जनभाषा का नीम-अर्क


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7 सितम्बर को छपे प्रभु जोशी के आलेख ‘चटकीली जुमलों की जादूगरी’ पर राजीव रंजन प्रसाद की जनसत्ता को प्रेषित त्वरित प्रतिक्रिया

हर लेखक समाज-द्रष्टा होता है। इस नाते यह अपेक्षित है कि वह उन मुद्दों
पर अवश्य लिखे जिसका सम्बन्ध बहुसंख्य जनता-जनार्दन के हक़-हकू़क,
जनाधिकार और जनाकांक्षा से जुड़ा हुआ है। लेकिन, सबसे बड़ी दिक्कतदारी 
आज के बौद्धिकजनों के साथ यह है कि वह घुमा-फिराकर 
अपनी अगली या नई पीढ़ी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। यह बिना बताये कि
 वह जिस नई पीढ़ी की आलोचना कर रहे है उसकी परम्परा, पृष्ठभूमि और संलग्नता 
के बारे में उनका खुद का ज्ञान, सम्पर्क, सम्वाद और प्रत्यक्षीकरण कैसा और कितना है?

जनाब! नई पीढ़ी में हम भी शामिल हैं जो सांस्कृतिक आरोपण के चालू फंडे को
‘बाॅयकाट’ करने की तमीज़ और साहस रखते हैं। हमारी सोच, चिन्तन, दृष्टि,
कल्पना और यहाँ तक की स्वप्न में भी अपनी भाषा को लेकर कहीं कोई
कुंठा/क्षोभ नहीं है। हम लगातार अपनी भाषा में परिष्कृत/आविष्कृत होने का
स्वभाव रच रहे हैं। हम यह साफतौर पर मानते हैं कि हर भाषा को अपूर्णीय
क्षति होती है जब उसके वाचिक-तलबगारों की ज़बान दोगली हो जाती है। भारतीय
परिक्षेत्र में ऐसी करतूताना हरक़तों को कौन और क्यों शह दे रहा है? इसका
वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन-विश्लेषण आपको करना ही होगा। आपकी यह महती जवाबदेही
बनती है कि आप हमारी शब्दावली के भरोसे हमारी चेतना और संज्ञान-बोध को न
कोसे या कि उसे खरी-खोटी सुनायें। आपको यह चाहिए कि आप परम्परा के इतिहास
में यात्रा करते हुए वर्तमान में प्रकट हो; और यह सिद्ध कीजिए कि
मानव-कौशल अथवा मानव-ज्ञान का वास्तव में विकसनशील होना देश के
प्रधानमंत्री के बोलने-चालने से कभी तय/सिद्ध नहीं हुआ है। आप देश की
जनता को इस सचाई से भली-भांति अवगत कराइए कि अपनी माटी से गूँथी-सनी
जनभाषा(सिर्फ हिन्दी नहीं) का वास्तविक संचारक आम-अवाम है जो ख़ालिस
तालियाँ नहीं पीटता है; वह तो खुलेआम ताल ठोंकता है-‘मोको कहाँ सीकरी से
काम’। आपको यह भी नई पीढ़ी को बताना चाहिए कि भारत की जनता किसी राजा के
राग-दरबारियों या मनसबदारों के पीठ पर सवार होकर भविष्य की यात्रा तय
नहीं करती है; उसके लिए जनसंवेदना से सने/सम्पृक्त भाव-विचार-क्रिया और
ज्ञान चाहिए।

इस तरह लोगों को यह अहसास दिलाया जाना अत्यावश्यक है कि अंग्रेजी की
तरफ़दारी/तीमारदारी में चाहे जितने भी तर्क-विचार झोंक दें; भारतीय जनमानस
को हम वह हरग़िज नहीं दे सकते हैं जो वह ‘गणपति बप्पा मोरया’ कहते हुए
हासिल कर लेती है। विशेषतया हिन्दी भाषा अपनी मुहावरों-लोकोक्तियों में
प्रतिरोध का जो विधि-विधान रचती है; वह जादूगरी की भाषा में वाक्-कुशल उन
लोगों की भी जमकर ख़बर लेती है जो अपनी भाषा के लिए कथित तौर पर ‘रोडमैप’
तैयार करते नज़र आते हैं या फिर बेहतरीन ‘ब्लूप्रिंट’ होने का हवाला देते
हैं। दरअसल, यह जनता है जो सबकुछ न सही इतना तो अवश्य ही जानती है कि-इन
कथित जादूगरों के पास ‘न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी'। आइए, हम अपनी
ज़बान का तेल निचुड़ने से बचाएं और जनभाषा का नीम-अर्क पीते हुए अपनी तबीयत
तंदुरुस्त रखें। क्योंकि कल की तारीख में ये चटकीले जुमलों के जादूगर भी
हमारी भाषा के नेतृत्व में शामिल होंगे। आमीन!
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