क्यों और कैसे आते हैं हम आशंकाशास्त्रियों के झांसे में?

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14 सितम्बर, 2014
(प्रतिक्रिया आपकी सम्पादकीय ‘अजर-अमर है हमारी हिंदी’ पर)

आदरणीय शशि शेखर जी,
सादर-प्रणाम!

‘‘तम न होयगो दूर, विन ‘एक भाषा’ रवि उगे।
सुगम भाव भरपूर, ‘हिन्दी तासे उचित है।।...
सिखवहु निज सन्तान, हिन्दी सरल बनाय कै।
अरु सुविमल इतिहास, गौरव, युत निज देश को।।’’

यह सोरठा ‘उन्नति के मार्ग’ शीर्षक से पत्रिका ‘हिन्दी प्रदीप’ में जनवरी
1908 के अंक में प्रकाशित हुआ था। पण्डित बालकृष्ण भट्ट इस पत्रिका के
सम्पादक थे। आज का दिन उस दिन से महज नई सरकार माफ़िक 100 दिन आगे-पीछे
नहीं है; कि यह कहना उचित जान पड़े कि अभी देखने को बहुत कुछ हैं; नई
सरकार को थोड़ा और मौका तो देकर देखिए। यानी हमें हिन्दी को देखने की
दृष्टि बदलनी होगी। भारतेन्दु की ‘हतभागिनी’ हिन्दी को अपने देश में क्या
और कैसा गौरव प्राप्त है; इस पर विचार करना होगा। क्या सचमुच इस सोरठा
में लक्षित भाव का अर्थ-यथार्थ हमने पा लिया है? क्या बीते 105 वर्षों
में इतना कुछ बदल गया है कि आप अपनी भाषा को बोलते हुए हीनताबोध से न
भरें?

मैं बताता हूँ। उदाहरण देता हूँ। अक्तूबर, 2012 में ‘सर्जनात्मक लेखन एवं
पत्रकारिता’ विषय के लिए मेरा हिमाचलप्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय में
साक्षात्कार हुआ जिसमें मैं सहायक प्राध्यापक पद के लिए आवेदक था। कुल
जमा 18 आवेदकों में से उन्होंने एक को भी नहीं चुना। मुझे उन्होंने
टका-सा जवाब दिया था-‘आपकी हिन्दी में लेखनी बहुत अच्छी है; लेकिन हमें
अच्छी हिन्दी नहीं अच्छी अंग्रेजी चाहिए।’

मैं अवाक्। सन्न। हतप्रभ। मेरी ज़िन्दगी का पहला साक्षात्कार और मेरी ज़बान
ख़ारिज। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता के
कनिष्ठ शोध अध्येता को उस वक्त घुमरी आ रही थी। विश्वविद्यालय अनुदान
आयोग द्वारा जारी ‘जनसंचार एवं पत्रकारिता’ विषय में नेट और जेआरएफ दोनों
सटिर्फिकेट उस घड़ी मुझे चिढ़ा रहे थे। यही नहीं मैं हताशा से उन
पत्र-पत्रिकाओं को उलट-पुलट रहा था जिसमें मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी खपा
दी थी। जैसे-मीडिया विमर्श, संवेद, सबलोग, समकालीन जनमत, समकालीन तीसरी
दुनिया, परिकथा, अक्षर-पर्व, कादम्बिनी, प्रभात ख़बर। संयोगवश पत्रिकाओं
की इस झुण्ड में एक पत्रिका वह भी थी जिसका सम्पादक आप स्वयं
हैं-‘कादम्बिनी’। मेरा लिखा जो आपने प्रकाशित किया था-‘प्रेमचन्द के गाँव
लमही से लौटते हुए।’

वह दिन, और आज का दिन। मुझे अपनी भाषा में तिल-तिल मरना साबित हुआ है।
उसके बाद इस वर्ष दूसरा साक्षात्कार देने सिक्किम विश्वविद्यालय जाना
हुआ। विश्व के 200 मास-मीडिया फैक्लटी जिसमें दुर्भाग्यवश एक भी भारत के
नहीं हैं; में से मैंने एक 25 पृष्ठीय पाठ्यक्रम को भी इस साक्षात्कार के
लिए तैयार किया था। इसके अतिरिक्त भी ढेरों सामग्रियाँ जिन्हें मैंने
करीब 16-16 घंटे जगकर बनाया था। वहाँ भी अंग्रेजी में पढ़ाने की
अनिवार्यता पर मैंने ‘एक्सपर्टों’ को चैलेंज कर दिया-‘यदि मैं अंग्रेजी
में जवाब दे रहा होता, तो आप मुझसे क्या सवाल पूछते?’ उन्हें नाग़वार
गुजरा था। धुँआधार प्रश्नों के बीच साक्षात्कार जब खत्म हुआ; वे अपने हाथ
खड़े कर चुके थे। राॅबिन जेफ्री, फा्रंचिस्का आॅरशेनी, हैबरमास, नाॅम
चामस्की इत्यादि को हिन्दीभाषी पत्रकारिता के विद्यार्थी भी जानते-समझते
हैं और उस पर धाराप्रवाह बोल सकने का सामथ्र्य रखते हैं; यह पूर्वानुमान
वे नहीं लगा सके थे। मेरी भाषा उस कक्ष से विजित होकर निकली थी; लेकिन,
मेरा चयन वहाँ भी नहीं किया जा सका। जबकि उस जगह सिर्फ हम तीन ही लोग थे।
पिछले महने जुलाई में राजस्थान के वनस्थली पीठ में साक्षात्कार हेतु जाना
हुआ; और मैं एक बार फिर अपनी भाषा में मरते हुए वापिस हुआ।(संलग्नक
देखें)

आदरणीय शशि शेखर जी, ऐसे आते हैं हम आशंकाशास्त्रियों के झांसे में। आपने
जिस भाषा में अपने भाव लिखे हैं न! वे आज मेरे हैं-‘‘उन दिनों मैं खुद को
छला हुआ महसूस करता था......’

खैर! आपका सम्पादकीय पढ़ा। आपने मनोयोग से हिन्दी भाषा के बारे में
सकारात्मक सोच रखने की बात कही है; इसके लिए आपको साधुवाद!
सादर,

भवदीय
राजीव रंजन प्रसाद
वरिष्ठ शोध अध्येता(जनसंचार एवं पत्रकारिता)
प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता,
हिन्दी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी-221 005
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