हाय! रिसर्च

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‘फुटानी बहुत करते हैं....काम कम.....’
उसने कहा था। मेरी निगाहें टीवी स्क्रीन पर दिखते बाढ़ पर टिकी थी।

‘मैंने कहा था न....आटा ख़त्म हो गया है, लौटते समय ले आइएगा।’

मैं बाढ़ में फंसे हुए लाखों लोगों की चीख-चिल्लाहट सुन रहा था। मेहरारू बोलती रही और मैं आदतन उसे अनसुना करने का भूगोल रचने में मशगूल हो गया।

उसने इस बार झकझोर कर कहा-‘आटा नहीं और कल बाबू लोग को टिफिन बनाकर भेजना होगा.....’

‘चावल है न!’ मैंने संत-भाव से कहा था।

वह तमतमाई हुई किचेन में घुसी थी। उसके पायल की आवाज़ कर्कश हो ली थी। लेकिन मैं टेलीविज़न पर सेना की बहादुरी के सुनाये जा रहे किस्से सुनने में अलमस्त था।

यह क्या....? अगले ही पल उसने चावल के झोले मेरे पर उझील दिया था। 

मैं सन्न, अवाक्।

अगले पल गुस्सा में उठा। और बाहर चला गया। मैं साईकिल इतनी तेज चला रहा था कि एक किलोमीटर के भीतर तीन बार चेन उतर गए। किराना के दुकान पर गया, चावल की मांग की। लेकिनए जेब खाली है। यह अहसास काफी बाद में हुआ। निकला 5 रुपया। एटीएम की ओर भागा। पैसा नहीं निकला। बैलेंस तीन सौ तिरानवे रुपए।

मुझे क्रोध इतना कि लगा जैसे एक वरिष्ठ शोध अध्येता की जबर्दस्त तौहिनी हो गई है। उस बचे 5 रुपए से एटीएम रसीद का स्कैन करा लिया कि आज इसे अपने विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर को भेजूंगा। बिल भेजे  40 दिन से अधिक हो गये; और अभी तक यह तमाशा!!

यह सच है कि कुछ दिनों बाद अकाउंट में चालीस हजार रुपए लगभग होंगे। लेकिन आज आटे-चावल खरीदने के लाले पड़े हैं। मुआ एटीएम सौ का नोट देता ही नहीं है। हाय!

मैंने किसी तरह तकादे के लोगों को मना लिया कुछ दिनों के लिए। पेट पर आफ़त है, इसे कैसे मनाये?

भारी मन से घर लौटा, तो उकडू बने बैठा रहा। उसे दया आ गई। गुस्सा के बावजूद पचास का नोट निकालकर मेरे सामने रखे पुस्तक पर रख दी जिसका नाम था-‘अथातो सौन्दर्यजिज्ञासा!’

मैं उस किताब के पन्नों की तरह अपने आदत-स्वभाव के पुरानेपन से जूझ रहा था।

अगले पल एक सूची बनाई जिमें यह जिक्र था कि किससे कितना पैसा लेना है और किसको कितना देना है। मात्र देने को साढ़े ग्यारह हजार रुपए निकले। नाम था-सर जी: छह हजार, कृष्ण: पांच हजार, मोतीलाल जी: 500 रुपए।’

लेकिन मुझे जिनसे लेना था वह तो डेढ़ लाख रुपए हैं। अब मैं नाम बताकर अपनी मेहरारू से अपना कचूमर नहीं निकलवा सकता। यह एक ऐसा सच है जिसे वह पसंद नहीं करती क्योंकि मेरे इसी व्यवहार से वह हमेशा तकलीफ़ से जूझती है; बूरी तरह। लेकिन, मैं तो पैसा आते ही बौराता रहता हूं। वैसे फ़िजूलखर्ची एक चाय को छोड़कर रुपल्ली भी फ़ालतू नहीं हैं। मेहरारू तो मुझसे भी बीस है इस मामले में।

अचानक फोन की घंटी बजी। बोलने वाले हमारे सीनियर थे। हिन्दी साहित्य से उन्होंने सिनेमा पर पीएच.डी कर रखा है। उन्होंने सुनाया कि वे एक विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए हैं। उसी विश्वविद्यालय में जहां के वाइस-चांसलर ने कहा था कि-‘हिन्दी पत्रकारिता की आपकी योग्यता हिन्दीपट्टी के राज्यों के लिए उपयुक्त है....हमारे यहां तो बस अंग्रेजी में ही मास-काॅम है।’ खैर!

उनको एक समस्या साझा करने थी-‘अरे! मित्र मैं आपको ही याद कर रहा था....यहां इन्होंने मुझे एक जनसंचार और पत्रकारिता का पेपर लगा दिया है पढ़ाने को; और आप तो जानते ही हैं कि मुझे पत्रकारिता का उस तरह ज्ञान नहीं है कि पढ़ाया जा सके। आप मेरी मदद करें।’

उस समय मुझे काटो तो खून नहीं। पूर्वोत्तर के इस केन्द्रीय विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर का चेहरा मेरे दिमाग में घूम गया। लगा कि इतना बुजुर्ग और अनुभवी होकर भी लोग क्या-क्या ग़लत नहीं कर रहे हैं। उस साक्षात्कार के लिए मैंने अपनी जान लगा दी थी। करीब विश्व के 200 मास-मीडिया फैक्लटी का सिलेबस देख-ताक कर 25 पृष्ठ में एक वैकल्पिक पाठ्यक्रम का पूरा खाका मैंने तैयार किया था। लेकिन ढाक के वही तीन पात। परिणाम मेरे विपरीत।

यह सब सोचते हुए मैं वहीं ज़मीन पर पसर गया। एकबारगी अचकचा गया।

सारे अख़बार नदारद थे। कई साल की जमा-पूंजी है वह। कई आशंकाएं। भागा हुआ, सीमा के पास। बोली नहीं निकल रही थी।

‘बेच दी, अभी जो आपको पैसा दी उसी में का है। कुल साढे चार सौ दिए अख़बार वाले ने।’

ओह! जनसता, हिन्दुस्तान, सहारा हस्तक्षेप, जनसंदेश, जागरण्ण्ण्...हाय! रिसर्च....

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