों का नाम दर्ज हैं; वे सब मात्र लाशों की नामशिलाएँ हैं, मुर्दा यानी दफनाए गये लोगों की ऐसी दस्तावेजी-पंजिका जिन्हें न तो पढ़ने की इच्छा होती है और न ही उन पर गुमान करने की कोई विशेष वजह समझ में आती है।

देव-दीप, आदमी कर्म से बड़ा होता है। सही कर्म करने का संस्कार धर्म से मिलता है। धर्म आज जो कहा जाता है वह कतई नहीं है। धर्म तो वह है जिसे हम चैबीसों घंटे धारण किए रखे; लेकिन हमें तनिक उकताहट न हो; ऊब या चिढ़ न हो। इस तरह की सोच-समझ वाला धर्म हमारे भावों को पवित्र रखता है। वह हमको दुनिया में फूल सरीखा खिलने की सीख देता है और चाहता है कि जब हम मुरझायें, तो हमारे आगोश में वह जीवनदायिनी बीज हो जिसमें अपनी ही भाँति उगने-उमगने, खिलने और खिलकर प्राकृतिक आभा-सौन्दर्य में इज़ाफा करने का बीजगुण विद्यमान हो।


देव-दीप, इस दुनिया में मानवता से बढ़कर कोई इबादत नहीं है। औरों के काम आना ही इंसान को इंसान बनाए रखने की सबसे पवित्र तालीम है। अपना-पराया संसार में कुछ भी नहीं है। न्यूटन का गति नियम सब पर बराबर लागू होता है। सभी वस्तुएँ गुरुत्वाकर्षण के सामान्य नियम से बँधे हुए हैं। तूफान, सुनामी, बाढ़, भूकंप आदि आने पर सबको समान क्षति और नुकसान पहुँच सकती है। हाँ, बचाव और राहत की सुविधा किसको कैसे और कितने समय से मिल पाती है या वह भी नहीं...यह जरूर व्यवस्था, कानून और सामाजिक वातावरण के अनुसार तय होता है।

देव-दीप, मान लो कि मैं असमय मर जाऊँ, तो क्या होगा? दुनिया जस की तस अपने भूगोल-अक्ष में घूमती रहेगी। अंतरिक्ष वैसे ही तारों-सितारों से आच्छादित होगा। सूरज और चन्द्रमा रोज की भाँति बेखटक उदय और अस्त होंगे। रात और दिन के क्रम सामान्य ढंग से बदलती रहेंगी। जो बचे रहेंगे वो आने वाले समय की राजनीति देखेंगे। गाँधी और नेहरू युग की आज जैसी यादें बची हैं उनसे हमारा वर्तमान सुधर या बन नहीं सकता है; वैसे ही मनमोहन या मोदी युग भी इतिहास हो जाएगा। तारीख रोज बदल रही है। एक-एक कर साठ महीने पूरे होने की अंतिम तारीख भी सामने आ जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी जो कल के बेहतर होने का दिलासा देते हुए आज अपनी भाषा में महमह कर रहे हैं; हो सकता है कि उनकी विदाई मनमोहन से भी बुरे ढंग से हो या कि मोदी जी के ‘अच्छे दिन’ कहने का लक्ष्यार्थ ही हो पूँजीपतियों के अच्छे दिन, व्यापारियों के अच्छे दिन, नौकरीपेशावालों के अच्छे दिन....और ये ही लोग उन्हें भारत का अब तक का सबसे गुणी और श्रेष्ठ प्रधानमंत्री घोषित कर दें। यानी उनके प्रधानमंत्रीत्व काल में जनता-जनार्दन उसी तरह बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, भूमि, रोजगार, प्रगति, समृद्धि, स्वस्थ मनोरंजन, निष्पक्ष जनसंचार, नैतिक समाज, मूल्य आधारित संस्कृति, भ्रष्टाचारमुक्त राष्ट्र के लिए चिंचियाती रहे, चीखती-चिल्लाती रहे और वह पुरानी सरकारों की तरह इन मुद्दों/समस्याओं पर जरा-भी कान न दें।

....तो फिर भरोसे से भरोसा उठ जाना स्वाभाविक है। ऐसा नहीं होगा, इसके लिए लोग आश्वस्त कर रहे हैं...निश्चिंत कर रहे हैं। मैं भी चाहता हूँ कि मैं ज़िन्दा रहूँ या न रहूँ; लेकिन मोदी सरकार के वादों/आश्वासनों की लाज बची रहे क्योंकि आज आमजन इन वादों और आश्वासनों के भरोसे अनगिन सपने बुनने में जुटा है। यदि धोखा हुआ तो समझो कि यह आमजन के सपनों की मृत्यु है। और जैसा कि कवि पाश कहते हैं...सबसे खतरनाक होता है ज़िन्दा आँखों में सपनों का मर जाना। चलो, देव-दीप! शेष फिर कभी।


तुम्हारा पिता
राजीव

Tuesday, July 1, 2014

प्रत्याशा, हमारी बेटी

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वह ज़िन्दा होती, तो 8 साल की होती। लेकिन, प्रत्याशा जन्म लेने के एक हफ़्ते के भीतर गुजर गई।

हमने पहले ही सोच रखा था उसका नाम: प्रत्याशा। प्रत्याशा सिर्फ मेरी और सीमा की नहीं, हमारी....हम सबकी बेटी थी। वह उन सबकी बेटी थी जो मेरे परिवार से अपनापन रखते हैं, मोलजोल रखते हैं, हर मौके...अच्छे या बुरे, साथ खड़े होते हैं। भारतीय समाज-परिवार की यही सबसे बड़ी ताकत है, खूबी है और अपने ज़िन्दा रहने की सबूत भी कि यहाँ कहीं किसी आँख से लोर टघरना भी शुरू होता है तो समंदर बन जाता है। भारत में सुख-दुख दोनों में साझेपन की हरियाली है, साथगोई का रिवाज़ है। प्रत्याशा की आकस्मिक मृत्यु पर ढाढस देने वाले, हिम्मत बंधाने वाले अनगिनत थे। प्रत्याशा अकेली मरी थी, लेकिन उसकी इस बिछुड़न पर विलाप सभी रहे थे।

समय से इंजेक्शन न लग पाने के कारण वह मर गई थी। प्रत्याशा की मृत्यु पर खुद को अपराधिन मानती नर्स बिलख-बिलख कर बेजार रोई थी।.....

प्रत्याशा इकलौती नहीं थी जो मर गई। सरकारी दयानत और रहमोकरम पर जीते अपने देश में स्वास्थ्य और चिकित्सा की हालबयानी पर रोना सबको आता है, कुछ करना किसी को नहीं। प्रत्याशा क्यों और कैसे दम तोड़ दी? एक नवजात को दफनाए पिता से इस सवाल का जवाब देते नहीं बनता है; पढ़ाई-लिखाई की सारी डिग्रियाँ बंगले झाँकने लगती है और चेहरा अपनी ही तमाचे और घूसे की मार से सूज कर काला-नीला हो जाता है।.....

Monday, June 30, 2014

आम-आदमी की वास्तविक ज़िन्दगी को ‘रील लाइफ’ न माने


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29 जून को 'हिन्दुस्तान' समाचारपत्र में प्रकाशित सम्पादकीय ‘सरकार को सिनेमा मत बनाइए’ के सन्दर्भ में

आदरणीय शशि शेखर जी,
प्रधान सम्पादक,
हिन्दुस्तान समाचारपत्र।

आजकल मल्टीप्लेक्स सिनेमा संस्कृति फल-फूल रही है। लेकिन आम-आदमी उसका हिस्सा नहीं है। सामान्य रहबसर से कटी हुई नवढ़ा पीढ़ी जो कि विशेषतः सुविधा-सम्पन्न वर्ग से ‘बिलांग’ करती है; को यह रंग-ढंग सर्वाधिक सुहाता है। उसकी जेब में रुपल्ली कितना, कैसे, क्यों और कहाँ से आती है....यह पड़ताल करने का विषय मेरा नहीं है। परन्तु यह सचाई है कि इस पीढ़ी के ऊपर घर-परिवार के लिए कमाने की जिम्मेदारी नहीं है। यह नवढ़ा पीढ़ी अक्सर सपनों के ख़्वाबगाह में जीती है और थोड़ी-सी भी मुसीबत गले पड़ने पर टूट कर जार-जार बिलखने लगती है। बाज़ार इस पीढ़ी के लिए सबसे माकूल चारागाह है जहाँ वह हर हफ़्ते पार्टी-सार्टी कर सकता है; लव-शव-डेटिंग की प्लानिंग कर सकता है; वह सब सुख-सुविधा और ऐश्वर्य भोग सकता है जिसकी इज़ाजत उसके पर्स, एटीएम, क्रेडिट कार्ड आदि देते हैं।

खैर! यह मामूली-सी बात हिन्दुस्तान समाचारपत्र के प्रधान सम्पादक शशि शेखर को नहीं पता हो, यह सोचना अपनेआप में ही अजीब लगता है। ‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र में 29 जून को ‘आजकल’ स्तंभ से प्रकाशित अपने सम्पादकीय ‘सरकार को सिनेमा मत बनाइए’ के आखि़री पैरे में आप सूत्रनुमा लहजे में कहते हैं-‘‘आशय यह है कि केन्द्र सरकार मल्टीप्लेक्स में लगा हुआ सिनेमा नहीं है, जिसे पहले शो, पहले दिन या पहले हफ़्ते की कमाई से नापा-जोखा जाए। नरेन्द्र मोदी ने कुंभकर्णी नींद में सोए प्रशासन को जगा दिया है। वह और उनके सहयोगी दिन-रात एक किए हुए हैं। थोड़ा इंतजार कीजिए। सत्ता-नायकों को भी सही परिणाम देने के लिए समय की दरकार होती है।’’

आप सही हैं। लेकिन इंतजार से पहले सत्ता-नायकों की ठीक-ठीक पहचान होनी भी जरूरी है। याद कीजिए...17 मई, 2014 को लिखी हुई अपनी ‘बाॅटम स्टोरी’ जिसका आपने बड़ी सूझ-बूझ से शीर्षक डाला था-‘नरेन्द्र मोदी के नए अवतार ने तोड़े तमाम सियासी मिथक’। यह स्टोरी पूरी तरह ‘जादूई यथार्थवाद’ के प्रभाव और रौ में लिखी हुई लगती है या फिर ‘भए प्रकट कृपाला, दीनदयाला’ के भक्ति-भाव में रंगी-डूबी हुई। आपने ‘स्पीन डाक्टर्स’ की भूमिका जैसे लगते तेवर में लिखा है-‘‘यहाँ भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कमाल पर भी नज़र डालनी होगी। आडवाणी ने उनके सत्तारोहण पर सरेआम उम्मीद जताई थी कि वे 2013 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का परचम फहरायेंगे। सिंह ने समूचे सिंहत्व के साथ असम्भव को सम्भव कर दिखाया। इसीलिए इस बार मतदाता ने खुद के सारे बंधन तोड़ डाले हैं। इस बार वोट देश के लिए डाले गए न कि सूबाई, साम्प्रदायिक, भाषाई या जातीय आग्रहों के लिए।’’

यह पत्रकारीय अनुभव की साफ-सूथरी, निष्पक्ष अथवा वस्तुनिष्ठ आकलन-मूल्यांकन नहीं है। आपने ‘सिंह के सिंहत्व’ की भाषिक शब्दावली दुराग्रह/पूर्वग्रह के साथ प्रयोग में लाया है ताकि ‘मोदी के मोदीत्व’ वाले प्रभाव का ‘काउंटर’ किया जा सके। अन्यथा, आपके सुर अगली ही पंक्ति में शंकालु न हो जाते-‘‘नरेन्द्र मोदी ने भी शुरुआती रुझानों में जीत का रंग चोखा होता देख ट्वीट किया-‘भारत की विजय। अच्छे दिन आने वाले हैं।’ क्या वाकई?’’ द्वंद्व ठीक है, अंतर्विरोध सही है; लेकिन चरित्र में दुहरापन या विरोधाभास से बचना नितान्त जरूरी है। जिन शंकाशास्त्रियों यानी ‘कुछ लोगों’ को लक्ष्य कर आपने यह सम्पादकीय लिखा है यह बात उनके सन्दर्भ में भी सौ टके वाजिब और खरी मानी जाएगी।

एक और बात आपने अपनी सम्पादकीय में ‘पहले मारे सो मीर’ मुहावरा प्रयोग में लाया है। बचपन में हम भी ‘जो पहले खाई सोई राजा’ के ललक संग थाली से कवर उठाते थे। लेकिन अब उस बचकानेपन से ज़िन्दगी नहीं जी या गुजारी जा सकती है। आपने ठीक कहा है कि जंग जीतने के लिए हालात से लोहा लेना पड़ता है। बकौल आप-‘‘बरसों बाद ऐसा हुआ है, जब जाति, धर्म, क्षेत्र, सम्प्रदाय और भाषाओं के आग्रह पीछे छूट गए। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और असम से अरब सागर तक लोगों ने वोट की शक्ल में उन्हें अपनी उम्मीदों का अक्षय-पत्र सौंपा। आशा है कि वह बिना समय गंवाए देश की जन-भावनाओं के अनुरूप काम करेंगे।....नरेन्द्र मोदी को मनमोहन सिंह से कंपकंपाती अर्थव्यवस्था मिली है, पर निराश होने की जरूरत नहीं है।’’

आप यहीं नहीं रूकते हैं। आपको पता है कि देश की स्थिति नाजुक है। बीमार व्यक्ति के लिए ‘इमरर्जेंसी’ का अर्थ तत्काल राहत होता है। अर्थात् ‘फास्ट रिलिफ’ बिना किसी लेकिन, किन्तु, परन्तु के। तभी तो आप अपने सम्पादकीय(18 मई, 2014) में सच को कुछ इस तरह नमूदार करते हैं-‘‘यकीनन, नरेन्द्र मोदी को तेजी से अपना एजेण्डा लागू करना होगा। महंगाई और बेरोजगारी लोगों को जीने नहीं दे रही, नए रोजगार सृजित नहीं हो रहे और ऊपर से रुपए की गिरावट ने हमारी अर्थव्यवस्था को बेहाल कर रखा है। अनेक राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें हैं। उनका सहयोग हासिल करना भी एक चुनौती होगी। उम्मीद है, मोदी का अनुभव और दृढ़ संकल्प उनकी राह हमवार करेगा। हालांकि, इस सबके लिए नरेन्द्र मोदी के पास समय बहुत कम है। हमारे देश की युवा पीढ़ी बेताब है। सोशल मीडिया जिस तरह उनका मोह बढ़ाता है, वैसे ही उसे भंग भी कर देता है। फिर अगले कुछ महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश, झारखण्ड और जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने हैं। ये चुनाव उनकी पहली अग्निपरीक्षा होगी।’’

भारतीय जनता बेहद धीरजधर्मी है। वह अपनी ज़िन्दगी को ‘रील लाइफ’ नहीं मानती है। उसे बख़ूबी पता है कि-‘‘दिल्ली की सत्ता सदन में बैठे शख्स के हाथ में जादू की छड़ी होती है, जिसे वह हिलाएगा और महंगाई सहित सारी दिक्कतें दूर हो जाएगी।’’ दरअसल, सारी दिक्कत उन कथित बौद्धिक विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के साथ हैं जिन्हें पहली बात बोलना नहीं आता और जो बोलते हैं उसका दूरगामी, ठोस एवं निर्णायक कोई अर्थ नहीं होता। फिलहाल, आप अपनी सोच को नई सरकार की धारा में बेवज़ह बहने से रोकें। आप इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि-‘‘आत्मप्रशंसा और खुशामद राजनेताओं की सबसे बड़ी शत्रु हैं।’’(01 जून, 2014) मोदी सरकार बनने के एक माह के भीतर आपने सम्पादकीय पृष्ठ पर आने वाली अपनी  तस्वीर का ‘पोज-पोजिशन’ बदला दिया है.....शशि शेखर जी, हमें पुराना वाला सम्पादक चाहिए जो चुनाव-पूर्व ‘आओ राजनीति करें’ की घोषणा करता है; तदुपरान्त ‘अब राजनीति ख़त्म, काम शुरू’ करने जैसी पत्रकारीय भूमिका का विधान रचता है; यदि वह ‘सिंह के सिंहत्व’ या ‘मोदी के मोदीत्व’ की राजनीति में फँस गया, तो फिर इन राजनीतिक शख़्सियतों का नीर-क्षीर मूल्यांकन कौन करेगा?

यदि आप इस पत्र को प्रकाशन योग्य समझें, तो मुझे अपनी ‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ सम्बन्धी मूल्य एवं प्रतिबद्धता को आपका वास्तविक संबल और सहयोग प्राप्त हो सकेगा। आशा है, आप स्वस्थ एवं सानंद होंगे।
सादर,

भवदीय
राजीव रंजन प्रसाद
वरिष्ठ शोध अध्येता
प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता
हिन्दी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी-221005

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...